शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
१३० ] [ श्री शारदा तिलक
करने वाले चन्द्र खण्ड के आभरण से भूषित, तीन नेत्र धारी, ऐसे अर्धा-
म्बिकेय वपु का होम समाश्रय ग्रहण करते हैं ।४०। पूर्व में बतलाते हुए
मार्ग के ही द्वारा विधि के सहित उनका अर्चन करना चाहिए । जिसके
आदि में केशव हो और नमः इस पद से समन्वित हो ऐसी स्मराद्य
मातृका का कर न्यास करना चाहिए ।४१। वह धातुएं, त्वचा सृक्
मांसादि, प्राण शक्ति और आत्मा से युक्त मकारादि में क्रम से हैं ।
इसका ऋषि प्रजापति और छन्द गायत्र कहा गया है ।४२। अर्ध लक्ष्मी
हरि को यहाँ पर साक्षात देवता को कहा गया है। दीर्घ छः हैं जो अभी
पूर्व में बताये गए हैं । इनसे युक्त आदि बीज से षट् अंगों का समाचरण
करना चाहिए ।३३। अब ध्यान है—अपने करों से सरसिज, गदा, शंख,
विद्या परम-आदर्श (दर्पण)-मेघ की विद्युत के विलास से संयुक्त सुवर्ण
निर्मित कलशको धारण करने वाले, वाम भागमें अविरला कल्प उत्तुंग
स्तन के आश्लेष के लोभ से ऐकीभूत पुण्डरीकाक्ष और लक्ष्मी का वपु
रक्षा करे ।४४।
अत्रार्चनादिकं सर्वं प्राग्वन्मन्त्री समाचरेत् ।
शक्तिपूर्वा तनौ न्यस्येन्मातृकां मन्त्रवित्तमः ।४५
ऋषिः शक्तिः स्मृतं छन्दोगायत्रं देवता बुधैः ।
संप्रोक्ता विश्वजननी सर्वसौभाग्यदायिनी ।४६
दीर्घाद्धेन्दुयुजाङ्गानि कुर्यान्मायात्मना बुधः ।४७
उद्यत्कोटिदिवाकरप्रतिभरोत्तुङ्गोरूपीनस्तनीं
बद्धार्द्धेन्दुकिरीटहाररसनामञ्जीर संशोभिता ।
विभ्राणा करपंकजैर्जपवटीं पाशाङ्कुशौ पुस्तकं
दिश्याद्वो जगदीश्वरी त्रिनयना पद्म निषण्णा सुखम् ॥४८
पुरोदितेन विधिना देवीमन्वहमर्चयेत् ।
न्यसेच्छ्रीबीजसंपन्नां मातृकां विधिना तनौ ।४६
ऋषिर्भृगुः स्मृतं छंदो गायत्रं, देवता स्मृता ।
समस्तसम्पदामादिर्जगतां नायिका बुधैः ।५०
प्रावप्रस्तुतेन बीजेन कुर्यादङ्गानि साधकः ।५१
षष्ठ पटल } [ १३१
यहाँ पर मन्त्रधारी व्यक्ति अर्चन आदि सब कर्म का पूर्व की ही
भाँति समाचरण करे । मन्त्र वेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष तनु में पूर्व में शक्ति
से समन्वित मातृका का न्यास करे ।४५। बुधों के द्वारा इसका ऋषि
शक्ति, गायत्र छन्द और देवता सब प्रकार के सौभाग्यों का प्रदान करने
वाली विश्व जननी को कहा गया है ।४६। बुद्ध पुरुष छै दीर्घ जो कि
अभी पूर्व कहे गये हैं—अर्धेन्दु-विन्दु, इससे युक्त माय्य के स्वरूप वाले
बीज से अंगों का समाचरण करे ।४७। अब ध्यान कहा जाता है—उगते
हुए करोड़ों दिवाकरों के समान प्रतिभा, ऊँचे और पीन स्तनों से
शोभित कर कमलों के द्वारा जपवटी, पाश, अंकुश, पुस्तक को धारण
करने वाली, तीन नयनों से समन्वित, पद्मासन पर सुखपूर्वक विराज-
मान जगदीश्वरी आपका कल्याण करे ।४८। पूर्वमें वर्णित विधि-विधान
से ही प्रतिदिन देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए । और विधि के साथ
ही तनु में श्रीबीज से सुसम्पन्ना मातृका का न्यास करे ।४६। इसका
ऋषि भृगु-छन्द गायत्र और इसका देवता बुधों के द्वारा सम्पूर्ण सम्प-
दाओं की आदि जगतों की नायिका कही गयी है ।५०। साधक पूर्व में
प्रस्तुत बीज के द्वारा अङ्गों को करे ।५१।
विद्युद्दामसमप्रभां हिमगिरिप्रख्यैश्चतुर्भिर्गजैः ।
शुण्डादण्डसमुद्धृतामृतघटैरासिच्यमानामिमाम् ।५१
बिभ्राणां करपङ्कजैर्जपवटीं पद्मद्वयं पुस्तकम् ।
भास्वद्रत्नसमुज्ज्वलां कुचनतां ध्यायेज्जगत्स्वामिनीम् ।५२
आराधयेदिमां प्रोक्तावर्त्मना कुसुमादिभिः ।
न्यसेत्स्कराद्यां वपुषि मातृकां मङ्गलप्रदाम् ।५३
ऋषिः संमोहनः प्रोक्तश्छन्दो गायत्रमुच्यते ।
देवता मंत्रिभिः प्रोक्ता समस्तजननी परा ।५४
स्मरेण दीर्घयुक्तेन विदध्यादङ्गकल्पनम् ।५५
बालार्ककोटिरुचिरां स्फटिकाक्षमालां
कोदण्डमिक्षुजनितं स्मरपञ्चबाणान् ॥
१३२ [ श्री शारदा तिलक
विद्यां च हस्तकमलैर्दधतीं त्रिनेत्रां
ध्यायेत्समस्तजननीं नवचन्द्रचूडाम् ॥५६
ध्यान—विद्युल्लता के सदृश प्रभा से अन्विता, हिमवान् पर्वत के
समान अर्थात् विशाल चार गजों के द्वारा सूड़ों के द्वारा समुद्धृत अमृत
के कलशों से अभिषिञ्चन की गयी, कर कमलों से जपवटी, दो परम
पुस्तक को धारण करने वाली, देदीप्यमान रत्नों के समुदाय से समु-
ज्ज्वल, स्थूल कुचों के भार से नीचे की ओर झुकी हुई जगतों की स्वा-
मिनी का ध्यान करना चाहिए ।५२। पूर्व में वर्णन की हुई विधि से
कुसुम आदि उपचारों के द्वारा इनकी आराधना करनी चाहिए । स्म-
