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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

१७८ सौंदर्य लहरी

इससे भी सिद्ध होती है कि वे लोग जो दूसरे श्लोकोक्त मंत्र की
उपासना करते हैं, जप के पश्चात् दशांश आहुति भी देते हैं, और
वे कभी समाप्त न होने वाली भोगों की इच्छा से सकाम अनुष्ठान
किया करते हैं, जैसा कि ‘निरवधि महाभोग रसिकाः’ पद से स्पष्ट
है। शंकर भगवत्पाद एक सन्यासी थे, उनने दारेषणा, वित्तेषणा
और लोकेषणा तीनों का त्याग किया हुआ था, अग्नि का स्पर्श भी
नहीं करते थे, और कर्म काण्ड का सर्वथा त्याग किया हुआ था; इस
लिये वे प्रथम श्लोकोक्त भावना प्रधान विद्या के ही उपासक थे। अर्थात्
प्रथम श्लोक में सन्यासियों के लिये लोपा मुद्रा हादि विद्या का मंत्र
बताया गया है। और दूसरे में सब प्रयोगों की सिद्धि देने वाले
कादि विद्या के मंत्र का वर्णन है। यह ही बात त्रिपुरोपनिषद् से
भी स्पष्ट है। देखें परिशिष्ट (२) श्रुतियां ८, ९, १०, ११,
और १२। श्लोक ८ की व्याख्या में हम यह भी दिखा चुके हैं कि
आनन्द लहरी पद का भी संकेत हादि विद्या की ही ओर है।

भगवती की उपासना भोग और मोक्ष दोनों देती है। भोगों
में आसक्त गृहस्थियों के लिये कादि विद्या की सपर्या पद्धति, जो
श्री चक्र के पूजन न्यास और बहिरनुष्ठानों से संयुक्त है, आणवी
दीक्षा द्वारा दी जाती है। कर्म काण्ड का उपयोग कामनाओं की
तृप्ति मात्र नहीं है, वरन सब भोगों को भगवती के चरणों में समर्पण
कर के अन्तःकरण की शुद्धि के लिये है। सकाम अनुष्ठानों से
कामनाओं की पूर्ति अवश्य होती है, परन्तु यह मंत्रशास्त्र का गौण
फल है। कहा है—‘मननात् त्रायते इति मंत्रम्....’

सौंदर्य लहरी १७९
मननात् प्राणनाच्चैव मद्रूपस्यावबोधनात् ।
मंत्रमित्युच्यते ब्रह्मन् मदधिष्ठानतोऽपिवा ॥ यो०शि०(२,७)
शिवजी ब्रह्माजी से कहते हैं कि मनन किये जाने के कारण,
प्राणों का उत्थान करने के कारण, मेरे रूप का ज्ञान उत्पन्न करने के
कारण अथवा मेरा अधिष्ठान होने के कारण मंत्र मंत्र कहलाता है ।
मंत्र के जप से कुण्डलिनि शक्ति का जागरण होता है, शक्ति
के जागरण से आत्मज्ञान का उदय होता है, इसलिये मंत्र को
देवता का अधिष्ठान कहा गया है । शक्ति दीक्षा से शक्ति का
जागरण होने पर मंत्रयोग, लययोग, हठयोग और राजयोग चारों का
विकास होता देखा जाता है । इसलिये शक्ति जागरण को ही
महायोग कहते हैं ।
मंत्रो लयोहठो राजयोगोऽन्तर्भूमिकाः क्रमात् ।
एक एव चतुर्धायं महायोगोऽभिधीयते ॥ यो०शि० (१,१२९)
मंत्र के प्राप्त करने पर उक्त चारों भूमिकाएं उदय होती हैं ।
आणवी दीक्षा में मंत्र का उपदेश करके शिष्य को श्रीचक्र पर
भगवती की सपर्यापद्धति के अनुसार पूजन विधि बताई जाती है ।
शक्ति दीक्षा में गुरु शिष्य के सिर पर स्पर्श करके शक्ति जागृत
करता है । तीसरी शांभवी दीक्षा में ब्रह्मात्मैक्य भाव में शिष्य को
ले जाया जाकर उसको महावाक्यों का उपदेश दिया जाता है ।
इस विषय के सम्बन्ध में श्री विद्या पर लिखित नित्योत्सव ग्रंथ में
दीक्षा प्रकरण देखें ।

