सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

( ३२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध-
न प्रथमः, अतीन्द्रियत्वात् षट्केन युगपद्योगर बाधक-
त्वाच्च । यथोक्तम्-“षट्केन युगपद्योगात् परमाणोः षडंशता ।
तेषां मप्येकदेशत्व पिण्डः स्यादणुमात्रकः” इति ॥ ३७ ॥
परमाणु पक्ष भी दूषित करते हैं “न प्रथमेति” परमाणुको अतीन्द्रिय = अप्रत्यक्ष
मानते हैं - परमाणु उसको कहते हैं - जो प्रातःकाल - गवाक्ष (झरोखा) द्वारा सूर्य
की किरणें घरके भीतर - प्रवेश होनेपर सूक्ष्म रज देखपडते हैं उसको त्रसरेणु कह-
ते हैं उसमें तीन द्वयणुक हैं एक द्वयणुकमे दो अणु होते हैं अणु और परमाणु दोनों
पर्यायशब्द हैं । तथा च उक्त त्रसरेणुका षष्ठ भाग परमाणु है- कोई कोई साठमें भाग
को परमाणु कहते हैं वह उक्त क्रमविरुद्ध होनेसे नैयायिकसिद्धान्तके अज्ञानमूलक हैं
नैयायिकोंने दृश्यमानसूक्ष्म रजको त्रिसरेणु माना है इसी अभिप्रायसे कहा है-
“जालान्तरे गते भानौ सूक्ष्मं यद्दृश्यते रजः ।
तस्य षष्ठो विभास्तु परमाणुः प्रकीर्तितः” इति ॥ ३७ ॥
तस्मात् स्वव्यतिरिक्तग्राह्यविरहात्तदात्मिका बुद्धिः स्वयमेव
स्वात्मरूपप्रकाशिका प्रकाशवदितिसिद्धम् । तदुक्तम्-“नान्योऽ-
नुभाव्यो बुद्ध्यास्ति तस्या नानुभवोऽपरः । ग्राह्यग्राहकवैधुर्यात्
स्वय सैव प्रकाशत.” इति ॥ ३८ ॥
उपसंहार “तस्मादिति” ज्ञानसे अतिरिक्त ग्राह्य न होनेसे ज्ञानात्मक बुद्धि को स्वय
स्वकीय रूपका दीपादि प्रकाशवत् प्रकाश करती है । इसमे प्रमाण भी कहते हैं
“तदुक्तमिति’ बुद्धिसे अनुभाव्य अन्य वस्तु नहीं है बुद्धिका अन्य कोई अनुभव है
भी नहीग्राह्यग्राहकशुन्य होनेसे स्वयमेव प्रकाशवती बुद्धि है ॥ ३८ ॥
ग्राह्यग्राहकयोरभेदश्चानुमातव्यः । यद्वेद्यते येन वेदनेन तत्ततो न
भिद्यते यथा ज्ञानेनात्मा। वेद्यन्ते तैश्च नीलादयः। भेदे हि सत्य-
धुना अनेनार्थस्य सम्बन्धित्व न स्यात् तादात्म्यस्य नियम-
हेतोरभावात्तदुत्पत्तेरनियामकत्वात् यश्चाय ग्राह्यग्राहकसंवि-
त्तीनां पृथगवभास । स एकस्मिंश्चन्द्रमसि द्वित्वावभास इव
भ्रमः । अत्राप्यनादिरविच्छिन्नप्रवाहभेदवासनेव निमित्तम्॥३९॥
वेद्यवेदकका अभेद विनाप्रमाण सिद्ध न होगा इसलिये कहते हैं-“ग्राह्यग्राहकयोरिति”
ग्राह्य घटादि द्वारा मन दोनोंका वेद्य अर्थात, ग्राह्यके अतिरिक्त वस्तुका अभाव

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ३३ )
अनुमानसे ज्ञात होता है । अनुमानका स्वरूप दिखाते हैं ( यद्वेद्येति ) जिससे जिस
वस्तुका ज्ञान होता है वह वस्तु उस ज्ञानसे अभिन्न होती, है जिस प्रकार ज्ञानसे
प्रतीयमान आत्मा ज्ञानसे भिन्न नहीं है नीलादि भी ज्ञान ग्राह्य है अतः नीलादिक
भी ज्ञानसे अभिन्न होंगे यदि भेद होता तो उत्पन्न वस्तु क्षणिक होनेसे विषय न
होनेके कारण ज्ञानका अर्थके साथ सम्बन्धही न होगा तादात्म्य ( सम्बन्ध ) के
नियामक जो वस्तुकी सत्ता है, वह है नहीं उत्पत्ति अर्थात्, ज्ञानका उत्पादक
विषय होनेसे सम्बन्ध होगा यह भी इन्द्रियादिके वेद्यत्व निराकरणसे निराकृत है
ग्राह्यग्राहकका भेद प्रतीति भी अद्वितीय चन्द्रमामें दो चन्द्र हैं इस प्रतीतिके समान
है भ्रान्तिका मूलभूत अविद्यादि न होनेसे भ्रम कैसे सम्भव होगा ऐसी शंकासे कहा
है (अनादिरीति ) अनादि कालसे निरन्तर अनुवर्तमान भेद वासना ही निमित्त
ह ॥ ३९ ॥
यथोक्तम्- “सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियो । भेदश्च
भ्रान्तिविज्ञानैर्हश्येतेन्दाविवाद्वयेः ” इति ॥ “अविभागोऽपि
बुद्ध्यात्मा विपर्यासितदर्शनै । ग्राह्यग्राहकसंविन्तिभेदवानिव
लक्ष्यते ” इति च ॥ न च रसवीर्य्यविपाकादिसमानमाशामो-
दकोपार्जितमोदकानां स्यादिति वेदितव्यं वस्तुतो वेद्यवे-
द्यकाकारविधुराया अपि बुद्धेर्व्यवहर्तृपरिज्ञानानुरोधेन विभि-
न्नग्राह्यग्राहकाकाररूपवत्तया तिमिराद्युपहताक्षणां केशोण्डुना-
डीज्ञानाभेदवदनाद्युपप्लववासनासामर्थ्याद्व्यवस्थोपपत्ते पर्य-
नुयोगात् ॥ ४० ॥
जिस प्रकार घट मृत्तिकाके साथ ही उपलब्ध होनेसे मृत्तिकासे भिन्न नहीं है,
तिसी प्रकार विज्ञानके साथ ही अर्थात् विज्ञानके विना नीलादि वस्तुका उपलम्भ न
होनेसे नीलादिक भी नीलादि बुद्धिसे भिन्न नहीं है इसी अभिप्रायसे कहते हैं ( सहो-
पलम्भनियमदित्यादि ) ग्राह्य ग्राहक भेद न होनेपरभी बुद्धिरूप आत्मा अनादि-
कालिक विपरीत वासनासे ग्राह्य, ग्राहक संवेदन भेदवान्‌के समान प्रतीत होता है
इसको आशा मोदकजन्य रस वीर्य्यके समान असम्भव नहीं कहसकते किन्तु वास्तव-
वमें ग्राह्यग्राहकादिस्वरूप भेद न होनेपर भी व्यवहार ज्ञानके लिये अनादि कालिक
१ " ग्राह्य ग्राहकात् अभिन्न, ग्राहकेनै सहैव उपलभ्यमानत्वात् यद् येन सहैवोपलभ्यते
तत तदभिन्नम्, यथा मृद्धट इत्य दि" अनुमान है
३