राद्या-मंगलों की प्रदात्री मातृका शरीर में न्यास करे ।५३। इसका ऋषि
सम्मोहन और छन्द गायत्र कहा जाता है। मन्त्र धारियों ने इसका
देवता परा समस्त जननी बताया है ।५४। दीर्घों से युक्त स्मर से अंगों
की कल्पना करनी चाहिए ।५५। ध्यान कहा जाता है—करोड़ों बाल
सूर्यों के समान रुचिरा, हस्त कमलों के द्वारा स्फटिकाक्षों की माला,
इक्षुजनित कोदण्ड स्मर (कामदेव) के पाँच वाण और विद्या को धारण
करनी वाली, तीन नेत्रों से अन्वित, नवीन चन्द्र को चूड़ा में रखने
वाली समस्तों को जन्म देने वाली का ध्यान करना चाहिए ।५६।
अर्चनाविक्रियाः सर्वाः प्रोक्ताः पूर्वविधानतः ।
शक्तिश्रीकामबीजाढ्यां देवी वर्णतनुं भजेत् ।५७
ऋषिः पूर्वोदितश्छन्दोगायत्रं, देवता बुधैः ।
सम्मोहनी समुद्दिष्टा सर्वलोकवशङ्करी ।५८
आवर्तितैस्त्रिभिर्बीजैः षडङ्गानि प्रकल्पयेत् ।।५६
ध्यायेयमक्षवलयेक्षुशरासपाशान् पद्मद्वयाङ्कुशशरान्नवपुस्तकञ्च।
आविभ्रतीं निजकरैररुणां कुचार्त्ता संमोहिनीं त्रिनयनां तरुणेन्दु-
चूडाम् ।६०
यजेदावरणैः सार्द्धमुमचारैः सुशोभनाम् ।
प्रपञ्चयाग वक्ष्यामि सच्चिदानन्दसिद्धिदम् ।६१
षष्ठ पटल ] १३३
वेदादिशक्तिरजपा परमात्ममहामनुः ।
वह्नेर्जाया च कथिताः पञ्चमन्त्राः शुभावहाः ॥६२
तारशक्त्यादिकां न्यस्येदजपाऽऽत्मद्विठान्तिकाम्।
मातृकामुक्तमार्गेण सृष्ट्या देहे विधानवित् ॥६३
ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दो गायत्रमीरितम्।
समस्तवर्णसं व्याप्तं परं तेजोऽस्य देवता ॥६४
अर्चन आदि की पूर्ण क्रिया सभी पूर्व विधान से कही गयी है ।
शक्ति,श्री, काम बीजाद्या, वर्ण तनु वाली देवी का ध्यान करना चाहिये।
।५७। बुधों के द्वारा ऋषि पूर्व में कहा गया है। छन्द इसका गायत्र
होता है और इसका देवता सब लोकों को वश में करने वाली सम्मोहनी
बताया गया है ।५८। अवर्तित तीन बीजों से षडङ्गों की कल्पना करनी
चाहिए ।५६। (ध्यान) अपने कर कमलों के द्वारा अक्ष वलय, इक्षु,धनुष,
पाश, दो पद्म, अंकुश, शर, नव पुस्तक को धारण करने वाली, अरुण
वर्ण वाली, पीन एवं उत्तुङ्ग कुच युग के भार से पीड़ित, तीन नयनों
की धारिणी, तरुण चन्द्र को अपनी चूड़ा में रखने वाली सम्मोहनी का
ध्यान करता हूँ ।६०। उपचारों के द्वारा आवरणों के सहित सुशोभना
का अभ्यर्चन करना चाहिए । अब प्रपञ्चयाग के विषय में बतलाया
जायेगा जो सच्चिदानन्द की सिद्धि के प्रदान करने वाला होता है ।
वेदादि प्रणव, शक्ति, अजपा-हंस, परमात्मा का महामन्त्र-सोऽहम्,
वह्नि की जाया, स्वाहा के पाँच मन्त्र परम शुभके आवाहन करने वाले
कहे गये हैं ।६१।६२। आत्मा-परमात्मा का मन्त्र, अजपा पूर्व में अभी
बताया गया है, और अन्त में दो प्रकार वाली अर्थात् द्वन्द्व इस रूप
वाली तारशक्ति आदिक का न्यास करे । विधान के ज्ञान रखने वाला
पुरुष देह में सृजन से कथित मार्ग के द्वारा मातृका न्यास करे । इसका
ऋषि ब्रह्मा कहे गए हैं और छन्द गायत्र बताया गया है । समस्त वर्णों
में भली भाँति व्याप्त परम तेज ही इसका देवता होता है ।६३।६४।
१३४ ] [ श्री शारदा तिलक
स्वाहाद्यैः पञ्चमनुभिः पञ्चाङ्गानि प्रकल्पयेत् ।
अस्त्रं दिक्षु बुधः कुर्याद्भूयो हरिहराक्षरैः ।६५
तारा दिपञ्चमनुभिः परिचीयमानं
मानैरगम्यमनिशं जगदेकमूलम् ।
सच्चित्समस्तगमनश्वरमच्युतं तत्तेजः
परम्भजत सान्द्रसुधाम्बुराशिम् ।।६६
पञ्चभूतमया वर्णा वर्गेभ्यः प्रागुदीरिताः ।
तस्माज ज्ञानेन्द्रियात्मानः प्रपञ्च मन्मयं विदुः ।६७
देहोऽपि तादृशस्तस्मिन्न्यसेद्वर्णान्विलोमतः ।
तत्तत्स्थानयुतान्मन्त्री जुहुयात् परतेजसि ।६८
एवं वर्णमयं होमं कृत्वा दिव्यतनुर्भवेत् ।
न्यस्य मन्त्री यथान्यायं देहे विश्वस्य मातरम् ।६६
जपेन्मन्त्रान्भजेद्देवान्यजेदग्निमनन्यधीः ।
द्रव्यैश्च जुहुयादग्नौ मन्त्रवित्तन्त्रचोदितैः ।७०
स्वाहा आदि पाँच मन्त्रों के द्वारा पांच अंगों की कल्पना करनी
चाहिए । बुध पुरुष अस्त्र को दिशाओं में करे और पुनः हरिहर अक्षरों
के द्वारा करना चाहिए । ध्यान बतलाया जाता है—तारा आदि पाँच
मन्त्रों के द्वारा परिचीयमान-मन्त्रों के द्वारा अगम्य-निरन्तर जगतों का
एकमात्र मूल-सच्चित् समस्त में गमन करने वाले-अनश्वर अर्थात् नित्य
एवं नाश रहित-अच्युत-सान्द्र (सघन) सुधा का महा सागर उस परम
तेज का सेवन करो ।६५।६६। वर्ण पाँच भूतों के स्वरूप वाले होते हैं ।
जो पूर्व में ही वर्गों के द्वारा कहे गए हैं । इस कारण से ज्ञानेन्द्रियों के