१८० सौन्दर्य लहरी
श्री विद्या का मंत्र १५ अक्षरों का होने के कारण उसे पंचदशी
भी कहते हैं, उसमें एक १६ वां बीज लगा देने
पंचदशी और से वह ही षोडशी विद्या बन जाती है । प्रथम
उसके आधार पर ५ अक्षरों को वाग्भवकूट, बीच के ६ अक्षरों
अन्य विद्याए को कामकला कूट और अन्तिम ४ अक्षरों को
शक्ति कूट कहते हैं। कादि विद्या मूल विद्या है, उसके आधार पर
अगस्त्य मुनि की पत्नि लोपामुद्रा, दुर्वासा, कुबेर, चन्द्र, नन्दि, मनु,
अगस्त्य, सूर्य, षडानन, शिव, विष्णु, ब्रह्मा, यमराज, इन्द्र और
कामदेव सबने अपने २ इष्ट के अनुसार मूल विद्या को भिन्न २
विद्याओं का रूप दिया, और वे विद्याएं उस २ देवता या ऋषि के
नाम से प्रसिद्ध हैं । कामदेव ने मूलकादि विद्या की ही उपासना
की थी । इन विद्याओं को त्रैलोक्य मोहन कवच से जाना जा
सकता है ।
चिन्तामणि गुणनिवद्धांक्षवलयाः—सकाम प्रयोगों की शीघ्र
सिद्धि के लिये, माला का भी जिस पर जप
माला का विधान किया जाता है संस्कार करना आवश्यक है ।
माला की संस्कार विधि अक्षमालोपनिषद् में दी हुई है । तदनुसार
मेरु अर्थात् शिखामणि पर अनुस्वार सहित क्षकार और दोनों ओर के
पचास २ मणियों पर अकार से ळकार पर्यंत सानुनासिक एकाक्षरी
मंत्रों की प्रतिष्ठा करनी पडती है । इस प्रकार वर्णमाला के ५१ वर्ण
रूपी चिन्तामणियों की गुणनिबद्धा अर्थात् सत्व, रजोगुण और
तमोगुण रूपी डोरों के प्रतीक विवर में सुवर्ण, दक्षिण ओर चान्दी,
और बाम ओर ताम्र के तारों में गूंथी हुई माला लेनी चाहिये ।

सौंदर्य लहरी १८१
माला के लिये प्रवाल, मोती, स्फटिक, शंख, सोना, चांदी, चन्दन,
पुत्र जीविक (जीयापोता), कमलगट्ठा, और रुद्राक्ष में से किसी प्रकार
के मणिके लिये जा सकते हैं। माला को गंध और पंचगव्य से
स्नान कराकर अष्टगंध से लेपकर, अक्षत् पुष्पादि से पूजन करके,
अ से क्ष पर्यन्त चिन्तामणियोँ की उक्त उपनिषदुक्त मंत्रों से भावना-
युक्त प्रतिष्ठा करनी चाहिये। देखें अक्षमालोपनिषद् ।
श्लोक ११ की व्याख्या में श्री चक्र का रहस्य समझाया जा चुका
\ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ है। मंत्र का यंत्र से संबंध है पहिले मंत्र का
षोडशी \ \ \ \ \ \ स्वरूप समझना आवश्यक है, फिर मंत्र, यंत्र
विज्ञान \ \ \ \ \ \ (श्री चक्र), षट् चक्र, मातृका और ब्रह्माण्ड
पिण्ड का पारस्परिक संबंध समझा जा सकेगा।
मंत्र के तीन कूट हैं और १५ अक्षर हैं, सोलहवां अक्षर
गुरुमुख से लेकर वह ही मंत्र षोडशी मंत्र बन जाता है। प्रथम
*वाग्भव कूट अग्नेय भगवती का मुख है। दूसरा काम कला कूट सूर्य से
संबंध रखता है, वह शक्ति का कण्ठ से नीचे कटि पर्यन्त रूप है।
दोनों के बीच में हृल्लेखा ब्रह्म ग्रंथि है। तीसरा शक्ति कूट चन्द्र से
संबंधित कटिके नीचे का भाग है, वह सर्जन शक्ति का रूप है।
दूसरे और तीसरे कूट के बीच की हृल्लेखा विष्णु ग्रंथि है।
*श्रीमद्वाग्भव कूटैकस्वरूप मुखपंकजा ।
कण्ठाधः कटिपर्यन्त मध्यकूट स्वरूपिणी ॥
शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभाग धारिणी ।
मूलमंत्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेवरा ॥
ललिता सहस्रनाम (८५, ८६, ८७,)

१८२ सौंदर्य लहरी
चौथा पाद एकाक्षरी लक्ष्मी बीज है जो गुरु मुख से ही प्राप्त
किया जाना चाहिये। इसको चन्द्रकला कहते हैं। इसके और
तीसरे शक्ति कूट के बीच की हृल्लेखा रुद्र ग्रंथि है। १६
अक्षरों का यह मंत्र षोडशी विद्या के नाम से प्रसिद्ध है।
१६ अक्षरों को १६ नित्या समझना चाहिये। वास्तव में
अन्तिम एकाक्षरी लक्ष्मी बीज ही नित्या है, क्योंकि वह परा
कला है, और उसके कारण ही समस्त विद्या श्री विद्या कहलाती है।
यह शुद्ध चिति शक्ति स्वरूपा सहस्रारस्थ चन्द्र की १६ वीं कला है,
जो विशुद्ध चक्र के १६ पत्रों पर प्रतिबिंबित हुआ करती है।
प्रथम कला का प्रकाश पूर्व से आरम्भ होकर १६ वीं कला का
ईशान पूर्व कोण के पत्र पर समझना चाहिये। सोलहवीं कला के
आधीन ही अन्य कलाएं घटती बढती हैं, वे स्वतंत्र नहीं हैं। इस
लिये इस विद्या का नाम श्री विद्या पडा है। शुक्ल और कृष्णपक्ष
की १४ तिथियां, पूर्णिमा और अमावस्या सहित १६ चन्द्र कलाएं
कहलाती हैं। ये सब कलाएं शुक्ल पक्ष में सूर्य के योग से उदय
होती हैं और कृष्ण पक्ष में सूर्य में ही अस्त हो जाती हैं। यथा
प्रथम कला शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदय होकर कृष्ण पक्ष की
प्रतिपदा में अस्त हो जाती है, दूसरी कला शुक्ल पक्ष की द्वितीया
को उदय होकर कृष्ण पक्ष की द्वितीया में अस्त हो जाती है, इसी
प्रकार अन्य कलाओं को भी समझना चाहिये। पूर्णिमा की पूर्ण
कला अमावस्या में अस्त होती है। अमावस्या को पूर्णिमा की
कला अस्त हो जाने पर जो चन्द्र कला रहती है वह ही १६ वीं
नित्या कला है। क्योंकि वह ही चन्द्रमा का वास्तविक बिंब प्रत्येक
कला में सूर्य के प्रकाश से घटती बढती कलाओं के रूप में चमका

