सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० सौंदर्य लहरी
ध्यास, चौथे से प्रलय, और पांचवे से प्रलय के पश्चात् बन्धन में
पड़े हुए जीवों की फिर उत्पत्ति । बिन्दु से नाद का संबंध न बताने
का यह अभिप्राय है कि ब्रह्म कभी जीव नहीं बनता, आत्मा सदा
ब्रह्म स्वरूप है, और जीव भाव की एक मिथ्या प्रतीति मात्र है ।
यदि बिन्दु को शिव शक्ति भेद से दो प्रकार का माना जाय
तो शक्त्यात्म बिन्दु ही बीज है, और दोनों से शब्द ब्रह्म नाद
की उत्पत्ति समझनी चाहिये और शब्द से कला अर्थात्
अर्थात्मक सृष्टि की उत्पत्ति ।
शिव शक्ति का अङ्गी और अङ्गवत सम्बन्ध
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शरीरं त्वं शंभोः शशि मिहिरवक्षो रुहयुगं.
तवात्मानं मन्ये भगवति नवा ( भवा ) त्मानमनघम् ।
अतः शेषः शेषीत्ययमुभयसाधारणतया
स्थितः संबंधो वां समरस परानन्दपरयोः ॥
अर्थः- हे भगवति ! मैं ऐसा समझता हूं कि तू शंभु
का शरीर है, जिसके वक्षः स्थल पर सूर्य और चन्द्र दो स्तन
उभरे हुए हैं, और तेरी आत्मा सारे भव की आत्मा शंकर है,
अथवा नवात्मा शंकर है । इसलिये तुम दोनों परा शक्ति और
आनन्द का एक समरस होने के कारण शेष और शेषी वत्
संबंध स्थित् है ।