स्वरूप वाले प्रपंच को तन्मय कहा करते हैं ।६७। यह देह भी ठीक उसी
भांति का होता है विलोमसे वर्णों का न्यास करना चाहिए । मन्त्रधारी
उस-उस स्थान से युक्तों का पर तेज में हवन करे ।६८। इसी रीति से
वर्णों के स्वरूप वाले होम को करके होम करने वाला दिव्य शरीर से
युक्त हो जाया करता है । मन्त्र को धारण करने वाला पुरुष न्याय के
षष्ठ पटल ] [ १३५
अनुसार विश्व की माता का देह में न्यास करे ।६६। अनन्यधी वाले
को चाहिए कि वह मन्त्रों का जप करे—देवगणों का सेवन करे और
उसको अग्नियों का यजन करना चाहिए । मन्त्रों के ज्ञान रखने वाले
पुरुष को तन्त्र ग्रन्थों में बताये हुए द्रव्यों के द्वारा अग्नि में हवन करना
चाहिए ।७०।
अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षन्यग्रोधसमिधस्तिलाः ।
सिद्धार्थपायसाज्यानि द्रव्याण्यष्टौ विदुर्बुधाः ।७१
अमीभिर्जुहुयाल्लक्षं तदर्द्धं वा समाहितः ।
सर्वान्कामानवाप्नोति परां सिद्धिं च विन्दति ।७२
एभिरर्कसहस्राणि हुत्वा मन्त्रो विनाशयेत् ।
रिपून्क्षुद्रग्रहान्भूतान् ज्वराञ्छपांश्च पन्नगान् ।७३
मन्त्राणामयथावृत्तिप्रतिपाद्यसमुद्भवान् ।
विकारान्नाशयेदाशु होमोऽयं समुदीरितः ।७४
एभिस्त्रिमधुरोपेतै र्जुहुयाल्लक्षमानतः ।
अचिरादेव स सवेत्साक्षाद्भूमिपुरन्दरः ।७५
बुधजन हवन करने के लिए आठ द्रव्यों को बतलाते हैं—पीपल,
गूलर, पाकड़ वट की समिधायें, तिल सिद्धार्थ, पायस और घृत ये आठ
हैं ।७१। इन्हीं उक्त द्रव्योंके द्वारा एक लाख आहुतियाँ देनी चाहिए ।
अथवा परम सावधान होकर उसका आधा भाग अर्थात् पचास हजार
आहुतियाँ देवे । ऐसा होम करने वाला पुरुष अपनी सभी मनोवञ्छित
कामनाओं की प्राप्ति किया करता है और उसको परासिद्धि प्राप्त हो
जाया करती है ।७२। इनके ही द्वारा बारह सहस्र आहुतियाँ देकर मन्त्र
धारी शत्रुओं को, क्षुद्रग्रहों को, भूतों को ज्वरों को, शापों को, पलगों
को विनष्ट कर दिया करता है ।७३। मन्त्रों की अथवा वृत्ति की प्रति-
पत्ति से समुत्पन्न विकारों को बहुत ही शीघ्र यह होम नाश कर दिया
करता है—ऐसा ही इसको कहा गया गया है ।७४। तीन मधुरों से
उपेत इनके द्वारा एक लाख प्रमाण वाली आहुतियाँ देवे तो वह होम
१३६ [ श्री शारदा तिलक
कर्त्ता पुरुष अविलम्ब ही थोड़े समय में साक्षात् भू मण्डल का इन्द्र हो
जाया करता है ।७५
अमीभिः साधको हुत्वा वश्यादीनापि साधयेत् ।
हुत्वा लक्षं तिलैः शुद्धैर्मुच्यते सर्वपातकैः ।७६
पायसान्नेव जुहुयान्मन्त्री सर्वसमृद्धये ।
पद्मानां लक्षहोमेन महतीं श्रियमाप्नुयात् ।७७
घृतेन जुहुयाल्लक्षं प्राप्नुयात् कीर्त्तिमुत्तमाम् ।
जातीकुसुमहोमेन सर्वलोकं वशं नयेत् ।७८
संशोधितैस्त्रिमध्वक्तैर्लवणैर्लक्षमानतः ।
जूहूयाद्गुलिकाः कृत्वा वशयेत्सर्वमञ्जसा ।७९
लिखित्वा पत्रखण्डेषु मातृकार्णान्पृथक् पृथक् ।
अभ्यर्च्य जुहुयाद्वह्नौ तत्पत्राक्षरमुच्चरन् ।८०
अभिचारहरो होमः सर्वरक्षाप्रसिद्धिदः ।
सहस्रहोमे वितरेद्दक्षिणान्निष्कमानतः ।८१
साधना करने वाला पुरुष इनके द्वारा हवन करके वश्य आदि को
भी साधित कर लिया करता है। शुद्ध तिलों के ही द्वारा होम करके
जो कि एक लाख आहुतियों को होना चाहिए, मनुष्य समस्त पातकों से
छुटकारा पा जाया करता है ।७६। मन्त्रधारी पुरुष सब प्रकार की
समृद्धि की प्राप्ति करने के लिये पायसान्न के द्वारा होम करे। एक
लाख पद्मों के होम करने से मनुष्य बड़ी भारी श्री की प्राप्ति किया
करता है ।७७। घृत से एक लाख आहुतियों के द्वारा होम करे तो वह
उत्तम कीर्ति को प्राप्ति कर लिया करता है। जाती के कुसुमों के द्वारा
होम करने से सम्पूर्ण लोक को अपने वश में कर लिया करता है।
।७८। संशोधित तीन मधुरों से अक्त लवणों से एक लाख मान वाला
होम करे और गुलिका बनाकर करे तो तुरन्त ही सबको अपने वश में
कर लिया करता है ।७६। पत्रों के खण्डों में मातृका के वर्णों को पृथक्-
पृथक् लिखकर फिर उनका अभ्यर्चन करे और इसके अनन्तर उन पत्रों
षष्ठ पटल ] १३७
के अक्षरों को मुख से उच्चारण करते हुए अग्नि से होम करे तो यह
होम अभिचार के हरण करने वाला होता है और सबसे रक्षा करने
वाला तथा प्रसिद्धि के देने वाला हुआ करता है। एक सहस्र के होम में
एक निष्क प्रमाण की अवधि वाली दक्षिणा का वितरण करना चाहिए।
= : ० ८ ५ ।
अर्द्धं वा शक्तितोद्याद्यथोक्तं फलमाप्नुयात् ।
तनया सप्त सञ्जप्तं पिवेत्प्रातर्दिने दिने ।८२
सलिलं स भवेद्वाग्मी लभते कवितां पराम् ।
ब्राह्मीरस वचा कल्कै पयसा विपचेद् घृतम् ।८३
