सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
प्रारंभिक मंगलाचरण एवं अध्याय १: सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र व नय-विचार
सर्वार्थसिद्धि
सम्पादक
पं० फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन
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ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला : संस्कृत ग्रन्थांक १३
श्रीमदाचार्यपूज्यपादविरचिता
सर्वार्थसिद्धिः
[ श्रीमदाचार्यगृद्धपिच्छप्रणीतस्य तत्त्वार्थसूत्रस्य वृत्तिः ]
सम्पादक
पण्डित फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री
भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन
वीर नि० संवत् २४९६ : विक्रम संवत् २०२७ : सन् १९७१
द्वितीय संस्करण : मूल्य १८.००
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स्व० पुण्यश्लोका माता मूर्तिदेवीकी पवित्र स्मृतिमें तत्सुपुत्र साहू शान्तिप्रसादजी द्वारा
संस्थापित
भारतीय ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला
इस ग्रन्थमालाके अन्तर्गत प्राकृत, संस्कृत, अपभ्रंश, हिन्दी, कन्नड़, तमिल आदि प्राचीन भाषाओंमें
उपलब्ध आगमिक, दार्शनिक, पौराणिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक आदि विविध-विषयक
जैन-साहित्यका अनुसन्धानपूर्ण सम्पादन तथा उसका मूल और यथासम्भव
अनुवाद आदिके साथ प्रकाशन हो रहा है। जैन भण्डारोंकी
सूचियाँ, शिलालेख-संग्रह, विशिष्ट विद्वानोंके अध्ययन-
ग्रन्थ और लोकहितकारी जैन-साहित्य ग्रन्थ भी
इसी ग्रन्थमालामें प्रकाशित हो रहे हैं।
ग्रन्थमाला सम्पादक
डॉ० हीरालाल जैन, एम० ए०, डी० लिट्०
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प्रकाशक
भारतीय ज्ञानपीठ
प्रधान कार्यालय : ३६२०।२१, नेताजी सुभाष मार्ग, दिल्ली-६
प्रकाशन कार्यालय : दुर्गाकुण्ड मार्ग, वाराणसी-५
मुद्रक : सन्मति मुद्रणालय, दुर्गाकुण्ड मार्ग, वाराणसी-५
स्थापना : फाल्गुन कृष्ण ९, वीर नि० २४७० • विक्रम सं० २००० • १८ फरवरी १९४४
सर्वाधिकार सुरक्षित
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भारतीय ज्ञानपीठ
स्व० मूर्तिदेवी, मातेश्वरी सेठ शान्तिप्रसाद जैन
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JÑĀNAPĪṬHA MŪRTIDEVĪ GRANTHAMĀLĀ : S nskrit Grantha No. 13
SARVĀRTHASIDDHI
of
PŪJYAPĀDA
[ The Commentary on Āchārya Gṛiddhapiććha's Tattwārtha Sūtra ]
Edited by
Pt. Phoolchandra Siddhant Shastry
श्री लक्ष्मीधर-विद्यामन्दिर,
देवप्रयाग ( गढ़वाल-हिमालय )
व्यवस्थापक-पं. चक्रधर जोशी
BHĀRATĪYA JÑĀNAPĪṬHA PUBLICATION
VĪRA SAMVAT 2496 : V. SAMVAT 2027 : 1971 A. D.
Secend Edition : Price Rs. 18/-
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BHĀRATĪYA JÑĀNAPĪTHA MŪRTIDEVĪ
JAINA GRANTHAMĀLĀ
FOUNDED BY
SĀHU SHĀNTIPRASĀD JAIN
IN MEMORY OF HIS LATE BENEVOLENT MOTHER
SHRĪ MŪRTIDEVĪ
IN THIS GRANTHAMĀLĀ CRITICALLY EDITED JAIN ĀGAMIC, PHILOSOPHICAL,
PURĀṆIC, LITERARY, HISTORICAL AND OTHER ORIGINAL TEXTS
AVAILABLE IN PRĀKRIT, SANSKRIT, APABHRAṀŚA, HINDI,
KANNADA, TAMIL ETC., ARE BEING PUBLISHED
IN THESE RESPECTIVE LANGUAGES WITH THEIR
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STUDIES OF COMPETENT SCHOLARS & POPULAR
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General Editors
Dr. Hiralal Jain, M. A., D. Litt.
Dr. A. N. Upadhye, M. A., D. Litt.
Published by
Bharatiya Jnanapitha
Head office : 3620/21 Netaji Subhash Marg, Delhi-6
Publication office : Durgakund Road, Varanasi-5.
Founded on Phalguna Krishna 9, Vira Sam. 2470, Vikrama Sam. 2000. 18th Febr. 1944
All Rights Reserved.
प्राथमिक
तत्त्वार्थसूत्र जैनधर्मका एक प्राचीनतम ग्रन्थ है और संस्कृतमें सूत्ररूप रचना द्वारा जैन सिद्धान्तका
विधिवत् संक्षेपमें परिचय करानेवाला संभवतः सर्वप्रथम ग्रन्थ है। यह रचना अपने विषयकी इतनी सुन्दर
हुई है कि आजतक दूसरा कोई ग्रन्थ उसकी तुलना नहीं कर पाया। इस ग्रन्थकी महिमा इससे भी प्रकट है कि
इसका प्रचार जैन समाजके समस्त सम्प्रदायों—दिगम्बर, श्वेताम्बर, स्थानकवासी आदिमें समान रूपसे पाया
जाता है। लोकप्रियतामें भी यह जैन साहित्यका अद्वितीय ग्रन्थ है।
इस ग्रन्थकी समय-समयपर अनेक टीकाएँ लिखी गयी हैं। दिगम्बर सम्प्रदायमें उसकी देवनन्दी
पूज्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि नामक वृत्ति सर्वप्राचीन मानी जाती है। इसका प्रकाशन इससे पूर्व अनेक बार हो
चुका है। किन्तु प्राचीन प्रतियोंका समालोचनात्मक ढंगसे अध्ययन कर पाठ निश्चित करनेका प्रयास इससे
पूर्व नहीं हो सका था। इस दिशामें पण्डित फूलचन्द्रजी शास्त्रीने जो यह प्रयत्न किया है उसके लिए वे
धन्यवादके पात्र हैं।
ग्रन्थका सम्पादन व मुद्रण आदितः ज्ञानपीठसे प्रकाशनके लिए नहीं किया गया था, इसलिए इसकी