सौंदर्य लहरी १८३
करता है। शुद्ध चिति शक्ति की १५ कलाएं पंचदशी के १५
अक्षरों से क्रमशः संबद्ध हैं और १६ वीं कला शुद्ध चिति शक्ति
चिन्मात्र निर्विकल्प समाधि में विराजने वाली स्वयं महात्रिपुर-
सुन्दरी है क्योंकि अन्य सब कलाएं घटती बढती हैं, चन्द्र का बिंब
सदा एक समान रहता है। इसलिये प्रत्येक कला को १६ वीं
कला का अंग समझना चाहिये और प्रत्येक कला का पूजन और
ध्यान तदनुसार उस कला की संबंधित तिथि में १६ वीं कला
सहित किया जाता है। कुण्डलिनी के सहस्रार में चढते समय वह
मानस चक्रस्थ चन्द्र मंडल में छिद्र कर देती है, उससे अमृत टपक
कर आज्ञा चक्र को अमृत मय कर देता है, जिससे वहां पर चन्द्रमा
की सब कलाएं नित्य चमकने लगती हैं, और उनका नाम नित्या
कहलाने लगता है। ये कलायें फिर विशुद्ध चक्र पर उतर कर
उसकी १६ पंखडियों पर प्रकाशमान हो जाती हैं। सहस्रार के
मध्यस्थ चन्द्र मण्डल को वैन्दव स्थान कहते हैं यह शुद्ध चिति
शक्ति की आनन्दमयी कला का स्थान है, जिसको श्री अथवा
महा त्रिपुर सुन्दरी कहते हैं।
आधार चक्र अन्धकारमय चक्र है, स्वाधिष्ठान जल का स्थान
है, इसलिये वह भी कुछ थोडा प्रकाशयुक्त अन्धकारमय चक्र है,
मणिपुर में अग्नि का प्रकाश भी उज्वल न होने से उसका स्थान भी
अन्धकार युक्त ही है। इसलिये नीचे का अग्नि मंडल अन्धकार
मिश्रित प्रकाश युक्त मण्डल है। अनाहत् में सूर्य का प्रकाश रहता
है और विशुद्ध में चन्द्र का। आज्ञा चक्र अमृत का स्थान है।
इसलिये विशुद्ध और आज्ञा स्वयं प्रकाशमान नहीं हैं, वे सहस्रार
में स्थित चन्द्रकला से प्रकाशित होते हैं। सहस्रार में स्वतंत्र रूप

१८४ सौंदर्य लहरी
से चन्द्रकला नित्य पूर्ण रहती है, इसलिये वह ही वास्तविक नित्या
है। श्री चक्र का तीनों मण्डलों और चक्रों से संबंध पहिले बताया
जा चुका है। यदि श्री चक्र के त्रिकोण को मूलाधार, अष्टार चक्र
को स्वाधिष्ठान, अन्तर्दशार को मणिपूर, बहिर्दशार को अनाहत,
चतुर्दशार को विशुद्ध, ४ श्री कंठों को आज्ञा चक्र समझा जाय और
विन्दु को सहस्रार, चतुष्कोण भूगृह को ब्रह्माण्ड, तो विन्दु स्थान में
स्थित चिति रूपा चन्द्रकला की चन्द्रिका का प्रकाश सब पर प्रतिबिंबित
होता समझना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि मनरूपी
चन्द्रमा में चेतना देने वाला चेतन प्रकाश (Consciousness)
सहस्रार में स्थित चिन्मात्र सत्ता का प्रतिबिंब है। जो अनाहत् चक्र
में स्थित प्राणरूपी सूर्य के उर्ध्वगामी होने पर अपने विशुद्ध स्वरूप
में अनुभवगम्य होता है जो प्राणरूपी सूर्य और मनरूपी चन्द्र
दोनों की क्रियाओं का निःस्पन्द स्वरूप योग (neutralization)
होने पर अनुभव में आता है। प्राण और मन दोनों को चिति शक्ति
से उद्भूत क्रमशः सत्तात्मिका और चिदात्मिका शक्तियों के दो स्रोत
(currents) समझना चाहिये। जैसे विद्युत् शक्ति की धनात्म
(positive) और ऋणात्म (negative) स्रोत हुआ करते
हैं। जहां दोनों का उदय और अस्त होता है वह परम कला है।
पंचदशी के अक्षरों की सुषुम्नापथ पर सहस्रार में चढते समय
इस प्रकार भावना की जाती है। प्रथम अक्षर को अधःसहस्रार से
उठाकर उसका विषुस्थान पर लय किया जाता है, दूसरे अक्षर को
विषुस्थान से उठाकर उसका मूलाधार में लय किया जाता, तीसरे
को मूलाधार से उठाकर स्वाधिष्ठान में, चौथे को स्वाधिष्ठान से