( ३८ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [बौद्ध-
भ्रान्तिसे भेद व्यवस्था उपपन्न होसकती है इसम आक्षेपकी आवश्यकता नहीं है
जिस प्रकार तिमिराक्रान्त दृष्टिवालोंको आकाशम कभी २ केशोंके समान रेखा दीख
पडती है कभी २ उण्ड्रुक अर्थात् मकरीके जालेके समान रेखा दीख पडती है,
कभी २ नाडीके समान रेखा दीख पडती है इसी प्रकार ज्ञान वैचित्र्यभी वासना
वैचित्र्यसे होता है ॥ ४० ॥
यथोक्तम्-“अवेद्यवेदकाकारा यथा भ्रान्तैर्निरीक्ष्यते । विभक्त-
लक्षणग्राह्यग्राहकाकारविप्लवा ॥ तथा कृतव्यवस्थेयं केशादि-
ज्ञानभेदवत् । यदा तदा न सञ्चोद्या ग्राह्यग्राहकलक्षणा”॥
इति ॥ तस्माद्बुद्धिरेवानादिवासनावशादनेकाकाराऽवभासत
इति सिद्धम् । ततश्च प्रागुक्तभावनाप्रचयबलान्निसिलवासना-
च्छेदाद्विगलितविविधविषयाकारोपप्लवविशुद्धविज्ञानोदयो महो-
दय इति ॥ ४१ ॥
इसमें प्राचीनोंकी सम्मति भी देते हैं (अवेद्यवेदकाकारेति) वेद्य वेदक स्वरूप
शून्य बुद्धिको भ्रान्तोंने विभक्त ग्राह्य ग्राहक स्वरूप भेद भ्रान्तिसे समझा हे निगमन
करते हैं (तस्मादिति) अनादि वासनासे बुद्धि ही अनेकाकारसे प्रतिपन्न होती हे यह
निर्विवाद हुआ अतः पूर्वोक्त भावना प्रकर्ष वश समस्त वासना नष्ट होने पर नाना
प्रकार घटादि विषय भ्रान्ति नष्ट होकर शुद्ध विज्ञान प्रकाशरूप निश्रेयस
होता है ॥ ४१ ॥
अन्येतु मन्यन्ते-यथोक्तं बाह्य वस्तुजातं नास्तीति । तदयुक्तम्
प्रमाणाभावात् । नच सहोपलम्भनियमं प्रमाणमिति वक्तव्यम्
वेद्यवेदकयोरभेदसाधकत्वेनाभिमतस्य तस्याप्रयोजकत्वेन स-
न्दिग्धविपक्षव्यावृत्तिकत्वात् ॥ ननु भेदे सहोपलम्भनियमा-
त्मकं साधनं न स्यादिति चेन्न । ज्ञानस्यान्तर्मुखतया च भेदेन-
प्रतिभासमानतया एकदेशत्वैककालत्वलक्षणसहत्वनियमा-
सम्भवाच्च नीलाद्यर्थस्य ज्ञानाकारत्वे अहमिति प्रतिभासः
स्यात् नत्विदमिति प्रतिपत्तिः प्रत्ययाद्व्यतिरेकात् ॥ ४२ ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ३५ )
बाह्यार्थानुमेयवादीका मत कहते हैं ( अन्ये तु इत्यादि ) विज्ञानातिरिक्त बाह्य
नीलादि वस्तु नही ऐसा कहना अप्रमाणिक है । मृद्घटवत् सहोपलब्धिरूप नियम
भी बाह्यसत्तानिषेधम प्रमाण नही होसकता । ग्राह्यग्राहकका अभेदसाधक अप्रयोजक है
अर्थात् व्यभिचारशंका निवर्तकत्वरूप तर्कशून्य है, क्योंकि सन्दिग्ध विपक्ष व्यावर्तक
नहीं है यदि कहो भेदम सहोपलम्भनियम न रहेगा यहभी नही होसकता क्योंकि ज्ञान
अन्तर्मुख ( अन्तःकरणधर्म ) विषय, बाह्य होनेसे भेद प्रतीतिविषय दोनोको एक-
देशत्व एककालत्वरूप सहत्व ही असम्भव है । दूषणान्तरभी कहते हैं ( नीलेति )
नीलार्यर्थ यदि ज्ञानरूप होता तो ज्ञान अहमतीतिविषय होनेसे नीलादिको भी अहं
इत्याकारक प्रतीति न होने सकेगी इद इत्याकारक प्रतीति न होगी क्योंकि ज्ञानसे
विषयका भेद है ही नही ॥ ४२ ॥
अथोच्यते—ज्ञानस्वरूपोऽपि नीलाकारो भ्रान्त्या बहिर्वद्भेदेन
प्रतिभासत इति न च तत्राहमुल्लेख इति । तथोक्तम्—"परिच्छे-
दान्तराद्योय भागो बहिरिव स्थितः । ज्ञानस्याभेदिनो भेदप्र-
तिभासोऽप्युपप्लव ॥" इति । "यदन्तर्ज्ञेयतत्त्वं तद्बहिर्वदवभा-
सते " इति च ॥ ४३ ॥
( अथोति ) यद्यपि नीलादि विज्ञानस्वरूप ही है तथापि भ्रान्तिसे बाह्यके समान
भिन्न प्रतीत होता है अत उसमें अहमित्याकार नहीं होता ( तथोक्तमिति ) भेद-
शून्य ज्ञानको भी अन्य ( व्यावर्तक ) सम्बन्धसे बाह्यके समान स्थित भेदावभास भी
भ्रम है । जो आन्तरिक ज्ञेयतत्व बाह्यवत् भासित होता है ॥ ४३ ॥
तद्युक्तम्-बाह्यार्थाभावे तद्व्युत्पत्तिरहिततया बहिर्वदित्युपमानोक्तेर-
युक्तेः। नहि वसुमित्रो वन्ध्यापुत्रवद्भासत इति प्रेक्षावानाचक्षीत ।
भेदप्रतिभासस्य भ्रान्तत्वे अभेदप्रतिभासस्य प्रामाण्यम् । तत्
प्रामाण्ये च भेदप्रतिभासस्य भ्रान्तत्वमिति परस्पराश्रयप्रसङ्गाच्च ।
अविसंवादान्नीलतातिकमेव संविदाना बाह्यमेवोपाददते जगत्यु-
पेक्षन्तेऽवान्तरमिति व्यवस्थादर्शनाच्च । एवञ्चायमभेदसाधको
हेतुर्गोमयपायसीयन्यायवदाभासतां भजेत् । अतो बहिर्वदिति
वदता बाह्यं ग्राह्यमेवेति भावनीयमिति भवदीय एव बाणो
भवन्त प्रहरेत् ॥ ४४ ॥

( ३६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [बौद्ध-
अथ समाधान करते हैं (तदयुक्तमिति) जब बाह्य अर्थ ही नहीं तो घटाकाशस्थ
उत्पत्ति न होनेसे ज्ञानको वहिर्वत् ऐसा उपमानोपमेयभाव कथन भी अयुक्त है
वसुमित्र वन्ध्यापुत्रके समान सुन्दर है ऐसा कोई बुद्धिमान नहीं कहत है भेदज्ञान
भ्रान्तिसिद्ध होनेसे अभेद ज्ञानको प्रामाण्य होगा अभेद ज्ञानका प्रामाण्य होनेसे
भेद ज्ञानमें भ्रान्तत्व होगा इस प्रकारसे अन्योन्याश्रय होगा प्रत्युत लोक निर्वि-
वाद रूपसे बाह्य नीलादि विषयको ही स्वीकारकर आन्तरिक वस्तुकी ही उपेक्षा
करते हैं अत अभेदसाधक युक्ति गोशृङ्गकी सींगके समान कथनमात्र है वहिर्वत्
ऐसे उपमानवाक्यको कहनेवाले स्वयं बाह्यवस्तुकी भावस्वीकार करके पुनः
बाह्यपर निषेध करनेपर आप अपने ही बाणसे मारे जायंगे । अर्थात् सर्वांश
वाक्यमें ही बाह्यार्थ सिद्ध होता है ॥ ४४ ॥
ननु ज्ञानाभिन्नकालस्यार्थस्य बाह्यत्वमनुपपन्नमिति चेत्तदनुपप-
न्नम्। इन्द्रियसन्निकृष्टस्य विषयस्योत्पाद्ये ज्ञाने स्वाकारस-
मर्पणकतया समर्पितेन चाकारेण तस्यार्थस्यानुमेयतोपपत्ते ।
अतएव पर्य्यनुयोगपरिहारौ समग्राहिषाताम्–“ भिन्नकाल
कथं ग्राह्यमिति चेत् ग्राह्यतां विदु । हेतुत्वमेव च व्यक्ते-
र्ज्ञानाकारार्पणक्षमम्॥” इति। तथाच, यथा पुष्ट्या भोजनमनुमी-
यते यथा च भाषया देशः यथा वा सम्भ्रमेण स्नेह तथा ज्ञाना-
कारेण ज्ञेयमनुमेयम् । तदुक्तम् “अर्थेन घटयत्येनां नहि मुक्त्वा-
ऽर्थरूपताम् । तस्मात् प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपता ॥” इति ।
नहि वित्तिसत्तैव तद्वेदनायुक्ता तस्या सर्वत्राविशेषात् । तान्तु
सारूप्यमाविशत् सरूपयितुं घटयेदिति च ॥ ४५ ॥
(ननु-इति) ज्ञानसे अर्थका प्रतिभास होता है अतः ज्ञानसे अतिरिक्त कालमें अर्थका
बाह्यत्व अनुपपन्न है ऐसा कथनही अनुपपन्न है क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रिय और विष-
यको सन्निकर्षसे उत्पादनीय ज्ञानम विषयको आकारका आरोप होना कहा है
“ अर्थेनैव विशेषो हि निराकारतया धियाम्” ॥ इति । अन्यथा ज्ञानमें विशेष हीन
होगा अत अर्पित आकारसे बाह्यका अनुमान होसक्ता है + । एतद्विषयक आक्षेप

  • अनुमान स्वरूप यह है 'बाह्य वस्तु सत्, ज्ञाने स्वाकार समर्प कत्वात् । य स्वाकार
    समर्पक स आरोपाधिकरणातिरिक्त सत्तावान् भवति यथा स्फटिके लौहित्याकारसमर्पक-
    जपाकुसुम स्फटिकभिन्न सदेव ' इत्यादि ।