अयुतं मातृकाजप्तमर्चितं च विधानतः ।
पिवेत्प्रातः स मेधावी भवेद्वाक्पतिसत्तमः ।८४
ब्राह्मीसहस्रसंजप्तां वचां वा पयसा पिवेत् ।
स लभेन्महतीं मेधामचिरान्नात्र संशयः ।८५
पूर्वोक्तं पङ्कज कृत्वा कुम्भं संस्थाप्य पूर्ववत् ।
क्वाथेन पूरयेन्मन्त्री यथावत् क्षीरशाखिनाम् ।८६
अष्टगन्धं विलोड्यास्मिन्नवरत्नसमन्विते ।
आवाह्य पूजयेद्देवीं मातृकामुक्तमार्गतः ।८७
अथवा एक निष्क सुवर्ण की दक्षिणा देने की शक्ति न होवे तो
अपनी शक्ति के अनुसार ही देवें या आधा निष्क देवें । जैसा कहा गया
है इसका भी वैसा ही फल प्राप्त किया करता है। इसके द्वारा सात बार
जप किये हुए का प्रातःकाल में प्रतिदिन जल का पान करे तो वह पीने
वाला वाग्मी हो जाता है और परम कवित्व की शक्ति का लाभ लिया
करता है । ब्राह्मी बूँटी का रस और वच के कल्क को दूध के साथ घृत
का पाचन करे और दश सहस्र मातृका के द्वारा अभिमन्त्रित और
विधान से समचित करके प्रातःकाल पान करें तो वह परम मेधावी और
श्रेष्ठ वाक्पति हो जाया करता है ।८२।८४। एक सहस्रवार जप की
हुई ब्राह्मी अथवा वच को दूध के साथ पीवे तो वह पुरुष बड़ी भारी
• १३८ ] [ श्री शारदा तिलक
मेधा का लाभ करता है और शीघ्र ही किया करता है—इसमें लेश
मात्र भी संशय नहीं है ।८५। पूर्व में वर्णित किए हुये पद्म को बनाकर
पहिली की भाँति कुम्भ की संस्थापना करे । फिर मन्त्रधारी पुरुष क्षीर
वाले वृक्षों के क्वाथ से उसे पूरित कर देवे ।८६। इसमें अष्टगन्ध को
विलोडित करके उसे नौ प्रकार के रत्नों से समन्वित कर देवे । फिर
उसमें पूर्व में कहे हुए मार्ग के द्वारा मातृका देवी का आवाहन करके
उसका पूजन करना चाहिये ।८७।
सहस्रासाधितैस्तोयैरभिषिञ्चेत्प्रियं नरम् ।
भानुवार' शेभे लग्ने ब्राह्मणानपि भोजयेत् ।८८
गुरवे दक्षिणां दद्याद् भक्तियुक्तः स्वशक्तितः ।
रक्षाकरं विशेषेण कृत्वा द्रोहोपशान्तिदम् ।८६
ऐश्वर्यजननं पुंसां सर्वसौभाग्यसिद्धिदम् ।
अभिषेकमिमं प्राहर्विश्वसंवननं (मोहनं) परम् ।६०
पूर्वोक्तं मण्डलं कृत्वा मन्त्री नवपदान्वितम् ।
मध्यादि स्थापयेत्तेषु पदेषु कलशान्नव ।६१
तन्तुभिर्वेष्टितान् शुद्धान्वहिश्चन्दनचर्चितान् ।
सुधूपवासितान् मन्त्री दूर्वाक्षतसमन्वितान् '६२
एक सहस्र वार साधित अर्थात् अभिमन्त्रित जल से अपने प्रिय
मानव का अभिषिञ्चन करना चाहिए । रविवार के दिन किसी परम
शुभ लग्न में करे और ब्राह्मणो को भी भोजन कराना चाहिए ।८८।
भक्ति की भावना से समन्वित होकर अपनी शक्ति के अनुसार गुरुदेव
को दक्षिणा समर्पित करे । यह द्रोह की उपशान्ति का देने वाला विशेष
रूप से रक्षा के करने वाला होता है । यह पुरुष के ऐश्वर्य को उत्पन्न
करने वाला है और सब सौभाग्य की सिद्धि का प्रदाता होता है । इस
अभिषेक को मनीषीगण विश्व का पर मोहन करने वाला कहा करते
हैं ।८६।६०। मन्त्रधारी पूर्वमें कथित नौ पदोंसे समन्वित मण्डल बनावे,
मध्यादि में उन पदों में नौ कलशों की स्थापना करनी चाहिए ।६१।
षष्ठ पटल ] [ १३६
उनको तन्तुओं से वेष्टित करे और शुद्धतापूर्वक वाहिर चन्दन से चर्चित
कर देना चाहिए । मन्त्रधारी पुरुष उनको सुन्दर धूप से सुवासित करे
और दूर्वा तथा अक्षतों से अन्वित कर देवे ।६२।
आपूर्य शुद्धतोयैस्तु (स्तान्) वेष्टयेदंऽशुकैस्तुतान् ।
मुक्तामाणिक्यवैदूर्यगोमेदान्वज्रविद्रुमौ ।६३
पुष्परागं मरकतं गरुडोन्दारमेव च ।
उक्तानि नव रत्नानि तेषु कुम्भेषु निःक्षिपेत् ।६४
विष्णुक्रान्तामिन्द्रवल्लीं देवीं दूर्वाश्व निःक्षिपेत् ।
स्थापयेत्कुम्भवक्त्रं षु कङ्कोलांश्चूतपल्लवान् ।६५
विन्यसेदक्षतोपेतांश्च फलान्वितान् ।
मध्येकुम्भं समाराध्य देवी मन्त्री वृषादितः ।६६
अर्चयेद्दिक्षु कुम्भेषु व्यापिन्याद्याः पुरोदिताः ।
वर्णमन्त्रयुता प्रोक्तलक्षणः सर्वसिद्धिदाः ।६७
शर्कराघृतसंयुक्तं पायसं च निवेदयेत् ।
स्पृष्ट्वा कुम्भान्कुशैर्विद्यां जपेत्साग्रंशतं शतम् ।६८
फिर उन कलशों को शुद्धि जल से आपूरित करे और उनको वस्त्रों
से वेष्टित कर देना चाहिए । नौ रत्नों के नाम—मुक्ता, माणिक—
वैदूर्य्य—गोमेद—वज्र (हीरा)—विद्रुम—पुष्पराग मरकल—गरु-
डोन्दार ये नौ रत्न होते हैं । इन नौ रत्नो के नाम बता दिए गए हैं
इनको उन कलशों में डाल देना चाहिए ।६३।६४। फिर उनमें विष्णु
क्रान्ता—इन्द्र वल्ली—देवी और दूर्वा का निक्षेप करे । उन कुम्भों के
मुखों में कंकोल और आम्र के पत्तों को स्थापित कर देना चाहिये ।६३।