सौंदर्य लहरी १८५
उठाकर मणिपूर में, पांचवे को मणिपूर से उठाकर अनाहत् में, छठे
को अनाहत् से उठाकर विशुद्ध में, सातवे को विशुद्ध से उठाकर
लंबिका में, आठवें को लंबिका से उठाकर आज्ञा में, नवें को आज्ञा
से उठाकर विन्दु में, दसवें को विन्दु से उठाकर अर्धचंद्रिका में,
१ १वें को अर्धचन्द्रिका से उठाकर निरोधिका में, १२वें को निरोधिका
से उठाकर नाद में, १३ वें को नाद से उठाकर नादान्त में, १४ वें
को नादान्त से उठाकर शक्ति में, १५ वें को शक्ति से उठाकर
व्यापिका में, इस क्रम से प्रत्येक पूर्व अक्षर को अगले अक्षर
में लीन करते हुए पूरा मंत्र उन्मनी में, जो पराकला स्वरूपा श्री
कला है, लीन कर दिया जाता है। ललिता सहस्रनाम के श्लोक
११३ की व्याख्या में भास्करराय कहते हैं कि त्रिपुरसुन्दरी
निर्विवाद षोडशकलात्मिका है जैसा कि वासना सुभगोदय में
कहा है:—
दर्शाद्याः पूर्णिमान्ताद्या कलाः पंचदशैवतु ।
षोडशी तु कला ज्ञेया सच्चिदानन्द रूपिणी ॥
चन्द्र मण्डल में वह कला वृद्धि ह्रासरहिता है, शेष अन्य १५
कलायें आने जाने वाली होती हैं। दर्शा शुक्ल प्रतिपदा को कहते
हैं, अर्थात् शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पूर्णमासी तक १५ कलाएं
होती हैं जो पञ्चदशी मंत्र के १५ अक्षरों के अनुरूप समझी जानी
चाहियें। उक्त १५ कलायें नन्दा, भद्रा, जया, रिक्ता और पूर्णा
भेद से और वाग्भव, कामकला, और शक्ति कूट ऐसे त्रिरावृत्त

१८६ सौंदर्य लहरी
भेद से बढती हैं। परन्तु दूसरे कूट में ६ अक्षर और शक्ति कूट में
४ अक्षर होने से पंचदशी के पांच २ अक्षरों से तीन खंड इस
प्रकार समझने चाहिये । कामराज कूटकी अन्तिम हृल्लेखा एकादशी
होती है और दशमी से विद्धा होने के कारण वह दशमी कला के
ही अन्तर्गत माननी चाहिये परन्तु उसका योग शक्ति कूट के प्रथम
अक्षर के साथ, जो द्वादशी है तीसरे खण्ड की पूर्ति करता है और
‘ उपोष्या द्वादशी शुद्धा ’ इस वचन के अनुसार द्वादशी को ही
एकादशी मानकर दोनों कूटों का योग समझ लेना चाहिये । और
उन्नेय भूमिका में तदनुसार ही भावना करनी चाहिये । इस प्रकार
भावना करने से प्रथम कूट को अधः सहस्रार से उठाकर अनाहत्
म उसका विलिनीकरण होता है, दूसरे कूट को अनाहत् से उठाकर
उसका निरोधिका में और तीसरे को निरोधिका से उठाकर व्यापिका
में विलिनीकरण होता है, परन्तु निरोधिका से नाद तक एकादशी का
द्वादशी में संक्रमण समझना चाहिये और नीचे अर्धचन्द्रिका से
दशमी में । मंत्र के तीनों कूटों के पांच पांच अक्षरों के खण्ड करने
से प्रथम, छटा, और ग्यारहवां अक्षर नन्दा, दूसरा, सातवां और
बारहवां अक्षर भद्रा, तीसरा, आठवां और तेरहवां जया, चौथा,
नवां और चौदहवां रिक्ता और पांचवां, दसवां और पन्द्रहवां अक्षर
पूर्णा समझना चाहिये ।
इस प्रकार मंत्र का वाग्भव कूट रूपी मुख जो नीचे था, और
शक्ति कूट रूपी कटि के नीचे का भाग जो ऊपर को था,
सीधा ऊर्ध्वमुख हो जाता है ।

