सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 9, कुल 558 में से
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तत्त्वार्थसूत्र जैनधर्मका एक प्राचीनतम ग्रन्थ है और संस्कृतमें सूत्ररूप रचना द्वारा जैन सिद्धान्तका
विधिवत् संक्षेपमें परिचय करानेवाला संभवतः सर्वप्रथम ग्रन्थ है। यह रचना अपने विषयकी इतनी सुन्दर
हुई है कि आजतक दूसरा कोई ग्रन्थ उसकी तुलना नहीं कर पाया। इस ग्रन्थकी महिमा इससे भी प्रकट है कि
इसका प्रचार जैन समाजके समस्त सम्प्रदायों—दिगम्बर, श्वेताम्बर, स्थानकवासी आदिमें समान रूपसे पाया
जाता है। लोकप्रियतामें भी यह जैन साहित्यका अद्वितीय ग्रन्थ है।
इस ग्रन्थकी समय-समयपर अनेक टीकाएँ लिखी गयी हैं। दिगम्बर सम्प्रदायमें उसकी देवनन्दी
पूज्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि नामक वृत्ति सर्वप्राचीन मानी जाती है। इसका प्रकाशन इससे पूर्व अनेक बार हो
चुका है। किन्तु प्राचीन प्रतियोंका समालोचनात्मक ढंगसे अध्ययन कर पाठ निश्चित करनेका प्रयास इससे
पूर्व नहीं हो सका था। इस दिशामें पण्डित फूलचन्द्रजी शास्त्रीने जो यह प्रयत्न किया है उसके लिए वे
धन्यवादके पात्र हैं।
ग्रन्थका सम्पादन व मुद्रण आदितः ज्ञानपीठसे प्रकाशनके लिए नहीं किया गया था, इसलिए इसकी
सम्पादन-प्रणाली आदिमें इस मालाके सम्पादकोंका कोई हाथ नहीं रहा। पण्डितजी की प्रस्तावना आदि भी
उनकी अपनी स्वतंत्रतासे लिखी और छापी गयी है। उसमें मल्लि तीर्थंकर, श्वेताम्बर आगमकी प्रामाणिकता
आदि सम्बन्धी विचार पण्डितजीके अपने निजी हैं और पाठकोंको उन्हें उसी रूपसे देखना-समझना चाहिए।
हमारी दृष्टिसे वे कथन यदि इस ग्रन्थमें न होते तो अच्छा था क्योंकि जैसा हम ऊपर कह आये हैं, यह रचना
जैन समाज भरमें लोकप्रिय है, उसका एक सम्प्रदाय-विशेष सीमित क्षेत्र नहीं है। अतः उसी उदात्त भूमिका
पर इस ग्रन्थको सदैव प्रस्तुत करना श्रेयस्कर है। हमें आशा और भरोसा है कि पाठक उसी उदार भावनासे
इस प्रकाशनका आदर और उपयोग करेंगे।
—हीरालाल जैन
—आ० ने० उपाध्याय
ग्रन्थमाला-सम्पादक
द्वितीय संस्करण
सर्वार्थसिद्धिका यह संस्करण विषय-सामग्रीकी दृष्टिसे प्रथम संस्करणका पुनर्मुद्रण है। प्रस्तुति आदिमें
कुछ परिवर्तन किये गये हैं—
१. मूल तथा अनुवादमें पैराग्राफ दे दिये गये हैं, जिससे विषयको समझनेमें अधिक आसानी रहे।
२. मूल संस्कृतको ज्ञानपीठके अन्य संस्कृत-प्राकृत प्रकाशनोंकी तरह एकरूपता देनेका प्रयत्न किया
गया है।
३. परिशिष्टमें आचार्य प्रभाचन्द्रकृत संस्कृत टिप्पण जोड़ दिये गये हैं, जो अब तक अप्रकाशित थे।
पं० कैलाशचन्द्रजी सिद्धान्तशास्त्रीने इनका इस संस्करणके लिए विशेष रूपसे सम्पादन किया है।
ग्रन्थमाला सम्पादक