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ३७ )
परिहारकाभी सग्रह भिन्नकालेत्यादिसे किया है ज्ञान ही ग्राहक हे अत जिस कालमें
ज्ञान न हो उस कालका ग्रहण कौन करेगा ज्ञानमे विषय अपने स्वरूपको आरोप
करता हे इस लिये स्वाकार समर्पक स्वरूप हेतुसे वाह्यका ग्रहण होसकता है । अत'
'देवदत्त स्थूल है' यहा भोजनके विना स्थूलत्व अनुपपन्न होनेसे जिस प्रकार भोज-
नका अनुमान होता है उसी प्रकार ज्ञानसे स्वाकारसमर्पक वाह्य वस्तुकाभी अनु-
मान होगा. यथा-भाषासे देशका अनुमान होता है । यथा किसीके वियोगसे संभ्रम
देखकर स्नेहका अनुमानुमान होता है तथा ज्ञानका आकारसे ज्ञेयका अनुमान होता
है (अधनेति) ज्ञान जब साकार है तो उसको दो अश हुए आकार और आकारी
जाकार विषयसे ही आरोपित होता है अत' अर्थ विषय समर्पित आकारको छोड-
कर केवल निराकारज्ञान नहीं उपपन्न होगा इस कारण विषयसिद्धिमे ज्ञानका
प्रमेयाकारवत्त्व ही प्रमाण है ( नहीति) केवल ज्ञानमात्रमे विषयप्रतिभास नही होस-
कता क्योकि ऐसा होनेसे घटपटादिसवेदनमें विशेष ही नहीं होगा वस्तु भेदसे ही
ज्ञानमें विशेषता होती है जो स्वरूप प्रविष्ट होता है तदाकार ही रूप सघटित
होता है ॥ ४५ ॥
तथाच-वाह्यार्थसद्भावे प्रयोगः ये यस्मिन् सत्यपि कादाचित्का-
ते सर्वे तदतिरिक्तसापेक्षाः । यथा अविवक्षति अजिगमिषति
मयि वचनगमनप्रतिभासा विवक्षुजिगमिषुरुषान्तरसन्तानसा-
पेक्षा तथाच विवादाध्यासिताः प्रवृत्तिप्रत्यया सत्यप्यालयवि-
ज्ञाने कदाचिदेव, नीलाद्युल्लेखना इति ॥ ४६ ॥
बाह्यार्थसद्भावमें अनुमानका प्रयोग दिखाते हैं जिसके रहनेपरभी जो वस्तु कदा-
चित् रहती है वह उससे अतिरिक्त वस्तुको सापेक्ष होता है । जैसे नहीं बोलनेके और
न जानेकी इच्छा करनेवालेके विषयमें वचन और गमनका प्रतिभास विवक्षु
और जिगमिषु पुरुषान्तर सन्तान सापेक्ष है विवादग्रस्त प्रवृत्तिविज्ञान आलयविज्ञान
रहनेपर भी कदाचित् ही नीलाद्याकारमे प्रकाशित होता है अत वहभी विज्ञानमे अति-
रिक्त वस्तु सापेक्ष है ॥ ४६ ॥
तत्रालयविज्ञानं नामाहमास्पदं विज्ञानं, नीलाद्युल्लेिख च प्रवृत्ति-
विज्ञानम् । यथोक्तम्- “तत् स्यादालयविज्ञानं यद् भवेदन्तरता
दम् । तत् स्यात् प्रवृत्तिविज्ञानं यन्नीलादिकमल्लिो । नचात्र
तस्मादालयविज्ञानसन्तानातिरिक्तः कश्चार्थः। यथा प्रतीत्यसमु

( ४२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [बौद्ध-
त्पादस्य हेतूपनिबन्धः' बीजादङ्कुरोऽङ्कुरात्काण्डकाण्डान्नालो
नालाद्गर्भस्ततः शूकं ततः पुष्पं ततःफलम् । न चात्र बाह्ये
समुदाये कारणं बीजादि कार्य्यमङ्कुरादि वा चेतयते । अहम-
ङ्कुरं निर्वर्त्तयामि अहं बीजेन निर्वर्त्तित इति । एवमाध्यात्मि-
केऽपि कारणद्वयमवगन्तव्यम् । पुरःस्थिते प्रमेयाब्धौ ग्रन्थ
विस्तरभीरुभिरुपरम्यते ॥५३॥
उक्त कार्यकारणभाव चेतनके बिना नहीं होसकेगा ऐसी आशङ्काम् कहते हैं
( प्रतीत्येति ) कारणकी सत्तामें उसके सम्बन्धसे उत्पत्तिमें अनुकूलता है वही धर्मता
धर्ममें स्थित है किसी कार्यमें भी कोई चेतन कहीं उपलब्ध नहीं होते हैं प्रतीत्य-
समुत्पादमें जो दो भेद कहे हैं उनमं हेतूपनिबन्धन यथा बीजसे अङ्कुर, अङ्कुरसे
काण्ड, काण्डसे नाल, नालमे गर्भ, गर्भसे शूक, शूकस पुष्प, पुष्पसे फल यह क्रम
है इस बाह्य समुदायमें बीजादि, कारण अथवा अङ्कुरादि कार्य कोई भी चेतन नहीं
है मैं बीजसे उत्पन्न हुआ किंवा मैं अङ्कुरको उत्पन्न करता हूं ऐसा ज्ञान भी
किसीको नहीं है । इसी प्रकार आध्यात्मिकमेंभी जानना । ग्रन्थ गौरवभयसे उस
विषयको छोडदिया इति + ॥ ५३ ॥
तात्पर्य-प्रत्ययोपनिबन्धन हेतूपनिबन्धनरूप प्रतीत्य समुत्पाद है वह बाह्य और आध्या
त्मिक भेदसे दो प्रकारकी है बाह्य कहचुका आध्यात्मिक हेतूपनिबन्धन इस प्रकार है "यदि
द्मविद्याप्रत्यया मस्कारा यावज्जातिप्रत्यय जरामरणादीति " अविद्या यदि न होती तो
सस्कार न होते इस प्रकार जाति (जन्म) भी नहीं होती यदि जाति न होती तो जरामर-
णादिक भी नहीं होते उसमें अविद्या ऐसा नहीं जानती कि में सस्कारको उत्पन्न करती हूँ
सस्कारको भी ऐसा ज्ञान नही कि मुझको अविद्याने उत्पन्न किया इसी प्रकार यावज्जातिको
भी ऐसा ज्ञान नहीं है मैं जरामरणादिकी उत्पादन करती हूं । न जरामरणादिको ऐसा ज्ञान है
कि मैं जातिसे उत्पन्न हूं । तथापि अविद्यादिक रहनेपर चेतनान्तरसे अनाधिष्ठित अचेतनमें
सस्कारादि स्वयं उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार बीजादिमें अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं । केवल
प्रचुरता मयोगसे अमुक उत्पन्न होता है एतावन्मात्र दृष्ट है । चेतनाधिष्ठान कहीं इसमें भी
दृष्ट नहीं।प्रत्ययोपानबन्धन पृथिवी, जल, तेज,वायु, आकाश, विज्ञान, धातुओंगे समूहमे काय
उत्पन्न होता है । पृथिवी शरीरको काठिन्य उत्पादन करती है जल स्नेह तेज शरीरके खाये
पिये वस्तुको पचाते हैं वायु श्वासादि सञ्चालन करता है आकाश शरीरके भीतर छिद्र बना
रखता है मनोविज्ञानको विज्ञान धातु उत्पादन करता है जब आध्यात्मिक पृथिव्यादि धातु
अविकल होते हैं तब शरीरकी उत्पत्ति होती है । उसमें पृथिव्यादिको यह ज्ञान नहीं कि मैं
शरीरका काठिन्यादि उत्पादन करता हूं न काठिन्यादिको ही यह ज्ञान है कि मुझे पृथिव्या-