सम्पादन-प्रणाली आदिमें इस मालाके सम्पादकोंका कोई हाथ नहीं रहा। पण्डितजी की प्रस्तावना आदि भी
उनकी अपनी स्वतंत्रतासे लिखी और छापी गयी है। उसमें मल्लि तीर्थंकर, श्वेताम्बर आगमकी प्रामाणिकता
आदि सम्बन्धी विचार पण्डितजीके अपने निजी हैं और पाठकोंको उन्हें उसी रूपसे देखना-समझना चाहिए।
हमारी दृष्टिसे वे कथन यदि इस ग्रन्थमें न होते तो अच्छा था क्योंकि जैसा हम ऊपर कह आये हैं, यह रचना
जैन समाज भरमें लोकप्रिय है, उसका एक सम्प्रदाय-विशेष सीमित क्षेत्र नहीं है। अतः उसी उदात्त भूमिका
पर इस ग्रन्थको सदैव प्रस्तुत करना श्रेयस्कर है। हमें आशा और भरोसा है कि पाठक उसी उदार भावनासे
इस प्रकाशनका आदर और उपयोग करेंगे।
—हीरालाल जैन
—आ० ने० उपाध्याय
ग्रन्थमाला-सम्पादक
द्वितीय संस्करण
सर्वार्थसिद्धिका यह संस्करण विषय-सामग्रीकी दृष्टिसे प्रथम संस्करणका पुनर्मुद्रण है। प्रस्तुति आदिमें
कुछ परिवर्तन किये गये हैं—
१. मूल तथा अनुवादमें पैराग्राफ दे दिये गये हैं, जिससे विषयको समझनेमें अधिक आसानी रहे।
२. मूल संस्कृतको ज्ञानपीठके अन्य संस्कृत-प्राकृत प्रकाशनोंकी तरह एकरूपता देनेका प्रयत्न किया
गया है।
३. परिशिष्टमें आचार्य प्रभाचन्द्रकृत संस्कृत टिप्पण जोड़ दिये गये हैं, जो अब तक अप्रकाशित थे।
पं० कैलाशचन्द्रजी सिद्धान्तशास्त्रीने इनका इस संस्करणके लिए विशेष रूपसे सम्पादन किया है।
ग्रन्थमाला सम्पादक
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दो शब्द
१ सम्पादनका कारण
सर्वार्थसिद्धिको सम्पादित होकर प्रकाशमें आनेमें अत्यधिक समय लगा है । लगभग आठ नौ वर्ष पूर्व
विशेष वाचनके समय मेरे ध्यानमें यह आया कि सर्वार्थसिद्धिमें ऐसे कई स्थल हैं जिन्हें उसका मूल भाग
माननेमें सन्देह होता है । किन्तु जब कोई वाक्य, वाक्यांश, पद या पदांश लिपिकारकी असावधानी या अन्य
कारणसे किसी ग्रन्थका मूल भाग बन जाता है तब फिर उसे बिना आधारके पृथक् करनेमें काफी अड़चनका
सामना करना पड़ता है । सर्वार्थसिद्धिके वाचनके समय भी मेरे सामने यह समस्या थी और इसीके फलस्वरूप
इसके सम्पादनकी ओर मेरा झुकाव हुआ था ।
यह तो स्पष्ट ही है कि आचार्य पूज्यपादने तत्त्वार्थसूत्र प्रथम अध्यायके 'निर्देशस्वामित्व' और
'सत्संख्या' इन दो सूत्रोंकी व्याख्या षट्खण्डागमके आधारसे की है । इसका विचार आगे चलकर प्रस्तावना-
में हम स्वतन्त्र प्रकरण लिखकर करनेवाले हैं । यहाँ केवल यह देखना है कि इन सूत्रोंकी व्याख्यामें कहीं
कोई शिथिलता तो नहीं आने पायी और यदि शिथिलताके चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं तो उसका कारण क्या है ?
'निर्देशस्वामित्व-' सूत्रकी व्याख्या करते समय आचार्य पूज्यपादने चारों गतियोंके आश्रयसे सम्य-
ग्दर्शनके स्वामीका निर्देश किया है। वहाँ तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शनके अभावके समर्थनमें पूर्व मुद्रित
प्रतियोंमें यह वाक्य उपलब्ध होता है—
‘कुत इत्युक्ते मनुष्यः कर्मभूमिज एव दर्शनमोहक्षपणप्रारम्भको भवति । क्षपणप्रारम्भकालात्पूर्वं
तिर्यक्षु बद्धायुष्कोऽपि उत्तमभोगभूमितिर्यक्पुरुषेष्वेवोत्पद्यते न तिर्यक्स्त्रीषु ; द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां क्षायिका-
संभवात् । एवं तिरश्चामपर्याप्तिकानां क्षायोपशमिकं ज्ञेयं न पर्याप्तकानाम् ।'
दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके आगममें इस प्रकारके नियमका निर्देश है कि सम्यग्दृष्टि
मर कर किसी भी गतिके स्त्रीवेदियोंमें उत्पन्न नहीं होता ।
किन्तु श्वेताम्बर आगम ज्ञाताधर्मकथा नामके छठवें अंगमें मल्लिनाथ तीर्थङ्करकी कथा¹ के प्रसंगसे
बतलाया गया है कि मल्लिनाथ तीर्थङ्करने अपने पिछले महाबलके भवमें मायाचारके कारण ²स्त्रीनामकर्म
गोत्रको निष्पन्न किया जिससे वे तीर्थङ्करकी पर्यायमें स्त्री हुए । और इसी कारण पीछेके श्वेताम्बर टीका-
कारोंने उक्त नियमका यह खुलासा किया है कि 'सम्यग्दृष्टि मरकर स्त्री नहीं होता यह बाहुल्यकी अपेक्षा
कहा है ।'
यहाँ हमें इस कथाके सन्दर्भ पर विचार न कर केवल इतना ही देखना है कि यह स्त्री नामकर्म गोत्र
क्या वस्तु है । क्या यह नौ नोकषायोंमेंसे स्त्रीवेद नामक नोकषाय है या इस द्वारा अङ्गोपाङ्गका निर्देश
किया गया है ? जब महाबलकी पर्यायमें इस कर्मका बन्ध होता है तब वे तीर्थंकर प्रकृतिका बन्ध करनेवाले
सम्यग्दृष्टि साधु थे और सम्यग्दृष्टिके स्त्रीवेदका बन्ध नहीं होता ऐसा कर्मशास्त्रका नियम है । इसलिए यह
बँधनेवाला कर्म स्त्रीवेद नामक नोकषाय तो हो नहीं सकता । रही अङ्गोपाङ्गकी बात सो एक तो अङ्गो-
पाङ्गमें ऐसा भेद परिलक्षित नहीं होता । कदाचित् ऐसा भेद मान भी लिया जाय तो कर्मशास्त्रके नियमा-
नुसार अशुभ अङ्गोपाङ्गका बन्ध प्रमत्त-संयत और अप्रमत्तसंयत गुणस्थानमें होता है यह कहना कठिन है ।
१. देखो अध्ययन ८ । २. तए णं से महब्बले अणगारे इमेणं कारणेणं इत्थिणामकम्मं गो यं विव्वंतिसु ।
ज्ञाता० पृ० ३१२ ।