सौंदर्य लहरी १८७
दूसरे प्रकार की भावना में विशुद्ध चक्र के १६ पत्नों पर पूर्व से
अग्नि, दक्षिण, नैऋत, पश्चिम, वायव्य, उत्तर और ईशान क्रमानुसार
१६ अक्षरों की भावना की जाती है. जो चन्द्रमा की कलाओं के
सदृश चमकती हैं और सहस्रार की पूर्ण कला के बिंब से आज्ञाचक्र
पर होती हुई नीचे के विशुद्धचक्र पर प्रतिबिंबित होती हैं। इस प्रकार
चितिशक्ति का सम्बन्ध १६ नित्याकलाओं से, उनका संवन्ध मन्त्र से,
मन्त्र का संवन्ध सुषुम्ना से, सुषुम्ना का मातृका से, मातृका का
संबन्ध ईड़ा पिंगला से, और तत्सम्बन्धी सूर्याग्निचन्द्र से और सबका
श्रीचक्र से, जो देह (पिण्ड) और विराट् देह (ब्रह्माण्ड) दोनों का
प्रतीक है, सबका पारस्परिक सम्बन्ध समझना चाहिये ।
सबका उपरोक्त पारस्परिक सम्बन्ध जानने के साथ नाद विन्दु
नाद, विन्दु और और कला का अर्थ और उनका मन्त्र, यंत्र और
कला देहस्थ चक्रों से सम्बन्ध भी समझना आवश्यक
है और यह जानना आवश्यक है कि इन
तीनों का पारस्परिक सम्बन्ध क्या है ।
बिन्दुः शिवात्मको बीजं शक्ति र्नादस्तयोर्मितः ।
समवायः समाख्यातः सर्वागम विशारदैः ॥
सच्चिदानन्द विभवात् संकलात्परमेश्वरात् ।
आसीच्छक्तिस्ततो नादा नादाद्विन्दु समुद्भवः ॥
पर शक्तिमयः साक्षात् त्रिधासौ भिद्यते पुनः ।
विन्दुनादो बीजमिति तस्यभेदाः समीरिंताः ॥
रौद्री विन्दोस्ततो नादाज्ज्येष्ठा बीजादजायत ।
वामा ताभ्यः समुत्पन्नाः रुद्रब्रह्मारमाधिपाः ॥

१८८ सौंदर्य लहरी
ते ज्ञानेच्छाक्रियात्मानो वह्नीन्द्वर्क स्वरूपिणः ।
इच्छा क्रिया तथा ज्ञान गौरी ब्राह्मी तु वैष्णवी ॥
त्रिधा शक्तिःस्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ संगृहीत श्लोक
शिव (पर बिन्दु) अर्थः—आगमो के विद्वानों
। का ऐसा मत है कि बिन्दु शिवात्मक
शक्ति है, बीज शक्त्यात्मक है और दोनों
। के समवाय से उत्पन्न होने वाला तत्व
सदाख्यशिव (नाद) नाद कहलाता है । सत् चित् आनन्द
। स्वरूप विभु परमेश्वर के स्पन्द रूपी
ईश्वर (बिन्दु) संकलन से शक्ति उत्पन्न होती है, फिर
। नाद और नाद से विन्दु उत्पन्न होता
शुद्ध विद्या ” है । जो साक्षात् परा शक्ति से युक्त
──*|──────|──────|── है । वह विन्दु फिर तीन रूपों में फट
नाद बीज बिन्दु जाता है अर्थात् बिंदु, बीज और नाद ।
ज्येष्ठा वामा रौद्री
। । । अर्थः—विन्दु से रौद्री, नाद
⎧ ब्रह्मा ⎫ ⎧ विष्णु ⎫ ⎧ रुद्र ⎫ से ज्येष्ठा और बीज से वामा, और
⎩ इच्छा ⎭ ⎩ क्रिया ⎭ ⎩ ज्ञान ⎭ उनसे क्रमशः रुद्र ब्रह्मा और विष्णु
⎧ ब्राह्मी ⎫ ⎧ वैष्णवी ⎫ ⎧ गौरी ⎫ हुए । वे क्रमशः ज्ञान इच्छा और
⎩ क्रिया ⎭ ⎩ ज्ञान ⎭ ⎩ इच्छा ⎭ क्रियात्मा हैं और अग्नि, चन्द्र और
। । ।
सूर्य अग्नि चन्द्र
प्राण चिति मन
सूर्य के रूप हैं । इच्छा, क्रिया और ज्ञान क्रमशः गौरी, ब्राह्मी और
वैष्णवी शक्तियां हैं, जहां पर तीनों का आधार है वह ॐ स्वरूप
परं ज्योति है । बीज को शक्त्यात्मिका कला समझना चाहिये ।

  • नोटः-विन्दुनाद कला ब्रह्मन् विष्णु ब्रह्नेश देवताः (यो०शि०६, ७०)
    यहां विष्णु को विन्दु, ब्रह्मा को नाद और ईश(रुद्र)को कला माना गया है।

सौंदर्य लहरी १८२
भास्करराय विरचित वरिवास्यारहस्य में बिन्दु, अर्धचन्द्रिका
रोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिका, और उन्मनी इन नौ
स्तरों की समष्टि को नाद संज्ञा दी गई है ।
विन्द्वादीनां नवानां तु समष्टिर्नाद उच्यते । (१.३) ।
अर्थात् हृल्लेखा के उच्चारण होने पर अनुनासिक ध्वनि उक्त नौ
स्तरों से होती हुई उन्मनी में समाप्त होती है, जिसके काल की
मात्रा उत्तरोत्तर आधी होती जाती है और सबके योग का काल
१/२ मात्रा होता है। जो बिन्दु की आधी मात्रा सहित पूरी १ मात्रा
बनाती है । अर्थात्
१/२ + १/४ + १/८ + १/१६ + १/३२ + १/६४ + १/१२८ = + १/२५६ + १/२५६ = १
पंचदशी के ३ अनुस्वार तीन विन्दु हैं, हृल्लेखा नाद, और
१५ अक्षर १५ कला । नाद विन्दु और कला तीनों को भी त्रिविन्दु
कह सकते हैं । श्री चक्र को भी नाद विन्दु कला भेद से त्रिधा
माना जाता है ।
नाद से विन्दु, विन्दु से कला, नाद से कला, कला से विन्दु
और कला से नाद का पांच प्रकार का ऐक्य संबंध जानने से
अन्तर्याग की सिद्धि होती है ।
ब्रह्म को विन्दु, शक्ति को कला और जीव को नाद समझकर
उक्त पांच प्रकार का संबंध स्थापित होता है । प्रथम में जीव
ब्रह्मैक्य भाव है, दूसरे में ब्रह्म से सृष्टि का प्रभव, तीसरे से देहा-