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेत । ( ४३ )'
तदुभयनिरोधस्तदनन्तरं विमलज्ञानोदयो वा मुक्ति , तन्निरोधो-
पायो मार्ग स च तत्त्वज्ञानं, तच्च प्राचीनभावनावलाद्भवतीति
परमं रहस्यम् । सूत्रस्यान्तं पृच्छतां कथितं भवन्तश्च सूत्रस्या-
न्तं पृष्टवन्तः सौत्रान्तिका भवन्त्विति भगवताभिहिततया सौ-
त्रान्तिकसंज्ञा सञ्जातेति ॥ ५४ ॥
उक्त हेतुपनिबन्धन और प्रत्ययोपनिबन्धनरूप प्रतीत्य समुत्पाद निरोधानन्तर-
निर्मल ज्ञानका उदय ही मुक्ति है निरोधका उपाय मार्ग है वह तत्त्वज्ञान है वह पूर्व-
संस्कारसे होता है यही परम रहस्य है । सूत्रका अन्त पूछनेपर बुद्धने कहा आप
लोगोने सूत्रका अन्त पूछा है इस लिये सौत्रान्तिक हों इससे वे सौत्रान्तिक संज्ञासे
प्रसिद्ध होगये हैं ॥ ५४ ॥
केचन बौद्धा बाह्येषु गन्धादिषु आन्तरेषु रूपादिस्कन्धेषु सत्स्वपि
तत्रानास्थामुत्पादयितुं सर्वं शून्यमिति, प्राथमिकान् विनेया-
नचीकथत् भगवान्, द्वितीयांस्तु विज्ञानमात्रग्रहाविष्टान् विज्ञा-
नमेवैकं सदिति, तृतीयानुभयं सत्यमित्यास्थितान् विज्ञेयमनु-
मेयमिति, सेयं विरुद्धा भाषेति वर्णयन्तो वैभाषिकाख्यया ख्या-
ता एषा हि तेषां परिभाषा समुन्मिषति । विज्ञेयानुमेयत्ववादे
प्रात्याक्षिकस्य कस्यचिदप्यर्थस्याभावेन व्याप्तिसंवेदनस्थाना-
भावेनानुमानप्रवृत्त्यनुपपत्ते सकललोकानुभवविरोधश्च । ततश्चा
र्थो द्विविध , ग्राह्योऽध्यवसेयश्च ॥ ५५ ॥
बाह्य गन्धादिक और आन्तरिकरूपादि स्कन्धके होनेपर भी उसम अनास्था उत्पन्न
होनेके लिये सब शून्य है इस प्रकार प्राथमिक शिष्य मात्रसे बुद्धने कहा विज्ञानमे
दिने उत्पादन किया तथापि चेतनांतरसे अनाधिष्ठित पृथिव्यादिसे शरीर उत्पन्न होता है
जैसे बीजमे अङ्कुर होता है इस दृष्ट प्रतीत्य समुत्पादको अन्यथा नहीं कहसक्ते ॥

आग्रद्दवाले दूसरे शिष्यसे विज्ञान ही सत् हे यह कहा उभयको सत्य माननेवाले
तीसरे शिष्यने विज्ञेय अनुमेय हे ऐसा कहा तब चतुर्थ शिष्यने उनकी परस्पर
विरुद्ध भाषा बताई इस कारण वह वैभाषिक संज्ञासे प्रसिद्ध होगया सामान्यत यह
उनका सिद्धान्त हे विज्ञेयको अनुमेय मानोगे तो व्याप्तिज्ञानकी अपेक्षा होगी व्याप्ति
ग्रह प्रत्यक्षदृष्टि हीमें होगा प्रत्यक्षदृष्ट वस्तु अनुमेयवादीके मतमें न होनेसे व्याप्ति ग्रहका
स्थल न होनेसे अनुमानकी प्रवृत्ति न होगी अनुमान न होनेपर समस्त लोकव्यव-
हार भी विरुद्ध होंगे इस लिये ग्राह्य ओर अध्यवसाय भेदसे अर्थ दो प्रकार मानने
होंगे ॥ ५५ ॥
तत्र ग्रहणं निर्विकल्पकरूपं प्रमाणं कल्पनापोढत्वात् । अध्यव-
साय सविकल्पकरूपोऽप्रमाणं कल्पनाज्ञानत्वात् । तदुक्तम्-
"कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षं निर्विकल्पकम् । विकल्पो वस्तुनिर्भा-
सादसंवादादुपप्लव ॥" इति । "ग्राह्यं वस्तुप्रमाणं हि ग्रहणं यदि-
तोऽन्यथा । न तद्वस्तु न तन्मानं शब्दलिङ्गेन्द्रियादिजम् " ॥
इति च ॥ ५६ ॥
ग्रहण ( प्रत्यक्ष ) निर्विकल्पक अर्थात् प्रकार विशेष्य ससर्ग आदि शून्य ही
प्रमाण है । नाम रूप जात्यादिका नाम कल्पना है उससे रहित कल्पनापोढ है ।
अध्यवसाय सविकल्पकरूप है यथा अय घट इत्यादि वह अप्रमाण है उक्तार्थमें
प्राचीन सम्मति कहते हैं (कल्पनेत्यादि) कल्पनारहित ओर भ्रमरहित निर्विकल्पक
प्रत्यक्ष प्रमाण हे निर्विवाद जात्यादिविशिष्ट वस्तुप्रकाश उपप्लव ( भ्रम ) है यदि
प्रमाणसिद्ध ग्राह्य हो तो उस वस्तुसे पृथक ग्रहण भी प्रमाण होगा । यद्वा ग्रहण
( प्रत्यक्ष ) प्रमाण हो तो ग्राह्य पदार्थ भी अवश्य होगा अन्यथा जो शब्द लिङ्ग
इन्द्रियादिसे प्रतीयमान ग्राह्यातिरिक्त हो तो वह न वस्तु हे ओर न प्रमाण ही हे जो
वस्तुका ग्रहण नही करसकता है ॥ ५६ ॥
ननु सविकल्पकस्याप्रामाण्ये कथं ततः प्रवृत्तस्यार्थप्राप्ति सं-
वादश्चोपपद्येयातामिति चेन्न तद्भद्रं मणिप्रभाविवयमणिविकल्प-
न्यायेन पारम्पर्येणार्थप्रतिलम्भसम्भवेन तदुपपत्ते । अव-
शिष्टं सौत्रान्तिकप्रस्तावे प्रपञ्चितमिति नेह प्रतन्यते ॥ न च
विनेयाशयानुरोधेनोपदेशभेदः साम्प्रदायिको न भवतीति भणि-

दर्शनम् [ भाषाटीकासमेत. ] ( ४६)
तव्यम् । यतो भणितं बोधिचित्तविवरणे ॥ “देशना लोकनाथानां
सत्त्वाशयवशानुगा । विद्यन्ते बहुधा लोके उपायैर्बहुभि किल ॥
गम्भीरोत्तानभेदेन क्वचिच्चोभयलक्षणा. । भिन्ना हि देशना-
ऽभिन्ना शून्यताऽद्वयलक्षणा ॥ ” इति ॥ ५७ ॥
( ननु इति ) सविकल्पक यदि प्रमाण ही नही तो जब घट इत्यादि सविकल्पक
ज्ञानसे प्रवृत्तको वस्तु प्राप्ति और निर्विवाद व्यवहार कैसे होते हैं बहुत अच्छा प्रश्न
हे इसका उत्तर सुनो मणियोंकी प्रभाको देखकर मणिभ्रमसे प्रवृत्त पुरुषको परम्प
रासे जिस प्रकार मणिप्राप्त होता है तद्वत् परम्परासे वस्तुकी प्राप्ति होजाती है शेष
सौत्रान्तिक सिद्धान्तके अनुसार ही है एक ही आचार्यका शिष्य भेद होनेसे भिन्न २
रूपसे उपदेश करना सम्प्रदायविरुद्ध होगा क्योंकि उपदेशभेद होनेसे सिद्धान्तभेद
अवश्य हो जायगा इस आशयसे कहते है ( न च विनेयभेदेत्यादि ) ( देशनेति )
लोकनाथ जगतके स्वामी अर्थात् बुद्धदेवजीका उपदेश प्राणियोंकी बुद्धिके अनु-
सार होता है, कुछ सिद्धान्तभेदसे नही अधिकारीके भेद होनेसे केवल उपायमात्रका
भेद है । लोकमें भी एक ही प्राप्य वस्तुके लिये अनेक उपाय होते हैं । ( गम्भी-
रोति ) गम्भीर ( उत्तम ) उत्तान ( अधम ) उभयलक्षण ( मध्यम ) भेदसे भिन्न
है. यह अधिकारीके बुद्धिका तारतम्य है, परन्तु सब मतके सिद्धान्त केवल एक
शून्यतत्त्वमें है ॥ ५७ ॥
द्वादशायतनपूजा श्रेयस्करीति बौद्धनये प्रसिद्धम् “अर्थानु-
पार्य बहुशो द्वादशायतनानि वै । परित पूजनीयानि किम-
न्यैरिह पूजितैः ॥ ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा कर्मेन्द्रियाणि च ।
मनो बुद्धिरिति प्रोक्तं द्वादशायतनं बुधैः " इति ॥ ५८ ॥
बौद्धसिद्धान्तमें श्रोत्रादि द्वादशस्थानकी पूजा ही श्रेयस्कर प्रसिद्ध है, उसीको
दिखाते हैं, ( अर्थानित्यादि ) प्रचुर धनको उपार्जन करके द्वादश आयतनकी
भलीभाँतिसे पूजा करे संसारमें अन्यपूजन सब विफल है । श्रोत्र, चक्षु, घ्राण
त्वक्, रसना यह पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पायु, पाणि, पाद, उपस्थ, वाक रूप पाच कर्मे-
न्द्रिय, मन और बुद्धि इन्हीका ज्ञानी लोग द्वादशायतन कहते हैं ॥ ५८ ॥
विवेकविलासे बौद्धमतमित्थमभ्यधायि “बौद्धानां सुगतो देवो
विश्वं च क्षणभङ्गुरम् । आर्य्यसत्त्वाख्यया तत्त्वचतुष्टयमिदं

