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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 415 में से

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पृष्ठ 238

१८८ सौंदर्य लहरी
ते ज्ञानेच्छाक्रियात्मानो वह्नीन्द्वर्क स्वरूपिणः ।
इच्छा क्रिया तथा ज्ञान गौरी ब्राह्मी तु वैष्णवी ॥
त्रिधा शक्तिःस्थिता यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ संगृहीत श्लोक
शिव (पर बिन्दु) अर्थः—आगमो के विद्वानों
। का ऐसा मत है कि बिन्दु शिवात्मक
शक्ति है, बीज शक्त्यात्मक है और दोनों
। के समवाय से उत्पन्न होने वाला तत्व
सदाख्यशिव (नाद) नाद कहलाता है । सत् चित् आनन्द
। स्वरूप विभु परमेश्वर के स्पन्द रूपी
ईश्वर (बिन्दु) संकलन से शक्ति उत्पन्न होती है, फिर
। नाद और नाद से विन्दु उत्पन्न होता
शुद्ध विद्या ” है । जो साक्षात् परा शक्ति से युक्त
──*|──────|──────|── है । वह विन्दु फिर तीन रूपों में फट
नाद बीज बिन्दु जाता है अर्थात् बिंदु, बीज और नाद ।
ज्येष्ठा वामा रौद्री
। । । अर्थः—विन्दु से रौद्री, नाद
⎧ ब्रह्मा ⎫ ⎧ विष्णु ⎫ ⎧ रुद्र ⎫ से ज्येष्ठा और बीज से वामा, और
⎩ इच्छा ⎭ ⎩ क्रिया ⎭ ⎩ ज्ञान ⎭ उनसे क्रमशः रुद्र ब्रह्मा और विष्णु
⎧ ब्राह्मी ⎫ ⎧ वैष्णवी ⎫ ⎧ गौरी ⎫ हुए । वे क्रमशः ज्ञान इच्छा और
⎩ क्रिया ⎭ ⎩ ज्ञान ⎭ ⎩ इच्छा ⎭ क्रियात्मा हैं और अग्नि, चन्द्र और
। । ।
सूर्य अग्नि चन्द्र
प्राण चिति मन
सूर्य के रूप हैं । इच्छा, क्रिया और ज्ञान क्रमशः गौरी, ब्राह्मी और
वैष्णवी शक्तियां हैं, जहां पर तीनों का आधार है वह ॐ स्वरूप
परं ज्योति है । बीज को शक्त्यात्मिका कला समझना चाहिये ।

  • नोटः-विन्दुनाद कला ब्रह्मन् विष्णु ब्रह्नेश देवताः (यो०शि०६, ७०)
    यहां विष्णु को विन्दु, ब्रह्मा को नाद और ईश(रुद्र)को कला माना गया है।