सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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स्थान आज्ञाचक्र है, आकाश का विशुद्ध, वायु का अनाहत, अग्नि
का मणिपुर, जल का स्वाधिष्ठान, और पृथिवी का स्थान मूलाधार
है। पातंजल दर्शनोक्त वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता से
संबंधित् चार प्रकार की मानसिक संप्रज्ञात समापत्ति के अंर्तगत्
क्रमशः आज्ञा से ऊपर के ३, २, २, २ स्तर हैं। इसलिये इन सबका
समावेश आज्ञाचक्र में है जो मन का स्थान है, और मन एवं पांचों
महाभूतों के छः ही चक्र मुख्य माने जाते हैं। जिनका विशेष
उल्लेख शंकर भगवत्पाद अगले छः श्लोकों में करते हैं। मन का स्थूल
ध्येयाकार हो जाना उसकी रूपापत्ति कहलाती है, उस अवस्था को
वितर्क संप्रज्ञात समापत्ति कहा गया है, मन का शब्दात्म होना
विचार संप्रज्ञात समापत्ति के अन्तर्गत है, आनन्दाकार होना सानंद
समापत्ति है और चिदात्म होना सास्मिता समापत्ति कहलाती है।
समता की प्राप्ति को समापत्ति कहते हैं और प्रज्ञा से संयुक्ति को
संप्रज्ञात कहते हैं। अर्थात् इन अवस्थाओं में मन प्रज्ञा से संयुक्त
रहकर स्थूलाकार, सूक्ष्माकार, आनन्दाकार और चिदाकार रहता है।
आज्ञाचक्र
(३६)
तवाज्ञाचक्रस्थं तपनशशिकोटिद्युतिधरं
परं शम्भुं वन्दे परिमिलितपार्श्वं परचिता ।
यमाराधन् भक्त्या रविशशिशुचीनामविषये
१ निरातङ्के लोके निवसति हि भालोक भ (भु) वने ॥
१ पाठांतर=निरालोके लोके