( ४६ ) सर्वदर्शनसंग्रह । [ बौद्ध-
न्धमात् ॥ दुःखमायतनं चैव ततः समुदयो मतः । मार्गश्चेत्यस्य
च व्याख्या क्रमेण श्रूयतामतः ॥ दुःखं संसारिणः स्कन्धास्ते
च पञ्च प्रकीर्त्तिताः । विज्ञानं वेदना संज्ञा संस्कारो रूपमेव
च॥पञ्चेन्द्रियाणि शब्दाद्या विषयाः पञ्च मानसम् । धर्मायतन-
मेतानि द्वादशायतनानि तु ॥ रागादीनां गणोऽयं स्यात् समु-
देति नृणां हृदि । आत्मात्मीयस्वभावाख्यः स स्यात् समुदयः
पुनः ॥ ५९ ॥
विवेकविलास नाम ग्रन्थमें बौद्धमत निम्नलिखित प्रकार कहा है बौद्धोंके देव
सुगत ( बुद्ध ) ही हैं । संसार क्षणिक है चार्यसत्त्व अर्थात् “दुःख, समुदय,
तन्निरोध, मार्गाश्चत्वारः आर्यस्य बुद्धाभिमतानि तत्त्वानि” इस सूत्रोक्त चार ही तत्त्व
हैं उसीकी गणना करते हैं ( दुःखमायतनेत्यादि ) क्रमसे उसका व्याख्यान कहते
हैं विज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार, रूप यही पञ्च स्कन्ध सांसारिक दुःख है । शब्द,
स्पर्श, रूप, रस गन्ध यही पञ्च विषय हैं पञ्च ज्ञानेन्द्रिय मन और बुद्धि यही
द्वादशायतन हैं मनुष्यके हृदयमें जो रागद्वेषादि गण हैं वही समुदाय है आत्मा
आत्मीय स्वभावको भी समुदाय कहते हैं ॥ ५९ ॥
*क्षणिकाः सर्वसंसारा इति या वासना स्थिरा । स मार्ग इति
विज्ञेयः स च मोक्षोऽभिधीयते ॥ प्रत्यक्षमनुमानञ्च प्रमाणद्वि-
तयं तथा । चतुःप्रस्थानिका बौद्धाः ख्याता वैभाषिकादयः ॥
अर्थो ज्ञानान्वितो वैभाषिकेण बहु मन्यते । सौत्रान्तिकेन
प्रत्यक्षग्राह्योऽर्थो न बहिर्मतः ॥ आकारसहिता बुद्धियोंगाचारस्य
सम्मता। केवलां संविदं स्वस्थां मन्यन्ते मध्यमाः पुनः ॥ रागादि-
ज्ञानसन्तानवासनाच्छेदसम्भवा । चतुर्णामपि बौद्धानां मुक्तिरेषा
प्रकीर्त्तिता ॥ कृत्तिः कमण्डलुर्मौण्ड्यं चीरं पूर्वाह्नभोजनम् ।
सङ्घो रक्ताम्बरत्वं च शिश्रिये बौद्धभिक्षुभिः ॥” इति ॥ ६०॥
इति सर्वदर्शन संग्रहे बौद्धदर्शनं समाप्तम् ॥ २ ॥
सम्पूर्ण संसार क्षणिक है ऐसी जो स्थिरवासना है उसीको मार्ग कहते हैं यही
मोक्ष है । प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण हैं । सौत्रान्तिक वैभाषिकादि भेदसे चार

दर्शनम् ] भापाटीकासमेत. । ( ४७ )
सिद्धान्तवादी बौद्ध हे वैभाषिक ज्ञानसे युक्त ( बाह्य ) अर्थको नही मानते हे सौत्रा-
न्तिक ज्ञानग्राह्य बाह्य अर्थको नहीं मानते योगाचारके मतमें विषयाकारयुक्त
बुद्धिमात्र है माध्यमिक लोग शुद्ध संवित्को ही मानते हैं । उक्त चारोंके मतोंमें
रागादि ज्ञानसन्तानकी वासनाकी उच्छेद ही मुक्तिहै कृत्तिः ( चर्म मृगछाला आदि )
१ कमण्डलु २ शिरका सशिख मुण्डन ३ चीर ४ दिनका भोजन अर्थात् रात्रिमें
भोजन नहीं करना ५ सघ अर्थात् दो चारके साथ रहना ६ रक्तवस्त्र धारण करना
इतने बौद्धसन्यासियोंके चिह्न हैं ॥ ६० ॥
इति सर्वदर्शनसङ्ग्रहे बौद्धदर्शन समाप्तम् ।
अथार्हतदर्शनम् ।
तदित्थ मुक्तकच्छानां मतमसहमाना विवसनाः कथञ्चित् स्था-
यित्वमास्थाय क्षणिकत्वपक्षं प्रतिक्षिंपन्ति याद्यात्मा कश्चिन्ना-
स्थीयेत स्थायी तदा लौकिकफलसाधनसम्पादनं विफलं
भवेत् । न ह्येतत् सम्भविष्यति अन्यः करोत्यन्यो भुङ्क इति ।
तस्माद्योऽहं प्राक् कर्माकरवं सोऽहं सम्प्रति तत्फलं भुञ्जे इति.
पूर्वापरकालानुयायिनः स्थायिनस्तस्य स्पष्टप्रमाणावसिततया
पूर्वापरभागविकलकालकलावस्थितिलक्षणक्षणिकतां परीक्ष-
कैरर्हद्भिर्न परिग्राह्या ॥ १ ॥
पूर्वोक्त क्षणिकत्व शून्यवादिरूप मुक्तकच्छ ( बौद्ध ) के मतको न सहनेवाले
विवेसन ( नग्न ) स्थिरत्व मानकर क्षणिकत्व पक्षका निराकरण करते हैं यदि आत्मा-
को स्थिर नहीं माने तो पशु अन्नादि फलसाधन समस्त लोकव्यवहार भी विफल
होजायेंगे क्योंकि आत्मा क्षणिक होनेसे क्रियाके उत्तरकाल हीमें नष्ट होपायगा
कालान्तरभावी फलोत्पत्तिकालमें आत्मा नहीं यह भी सम्भव नहीं कि कर्म कोई करे
फल दूसरे भोगें जो मैंने पहिले कर्म किया उसका फल मै भोगता हू इस प्रकार
प्रत्यभिज्ञांस पूर्वोत्तर कालसम्बन्धी स्थायी आत्मा स्पष्ट प्रतीत होता है अतः
पूर्वोत्तरभागशून्य कलात्मके कालस्थितिरूप क्षणिकत्व तर्ककुशलोंके अनादर-
णीय है ॥ १ ॥
१ कच्छ न लगाना बौद्ध सन्यासियोंमें नग्न रहना दिगम्बर जैन सन्यासियोंमें प्रसिद्ध है ।