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इसलिए प्रस्तुत प्रकरणमें न तो ज्ञाताधर्मकथाकी इस कथाको आधार माना जा सकता है और न ही इस
आधारसे श्वेताम्बर टीकाकारोंका यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि 'सम्यग्दृष्टि जीव मरकर स्त्रीवेदियोंमें
नहीं उत्पन्न होता यह बाहुल्य की अपेक्षा कहा है।'
इतने विचारके बाद जब हम सर्वार्थसिद्धिके उक्त कथन पर ध्यान देते हैं तो हमें उसमें सन्देह होता है।
उसमें तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शन न होनेके हेतुका निर्देश किया गया है। यह तो स्पष्ट है कि जो
मनुष्य तिर्यञ्चायुका बन्ध कर सम्यग्दृष्टि हो क्षायिक सम्यग्दर्शनको प्राप्त होता है वह उत्तम भोगभूमिके पुरुष-
वेदी तिर्यञ्चोंमें ही उत्पन्न होता है, स्त्रीवेदी तिर्यञ्चोंमें नहीं। किन्तु इसके समर्थनमें जो 'द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां
क्षायिकासंभवात्' यह युक्ति दी गयी है वह न केवल लचर है अपि तु भ्रमोत्पादक भी है।
इस युक्तिके आधारसे पूरे वाक्यका यह अर्थ होता है कि तिर्यञ्च द्रव्यवेदवाली स्त्रियोंमें चूँकि क्षायिक
सम्यग्दर्शन सम्भव नहीं है इसलिए क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीव मरकर उत्तम भोगभूमिके तिर्यञ्च पुरुषोंमें ही
उत्पन्न होते हैं। अब थोड़ा बारीकीसे पूरे सन्दर्भ पर विचार कीजिए। जो प्रश्न है, एक तरहसे वही समाधान
है। तिर्यञ्चिनियोंमें क्षायिक सम्यग्दर्शन क्यों नहीं होता इसका विचार करना है। किन्तु उसके उत्तरमें इतना
कहना पर्याप्त था कि बद्धतिर्यञ्चायु मनुष्य यदि क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है तो वह मरकर उत्तम भोग-
भूमिके तिर्यञ्च पुरुषोंमें ही उत्पन्न होता है ऐसा नियम है वहाँ समर्थनमें 'द्रव्यवेदस्त्रीणां तासां क्षायिका-
संभवात्' इस हेतु कथनकी क्या आवश्यकता थी। इसीको कहते हैं वही प्रश्न और वही उत्तर।
दूसरे यहाँ 'द्रव्यवेदस्त्रीणां' यह वाक्य रचना आगम परिपाटीके अनुकूल नहीं है अतएव भ्रमोत्पादक
भी है, क्योंकि आगममें तिर्यञ्च, तिर्यञ्चिनी और मनुष्य, मनुष्यिनी ऐसे भेद करके व्यवस्था की गयी है तथा
इन संज्ञाओंका मूल आधार वेद नोकषायका उदय बतलाया गया है।
हमारे सामने यह प्रश्न था। हम बहुत कालसे इस विचारमें थे कि यह वाक्य ग्रन्थका मूलभाग है या
कालान्तरमें उसका अङ्ग बना है। तात्त्विक विचारणाके बाद भी इसके निर्णयका मुख्य आधार हस्तलिखित
प्राचीन प्रतियां ही थीं। तदनुसार हमने उत्तर भारत और दक्षिण भारतकी प्रतियोंका संकलन कर शंकास्थलोंका
मुद्रित प्रतियोंसे मिलान करना प्रारम्भ किया। परिणामस्वरूप हमारी धारणा सही निकली। यद्यपि सब
प्रतियोंमें इस वाक्यका अभाव नहीं है पर उनमेंसे कुछ प्राचीन प्रतियाँ ऐसी भी थीं जिनमें यह वाक्य नहीं
उपलब्ध होता है।
इसी सूत्रकी व्याख्यामें दूसरा वाक्य 'क्षायिकं पुनर्भाववेदेनैव' मुद्रित हुआ है। यहाँ मनुष्यिनियोंके
प्रकरणसे यह वाक्य आता है। बतलाया यह गया है कि पर्याप्त मनुष्यिनियोंके ही तीनों सम्यग्दर्शनोंकी प्राप्ति
सम्भव है अपर्याप्त मनुष्यिनियोंके नहीं। निश्चयतः मनुष्यिनीके क्षायिक सम्यग्दर्शन भाववेदकी मुख्यतासे ही
कहा है यह द्योतित करनेके लिए इस वाक्यकी सृष्टि की गयी है।
किन्तु यह तो स्पष्ट ही है कि आगममें 'मनुष्यिनी' पद स्त्रीवेदके उदयवाले मनुष्य गतिके जीवके लिए
ही आता है। जो लोकमें नारी, महिला या स्त्री आदि शब्दोंके द्वारा व्यवहृत होता है, आगमके अनुसार
मनुष्यिनी शब्दका अर्थ उससे भिन्न है। ऐसी अवस्थामें उक्त वाक्यको मूलका मान लेने पर मनुष्यिनी शब्दके
दो अर्थ मानने पड़ते हैं। उसका एक अर्थ तो स्त्रीवेदका उदयवाला मनुष्य जीव होता ही है और दूसरा अर्थ
महिला मानना पड़ता है चाहे उसके स्त्रीवेदका उदय हो या न हो।
ऐसी महिलाको भी जिसके स्त्रीवेदका उदय होता है मनुष्यिनी कहा जा सकता है और उसके क्षायिक
सम्यग्दर्शनका निषेध करनेके लिए यह वाक्य आया है, यदि यह कहा जाय तो इस कथनमें कुछ भी तथ्यांश
नहीं प्रतीत होता, क्योंकि जैसा कि हम पहले कह आये हैं कि आगममें मनुष्यिनी शब्द भाववेदकी मुख्यतासे
ही प्रयुक्त हुआ है, अतएव वह केवल अपने अर्थमें ही चरितार्थ है। अन्य आपत्तियोंका विधि-निषेध करना
उसका काम नहीं है।
हमने इस वाक्य पर भी पर्याप्त ऊहापोह कर सब प्रतियोंमें इसका अनुसन्धान किया है। प्रतियोंके
मिलान करनेसे ज्ञात हुआ कि यह वाक्य भी सब प्रतियोंमें नहीं उपलब्ध होता।
दो शब्द ९
इसी प्रकार एक वाक्य 'सत्संख्या' — इत्यादि सूत्रकी व्याख्याके प्रसंगसे लेश्या प्रकरणमें आता है।
जो इस प्रकार है—
‘द्वादशभागाः कुतो न लभ्यन्ते, इति चेत् तन्नावस्थितलेश्यापेक्षया पञ्चैव । अथवा येषां मते सासा-
दनएकेन्द्रियेषु नोत्पद्यते तन्मतापेक्षया पञ्चैव ।'
प्रकरणे कृष्ण आदि लेश्यावाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंके स्पर्शनका है। तिर्यंच और मनुष्य सासादन-
