सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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चौथा पाद एकाक्षरी लक्ष्मी बीज है जो गुरु मुख से ही प्राप्त
किया जाना चाहिये। इसको चन्द्रकला कहते हैं। इसके और
तीसरे शक्ति कूट के बीच की हृल्लेखा रुद्र ग्रंथि है। १६
अक्षरों का यह मंत्र षोडशी विद्या के नाम से प्रसिद्ध है।
१६ अक्षरों को १६ नित्या समझना चाहिये। वास्तव में
अन्तिम एकाक्षरी लक्ष्मी बीज ही नित्या है, क्योंकि वह परा
कला है, और उसके कारण ही समस्त विद्या श्री विद्या कहलाती है।
यह शुद्ध चिति शक्ति स्वरूपा सहस्रारस्थ चन्द्र की १६ वीं कला है,
जो विशुद्ध चक्र के १६ पत्रों पर प्रतिबिंबित हुआ करती है।
प्रथम कला का प्रकाश पूर्व से आरम्भ होकर १६ वीं कला का
ईशान पूर्व कोण के पत्र पर समझना चाहिये। सोलहवीं कला के
आधीन ही अन्य कलाएं घटती बढती हैं, वे स्वतंत्र नहीं हैं। इस
लिये इस विद्या का नाम श्री विद्या पडा है। शुक्ल और कृष्णपक्ष
की १४ तिथियां, पूर्णिमा और अमावस्या सहित १६ चन्द्र कलाएं
कहलाती हैं। ये सब कलाएं शुक्ल पक्ष में सूर्य के योग से उदय
होती हैं और कृष्ण पक्ष में सूर्य में ही अस्त हो जाती हैं। यथा
प्रथम कला शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदय होकर कृष्ण पक्ष की
प्रतिपदा में अस्त हो जाती है, दूसरी कला शुक्ल पक्ष की द्वितीया
को उदय होकर कृष्ण पक्ष की द्वितीया में अस्त हो जाती है, इसी
प्रकार अन्य कलाओं को भी समझना चाहिये। पूर्णिमा की पूर्ण
कला अमावस्या में अस्त होती है। अमावस्या को पूर्णिमा की
कला अस्त हो जाने पर जो चन्द्र कला रहती है वह ही १६ वीं
नित्या कला है। क्योंकि वह ही चन्द्रमा का वास्तविक बिंब प्रत्येक
कला में सूर्य के प्रकाश से घटती बढती कलाओं के रूप में चमका