(४८) सर्वदर्शनसंग्रहः । [अर्हत-
अथ मन्येथाः "प्रमाणबलादायातः प्रवाहः केन वार्य्येत" इति
न्यायेन यत् सत् तत् क्षणिकमित्यादिना प्रमाणेन क्षणिक-
तायाः प्रमिततया तदनुसारेण समानवर्त्तिनामेव प्राचीनः प्रत्ययः
कर्मकर्त्ता उत्तरः प्रत्ययः फलभोक्ता ॥ न चातिप्रसङ्गः कार्य्य-
कारणभावस्य नियामकत्वात् । यथा मधुररसभावितानामाम्र-
बीजानां परिकल्पितायां भूमावुप्तान्यामङ्कुरकाण्डस्कन्धशाखाप-
ल्लवादिषु तद्द्वारा परम्परया फले माधुर्य्यनियमः, यथा वा ला-
क्षारसावसिक्तानां कार्पासबीजादीनामङ्कुरादिपारम्पर्येण कार्पा-
सादौ रक्तिमनियमः । यथोक्तम्- "यस्मिन्नेव हि सन्ताने आहिता
कर्मवासना । फलं तत्रैव बध्नाति कार्पासे रक्तता यथा ॥ कुसुमे
बीजपूरादेर्यल्लाक्षाद्युपसिच्यते । शक्तिराधीयते तत्र काचित्तां
किं न पश्यसि॥" इति ॥ २ ॥
बौद्धमतसे पूर्वपक्ष (अथोते) नहि सिद्धेऽनुपपन्नं नामेति न्यायसे यत्सत् तत् क्ष-
णिकमिति अनुमान प्रमाणसिद्ध क्षणिकत्व प्रवाहको कौन वारण करसकता है अत
पूर्वक्षणवृत्ति विज्ञानात्माको कर्त्ता और उत्तरक्षणवृत्तिको फलभोक्ता मानने पड़ेगा
यदि पूर्वोत्तरक्षणवृत्तित्वमात्रसे कर्तृत्वभोक्तृत्वव्यवस्था करोगे तो देवदत्तका किया
हुआ कर्मका फल यज्ञदत्तको प्राप्त होने लगेंगे क्योंकि पूर्वोत्तरक्षणवृत्तित्व दोनोंमें
समान ही है इस आशयसे शंका करते हैं (नचोते) अतिप्रसङ्ग अतिव्याप्ति (उत्तर)
(कार्यकारणेति) पूर्वकालवृत्ति विज्ञानात्मा उत्तरविज्ञानका कारण है और उत्तरविज्ञान
का कार्य है उसमें भी यद्वृत्तिवासनासे जो उत्पन्न होता है उन दोनों विज्ञानमें पर-
स्पर कार्यकारण भाव है तथाच कार्यकारणभाव ही कर्तृत्व और भोक्तृत्वका नियामक
होगा अर्थात् कारण विज्ञानात्मवृत्तिक्रियाजन्यफलके कार्यविज्ञानात्मा भोगेगा एवञ्च
उक्त अतिप्रसंग नहीं होगा जिस प्रकार मधुर रससे भावित आम्रबीजको अच्छी
जोती हुई भूमिमें रोपनेपर अङ्कुर, स्तम्भ, स्कन्ध, शाखा, पत्र और पुष्पादि परम्परासे
मधुर फल उत्पन्न होता है खट्ट बीजसे उत्पन्न फल खट्टा होता है और भी लाक्षार्क
रससे भिगोया हुआ कपासका बीज अङ्कुरादि परम्परासे कपासमें रक्तवर्ण उत्पन्न
करता है उसी प्रकार आत्मामें भी वासनासन्तान परम्परासे फलभोग नियम
होनायगा । अभियुक्तोक्ति भी कहते हैं (यथोक्तमिति) जिस आत्माके वासना (संस्कार)

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः ।
सन्तानमें कर्मवासना सक्रान्त हो उसमें उस कर्मका फल होता है जिस प्रकार
कपासमें रक्तता होती है । ( कुसुमेति ) बीजपूर अर्थात् बिजोरानीम्बूके पुष्पमें
लाक्षादिके जलसे भिजानेपर रूपान्तर रसान्तर गन्धान्तरादिको उत्पन्न करनेवाली
जो शक्ति होती है उसी प्रकार आत्मसन्तानमे भी होगी यही तात्पर्य है ॥ २ ॥
तदपि काशकुशावलम्बनकल्पं विकल्पासहृत्वात् ॥ जलध-
रादौ दृष्टान्ते क्षणिकत्वमनेन प्रमाणेन प्रमितं प्रमाणान्तरेण
वा । नाद्यः, भवदभिमतस्य क्षणिकत्वस्य क्वचिदप्यदृष्टचर-
त्वेन दृष्टान्तसिद्धावस्थानुमानस्याद्युत्थानात् । न द्वितीय ,
तेनैव न्यायेन सर्वत्र क्षणिकत्वसिद्धौ सत्त्वानुमानवैफल्यापत्तेः,
अर्थक्रियाकारित्वं सत्त्वमित्यङ्गीकारे मिथ्यासर्पदंशादेरपि
अर्थक्रियाकारित्वेन सत्त्वापाताच्च । अतएवोक्तम्-उत्पाद-
व्ययध्रौव्ययुक्तं सदिति ॥ ३ ॥
उक्त पूर्वपक्षका उत्तर-( तदपीति ) यह भी जलमें डूबते हुएको कुशाका अव-
लम्वन करना है । क्योंकि वक्ष्यमाण विकल्पमे एक भी पक्षको स्थिर नही कर
सकता । तथाहि यत् सत् तत् क्षणिक यथा जलधर इस अनुमानमें दृष्टान्तभूतजल-
धरमें क्षणिकत्व इसी अनुमानसे साधना है या प्रमाणान्तरसे सिद्ध है ? प्रथमपक्षको
नहीं कहसकते क्योकि दृष्टान्त वही होता है जो सिद्ध और उभयवादीसम्मत
हो आपका अभिमत ( अनेकक्षणवृत्तित्वे सति कालवृत्तित्वरूप ) क्षणिकत्व कहीं
भी दृष्ट नही जाता अत दृष्टान्त न होनेसे इस प्रकारका अनुमानका उत्थान ही
असम्भव हे । यदि अनुमानान्तरसे कही तो उसी अनुमानसे सर्वत्र क्षणिकत्व
सिद्ध होही जायगा पुन यत्सद्दिति सत्त्वानुमानान्तरकल्पनाप्रयास भी व्यर्थ है ।
अर्थक्रिया ( फलजनकक्रिया ) कारित्वरूप सत्त्वका लक्षण भी अयुक्त है क्योंकि
मिथ्यासर्पका काटना भी तादृशज्ञान भयादिरूप अर्थक्रियाकारी होनेसे उसको भी
सत्यत्वप्रसङ्ग होगा । अतएव तत्त्वार्थसूत्रमें उत्पादेत्यादि सत्त्वका लक्षण कहा है
इसका अर्थ यह हे कि चेतन या अचेतन द्रव्यको सजातीय भावान्तरापत्ति उत्पाद
है जैसे मृत्पिण्डका घटरूप परिणाम पूर्वावस्थाका त्याग व्यय है यथा घटोत्पत्तिमें
पिण्डका नाश अनादिपरिणाम स्वभाव होनेसे स्थिरता ध्रुव है यथा मृत्पिण्ड घटाद्य
वस्थामें मृत्का सम्बन्ध तयाच तादृश त्रितययुक्त द्रव्य है ॥ ३ ॥
४

( ५० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
अथोच्येत सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्माध्यासात् तत्सिद्धि-
रिति तदसाधु स्यात् । स्याद्वादिनामनेकान्तानादस्यैतयोरपि
विरोधासिद्धे । यदुक्तं कार्पासादिवृष्टान्त इति तदुक्तिमात्रं युक्ते-
रनुक्तेः तत्रापि निरन्वयनाशस्यानङ्गीकाराच्च ॥ न च
सन्तानिव्यतिरेकेण सन्तान प्रमाणपदवीमुपारोढुमर्हति । तदु-
क्तम्—'सजातीया क्रमोत्पन्ना प्रत्यासन्ना परस्परम् । व्यक्त-
यस्तासु सन्तानः स चैक इति गीयते ॥” इति ॥ ४ ॥
( अथेति ) वर्तमान अर्थक्रिया सम्पादन कालमें अतीतानागत अर्थक्रियाको
बीजादि नहीं करता अतः विरुद्धधर्माध्यस्त होनेसे “बीजादयः प्रतिक्षणं भिन्ना विरु-
द्धधर्माध्यस्तत्वादित्यादि” अनुमानसे भी वस्तुका क्षणिकत्व सिद्ध हे यह भी कथन
अयुक्त है स्याद्वादीके मतसे सर्वत्र अनेकान्त अर्थात् अस्ति नास्तीति विरुद्ध-
धर्माध्यस्तत्व ही रहता है अतः उनके मतमें विरोध असिद्ध हे कर्तृत्वभोक्तृत्वादि प्रति
नियमके लिये जो कार्पास दृष्टान्त दिया वह भी निर्युक्तिक होनेसे कथनमात्र है
बीजादिकमे भी निरन्वय ध्वंस नहीं होता। तात्पर्य यह है कि, कार्यका ध्वंस कारणा-
वस्थाप्राप्ति है । निरन्वय अर्थात् निरुपाख्य अभावरूप नहीं यथा घटका ध्वंस होकर
कपालरूप होगया तब भी उसमें मृत्तिका रहती है कपाल नष्ट होकर पिण्ड या
चूर्ण होनेपर भी मृत्तिकारूप व्यवहार बना रहता है अतः अवयी मृत
सत्य ही रहता है यदि कहो यद्यपि घटादिके ध्वंसमे अन्वयी मृदादि बनी रहती है
तथापि बीजादिमें एव तप्तलोहम छोडी हुई जलबिन्दुमे अन्वयी नही उपलब्ध होता
हे यहभी नहीं वहा पर भी घटादि दृष्टान्तसे अनुमान किया जाता है अनुमानस्वरूप
अङ्कुरादि अनुवर्तमान बीजादि अन्वयी रूपह्य है कार्य होनेसे घटके समान तप्त-
लोहम नष्ट जल भी तेजके वेगसे मेघमण्डलमें अथवा सूर्यमण्डलमें जाता है ऐसा
अनुमान करना होगा अत अन्वयीका विनाश न होनेसे निरन्वय विनाश कही नहीं
होता हे । अतएव “उदाविन्दौ च सिन्धौ च तोयभावो न भिद्यते । विनष्टेऽपि ततो
विन्दौवास्ति तस्यान्वयोऽम्बुधौ ॥” इत्यादि सङ्गत होता है ॥ ४ ॥
न च कार्यकारणभावनियमोऽतिप्रसङ्गं भक्तुमर्हति । तथाहि
उपाध्यायबुद्धद्यनुभूतस्य शिष्यबुद्धि स्मरेत तदुपचितकर्मफ-
लमनुभवेद्वा तथा च कृतप्रणाशाकृताभ्यागमप्रसङ्ग । तदुक्तं