सम्यग्दृष्टि जीव मर कर नरकमें नहीं उत्पन्न होते । जो देवगतिमें जाते हैं या देवगतिसे आते हैं उनके कृष्ण
आदि अशुभ लेश्याएँ नहीं होतीं। नरकसे आनेवालोंके कृष्ण आदि अशुभ लेश्याएँ और सासादनसम्यग्दर्शन
दोनों होते हैं। इसी अपेक्षासे यहां कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यावाले सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्शन
क्रमसे कुछ कम पांच बटे चौदह राजु, कुछ कम चार बटे चौदह राजु और कुछ कम दो बटे चौदह राजु
कहा गया है।
यह षट्खण्डागमका अभिमत है। सर्वार्थसिद्धिमें सत्, संख्या और क्षेत्र आदि अनुयोगद्वारोंका निरूपण
इसी अभिप्रायसे किया गया है। कषायप्राभृतका अभिमत इससे भिन्न है। उसके मतसे सासादनसम्यग्दृष्टि
जीव मर कर एकेन्द्रियोंमें भी उत्पन्न होते हैं। इसलिए इस अपेक्षासे कृष्ण लेश्यामें सासादनसम्यग्दृष्टिका
कुछ कम बारह बटे चौदह राजु स्पर्शन भले ही बन जावे, परन्तु षट्खण्डागमके अभिप्रायसे इन लेश्याओं में
यह स्पर्शन उपलब्ध नहीं होता।
हमारे सामने यह प्रश्न था । सर्वार्थसिद्धिमें जब भी हमारा ध्यान 'द्वादशभागाः कुतो न लभ्यन्ते'
इत्यादि वाक्य पर जाता था, हम विचारमें पड़ जाते थे। प्रश्न होता था कि यदि सर्वार्थसिद्धिकारको मतभेद-
की चर्चा करना इष्ट था तो सतरूपणामें उन्होंने इस मतभेदका निर्देश क्यों नहीं किया ? अनेक प्रकारसे इस
वाक्यके समाधानकी ओर ध्यान दिया पर समुचित समाधानके अभावमें चुप रहना पड़ा। यह विचार अवश्य
होता था कि यदि सर्वार्थसिद्धिकी प्राचीन प्रतियोंका आश्रय लिया जाय तो सम्भव है उनमें यह वाक्य न
हो। हमें यह संकेत करते हुए प्रसन्नता होती है कि हमारी धारणा ठीक निकली। मूडबिद्रीसे हमें जो ताड़-
पत्रीय प्रतियां उपलब्ध हुईं उनमें यह वाक्य नहीं है। इस आधारसे हम यह निश्चयपूर्वक कह सकते हैं कि
यह वाक्य भी सर्वार्थसिद्धिका नहीं है।
सर्व-प्रथम सर्वार्थसिद्धिमूलका मुद्रण कल्लप्पा भरमप्पा निटवेने कोल्हापुरसे किया था। दूसरा मुद्रण
श्री मोतीचन्द्र गोतमचन्द्र कोठारी द्वारा सम्पादित होकर सोलापुरसे हुआ है। तथा तीसरी बार श्रीमान्
पं० बंशीधरजी सोलापुरवालोंने सम्पादित कर इसे प्रकाशित किया है। पण्डितजी ने इसके सम्पादित करनेमें
पर्याप्त श्रम किया है और अन्य संस्करणोंकी अपेक्षा यह संस्करण अधिक शुद्ध है। फिर भी जिन महत्वपूर्ण
शंकास्थलोंकी ओर हमने पाठकोंका ध्यान आकर्षित किया है वे उस संस्करणमें भी यथास्थान अवस्थित हैं।
सर्वार्थसिद्धिके नीचे जो टिप्पणियां उद्धृत की गयी हैं वे भी कई स्थलों पर भ्रमोत्पादक हैं। उदाहर-
णार्थ कालप्ररूपणामें अनाहारकोंमें नाना जीवोंकी अपेक्षा सासादनसम्यग्दृष्टियोंका उत्कृष्ट काल आवलिके
असंख्यातवें भागप्रमाण बतलाया गया है। इस पर टिप्पणी करते हुए टिप्पणकार लिखते हैं—
'आवलिकाया असंख्येयभाग इति — स च आवलिकाया असंख्येयभागः समयमात्रलक्षणत्वात् एक-
समय एव स्यात्, आवल्याः असंख्यातसमयलक्षणत्वात् ।'
इसका तात्पर्य यह है कि वह आवलिका असंख्यातवां भाग एक समय लक्षणवाला होनेसे एक समय
प्रमाण ही होता है, क्योंकि एक आवलिमें असंख्यात समय होते हैं, अतः उसका असंख्यातवां भाग एक समय
ही होगा।
स्पष्ट है कि यदि यहां आचार्योंको एक समय काल इष्ट होता तो वे इसका निर्देश 'एक समय' शब्द
द्वारा ही करते। जीवस्थान कालानुयोगद्वारमें आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण कालका जो स्पष्टीकरण किया
है उसका भाव यह है कि कई सासादनसम्यग्दृष्टि दो विग्रह करके दो समय तक अनाहारक रहे और तीसरे
समयमें अन्य सासादनसम्यग्दृष्टि दो विग्रह करके अनाहारक हुए। इस प्रकार निरन्तर आवलिके असंख्यातवें
प्रस्तावना-२
१० सर्वार्थसिद्धि
भाग बार जीव दो-दो समय तक अनाहारक होते रहे । इसलिए आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण काण्डकोंको
दो से गुणा करने पर अनाहारक सासादनसम्यग्दृष्टियोंका कुल काल उपलब्ध होता है । १
अधिकतर हस्तलिखित प्रतियोंमें यह देखा जाता है कि पीछेसे अनेक स्थलों पर विषयको स्पष्ट करनेके
लिए अन्य ग्रन्थोंके श्लोक, गाथा, वाक्यांश या स्वतन्त्र टिप्पणियां जोड़ दी जाती हैं और कालान्तरमें वे ग्रन्थका
अंग बन जाती हैं। सर्वार्थसिद्धिमें यह व्यत्यय बहुत ही बड़ी मात्रामें हुआ है । ऐसे तीन उदाहरण तो हम
इस वक्तव्यके प्रारम्भमें ही उपस्थित कर आये हैं । कहना न होगा कि यह किसी टिप्पणकारकी सूझ है और
उसने अपनी दृष्टिसे विषयको स्पष्ट करनेके लिए पहले वे वाक्य फुटनोटके रूपमें हाशियामें लिखे होंगे और आगे
चलकर उसपर-से दूसरी प्रति तैयार करते समय वे ही मूल ग्रन्थके अंग बन गये होंगे । इसके सिवा आगे
भी ऐसे कई वाक्यांश या गाथाएँ मिली हैं जो अधिकतर हस्तलिखित प्रतियोंमें उपलब्ध नहीं होतीं और जिन्हें
दूर कर देनेसे प्रकरणकी कुछ भी हानि नहीं होती । यहाँ हम कुछ ऐसे उपयोगी वाक्यांशोंके दो-तीन उदाहरण
उपस्थित कर रहे हैं जो प्राचीन संस्करणोंमें थे और इस संस्करणमें-से अलग करने पड़े हैं—