१९० सौंदर्य लहरी
ध्यास, चौथे से प्रलय, और पांचवे से प्रलय के पश्चात् बन्धन में
पड़े हुए जीवों की फिर उत्पत्ति । बिन्दु से नाद का संबंध न बताने
का यह अभिप्राय है कि ब्रह्म कभी जीव नहीं बनता, आत्मा सदा
ब्रह्म स्वरूप है, और जीव भाव की एक मिथ्या प्रतीति मात्र है ।
यदि बिन्दु को शिव शक्ति भेद से दो प्रकार का माना जाय
तो शक्त्यात्म बिन्दु ही बीज है, और दोनों से शब्द ब्रह्म नाद
की उत्पत्ति समझनी चाहिये और शब्द से कला अर्थात्
अर्थात्मक सृष्टि की उत्पत्ति ।
शिव शक्ति का अङ्गी और अङ्गवत सम्बन्ध
[ ३४ ]
शरीरं त्वं शंभोः शशि मिहिरवक्षो रुहयुगं.
तवात्मानं मन्ये भगवति नवा ( भवा ) त्मानमनघम् ।
अतः शेषः शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः संबंधो वां समरस परानन्दपरयोः ॥
अर्थः- हे भगवति ! मैं ऐसा समझता हूं कि तू शंभु
का शरीर है, जिसके वक्षः स्थल पर सूर्य और चन्द्र दो स्तन
उभरे हुए हैं, और तेरी आत्मा सारे भव की आत्मा शंकर है,
अथवा नवात्मा शंकर है । इसलिये तुम दोनों परा शक्ति और
आनन्द का एक समरस होने के कारण शेष और शेषी वत्
संबंध स्थित् है ।

सौंदर्य लहरी १०१
सं० टि० शक्ति को शिव का स्थूल देह समझना चाहिये ।
शंकर का एक नाम चिदंबर भी है। सांग विश्व (ब्रह्माण्ड) शक्ति का
रूप है और वह विराट् भगवान का स्थूल देह है। इसलिये शिव
और शक्ति का आधार आधेय संबंध यहां दिखाया गया है । यदि
पर पद शिव है तो आनन्द पद को शक्ति का रूप समझना चाहिये ।
दोनों की एकता का समरसपना दोनों की अभिन्नता प्रकट करता है ।
जैसे शक्कर और उसकी मधुरता । यह अधिदैव रूप है अर्थात्
चित् और आनन्द का जोडा ही ब्रह्म और शक्ति का जोडा है ।
अधि भौतिक स्तर पर भी ऐसा ही समझना चाहिये, सत् प्रकृति है
और चिदानन्द शिव्
व्याख्या— वेदों और पुराणों में सूर्य और चन्द्र को विराट्
भगवान के नेत्र माना गया है, परन्तु यहां उन्हें जगज्जननी प्रकृति
के दोनों स्तनों से उपमित किया गया है, क्योंकि प्राण और सोम
दोनों से विश्व का पोषण होता है । सूर्य से विश्व को प्राण शक्ति
प्राप्त होती है और चन्द्रमा से सोम रस । आध्यात्मिक स्तर पर भी
सूर्य हृदय में रहकर और चन्द्र मस्तिष्क में रहकर रक्षा करते है ।
सत् चित् आनन्द स्वरूप ब्रह्म के सत् स्वरूप का परिणाम सारा
विश्व है, और आध्यात्म स्तर पर चेतन सत्ता दो स्तरों पर दृष्टि-
गोचर होती है, आनन्द के रूप में और ज्ञान के रूप में । इस
श्लोक में ज्ञान के रूप को शिव अथवा परम भाव कहा है और
आनन्द को शक्ति भाव । दोनों भाव समरस वत् एक ही हैं जैसे

१९२ सौंदर्य लहरी
शक्कर और मीठापन । परम भाव शक्कर सदृश विशेष्य है और
आनन्द मीठेपन के सदृश विशेषण, प्रथम रूप शिव का है और
दूसरा शक्ति का । परानन्द का मार्ग शक्ति का योग मार्ग है । और
ज्ञान मार्ग वैदिक वेदान्त का मार्ग है । यहां यह दिखाया
गया है कि दोनों मार्गों का इतना एकरस पना है कि जैसे विशेषण
और विशेषी का, अर्थात् दोनों मार्ग पारस्परिक सापेक्षिक हैं और
एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं । आनन्द के मार्ग को भाव योग
कहते हैं जो कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर प्राप्त होता है और
ज्ञान मार्ग आत्म चिन्त रूप ध्यान योग का मार्ग है। गीता के १२ वें
अध्याय में श्री भगवान ने प्रथम भाव योग को सरल बताकर उसकी
श्लाघा की है और ज्ञानमार्ग को कठिन कहकर उसकी प्राप्ति को
दुःख साध्य बताया है ।
'नवात्म=शंकर । शिव, शक्ति और श्री चक्र तीनों ९ व्यूहात्म
हैं । तीनों के ९ नौ २ व्यूह नीचे दिये जाते हैं । शिव के ९
व्यूहः— काल, कुल, नाम, ज्ञान, चित्त, नाद, विन्दु, कला
और जीव ।
शक्ति के ९ व्यूहः— वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, अंबिका, इच्छा,
ज्ञान, क्रिया, शान्ति और परा ।
श्री चक्र के ९ व्यूहः— ११ श्लोकोक्त ४ श्रीकंठ और ५
शिव युवतियां अर्थात् ९ मूल त्रिकोण । इसलिये शिवजी सब के
अधिष्ठातृ देव अर्थात् आत्मा होने के कारण नवात्मा कहे गये हैं ।