दर्शनम् [ भाषाटीकासमेतः । ( ५१ )

सिद्धसेनवाक्यकारेण-" कृतप्रणाशाकृतकर्मभोगभवप्रमोक्ष-
स्मृतिभङ्गदोषान् । उपेक्ष्य साक्षात् क्षणभङ्गमिच्छन्नहो
महासाहसिकः परोऽसौ ॥" इति ॥ ५ ॥
( नचेति ) सन्तानसे भिन्न सन्तान भी प्रमाणगम्य नहीं क्योंकि एकजातीय हो
क्रमसे उत्पन्न हो परस्पर मिला हो ऐसे व्यक्तिको सन्तान कहते हैं वह एक ही कहा
जाता है कार्यकारणभाव नियम भी अतिव्याप्तिको हटा नहीं सकता अन्यथा
आचार्यके अनुभूत वस्तुका स्मरण शिष्यको होने लगेगा एवं आचार्यकृत कर्मका
फल शिष्यको भोगना पड़ेगा । उपालम्भ करते हैं ( तदुक्तमिति ) कृतका नाश,
अकृत कर्मका भोग, संसारका उच्छेद मोक्षभंग स्मरणानुपपत्त्यादि दोषोंकी उपेक्षा
कर क्षणभंगको माननेवाला बौद्ध बड़ा साहसिक अर्थात् हठी है ॥ ५ ॥
किञ्च क्षणिकत्वपक्षे ज्ञानकाले ज्ञेयस्यासत्त्वेन ज्ञेयकाले ज्ञान-
स्यासत्त्वेन च ग्राह्यग्राहकभावानुपपत्तौ सकललोकयात्रास्तमि-
यात्। न च समसमयवर्त्तित्त्वं शङ्कनीया सव्येतरविषाणवत् कार्य्य-
कारणभावासम्भवेनाग्राह्यस्यालम्बनप्रत्ययानुपपत्तेः । अथ
भिन्नकालस्यापि तस्याकारार्पकत्वेन ग्राह्यत्वं, तदप्यपेशलम् क्ष-
णिकस्य ज्ञानस्याकारार्पकताश्रयताया दुर्वचत्वेने साकारज्ञान-
वादे प्रत्यादेशेन निराकारज्ञानवादेऽपि योग्यतावशेन प्रतिकर्म-
व्यवस्थायाः स्थितत्वात् ॥ ६ ॥
दोषान्तर भी कहते हैं ( किञ्चेति ) क्षणिक पक्षमें ज्ञानकालमें ज्ञेय घटादि और
ज्ञेयकी सत्ताकालमें ज्ञानको न रहनेसे ग्राह्य ( घटादि ) ग्राहक ज्ञान अनुपपन्न होगा तो
तन्मूलक समस्त लोकव्यवहार भी नष्ट होगा ( नचेति ) ज्ञान और ग्राह्यको एक-
कालवृत्तित्व भी नहीं कहसकते क्योंकि समकालोत्पन्न होनेसे वामदक्षिण शृङ्गके
समान परस्पर कार्यकारणभाव असम्भव होगा अत ग्राह्य न होनेसे विषयालम्बन
प्रत्ययत्व असम्भव होगा ( अथेति ) ज्ञानसे पूर्वकालमें ग्राह्यकी सत्ता होनेसे भी
आकारार्पकत्व नहीं कहसकते क्योंकि क्षणिक ज्ञानमें आकारका आश्रयत्व ही दुर्निरूप
है ज्ञानकालमें विषय और विषयकालमें ज्ञान दोनों न होनेसे ज्ञानमें विषयाकार सम-
र्पकत्वके असम्भव होनेपर ज्ञानवैचित्र्य नहीं होसकेगा घटपटादि विचित्रज्ञान आकार
वैलक्ष्ण्यमें ही होता है। कहा भी है "अर्थेनैव विशेषे हि निराकारतया धियामिति"

( ५२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
अतः ज्ञानवैचित्र्यके लिये क्षणिकत्व पक्षमें भी कथञ्चित् विषयाकार समर्पकत्व स्वीकार
करना चाहिये इस आशङ्कासे कहते हैं (निराकारज्ञान वादऽपीति) तात्पर्य साकार-
ज्ञानवादमें विषय नष्ट होनेपर भी घटपाटादिरूप नियत आकारको ग्रहण करता
है अर्थात् घटज्ञान घटकेही आकारका ग्रहण करता है पट आकारको नही ग्रहण
करता यह व्यवस्था जिस प्रकार होती है उसी प्रकार निराकार ज्ञानवादमें भी नियम
हो जायगा अत साकारत्व मानना भी व्यर्थ हे ॥ ६ ॥
तथा हि-प्रत्यक्षेण विषयाकाररहितमेव ज्ञानं प्रतिपुरुषमहमित्या-
क्या घटादिज्ञानमनुभूयते न तु दर्पणादिवत् प्रतिबिम्बक्रान्तम् ।
विषयाकारधारित्वे ज्ञानस्यार्थे दूरनिकटादिव्यवहाराय जला-
ञ्जलिर्वितर्येत । न चेदमिष्टापादनमेष्टव्यं दवीयान् महीधरो
नेदीयान् दीर्घो बहुरिति व्यवहारस्य निराबाधं जागरूकत्वात् ।
न चाकाराधायकस्य तस्य दवीयस्त्वादिशालितया तथा व्य-
वहार इति कथनीयं दर्पणादौ नथानुप्लम्भात् ॥ ७ ॥
उसीको उपपादन करते है ( तथाहीति ) प्रत्यक्षसे जो ज्ञान होता है वह घटा
दिविषयाकार रहित ही अहङ्काररूपसे घटादिज्ञान अनुभूत होता है दर्पणादिमें मुख
जिस प्रकार प्रतिबिम्बित होता है उसी प्रकार विषयाकारप्रतिबिम्बित होकर
ज्ञान नही प्रतीत होता । दूषणान्तर ( विषयाकारेति ) यदि ज्ञानमे विषयाकारार्पण
मानो तो ज्ञान आत्मामें रहता है उसी ज्ञानमें विषयाकार भी अर्पित होनेसे विषयमें
दूरत्व समीपत्वादि व्यवहार गगनकुसुम समान होगा । यदि कहो यह दोष क्या देते
हो क्षणिकवादीके मतमें इष्टापत्ति है ऐसा भी नहीं कहसकते क्योंकि शिंशपावृक्ष
दूर है अमुक वट वृक्ष बहुत ऊंचा है इत्यादि बडे २ बुद्धिमानोंसे लेकर पामरपर्यन्तको
प्रतीति होती है । यह शुक्ति रजतादिकी समान बाधित भी नहीं आकारसमर्पक
वृक्षादिक दूर होनेसे ऐसा प्रतीत होता है सो भी नहीं कहसकते क्योंकि दृष्टान्तभूत
दर्पणादिमें मुखादिक दूर होनेपर भी दर्पणादिसन्निहितही प्रतीत होता है ॥ ७ ॥
किञ्चार्थादुपजायमानं ज्ञानं यथा तस्य नीलाकारतामनुकरोति
तथा यदि जडतामपि तर्ह्यर्थवत् तदपि जडं स्यात् । तथा च
वृद्धिमिष्टवतो मूलमपि ते नष्टं स्यादिति महतकष्टमापन्नम् ॥८॥