१. कुछ प्रतियोंमें तृतीय अध्यायके प्रथम सूत्रकी वृत्तिमें 'घनं च घनो मन्दो महान् आयत इत्यर्थः'
आदि पाठ उपलब्ध होता है। अब तककी मुद्रित प्रतियोंमें भी यह पाठ प्रकाशित हुआ है। हमारे सामने जो
प्रतियां थीं उनमें से अधिकतर प्रतियोंमें यह पाठ नहीं है और वृत्तिको देखते हुए वह वृत्तिकारका प्रतीत भी
नहीं होता, इसलिए इस पाठको ऊपर न देकर नीचे टिप्पणीमें दिखा दिया है।
२. नौवें अध्यायके नौवें सूत्रके मलपरीषहके व्याख्यानके अन्तमें 'केशलोञ्चसंस्काराभ्यामुत्पन्नखेद-
सहनं मलसामान्यसहनेऽन्तर्भवतीति न पृथगुक्तम्।' यह वाक्य मुद्रित प्रतियोंमें उपलब्ध होता है। किन्तु
हमारे सामने जो हस्तलिखित प्रतियां थीं उनमें यह वाक्य नहीं पाया जाता। वाक्य-रचनाको देखते हुए यह
सर्वार्थसिद्धिकारका प्रतीत भी नहीं होता। तथा किसी परीषहका स्वरूपनिर्देश करनेके बाद सर्वार्थसिद्धिमें
पुनः उस परीषहके सम्बन्धमें विशेष स्पष्टीकरण करनेकी परिपाटी भी नहीं दिखाई देती, इसलिए हमने इस
वाक्यको मूलमें न देकर टिप्पणीमें अलगसे दिखा दिया है।
२ प्रस्तुत संस्करणमें स्वीकृत पाठकी विशेषता
यह हम पहले ही निर्देश कर आये हैं कि प्रस्तुत संस्करणके पहले सर्वार्थसिद्धिके अनेक संस्करण
प्रकाशमें आ चुके थे। ऐसी अवस्थामें प्रस्तुत संस्करणके सम्पादनके समय किसी पाठको स्वीकार करने या
अस्वीकार करनेमें हमारे सामने बड़ी कठिनाई रही है। साधारणतः हमने इस बातका ध्यान रखा है कि
मुद्रित प्रतियोंमें जो पाठ उपलब्ध होते हैं। सर्वप्रथम उन्हें ही प्रमुखता दी जाय । किन्तु इस नियमका हम
सर्वत्र पालन नहीं कर सके । यदि हमें उनसे उपयुक्त पाठ अन्य हस्तलिखित प्रतियोंमें उपलब्ध हुए तो उन्हें
स्वीकार करनेमें हमने संकोच नहीं किया । यहाँ तुलनात्मक ढंगसे मात्र प्रथम अध्यायके कुछ ऐसे पाठ दे रहे
हैं जिनसे उनका महत्त्व पाठकोंके ध्यानमें आ जाय ।
पृ० पं० पुरानी मुद्रित प्रति प्रस्तुत संस्करण
३ ३ -वत् । एवं व्यस्तज्ञाना- -वत् व्यस्तं ज्ञाना-
६ १ स्वयं पश्यति दृश्यतेऽनेनेति पश्यति दृश्यतेऽनेन
६ १ ज्ञप्तिमात्रं ज्ञातिमात्रं
१७ ४ पुरुषाकारा- पुरुषकारा-
१८ १ -र्थानामजीवानां नामा- -र्थानां नामा-
१९ १ -विधिना नामशब्दा- -विधिना शब्दा-
१. देखो, जीवस्थान पृ० ४, पृ० ४३५ ।
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दो शब्द ११
२० १ तत्त्वं प्रमाणेभ्यो तत्त्वं प्रमाणाभ्याम्
२९ ६ -निर्देशः । प्रशंसा- -निर्देशः । स प्रशंसा-
३० २ संक्षेपरुचयः । अपरे संक्षेपरुचयः । केचित् विस्तररुचयः । अपरे
३४ १ द्विविधा सामान्येन तावत् द्विविधाः सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावत्
४४ ५ -संख्येयभागः -संख्येया भागाः
४९ ७ -स्पृष्टः अष्टौ नव चतु- स्पृष्टः अष्टौ चतु-
५० ३ -ख्येयभागः स्पृष्टः । सासादन- -ख्येयंभागः । असंयत-
सम्यग्दृष्टिभिः लोकस्यासंख्येयभागः
अष्टौ नव चतुर्दश भागा वा देशोनाः
सम्यग्मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां
सामान्योक्तं स्पर्शनम् । असंयत-
५९ २ -ख्येयः कालः । वन- -ख्येया लोकाः । वन-
६४ ११ -ज्ञिनां मिथ्यादृष्टेर्नाना- -ज्ञिनां नाना-
७१ १० -म्यधिके । चतुर्णा- -म्यधिके । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां
नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे
पूर्वकोटीपृथक्त्वैरम्यधिके । चतुर्णा-
८३ ७ -भागा असंख्येया उत्स- -भागोऽसंख्येयासंख्येया उत्स-
८८ ७ -संयता संख्ये- -संयता असंख्ये-
८९ ५ -भावः । इन्द्रियं प्रत्युच्यते । -भावः । पञ्चे-
पञ्चेन्द्रियाद्येकेन्द्रियान्ता उत्तरोत्तरं
बहवः । पञ्चे-
८९ ७ -भावः कायं प्रत्युच्यते । सर्वतस्तेजः- -भावः । त्रस-
कायिका अल्पाः । ततो बहवः पृथिवी-
कायिकाः । ततोऽप्यप्कायिकाः । ततो
वातकायिकाः । सर्वतोऽनन्तगुणा वन-
स्पतयः । त्रस-
९० ६ -दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मति- -दृष्टयोऽनन्तगुणाः विभगंज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाः
सासादनसम्यग्दृष्टयः । मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः ।
मति-
९० ९ -यताः संख्ये- -यताः असंख्ये-
९० ९ -ष्टयः संख्ये- -ष्टयः असंख्ये-
९१ ५ दृष्टयोऽसंख्ये- -दृष्टयः संख्येयं-
९१ १२ -संयता संख्ये- -संयता असंख्ये-
९२ १ -दृष्टयः संख्ये- -दृष्टयोऽसंख्ये-
९२ २ -दृष्टयोऽसंख्ये -दृष्टयः संख्ये-
९२ ७ -यताः संख्ये- -यताः असंख्ये-
९२ ९ -यताः संख्ये- -यताः असंख्ये-
९२ १० -बहुत्वम् । विपक्षे एकैक- -बहुत्वम् । संज्ञा-
गुणस्थानग्रहणात् । संज्ञा-
१२ सर्वार्थसिद्धि
९३ ११ -स्वमर्थान्मन्यते -स्वमर्थो मन्यते
९४ १ अनेनेति तत् अनेन तत्
९८ १ -ल्याज्ञानभावः अज्ञाननाशो -ल्पाज्ञाननाशो
९८ ३ -धिगमे अन्य- -धिगमे च अन्य-
९८ ५ हेतुः तत्स्वरूप- हेतुः स्वस्वरूप-
१०० १ -त्यर्थः उपमानार्थापत्त्यादीना- -त्यर्थः । उक्तस्य
मत्रैवान्तर्भावादुक्तस्य
१०३ ३ -ज्ञानमपि प्रति -ज्ञानमक्षमेव प्रति
१०४ १ एवं प्रसक्त्या आसस्य एवं सति आसस्य
१०७ २ संज्ञाः । सम- संज्ञाः । सम-