सौंदर्य लहरी १९३
साराविश्व शक्ति का परिणाम है
( ३५ )
मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥
अर्थः - हे शिवयुवति ! तू मन है, आकाश तू है और
वायु है सारथी जिसका वह अग्नि भी तू ही है, तू जल है और
तू भूमि है; तेरी परिणति के बाहर कुछ भी नहीं । अर्थात्
सारा विश्व तेरे परिणाम का ही रूप है । तू ने ही अपने आप
को परिणत करने के लिये, चिदानन्दाकार को विराट देह के
भाव द्वारा व्यक्त किया हुआ है
सं० टि०:- जैसे श्लोक (३४) विश्व और शिव की एकता
दिखाता है, वैसे ही (३५) श्लोक में चिदानन्द को समझना
चाहिये, अर्थात् यह अध्यात्म स्वरूप है । यहां चित् और आनन्द
का जोडा भी उसी प्रकार समझना चाहिये । मन, आकाश, वायु,
अग्नि, जल, पृथिवी सत् शक्ति के विकार हैं उनसे आज्ञा, विशुद्ध,
अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान और आधार चक्रों से संबंधित् तत्त्वों
के अधि देवताओं का संकेत है, जिनका अगले श्लोकों में वर्णन है ।
ये चिदानन्दाकारा भगवती के ही रूप हैं ।

१९४ सौंदर्य लहरी
ब्रह्म सत् स्वरूप है अर्थात् उसकी सत्ता है । श्रुति छा० ६, २)
कहती है 'सदेवसौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' । 'तदैक्षत'—उसने
इच्छा की, कि 'बहुस्यां प्रजायेय'—सृष्टि के लिये मैं अनेक हो
जाऊँ (अर्थात् वह चेतन चित् स्वरूप है) । उसकी सत् शक्ति
में क्रिया की प्रवृत्ति होती है और चेतन चित्शक्ति में अधिष्ठातृत्व
शक्ति रहती है । और 'अग्रे' अर्थात् सृष्टि के पूर्व वह एक ही
अद्वितीय था । और वह स्वयं ही अनेक हो गया, अर्थात् तेज,
जल, अन्न में परिणत हो गया और उनसे अनेक रूप की सृष्टि
होती गई । इसीलिये श्रुतिवचन है कि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' । 'एक-
मेव' में 'एव' का प्रयोग इस बात का निश्चय कराता है कि
अद्वितीय होने के कारण दूसरा कुछ न था ।
तस्माद्धान्यन्न परः किंचनाऽऽस । (नासदासीय सूक्त)
ऋग्वेद परिशिष्ट (१)
अर्थ:—उससे अन्य दूसरा कुछ भी न था ।
इसलिये ब्रह्म की सत् शक्ति का परिणाम यह सारा विश्व है
और उसका अधिष्ठातृत्व आधार चिदानन्द स्वरूप है । यह भाव
इस श्लोक में दिखाया गया है । मन, आकाश, वायु, अग्नि, जल
और पृथिवी ब्रह्म की सत् शक्ति के परिणाम हैं और चेतना और
आनन्द का प्रकाश उस परिणाम के प्रत्येक स्तर प्रत्याभासित् हो
रहा है । ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां और ५ ज्ञानेन्द्रियां
और मन बुद्धि चित्त अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय सब सत् शक्ति
के परिणाम हैं, जो चिति शक्ति के प्रकाश से चेतन और अचेतन

