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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 130, कुल 511 में से

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पृष्ठ 130

१३० ] [ श्री शारदा तिलक
करने वाले चन्द्र खण्ड के आभरण से भूषित, तीन नेत्र धारी, ऐसे अर्धा-
म्बिकेय वपु का होम समाश्रय ग्रहण करते हैं ।४०। पूर्व में बतलाते हुए
मार्ग के ही द्वारा विधि के सहित उनका अर्चन करना चाहिए । जिसके
आदि में केशव हो और नमः इस पद से समन्वित हो ऐसी स्मराद्य
मातृका का कर न्यास करना चाहिए ।४१। वह धातुएं, त्वचा सृक्
मांसादि, प्राण शक्ति और आत्मा से युक्त मकारादि में क्रम से हैं ।
इसका ऋषि प्रजापति और छन्द गायत्र कहा गया है ।४२। अर्ध लक्ष्मी
हरि को यहाँ पर साक्षात देवता को कहा गया है। दीर्घ छः हैं जो अभी
पूर्व में बताये गए हैं । इनसे युक्त आदि बीज से षट् अंगों का समाचरण
करना चाहिए ।३३। अब ध्यान है—अपने करों से सरसिज, गदा, शंख,
विद्या परम-आदर्श (दर्पण)-मेघ की विद्युत के विलास से संयुक्त सुवर्ण
निर्मित कलशको धारण करने वाले, वाम भागमें अविरला कल्प उत्तुंग
स्तन के आश्लेष के लोभ से ऐकीभूत पुण्डरीकाक्ष और लक्ष्मी का वपु
रक्षा करे ।४४।
अत्रार्चनादिकं सर्वं प्राग्वन्मन्त्री समाचरेत् ।
शक्तिपूर्वा तनौ न्यस्येन्मातृकां मन्त्रवित्तमः ।४५
ऋषिः शक्तिः स्मृतं छन्दोगायत्रं देवता बुधैः ।
संप्रोक्ता विश्वजननी सर्वसौभाग्यदायिनी ।४६
दीर्घाद्धेन्दुयुजाङ्गानि कुर्यान्मायात्मना बुधः ।४७
उद्यत्कोटिदिवाकरप्रतिभरोत्तुङ्गोरूपीनस्तनीं
बद्धार्द्धेन्दुकिरीटहाररसनामञ्जीर संशोभिता ।
विभ्राणा करपंकजैर्जपवटीं पाशाङ्कुशौ पुस्तकं
दिश्याद्वो जगदीश्वरी त्रिनयना पद्म निषण्णा सुखम् ॥४८
पुरोदितेन विधिना देवीमन्वहमर्चयेत् ।
न्यसेच्छ्रीबीजसंपन्नां मातृकां विधिना तनौ ।४६
ऋषिर्भृगुः स्मृतं छंदो गायत्रं, देवता स्मृता ।
समस्तसम्पदामादिर्जगतां नायिका बुधैः ।५०
प्रावप्रस्तुतेन बीजेन कुर्यादङ्गानि साधकः ।५१