१०७ ४ नातिवर्तत इति नातिवर्तन्त इति
११० १ -र्गतं करणमित्यु- -र्गतं करणमन्तःकरणमित्यु-
१११ ६ पताकेति । पताका वेति ।
१११ ७ अपैतस्य अवैतस्य
११३ ७ बहुषु बहुविशेष्वपि बहुष्वपि बहुत्वमस्ति बहुविशेष्वपि
११७ ३ द्वित्रिसिक्तः द्वित्रासिक्तः
११७ ५ द्वित्र्यादिषु द्वित्रादिषु
१२० ५ प्रतीत्या व्यु- प्रतीत्य व्यु
१३१ ३ ताम्याम् । तयोः ताम्यां विशुद्धचप्रतिपाताभ्याम् । तयोः
१३४ १० नारूपेष्विति नारूपिष्विति
१४० १ -ज्ञानमवध्यज्ञानं -ज्ञानं विभंगज्ञानं
१४० ८ -प्रवणप्रयोगो -प्रवणः प्रयोगो
३ प्रति परिचय
और भी ऐसी अनेक कई बातें थीं जिनके कारण हमने कई प्राचीन प्रतियोंके आधारसे इसे पुनः
सम्पादित करनेका निश्चय किया इसके लिए हमने मूडबिद्रीकी दो ताडपत्रीय प्रतियां, दिल्ली भाण्डारसे दो
हस्तलिखित प्रतियां और जैन सिद्धान्तभवन आरासे एक हस्तलिखित प्रति प्राप्त की । मुद्रित संस्करणोंमें से
हमारे सामने श्री पं० कलुप्पा भरमप्पा निटवे द्वारा सम्पादित और श्री पं० वंशीधरजी सोलापुर द्वारा
सम्पादित प्रतियां थीं । इस काममें मूडबिद्रीकी एक ताडपत्रीय प्रति और दिल्ली भाण्डारकी एक हस्तलिखित
प्रति विशेष उपयोगी सिद्ध हुईं । अन्य प्रतियोंकी अपेक्षा ये अधिक शुद्ध थीं । फिर भी आदर्श प्रतिके रूपमें
हम किसी एक को मुख्य मानकर न चल सके । हम यह तो नहीं कह सकते कि सर्वार्थसिद्धिका प्रस्तुत संस्करण
सब दृष्टियोंसे अन्तिम है फिर भी इसे सम्पादित करते समय इस बातका ध्यान अवश्य रखा गया है कि जहाँ
तक बने इसे अधिक परिशुद्ध और मूलग्राही बनाया जाय ।
प्रतियोंका परिचय देनेके पहले हम इस बातको स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि सर्वार्थसिद्धिको सम्पादित
होकर प्रकाशमें आनेमें आवश्यकतासे अधिक समय लगा है । इतने लम्बे कालके भीतर हमें अनेक बार गृह-
परिवर्तन करना पड़ा है और भी कई अड़चनें आयी हैं । इस कारण हम अपने सब कागजात सुरक्षित न रख
सके । ऐसे कई उपयोगी कागज पत्र हम गँवा बैठे जिनके न रहने से हमारी बड़ी हानि हुई है । उन कागज-
पत्रोंमें प्रतिपरिचय भी था, इसलिए प्रतियोंका जो पूरा परिचय हमने लिख रखा था वह तो इस समय हमारे
सामने नहीं है । वे प्रतियाँ भी हमारे सामने नहीं हैं जिनके आधारसे हमने यह कार्य किया है । फिर भी
दो शब्द १३
हमारे मित्र श्रीयुक्त पं० के० भुजबलिजी शास्त्री मूडबिद्री और पं० दरबारीलालजी न्यायाचार्य दिल्ली की
सत्कृपासे उक्त स्थानोंकी प्रतियोंका जो परिचय हमें उपलब्ध हुआ है वह हम यहाँ दे रहे हैं—
(१) ता०—यह मूडबिद्रीकी ताड़पत्रीय प्रति है। लिपि कनाडी है। कुल पत्र ११६ हैं। इसके
प्रत्येक पृष्ठमें पंक्ति १० और प्रत्येक पंक्तिमें अक्षर लगभग ७१ हैं। प्रति शुद्ध और अच्छी हालतमें है।
सरस्वती गच्छ, बलात्कार गण कुन्दकुन्दान्वयके आ० वसुन्धरने भाद्रपद कृष्णा प्रतिपदा शालि० शक १५५१
विलम्बि संवत्सरके दिन इसकी लिपि समाप्त की थी। हमारे] सामने उपस्थित प्रतियोंमें यह सबसे अधिक
प्राचीन थी। इसका संकेताक्षर ता० है।
(२) ना०—यह भी मूडबिद्रीकी ताडपत्रीय प्रति है। लिपि कनाडी है। कुल पत्र १०१ हैं। 'इसके
प्रत्येक पृष्ठमें पंक्ति ९ और प्रत्येक पंक्तिमें अक्षर लगभग १०७ हैं। प्रति शुद्ध और अच्छी अवस्थामें है।
इसमें लिपिकर्ता तथा लिपिकालका निर्देश नहीं है। इसका संकेताक्षर ना० है।
(३) दि० १—यह श्री लाला हरसुखराय सुगनचन्दजीके नये मन्दिरमें स्थित दि० जैन सरस्वती
भाण्डार धर्मपुरा दिल्लीकी हस्तलिखित प्रति है। पत्र संख्या २०१ है। प्रत्येक पत्रमें १८ पंक्ति और प्रत्येक
पंक्तिमें लगभग ३३ अक्षर हैं। पत्रकी लम्बाई ११ इंच और चौड़ाई ५ इंच है। चारों ओर एक-एक इंच
हासिया छोड़कर बीचमें प्रतिलिपि की गयी है। कागज़ पुष्ट है, अक्षर भी बड़े सुन्दर हैं जो बिना किसी कष्टके
आसानीसे पढ़े जाते हैं। लेखनकार्य संवत् १७५२ आषाढ़ सुदि ११ गुरुवारको समाप्त हुआ था। प्रतिके
अन्तमें यह प्रशस्ति उपलब्ध होती है—
'प्रणिपत्य जिनवरेन्द्रं वरविग्रहरूपरञ्जितसुरेन्द्रं । सद्गुणसुधासमुद्रं वक्ष्ये सस्तां प्रशस्तिमहां ॥ १ ॥
जगत्सारे हि सारेऽस्मिन्निहिंसाजलसागरे । नगरे नागराकीर्जे विस्तीर्णपण्यपण्यके ॥ २ ॥ छ ॥ संवत् १७५२
वर्षे आषाढ़ सुदि ११ गुरौ लिखापिताध्यात्मरतपरसाशेषज्ञानावरणीयक्षयार्थं लिखितं ।'
इसका संकेताक्षर दि० १ है।
(४) दि० २—यह भी पूर्वोक्त स्थानकी हस्तलिखित प्रति है। पत्र संख्या १११ है। प्रत्येक पत्रमें
१२ पंक्ति और प्रत्येक पंक्तिमें लगभग ५० अक्षर हैं। मात्र प्रथम और अन्तिम पत्रमें पंक्ति संख्या कम है।
पत्रकी लम्बाई ११। इंच और चौड़ाई ५ इंच है। अगल-बगलमें सवा इंच और ऊपर-नीचे पौन इंच हांसिया
छोड़कर प्रतिलिपि की गयी है। प्रतिके अन्तमें आये हुए लेखसे विदित होता है कि यह प्रति सं० १८४५
आश्विन वदि १४ मंगलवारको लिखकर समाप्त हुई थी। लेख इस प्रकार है—
'संवत् १८४५ मासोत्तममासे अश्विनीमासे कृष्णपक्षे तिथौ च शुभ चतुर्दशी भूमिवासरेण लिखितं
जैसिंहपुरामध्ये पिरागदास मोहाका जैनी भाई ।'
