सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
पृष्ठ 243, कुल 415 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौंदर्य लहरी १९३
साराविश्व शक्ति का परिणाम है
( ३५ )
मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥
अर्थः - हे शिवयुवति ! तू मन है, आकाश तू है और
वायु है सारथी जिसका वह अग्नि भी तू ही है, तू जल है और
तू भूमि है; तेरी परिणति के बाहर कुछ भी नहीं । अर्थात्
सारा विश्व तेरे परिणाम का ही रूप है । तू ने ही अपने आप
को परिणत करने के लिये, चिदानन्दाकार को विराट देह के
भाव द्वारा व्यक्त किया हुआ है
सं० टि०:- जैसे श्लोक (३४) विश्व और शिव की एकता
दिखाता है, वैसे ही (३५) श्लोक में चिदानन्द को समझना
चाहिये, अर्थात् यह अध्यात्म स्वरूप है । यहां चित् और आनन्द
का जोडा भी उसी प्रकार समझना चाहिये । मन, आकाश, वायु,
अग्नि, जल, पृथिवी सत् शक्ति के विकार हैं उनसे आज्ञा, विशुद्ध,
अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान और आधार चक्रों से संबंधित् तत्त्वों
के अधि देवताओं का संकेत है, जिनका अगले श्लोकों में वर्णन है ।
ये चिदानन्दाकारा भगवती के ही रूप हैं ।