।६५। वहाँ पर अक्षतों से उपेत तथा फलोंसे अन्वित चषकों का विन्यास
करे । मध्य में जो कुम्भ है वहां पर मन्त्रधारी देवी की समाराधना
करके वृषादि से दिशाओं में कुम्भों में पूर्व में उदित व्यापिनी आदि
का अर्चन करना चाहिए । पूर्व में कहे हुए लक्षणों से युक्त-वर्ण और
मन्त्र से युक्त सब सिद्धियों की प्रदात्री है ।६७। शर्करा और घृत
१४० [ श्री शारदा तिलक
से संयुक्त पायस को निवेदित करे । कुशाओं से कुम्भों का स्पर्श करके
साग्रशत-शत विद्या का जप करना चाहिए ।६८।
अभिषिञ्चेद्विलोमेन साध्यं त दत्तदक्षिणम् ।
सर्वपापक्षयकरं शुभदं शान्तिसिद्धिदम् । ६६
कृत्याद्रोहादिशमनं सौभाग्यश्रीजयप्रदम् ।
पुत्रप्रदं च वन्ध्यागामभिषेकमम्विदुः ।१००
ज्वरार्त्तं स्वपूरः स्थित्वा जपेत्साग्रं सहस्रकम् ।
ज्वरो नश्यति तस्याश क्षुद्रभूतग्रहा अपि ।१०१
परतेजसि सञ्चिन्त्य शुभ्रं स्रुतसुधामयम् ।
विधुं विद्यां जपेद्योगो त्रिषरोगविनाशकृत् ।१०२
बलीपलितरोगघ्नः क्षुत्पिपासाप्रणाशनः ।
पुष्टिदः सर्वसौभाग्यदायी लक्ष्मीशुभप्रदः ।१०३
विलोम से दी हुई दक्षिणा वाले उस साध्य का अभिषिञ्चन करना
चाहिए । यह अभिषेक समस्त पापोंके क्षय कर देने वाला शुभोंका दाता
और शान्ति तथा सिद्धि के देने वाला होता है । यह कृत्या के दोषों का
प्रशमन करने वाला—सौभाग्य, श्री और जय के देने वाला है । यह
अभिषेक वन्ध्या नारी को पुत्र प्रदान करने वाला होता है । ।६६-१००
जो मनुष्य ज्वर से आर्त्त होवे उसके आगे स्थित होकर साग्रसहस्र वार
जप करे तो उसका ज्वर शीघ्र ही नष्ट हो जाया करता है और क्षुद्र
भूत ग्रह भी विनष्ट हो जाया करते हैं ।१०१। पर तेज में शुभ्र स्रुत
सुधामय को सञ्चिन्त्य करके विधु विद्या का जप करे तो यह योग विष-
रोग के विनाश करने वाला होता है ।१०२। वली और पलित के रोग
का नाशक तथा क्षुधा और पिपासा के विनाश करने वाला है। यह
पुष्टि का दाता—सब प्रकार के सौभाग्य का प्रदाता और लक्ष्मी एव शुभ
का देने वाला है ।१०३।
सोमसूर्याग्निरूपाः स्युर्वर्णाः लोहत्रयं तथा ।
रौप्यमिन्दुः स्मृतो हेम सूर्य्यताम्रं हुताशनः ।१०४
षष्ठ पटल ] १४१
लोहभागाः समुद्दिष्टाः स्वरात्तक्षरसंख्यया ।
तैर्लोहैः कारयेन्मुद्रामसङ्कलितसङ्गताम् ॥१०५
साग्रं सहस्रं सञ्जप्य स्पृष्ट्वा यां जुहुयात्ततः ।
तस्यां सम्पातयेन्मन्त्री सर्पिषा पूर्वसंख्यया ।१०६
निःक्षिप्य कुम्भे तां मुद्रामभिषेकोक्तवर्त्मना ।
आवाह्य पूजयेद्देवीमुपचारैः समाहितः ।१०७
अभिषिच्य विनीताय दद्यात्तां मुद्रिकां गुरुः ।
इयं रक्षः क्षुद्ररोगविषज्वरविनाशिनी ।१०८
व्यालचौरमृगादिभ्यो रक्षां कुर्याद्विशेषतः ।
युद्धे विजयमाप्नोति धारयन्मनुजेश्वरः ।१०६
विभजेन्मातृकां मन्त्री नव वर्गान्यथाक्रमात् ।
अष्टावष्टौ स्वराः स्पर्शाः पंचशो व्यापका अपि ।११०
तीन प्रकार के लोह सोम-सूर्य और अग्नि के स्वरूप वाले हैं।
इनके वर्ण इसी प्रकार के होते हैं। रौप्य (चाँदी) चन्द्रमा है, हेम सूर्य
कहा गया है और ताम्र अग्नि है ।१०४। लोह भाग स्वर आदि अक्षरों
की संख्या से समुद्दिष्ट किये गये हैं। उन लोहों के द्वारा असंकलित
अर्थात् अमिलित से सङ्गत मुद्रा करनी चाहिए ।१०५। साग्र अर्थात्
अष्टाधिक एक सहस्र भली भांति जप करके उमका स्पर्श करके फिर
होम करना चाहिए । मन्त्रधारी उसमें पूर्व संख्या से घृत से सम्पातन
करे ।१०६! उस मुद्रा को अभिषेक में कहे हुए मार्ग से कुम्भ में निक्षिप्त
करके देवी का आवाहन करके पूजनोपचारों के द्वारा सावधान होकर
पूजा करे ।१०७। गुरु अभिषेक करके उन मुद्राओं को विनीत साधक
को दे देवे । यह मुद्रा राक्षस, क्षुद्र रोग, विष और ज्वर का विनाश
करने वाली होती है ।१०८। विशेष रूप से व्याल, चोर और पशु आदि
से रक्षा किया करती है । राजा इसको धारण करता हुआ युद्ध में
विजय को प्राप्त किया करता है ।१०६। मन्त्रधारी मातृका को यथा
क्रम नौ वर्गों में विभाजित करे । आठ-आठ स्वर हैं और स्पर्श पाँच
व्यापक भी हैं ।११०
१४२ ] [ श्री शारदा तिलक
नव वर्गाः समुत्पन्ना नवरत्नेश्वरा ग्रहाः ।
अर्केन्दुरक्तज्ञगुरुभृगुमन्दाहिकेतवः ।१११
माणिक्यं मौक्तिकं चारु विद्रुमं गारुडं पुनः ।
पुष्परागं लसद्वज्रं नीलं गोमेदिकं शुभम् ।११२
वैदूर्यं नव रत्नानि मुद्रान्तैः कल्पयेच्छुभाम् ।
जपहोमादिकं सर्वं कुर्यात्पूर्वोक्तवर्त्मना ।११३
योमुद्रां धारयेदेनां तस्य स्युर्वंशगा ग्रहाः ।
वर्द्धते तस्य सौभाग्यं लक्ष्मीरव्याहता भवेत् ।११४
कृत्याद्रोहा विनश्यन्ति नश्यन्ति सकलापदः ।