इस प्रतिके देखनेसे विदित होता है कि यह सम्भवतः दि० १ के आधारसे ही लिखी गयी होगी।
प्रतिकार श्री पिरागदास जी जैन हैं और नर्रासिंहपुरा (नयी दिल्ली) जिन मन्दिरमें बैठकर यह लिखकर
तैयार हुई है। इसका संकेताक्षर दि० २ है।
इन प्रतियोंके सिवा पाँचवीं प्रति श्री जैन सिद्धान्त भवन आरा की है। जो प्रति वाचनके समय
उपयोगमें ली गयी है। तथा मुद्रणके समय मध्यप्रदेश सागर जिलाके अन्तर्गत खिमलासा गाँवकी प्रति भी
सामने रही है। यह गाँव पहले समृद्धिशाली नगर रहा है। यह बीना इटावासे मालथौनको जानेवाली सड़कपर
स्थित है और बीना इटावासे लगभग १२ मील दूर है। प्राचीन उल्लेखोंसे विदित होता है कि इसका प्राचीन
नाम क्षेमोल्लास है। खिमलासा उसीका अपभ्रंश नाम है। नगरके चारों ओर परकोटा और खण्डहर प्राचीन-
कालीन नगरकी समृद्धिके साक्षी हैं। यहाँका जिनमन्दिर दर्शनीय है। इसमें एक सरस्वतीभवन है। जिसमें
अनेक ग्रन्थोंकी हस्तलिखित प्राचीन प्रतियां अब भी मौजूद हैं।
१४ सर्वार्थसिद्धि
४ प्रकाशनमें ढिलाईका कारण
सर्वप्रथम इसका सम्पादन हमने स्वतन्त्र भावसे किया था । सम्पादनमें लगनेवाली आवश्यक सामग्री
हमें स्वयं जुटानी पड़ी थी । एक बार कार्यके चल निकलने पर हमें आशा थी कि हम इसे अतिशीघ्र प्रकाशमें
ले आवेंगे । एक दो साहित्यिक संस्थाएँ इसके प्रकाशनके लिए प्रस्तुत भी थीं परन्तु कई प्रतियोंके आधारसे
मूलका मिलान कर टिप्पण लेना और अनुवाद करना जितने जल्दी हम सोचते थे उतने जल्दी कर नहीं
सके । परिणाम स्वरूप वह काम आवश्यकतासे अधिक पिछड़ता गया । इसी बीच वि० सं० २००३ में
श्री पूज्य श्री १०५ क्षु० गणेशप्रसादजी वर्णीकी सेवाओंके प्रति सम्मान प्रकट करनेके लिए श्री गणेशप्रसाद
वर्णी जैन ग्रन्थमालाकी स्थापना की गयी और सोचा गया कि सर्वार्थसिद्धिका प्रकाशन इसी ग्रन्थमालाकी
ओरसे किया जाय । तदनुसार श्री भार्गव भूषण प्रेस में यह मुद्रणके लिए दे दी गयी । किन्तु प्रेसकी ढिलाई
और ग्रन्थमालाके सामने उत्तरोत्तर दूसरे कार्योंके आते रहनेके कारण इसके प्रकाशनमें काफी समय लग गया ।
५ भारतीय ज्ञानपीठ
इस साल किसी तरह हम इसके मुद्रणका कार्य पूरा करनेकी स्थितिमें आये ही थे कि कई ऐसी
आर्थिक व दूसरी अड़चनें ग्रन्थमालाके सामने उठ खड़ी हुईं जिनको ध्यानमें रखकर ग्रन्थमालाने मेरी सम्मति-
से इसका प्रकाशन रोक दिया और मुझे यह अधिकार दिया कि इस कार्यको पूरा करनेका उत्तरदायित्व यदि
भारतीय ज्ञानपीठ ले सके तो उचित आधारों पर यह ग्रन्थ भारतीय ज्ञानपीठको साभार सौंप दिया जाय ।
ग्रन्थमालाकी इस मनसाको ध्यानमें रखकर मैंने भारतीय ज्ञानपीठके सुयोग्य मन्त्री श्रीमान् पं० अयोध्याप्रसाद-
जी गोयलीयसे इस सम्बन्धमें बातचीत की । गोयलीयजीने एक ही उत्तर दिया कि अर्थाभाव या दूसरे किसी
कारणसे यदि सर्वार्थसिद्धिके प्रकाशनमें श्री ग० वर्णी जैन ग्रन्थमाला कठिनाई अनुभव करती है तो भारतीय
ज्ञानपीठ उसे यों ही अप्रकाशित स्थितिमें नहीं पड़ा रहने देगा । वह मुद्रण होनेके बाद शेष रहे कार्यको तो
पूरा करायेगा ही साथ ही वर्णी ग्रन्थमालाका इसपर जो व्यय हुआ है उसे भी वह सानन्द लौटा देगा । साधा-
रणतः बातचीतके पहले भारतीय ज्ञानपीठसे यह कार्य करा लेना हम बहुत कठिन मानते थे, क्योंकि उसके
प्रकाशनोंका जो क्रम और विशेषता है उसका सर्वार्थसिद्धिके मुद्रित फार्मोंमें हमें बहुत कुछ अंशोंमें अभाव सा
दिखाई देता है । किन्तु हमें यहाँ यह संकेत करते हुए परम प्रसन्नता होती है कि ऐसी कोई बात इसके बीच
में बाधक सिद्ध नहीं हुई । इससे हमें न केवल श्री गोयलीयजी के उदार अन्तःकरणका परिचय मिला अपि
तु भारतीय ज्ञानपीठके संचालनमें जिस विशाल दृष्टिकोणका आश्रय लिया जाता है उसका यह एक प्रांजल
उदाहरण है ।
६ अन्य हितैषियोंसे
सर्वार्थसिद्धिका प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठसे हुआ है यह देख कर हमारे कतिपय मित्रों और हितैषियों-
को, जिन्होंने इसके प्रकाशनमें ग्रन्थमालाको आर्थिक व दूसरे प्रकारकी सहायता पहुँचायी है, अचरज होगा ।
परन्तु यह बहुत ही छोटा प्रश्न है कि इस ग्रन्थका प्रकाशन किस संस्थासे हो रहा है । उनके देखनेकी बात
तो केवल इतनी-सी है कि उन्होंने साहित्यकी श्रीवृद्धिके लिए जो धन या दूसरे प्रकार की सहायता दी है
उसका ठीक तरह से उपयोग हो रहा है या नहीं । साधारणतः प्रबन्ध और कार्यकर्त्ताओंकी सुविधाकी दृष्टिसे
ही अलग-अलग संस्थाओंकी स्थापना की जाती है । परन्तु हैं वे सब एक ही महावृक्षकी शाखा-प्रशाखाएँ ।
अमुक फल अमुक शाखा में लगा और अमुक फल अमुक शाखामें यह महत्त्वकी बात नहीं है । महत्त्वकी बात
तो यह है कि उस महावृक्षकी हर एक शाखा-प्रशाखा तथा दूसरे अवयव अपने-अपने स्थानमें उचित कार्य कर
रहे हैं या नहीं । नाम रूपका आग्रह जैन परम्पराको न कभी इष्ट रहा है और न रहना चाहिए । केवल
व्यवहारके संचालन हेतु इसको स्थान दिया जाता है । इसलिए सर्वार्थसिद्धिका प्रकाशन क्या वर्णी ग्रन्थ-
मालासे हुआ क्या भारतीय ज्ञानपीठसे दोनों चीजें एक हैं ।
दो शब्द १५
७ आभार प्रदर्शन