सौन्दर्य लहरी १९५
दिखते हैं। जैसे अंधकार प्रकाश की अपेक्षा रखता है, इसी प्रकार
अचेतन चेतन प्रकाश की अपेक्षा रखता है। क्योंकि प्रकाश का
तिरोभाव अंधकार का कारण है, और चेतना का तिरोभाव अचेतना
का कारण। जैसे समुद्र की तरंगों के उठाव उतार पर अथवा भूमि
की ऊंचे नीचे धरातल पर प्रकाश पड़ने से कहीं प्रकाश दिखता है,
कहीं छाया का अंधकार, उसी प्रकार सत् शक्ति के परिणाम की
विषमता पर प्रतिबिंबित् चिदानन्दाकार के कारण कहीं चेतनता
कहीं अचेतनता की अनुभूति समझनी चाहिये। वेदानुवचन हैं कि
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबल क्रिया च।
(श्वे० ६, ८)
इच्छा, ज्ञान और क्रिया भेद से वह पराशक्ति त्रिधा दिख रही
है। चितिशक्ति का स्थान सहस्रार में हैं और उन्मनी समनी दोनों
स्तरों पर व्यक्त होती है, उन्मनी में सूक्ष्म सामान्य रूप से और समनी
पर विशेष रूप से। चिदानन्द की अभिव्यक्ति व्यापिका और शक्ति
के स्तरों पर होती है, व्यापिका पर सूक्ष्म अविशेष सामान्य अभि-
व्यक्ति है और शक्ति के स्तर पर विशेष घनानन्द स्वरूप की अभि-
व्यक्ति है। नीचे के स्तरों पर सत् शक्ति का शब्द और अर्थ
अथवा नाम और रूप दो भेद से फटाव हो जाता है। पहिले शब्द,
फिर रूप की अभिव्यक्ति होती है। महानाद और नाद दो स्तरों
पर शब्दात्मज्ञान के हैं, महानाद पर अविशेष और नाद पर सवि-
शेष ज्ञान की अनुभूति रहती है। उनके नीचे विन्दु अर्धेन्दु और
निरोधिका के उत्तरोत्तर स्तर रूपों के संप्रज्ञात भेद हैं। मन का

सौन्दर्यलहरी: श्लोक ४२ से ७० (भगवती का दिव्य किरीट, मुखमण्डल व नयन सौन्दर्य)

१९६ सौन्दर्य लहरी
स्थान आज्ञाचक्र है, आकाश का विशुद्ध, वायु का अनाहत, अग्नि
का मणिपुर, जल का स्वाधिष्ठान, और पृथिवी का स्थान मूलाधार
है। पातंजल दर्शनोक्त वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता से
संबंधित् चार प्रकार की मानसिक संप्रज्ञात समापत्ति के अंर्तगत्
क्रमशः आज्ञा से ऊपर के ३, २, २, २ स्तर हैं। इसलिये इन सबका
समावेश आज्ञाचक्र में है जो मन का स्थान है, और मन एवं पांचों
महाभूतों के छः ही चक्र मुख्य माने जाते हैं। जिनका विशेष
उल्लेख शंकर भगवत्पाद अगले छः श्लोकों में करते हैं। मन का स्थूल
ध्येयाकार हो जाना उसकी रूपापत्ति कहलाती है, उस अवस्था को
वितर्क संप्रज्ञात समापत्ति कहा गया है, मन का शब्दात्म होना
विचार संप्रज्ञात समापत्ति के अन्तर्गत है, आनन्दाकार होना सानंद
समापत्ति है और चिदात्म होना सास्मिता समापत्ति कहलाती है।
समता की प्राप्ति को समापत्ति कहते हैं और प्रज्ञा से संयुक्ति को
संप्रज्ञात कहते हैं। अर्थात् इन अवस्थाओं में मन प्रज्ञा से संयुक्त
रहकर स्थूलाकार, सूक्ष्माकार, आनन्दाकार और चिदाकार रहता है।
आज्ञाचक्र
(३६)
तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं
परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता ।
यमाराधन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये
१ निरातङ्के लोके निवसति हि भालोक भ (भु) वने ॥
१ पाठांतर=निरालोके लोके

सौंदर्य लहरी १९७

कठिन शब्दः—निरालोके लोके=जिस लोक मे सूर्य चन्द्र और
अग्नि का प्रकाश नहीं है । लोकः=मनुष्य ।
अर्थः—तेरे आज्ञा चक्र में स्थित किरोडों सूर्य और चन्द्र
के तेज से युक्त पर शिव को वन्दना करता हूं, जिसका वाम
पार्श्व् पराचिति से एकीभूत हैं । उसका जो मनुष्य भक्तिपूर्वक
आराधन करते हैं, वे उस प्रकाशमान लोक में निवास करते हैं
जो सूर्य चन्द्र और अग्नि का विषय नहीं है अथवा सब आतङ्को
से मुक्त हैं । अथवा सूर्य्यचन्द्र और अग्नि का विषय न होने के
कारण उन के प्रकाश से प्रकाशित नहीं हैं ।
तब आज्ञा चक्र कहने का क्या अभिप्राय है ? भगवती की
काल्पनिक मूर्ति को ध्यान में लाकर उसके भ्रूमध्यस्थ स्थान में
पराचिति को वामांक में लिये हुए पर शिव की आराधना करने का
यहां विधान किया गया है, अथवा साधकों को अपने ही आज्ञा चक्र
में इस प्रकार ध्यान करने की ओर संकेत है, यह बात विचारणीय है ।
भगवती के देह के अन्तर्गत सारा ब्रह्माण्ड और पिंड दोनों हैं । अथवा
श्री चक्र जो भगवती के देह का प्रतीक है, उसके षोडश और अष्ट
दलों में आज्ञा चक्र की भावना पूर्वक अर्चन करने से श्लोकोक्त
भालोक भवन की प्राप्ति कही गई है । ब्रह्माण्ड रूपी विराट देह में
आज्ञा अथवा अन्य चक्रों का स्थिर करना असंभव है । और
काल्पनिक मूर्ति के ध्यान में भी चक्रों की कल्पना करने पर साधक
को अपने भीतर ही ध्यान करना पडेगा, अन्यथा ध्यान नहीं हो
सकता । आकाश में तो चक्रों की कल्पना करना वृथा है । पार्थिव