रक्षोभूतपिशाचाद्या नेक्षन्ते तं भयाकुलः ।११५
उपर्युपरि वर्द्धन्ते धनरत्नादिसम्पदः ।११६
तार्तीयोज्ज्वलकाणकं स्वरयुगैराविर्भवत्केसरम्
वर्गोद्भासिवसुच्छेद वसुमतीगेहेन सम्वेष्टितम् ।
ताराधीश्वरवारिवर्णविलसद्धिक्कोणसंशोभितम्
यन्त्रं वर्णतनोः पदं निगदित सर्वामयघ्नं परम् ।११७
नौ वर्ग उत्पन्न हुए। नौ रत्न हैं और नौ ग्रह होते हैं। उन ग्रहों
के नाम—सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, भृगु, शनि, राहु और केतु ये
होते हैं ।१११। माणिक्य, मौक्तिक, विद्रुम, गारुड, पुष्पराग, वज्र,
नीलम, गोमेद, चारु ये रत्नों के नाम होते हैं ।११२। उनमें वैदूर्य—
नवरत्न से शुभमुद्रा की कल्पना करनी चाहिए । जप और होम आदि
सब पूर्व में बताये हुए मार्ग से करे ।११३। जो पुरुष इस मुद्रा को
धारण किया करता है उसके वश में गमन करने वाले सभी ग्रह हुआ
करते हैं । उस पुरुष का सौभाग्य बढ़ा करता है और उसकी अव्याहत
गति होती है ।११४। कृत्या कृत द्रोह विनिष्ट हो जाया करते हैं और
सभी आपदाएं विनाश को प्राप्त हो जाया करती हैं । राक्षस, भूत
और पिशाच आदि तो भय से बेचैन होकर उसकी ओर अपनी दृष्टि
भी नहीं डाला करते हैं ।११५। धन और रत्नों आदि की सम्पदायें
सप्तम पटल ] [ १४३
ऊपर-ऊपर हो जाने की उस मनुष्य के गृह में स्पर्धा किया करती हैं
अर्थात् एक दूसरों से अत्यधिक बढ़ जाने की होड़ किया करती हैं
।११६। अब एक मन्त्र बतलाया जाता है—तार्त्तीय—कर्णिका बीज—
ताराधीश्वर, वारिवर्ण—वकार इनसे शोभित कोण ओर दिशा से
भूषित, तार्ती से उज्ज्वल कोण युक्त दो स्वरों से आविर्भूत केसर वाला-
वर्गोद्भासी आठ मन्त्रों वाला भूपुर से संवेष्ठित यह वर्णतनु का मन्त्र
कहा गया है, जो सब भयों का नाशक होता है ।११७।
———
सप्तम पटल
अथ भूतलिपिं वक्ष्ये सुगोप्यमतिदुर्लभम् ।
यां प्राप्य शम्भोर्मु नयः सर्वान्कामान्प्रपेदिरे ।१
पञ्च ह्रस्वाः सन्धिवर्णा व्यामेराग्निर्जलन्धरा ।
अन्त्यमाद्यं द्वितीयं च चतुर्थं मध्यमं क्रमात् ।२
पञ्च वर्गाक्षराणि स्युर्वान्तश्वतेन्दुभिः सह ।
एषा भूतलिपिः प्रोक्ता द्विचत्वारिंशदक्षरैः ।३
आयम्बराणं वर्गाणां पञ्चमाः शार्णसंयुताः ।
वर्गाद्या इति विज्ञेया नव वर्गाः स्मृता अमी ।४
व्योमेराग्निजलक्षोणी वर्गवर्णान्पृथक् विदुः ।
द्वितीयवर्गे भूर्न स्यान्नवमे जल धरा ।५
इसके अनन्तर भूत लिपि के विषय में बतलायेंगे जो बहुत ही
सुगोपनीय हैं और अत्यन्त दुर्लभ है । जिसको शम्भु से प्राप्त करके
मुनिगण ने अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त कर लिया था ।१। पाँच
ह्रस्व हैं—यथा—अ इ उ ऋ लृ, सन्धि वर्ण—ए-ऐ-ओ-औ है क्योंकि
अकार और इकार की सन्धि होने पर ही 'ए' बनता है । व्योम—
१४४ [ श्री शारदा तिलक
हकार, ई, ऐ—यकार, अग्नि—रकार, जल—वकार धरा—लकार—
यह तीसरा वर्ग होता है। अन्त्य अर्थात् अन्त में होने वाला ङकार
और आद्य अर्थात् आदि में रहने वाला—ककार । द्वितीय—खकार,
चतुर्थ घकार मध्यम—गकार, यही क्रम चारों में होता है। इस प्रकार
के वर्गों का अष्टक होता है। पांच वर्ग के अक्षर होते हैं दान्त—शकार,
चेतः—षकार, इन्दु—सकार । यह भूतलिपि ब्यालीस अक्षरों की कही
गयी हैं। २।३। अम्बराणं का अर्थ हकार होता है। अ-ए और अम्बराणं
इनमें द्वन्द्व समास होता है। वर्गाणं का अर्थ अ-क-च-र-त-प-य और श
अर्थ है। ये वर्गों के आद्य अक्षर होते हैं। ये नौ वर्ग कहे गये हैं ।४।
अब वर्णों के अक्षरों की भूत स्वरूपता बतलायी जाती है—अर्थात् नौ
वर्गों के प्रथम आदि वर्ण व्योम आदि नामों वाले होते हैं । आकाश,
वायु, अग्नि, जल और भूमि इन वर्गों के वर्णों को पृथक्-पृथक् जानना
चाहिये । द्वितीय वर्ग में भू नहीं है और नवम में जल और धरा नहीं
है ।५।
विरिञ्चिविष्णुरुद्राश्विप्रजापतिदिगीश्वराः ।
क्रियादिशक्तिसहिताः क्रमात्स्युर्वर्गदेवताः ।६
ऋषिः स्याद्दक्षिणामूर्तिगायत्रं छन्द ईरितम् ।
देवता कथिता सद्भिः साक्षद्वर्णेश्वरी परा ।७
हादिषड्वर्गकैः कुर्यात्षडङ्गानि सजातिभिः ।
ध्यायेल्लिपतरोर्मूले देवीं तन्मयपङ्कजे ।८
वदन्ति सुधियोवृक्षं नित्यं वर्णमयं शुभम् ।
परसञ्चिन्महाबीजं विन्दुनादमहाशिखम् ।६
पृथिव्यक्षरशाखाभिः सर्वाशासु विजृम्भितम् ।
सलिलाक्षरपत्रैःस्वैस्संछादितजगत्त्रयम् ।१०
अब नौ वर्गों के देवता बतलाये जाते हैं—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, अश्वि
प्रजापति और दिगीश्वर अर्थात् यम, वरुण और सोम ये क्रिया आदि