फिर भी यहाँ कई दृष्टियोंसे हमें अपने सहयोगियों, मित्रों व हितैषियोंके प्रति आभारस्वरूप दो शब्द
अंकित कर देना अत्यावश्यक प्रतीत होता है। यह एक निश्चित सी बात है कि जैन समाजका ध्यान जैन
साहित्यके प्रकाशनकी ओर अभी उतना नहीं गया है जितना कि जाना चाहिए था। प्राचीन कालमें मन्दिर
प्रतिष्ठा और शास्त्रोंको लिपिबद्ध कराकर यत्र तत्र प्रतिष्ठित करना ये दोनों कार्य समान माने जाते थे। अभी
तक शास्त्रोंकी रक्षा इसी पद्धतिसे होती आयी है। हमारे पूर्वज चाहे उन शास्त्रोंके ज्ञाता हों चाहे न हों
किन्तु वे शास्त्रों की प्रतिलिपि करा कर उनकी रक्षा करना अपना पुनीत कर्तव्य समझते थे और इस कार्यमें
प्रयत्नशील भी रहते थे, किन्तु जबसे मुद्रण कार्य प्रारम्भ हुआ है तबसे एक तरहसे समाजने इस ओरसे अपनी
आँख ही मूंद ली है। अब प्रतिलिपि कराना तो दूर रहा वे उनकी एक-एक मुद्रित प्रति निछावर देकर
खरीदनेमें भी हिचकिचाने लगे हैं। इस मदमें व्यक्तिगत खर्च करनेकी बातको तो छोड़ो, वे सार्वजनिक धनसे
भी यह कार्य सम्पन्न नहीं करना चाहते हैं जब कि वे इस धनका उपयोग दूसरे दिखावटी और अस्थायी
कार्योंमें करते रहते हैं। उनका तर्क है कि इतने बड़े ग्रन्थोंको हमारे यहाँ समझनेवाला ही कौन है? हम
उनको मन्दिरमें रख कर क्या करेंगे? यदि इसी तर्कसे प्राचीन पुरुषोंने काम लिया होता तो क्या साहित्यकी
रक्षा होना सम्भव था ? यह कहना तो कठिन है कि हमने अपना पूरा साहित्य बचा लिया है। तथापि जो
कुछ भी बचा लिया गया है वह भी पर्याप्त है। भगवान् महावीरकी चर्या और उनके उपदेशोंसे सीधा
सम्बन्ध स्थापित करनेकी क्षमता रखनेवाला एकमात्र साधन यह साहित्य ही है। इसलिए प्रत्येक गृहस्थका
यह कर्तव्य हो जाता है कि वह इसकी संरक्षाके लिए हर एक सम्भव उपाय काममें लावे।
प्रसन्नता है कि इस ओर भारतीय ज्ञानपीठके संस्थापक व दूसरे कार्यकर्ताओंका पर्याप्त ध्यान गया है
और वे इस बातका विचार किये बिना कि इसके प्रकाशन आदि पर पड़नेवाला व्यय वापस होगा या नहीं,
सब प्रकारके प्राचीन साहित्यके प्रकाशनमें दत्तावधान हैं। सर्वार्थसिद्धिका भारतीय ज्ञानपीठसे प्रकाशित होना
उनकी इसी शुभ भावनाका सुफल है, इसलिए सर्वप्रथम हम नम्र शब्दोंमें उनके प्रति आभार प्रदर्शित करना
अपना कर्तव्य मानते हैं। सर्वार्थसिद्धिके सम्पादक होनेके नाते तो हमें यह कार्य करना ही है, साथ ही वर्णी
ग्रन्थमालाके संचालक होनेके नाते भी हमें इसका निर्वाह करना है।
श्री ग. वर्णी जैन ग्रन्थमाला एक ऐसी संस्था है जिसे समाजके लब्धप्रतिष्ठ विद्वानोंका पृष्ठबल प्राप्त
है इसलिए सर्वार्थसिद्धिका उस द्वारा प्रकाशित हो जाना कठिन कार्य नहीं था फिर भी जो कठिन परिस्थिति
उसके सामने थी उसे देखते हुए उसने जिस अनुकरणीय मार्गका श्रीगणेश किया है इसके लिए हम वर्णी
ग्रन्थमालाकी प्रबन्ध समितिके प्रति भी आभार प्रदर्शित करना अपना कर्तव्य मानते हैं।
यहाँ हम उन महानुभावोंके प्रति भी आभार प्रदर्शित करना अपना कर्तव्य समझते हैं जिन्होंने एक
मात्र सर्वार्थसिद्धिके प्रकाशनके प्रति अभिरुचि होनेके कारण अपनी उदार सहायता वर्णी ग्रन्थमाला को दी
थी। देनेवाले महानुभाव ये हैं....
१. पूज्य श्री १०८ आचार्य सूर्यसागरजी महाराजके सदुपदेशसे श्रीमान् ब्र० लक्ष्मीचन्द्रजी वर्णी।
वर्णीजी ने १५००) इस कामके लिए दिल्लीकी पहाड़ी धीरज व डिप्टीगंजकी समाजसे भिजवाये थे।
२. वर्णी ग्रन्थमालाके कोषाध्यक्ष बाबू रामस्वरूपजी बरुआसागर। आपने इस कामके लिए १६०१)
प्रदान किये हैं।
३. उदारचेता श्रीमान् नेमचन्द बालचन्दजी सा० वकील उस्मानाबाद। आपकी पौत्री ब्र० गजराबाई
हमारे पास लब्धिसार क्षपणासार पढ़ने बनारस आयी थीं और लगभग २ माह यहाँ रही थीं। इसीके परिणाम-
स्वरूप बहिन गजराबाईकी प्रेरणासे वकील सा० ने १०००) ग्रन्थमालाको प्रदान किये थे।
१६ सर्वार्थसिद्धि
हस्तलिखित प्रतियोंके प्राप्त करनेमें हमें श्रीमान् पं० पन्नालालजी अग्रवाल दिल्ली, पं० नेमिचन्द्रजी
ज्योतिषाचार्य जैन सिद्धान्त भवन आरा, पं० के० भुजबलिजी शास्त्री मूडबिद्री और पं० दरबारीलालजी
कोठिया न्यायाचार्य दिल्लीसे पूरी सहायता मिली है, अतएव हम इनके भी आभारी हैं ।
भारतीय ज्ञानपीठके मैनेजर चि० श्री बाबूलालजी फागुल्ल उसके प्रकाशनोंको सुन्दर और आकर्षक
बनानेमें पर्याप्त श्रम करते रहते हैं । सर्वार्थसिद्धिको इस योग्य बनानेमें व दूसरे प्रकारकी सहायता पहुँचानेमें
भी उन्होंने हमें सहयोग दिया है, अतएव हम उनके भी आभारी हैं ।
सर्वार्थसिद्धिके परिशिष्ट और विषयसूची हमारे सहपाठी पं० हीरालालजी शास्त्रीने तैयार किये हैं
और आवश्यक संशोधनके साथ वे इसमें दिये गये हैं, अतएव हम इनका जितना आभार मानें थोड़ा है ।
तत्त्वार्थसूत्रकी उपलब्ध टीकाओंमें सर्वार्थसिद्धि प्रथम टीका है । इसमें प्रमेयका विचार आगमिक,
दार्शनिक आदि सभी पद्धतियोंसे किया गया है । हमें आशा है कि इस सम्पादनसे समाजमें इसका मान और
अधिक बढ़ेगा ।
—फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री