शक्ति के सहित क्रम से वर्गों के देवता होते हैं ।६। इसका ऋषि दक्षिणा-
पञ्चम पटल } [ १४५
मूर्त्ति है और छन्द गायत्र कहा गया है। इसका देवता सत्पुरुषों के द्वारा
साक्षात् परा वर्णेश्वरी कही गयी है ।७। हकार से आदि सजाति षड्
वर्गों के द्वारा षड अङ्गों को करना चाहिए। लिपि वृक्ष के मूल में
तत्स्वरूप पंकज में देवी का ध्यान करना चाहिए ।८। सुधीगण इसको
वर्णमय परम शुभ और नित्य वृक्ष कहते हैं। इसका परसम्वित् महा-
बीज है और विन्दुनाद महाशिफा है ।६। पृथिवी के अक्षरों की शाखाओ
से सभी दिशाओं में विजृम्भित है । अपने सलिलाक्षर सत्रों से तीनों
जगतों को आच्छादित करने वाला है ।१०।
वह्निवर्णांऽकुरैर्दीप्तं रत्नैग्वि सुरद्रुमम् ।
मरुद्वर्ण लसत्पुष्पैर्द्योतन्तं वपुः श्रियम् ।११
आकाशार्णफलैर्नम्यं सर्वभूताश्रयं परम् ।
पर मृताख्यमधुभिस्सिञ्चन्त परमेश्वरीम् ।१२
वेदागमादिभिः कॢप्तं समुन्नतिमनोहरम् ।
शिवशक्तिमयं साक्षात् छाया श्रितगतत्रयम् ।१३
एनमाश्रित्य मुनयः सर्वान्कामानवाप्नुयुः ।१४
अङ्कोन्मत्तशशाङ्ककोटिसदृशीमापीनतुङ्गस्तनीम्
चन्द्राङ्काङ्कितमस्तकां मधुमदादालोलनेत्रयाम् ।
विभ्राणामनिशं वरं जपवटीं विद्यां कपालं करै
सन्दृप्त्यां यौवनगर्वितां लिपितनुं वागीश्वरीमाश्रये ।१५
रत्नों से सुरद्रुम की ही भाँति यह वहिन वर्णों के अंकुरों से दीप्त
है। मरुद् वर्णों से शोभित पुष्पों के द्वारा वपु की श्री को द्योतित
करने वाला है ।११। आकाश वर्णों के स्वरूप वाले फलों से नम्र और
सर्वभूतों का आश्रय स्थल है । परामृत नामक मधुओं से परमेश्वरी का
सिञ्चन करता हुआ है ।१२। यह वेदों आगमों आदि से कॢप्त है तथा
भली भाँति उन्नति ऊँचाई से मनोह है। यह साक्षात् शिव शक्ति से
परिपूर्ण साक्षात् भ्रू छाया से तीनों जगतों का आश्रय दिए हुए हैं ।१३।
मुनिगण इस प्रकार से इस का समाश्रय ग्रहण करके सभी कामनाओं
१४६ ] [ श्री शारदा तिलक
कामनाओं को प्राप्त करते थे ।१४। अब ध्यान बतलाते हैं—अंक में
करोड़ों उन्मत्त चन्द्रों के सदृश है, थोड़े पीन (स्थूल) और ऊँचे कुच-
युगों वाली, अर्ध चन्द्र से अंकित मस्तक से युत, मधु के मद से ईषत्
चञ्चल तीन नेत्रों से अन्वित, करकमलों में निरन्तर वरदान—जपवटी,
विद्या, कपाल को धारण करने वाली, यौवन के गर्व से संदृप्त, लिपि
के तनुवाली भगवती वागीश्वरी का मैं समाश्रय ग्रहण करता हूँ ।१५।
आधारदेशेऽधिष्ठाने नाभौ हृदि गले पुनः ।
विन्दौ नादे ततः शक्त्यां शिवे देशिकसत्तमः ।१६
नवाधारेषु विन्यस्य स्वरान्नव यथाविधि ।
हादिवर्णांस्तनौ न्यस्येन्मुखे ऊर्ध्वादितः सुधीः ।१७
ऊर्ध्वमाहेन्द्रयाम्योदक्पश्चिमेषु समाहितः ।
दोः पत्सु पञ्चवर्गाणां वर्णान्देशिकसत्तमः ।१८
अग्रमूलोपमूलाग्रमध्यदेशक्रमेण तु ।
जठरे पार्श्वयुगले नाभौ पृष्ठे समाहितः ।१९
गुह्यहृद्भ्रूविले न्यस्येत शादिवर्णत्रयं क्रमात् ।
सृष्टौ सर्गाविसना स्यात्स्थितौ वह्निमरुत्पयः ।२०
वियद्भूमिक्रमान्न्यस्येद्बिन्दुसर्गाविसानिकाम् ।
संहृतौ प्रतिलोमेन विन्यसेद्बिन्दुभूषिताम् ।२१
श्रेष्ठ आचार्य आधार देश में, अधिष्ठान में, नाभि में, कण्ठ में,
विन्दु में, नाद में, शिव में, शक्ति में नवाधारों में विन्यास करके फिर
नौ स्वरों को विधि पूर्वक सुधी हकार से आदि वर्णों को स्तनों में न्यास
करे और मुख में ऊर्ध्वादि से करे ।१६।१७। ऊर्ध्व में समाहित होकर
माहेन्द्री, याम्य, उत्तर और पश्चिम में न्यास करे । श्रेष्ठ आचार्य
पाँचों वर्गों के वर्णों का बाहुओं और पादों में न्यास करे ।
अग्रमूल, उपमूलाग्र और मध्य देश के क्रम से समाहित होकर जठर
में, पार्श्वों के युगल में अर्थात् दोनों पार्श्वों में, नाभि में, पृष्ठ में
सप्तम पटल ] [ १४७
न्यास करे । १८-१९। क्रम से शादि तीन वर्णों का गुह्य-हृदय और
भ्रूविल में न्यास करना चाहिए । सृष्टि में सर्ग के अवमान वाली होवे
और स्थिति में यहित, जल, आकाश और भूमि के क्रम से विन्दु
और विसर्ग के अवसान वाली का न्यास करे । और संहार में प्रतिलोम
से विन्दुभूषिता का न्यास करना चाहिए । २०-२१।
आगमोक्तेन मार्गेण दीक्षितः साधकोत्तमः ।
लक्षं न्यसेजपेत्तावदयुतं जुहुयात्तिलैः ।२२
पूजयेदन्वहं देवीं पीठे प्रागीरिते सुधीः ।
वर्णाब्जेनासनन्दद्यान्मूर्त्तिं मूलेन कल्पयेत् ।२३
देवीं सम्पूजयेत्तस्यामङ्गाद्यावरणान्यजेत् ।
आदावङ्गावृत्तिः पश्चादम्बिकाद्याभिरीरिता ।२४
द्वितीया मातृभिः प्रोक्ता तृतीया द्वष्टशक्तिभिः ।
चतुर्थी पञ्चमी प्रोक्ता द्वात्रिंशच्छाक्तिभिः पुनः ।२५
चतुः षष्ठ्या स्मृता षष्ठो शक्तिःभिर्लोकनायकैः ।
सप्तमी पुनरेतेषामस्त्रैः स्यादष्टमावृत्तिः ।२६
एवं पूज्या जगद्धात्री श्रीभूतलिपिदेवता ।
स्थानेषु तेषु विधिवदभ्यर्च्य्याङ्गानि पूर्ववत् ।२७
आगमों में वर्णित मार्ग से साधकों में उत्तम दीक्षित होकर एक
लाख जप करे और दश सहस्र तिलों के द्वारा होम करना चाहिए ।२२
सुधी को चाहिए कि वह पूर्व में वर्णित पीठ पर देवी का प्रतिदिन
पूजन करे । वर्णाब्ज से आसन अर्पित करे । और मूल मन्त्र के द्वारा
मूर्त्ति की कल्पना करे ।२२! उसमें देवी का भली-भाँति पूजन करे और
अंग आदि आवरणों का यजन करना चाहिए । आदि में अंगों की
आवृत्ति और पीछे अम्बिकाद्याओं से कही गयी है । २४। दूसरी
मातृकाओं से बतायी गयी है । तीसरी सोलह शक्तियों के द्वारा होती
है । फिर चौथी और पाँचवी बत्तीस शक्तियों से कही गयी हैं ।२५।
शक्तियों से और लोक नायकों के द्वारा चौंसठ से छठवीं बतायी गयी
१४८ ] [ श्री शारदा तिलक
हैं। फिर इनके अस्त्रों से सातवीं करे। इस प्रकार से अष्टम आवृत्ति
होती है। २६। इस रीति से जगतों की धात्री श्रीभूत लिपि देवता का
पूजन करना चाहिए। पूर्व की भाँति उन स्थानों में विधि के साथ
अङ्गों का अभ्यर्चन करे। २७।
अम्बिका वाग्भवी दुर्गा श्रीशक्तिश्चोक्तलक्षणाः ।
ब्राह्मयाद्याः पूर्ववत् प्रोक्ताः कराली विकराल्युमा ।२८
सरस्वती श्रीदुर्गाषा लक्ष्मीश्रुतयौ स्मृतिधृतिः ।
श्रद्धा मेधा मतिः कान्तिराया षोडशक्तयः । २६
खड् खेटकधारिण्यः श्यामाः पूज्याः स्वलङ्कृताः ।
विद्या ह्री पुष्टयः प्रज्ञा सिनावाली कुहूः पुनः । ३०
रुद्रा वीर्या प्रभानन्दा स्याद्योषा ऋद्धिदा शुभा ।
कालरात्रिर्महारात्रिर्भद्रकाली कपर्दिनी । ३१
विकृतिर्दण्डिमुण्डिन्यौ सेन्दुरुखण्डा शिखण्डिनी ।
निशुम्भशुम्भमथिनी महिषासुरमर्दिनी । ३२
इन्द्राणी चैव रुद्राणी शङ्करार्र्द्धशरीरिणी ।
नारी नारायणी चैव त्रिशूलिन्यपि पालिनी ।३३
अम्बिका ह्लादिनी चैव द्वात्रिंशच्छक्तयःस्मृतः ।
चक्रहस्ताः पिशाचास्याः सम्पूज्याश्चोरुभूषणाः । ३४
अम्बिका, वाग्भवी, दुर्गा, और श्री शक्ति ये सब उक्त लक्षणों वाली
है। ब्राह्मी आदि पूर्व में की ही तरह कही गयी है। कराली, त्रिकराली,
उमा, सरस्वती, श्री, दुर्गा, ऊषा, लक्ष्मी, श्रुति, स्मृति, धृति, श्रद्धा,
मेधा, मति, क्रान्ति और आर्या ये सोलह शक्तियां हैं ।२८।२६। ये सब
खड्ग और खेटक के धारण करने वाली हैं—श्यामा और स्वलंकृता हैं,
इनका पूजन करना चाहिए। विद्या, ह्री, पुष्टि, प्रज्ञा, सिनीवाली,
कुहू, रुद्रा, वीर्या, प्रभा, मन्दा, योषा, ऋद्धिहा, शुभा, कालरात्रि,
महारात्रि, भद्रकाली, कपर्दिनी, विकृति दण्डी, मुण्डिनी, इन्दु खण्डा,
शिखण्डिनी, निशुम्भ, शुम्भमथिनी महिषासुर मर्दिनी, इन्द्राणी, रुद्राणी
- सप्तम पटल ] [ १४६
शंकरा र्धश रीरिणी, नारी, नारायणी, त्रिशूलिनी, पालिनी, अम्बिका,
ह्लादिनी ये बत्तीस शक्तियाँ कहीं हैं । चक्र, हस्ता, पिशाचा, और उरु-
भूषणा पूजने योग्य हैं । २६।३४।
पिङ्गलाक्षी विशालाक्षी समृद्धिर्वृद्धिरेव च ।
श्रद्धा स्वाहा स्वधाऽभिख्या माया संज्ञा वसुन्धरा ।३५
त्रिलोकधात्री सावित्री गायत्री त्रिदशेश्वरी ।
सुरूपा बहुरूपा च स्कन्दमाताऽच्युतप्रिया ।३६
विमला चामला पश्चादरुणी पुनरारुणी ।
प्रकृतिर्विकृतिः सृष्टिः स्थितिः संहृतिरेव च । ३७
सन्ध्या माता सती हंसी मद्दिका कुब्जिकाऽपरा (१) ।
वेदमाता भगवती देवकी कमलासना । ३८
त्रिमुखी सप्तमुख्यान्या सुरासुरविमर्दिनी ।
लम्बोष्ठी चोर्ध्वकेशी च बहुशीर्षा वृकोदरी । ३६
रथरेखाह्वया पश्चाच्छशिरेखा तथाऽपरा ।
गगनवेगा पवनवेगा च तदनन्तरम् ।४०
ततोभुवनमालाख्या ततः स्यान्मदनातुरा ।
अनङ्गाऽनङ्गमदना तथैवानङ्गमेखला ।४१
अनङ्गकुसुमा विश्वरूपाऽसुरभयङ्करी ।
अक्षोभ्यासत्यवादिन्यौ वज्ररूपा शुचिव्रता ।४२
पिङ्गलाक्षी, विशालाक्षी, समृद्धि, वृद्धि, श्रद्धा, स्वाहा, स्वधा,
माया, वसुन्धरा, संज्ञा, त्रिलोक धात्री, सावित्री, गायत्री, त्रिदशेश्वरी,
सुरूपा, बहुरूपा, स्कन्दमाता, अनुच्युत प्रिया, विमला, अमला, अरुणी,
आरुणी, प्रकृति, सृष्टि, स्थिति, संहृति, सन्ध्या, माता, सती, हंसी,
मद्दिका, कुब्जिका, अपरा, देवमाता, भगवती, देवकी, कमलासना,
त्रिमुखी, सप्तमुखी, अन्या, सुरासुर विमर्दिनी, लम्बोष्ठा, ऊर्ध्व केशी,
बहुशीर्षा, वृकोदरी, रथरेखा, शशिरेखा, अपरा, गगन, वेगा, पवन,