दर्शनम् ]। भाषाटीकासमेत। ( ५३ )
दूषणान्तर ( किञ्चेति ) अर्थ ( घटादि ) से उत्पन्न ज्ञान जिस प्रकार नीलादि
( घटादि ) आकारका अनुकरण करेगा । अर्थात् जिस प्रकार विषयाकार ज्ञानमें
अर्पित होता है । उसी प्रकार घटादि विषय वृत्ति जडताका भी अनुकरण करेगा
तो विषयके समान ज्ञानभी जड होने लगेगा, इष्टापत्ति कह नहीं सकते क्योंकि
ज्ञानका प्रकाशरूपत्व सर्वसम्मत है जड होगा तो घटादिवत् ज्ञान भी स्वयं प्रकाश
नहीं रहेगा । तब तो सूदके लालचसे दीवालियाके पास रुपये जमा करनेसे जिस
प्रकार मूलका भी नाश हो जाता है उसी प्रकार विषयका अनुकरण करने ज्ञानका
स्वयंप्रकाशरूप स्वरूपभी नष्ट होजायगा ॥ ८ ॥
अथैतद्दोषपरिजिहीर्षया ज्ञानं जडतां नानुकरोतीति ब्रूषे हन्त
तर्हि तस्याग्रहणं न स्यादित्येकमनुसन्धित्सतोऽपरं प्रच्यवत
इति न्यायापातः । ननु माभूत् जडताया ग्रहणं कि न छिन्नं
तद्ग्रहणेऽपि नीलाकारग्रहणे तयोर्भेदा नैकान्तो वा भवेत् ।
नीलाकारग्रहणे चागृहिता जडता कथं तस्यानुरूपं स्यात्
अपरथा गृहीतस्य स्तम्भस्यागृहीत त्रैलोक्यमपि रूपं भवेत् ।
तदेतत् प्रमेयजात प्रतापचन्द्रप्रभृतिभिरर्हन्मतानुसारिभि प्रमे-
यकमलमार्त्तण्डादौ प्रबन्धे प्रपञ्चितमिति ग्रन्थभूयस्त्वभयात्रो-
पन्यस्तम् ॥ ९ ॥
( अथेति ) इस दोषसे छूटनेके लिये यदि कहो ज्ञान जडताका अनुकरण नहीं करेगा
वि तो जडताका ग्रहण भी नहीं होगा अर्थात् 'घटो जड' ऐसा ज्ञान होता रहा सो
अब नहीं होगा इस प्रकार एककी रक्षा करनेपर दूसरा नष्ट होजायगा अर्थात् ज्ञान
जडाकारताका अनुकरण करे तो स्वयंप्रकाशक नष्ट होगा यदि न अनुकरण करे तो
विषयकी जडत्व प्रतीति न होगी । ( ननु इति ) जडताका ग्रहण न होनेपर भी
घटका ग्रहण होनेसे घटाकार ओर जडताका अत्यन्त अभेद अर्थात् व्यभिचार
न होनेसे जडताका भी ग्रहण हो जायगा यह कहना भी असंगत हे क्योंकि नीला-
कारके ग्रहणसे अगृहीत जडताका ग्रहण कैसा होसकेगा, यदि ग्रहण होता हो तो
घट जड हे ऐसा कहनेपर घटसे जन्य जड है ऐसी प्रतीति होने लगेगी क्योकि घटा-
कार गृहीत होनेसे ज्ञानरूप होगा, जटाकार अगृहीत होनेमे उससे भिन्न होगा
( अपरथेति ) अगृहीत भी गृहीतका स्वरूप होगा तो जब स्तम्भ इत्यादि खमका

३. आर्हत / जैन दर्शन (स्याद्वाद व सप्तभङ्गी नय)

( ५४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ आर्हत-
ग्रहण होनेपर समस्त संसार उसका रूप होनेसे समस्त संसारका ज्ञान होनेलगेगा
यह विषय प्रमेयकमलमार्तण्डादिमें विस्तृत रूपसे निरूपित होनेसे यहां संक्षेप
करके छोड देता हू ॥ ९ ॥
तस्मात् पुरुषार्थाभिलाषुकैः पुरुषैः सौगती गतिर्मानुगन्तव्या
अपित्वार्हंत्येवार्हणीया । अर्हत्स्वरूपञ्च चन्द्रसूरिभिराप्तनिश्च-
यालङ्कारे निरटङ्कि—“सर्वज्ञो जितरागादिदोषस्त्रैलोक्यपूजितः।
यथास्थितार्थवादी च देवोऽर्हन् परमेश्वरः ”॥ इति । ननु
न कश्चित् पुरुषविशेष सर्वज्ञपदवेदनीय प्रमाणपद्धतिम-
ध्यास्ते सद्भावग्राहकस्य प्रमाणपञ्चकस्य तत्रानुपलम्भात् । तथा
चोक्तं तौतातितैः । “सर्वज्ञो दृश्यते तावन्नेदानीमस्मदादिभिः ।
दृष्टो न चैकदेशोऽस्ति लिङ्गं वा योऽनुमापयेत् ॥ १० ॥
अर्हन्‌के स्वरूपका वर्णन सर्वज्ञ इत्यादि समस्त वस्तुको साक्षात्कार करनेमें समर्थ
रागद्वेषादि शून्य सम्पूर्ण संसारमें पूजित, यथार्थ वक्ता, परमेश्वर जो देव है वही
अर्हन् हे ( ननु इति ) सर्वज्ञ इत्यादि जो विशेषण दिया सो असंगत है क्योंकि
प्रत्यक्षादि पांच प्रमाणोंमेंसे एक भी प्रमाण तादृश पुरुषविशेषके प्रतिपादक न
होनेके कारण सर्वज्ञपदवाच्य पुरुषका मानना प्रमाण विरुद्ध है । ( तोतातीतै )
बौद्धधर्मप्रचारक प्रमाणभावका उपपादन करते हैं तत्र पूर्वार्धसे अस्मदादिके दृष्टि-
गोचर न होनेसे प्रत्यक्षप्रमाणोद्भव कहा ( दृष्टो नचेकेति ) उत्तरार्धसे अनुमान-
गम्यका भी अभाव कहा पूर्ववत् शेषवत् सामान्य तो दृष्टभेदसे अनुमानके तीन
भेद सांख्योंने माने यथा है समुद्रजलकी एक बूंद पानकरके अवशिष्टको क्षारजल्त्वका
अनुमान करते हैं यह शेषवत् अनुमान है मेघगर्जना सुनकर वृष्टिका अनुमान
होता हे यह पूर्ववत् हे धूमध्वजका एकदेशधूमाको देखकर जो अग्निका अनुमान
है वह समान्यतो दृष्ट है सर्वज्ञ विषयम ऐसा कोई दृष्टलिङ्ग नहीं है जिससे अनु-
मान होसके ॥ १० ॥
न चागमस्त्विति कश्चिन्नित्यसर्वज्ञबोधक_ । न च तत्रार्थवादाना
तात्पर्य्यमपि कल्पते॥न चान्यार्थप्रधानेस्तैस्तदस्तित्वं विधीयते ।
न चानुवदितुं शक्यं पूर्वमन्यैरबोधित ॥ अनादेरागमस्यार्थो न
च सर्वज्ञ आदिमान् । कृत्रिमेण त्वसत्येन स कथं प्रतिपाद्यते ॥

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ५५ )
अथ तद्वचनेनैव सर्वज्ञोऽन्यैः प्रतीयते । प्रकल्प्येत कथं सिद्धि-
रन्योन्याश्रययोस्तयोः ॥ सर्वज्ञोक्ततया वाक्यं सत्यं तेन तद्-
स्तिता । कथं तदुभयं सिद्ध्येत्सिद्धमूलान्तराहते ॥ असर्वज्ञप्र-
णीतात्तु वचनान्मूलवर्जितात् । सर्वज्ञमवगच्छन्तस्तद्वाक्योक्तं
न जानते ॥ ११ ॥
अब छह श्लोकोंसे शब्दप्रमाणका भी अविषय कहते हैं । नित्य सर्वज्ञ बोधक कोई
आगम विधिवाक्य नहीं अर्थवाद भी ऐसा कोई नहीं जिसका सर्वज्ञमें तात्पर्य हो
अर्थवादका स्वतःप्रामाण्य नहीं किन्तु ( विध्युपष्टम्भकत्व ) अर्थात् विधिनिषेधका
प्राशस्त्य निन्दाबोधन द्वारा प्रामाण्य है अतः अयथार्थप्रधान होनेसे सर्वज्ञकी सत्ताका
बोधन नहीं करसकता अनुवाद भी उक्तार्थका होता है अतः पूर्व किसी वाक्या-
न्तरसे उक्त न होनेसे अनुवादवाक्य भी तादृश नहीं अनादि अपौरुषेय आगमका
अर्थ सादि सर्वज्ञ हो भी नहीं सकता । तात्पर्य अर्थबोधनके लिये शब्दका प्रयोग होता
है आगम ( वेद ) अनादि है उस कालमें आपका सर्वज्ञ नहीं है तब किस
प्रकार बोधन करसकेगा । यदि कोई कृत्रिम आधुनिक वाक्य प्रमाण कहो तो उस
वाक्यका सत्यत्वमे विश्वास न होनेमे वह कैसे बोधन करसकेगा । यदि कहो
अर्हन्‌का बनाये आगमसे ही अस्मदादिका सर्वज्ञका ज्ञान होगा अर्थात् उन्हींके
वचनसे ही सर्वज्ञ सिद्ध होगा यह भी अन्योन्याश्रयग्रस्त होनेसे असिद्ध है । अन्यो-
न्याश्रयको दिखाते हैं ( सर्वज्ञोक्तेत्यादि ) सर्वज्ञके उक्ति होनेसे वचनकी सत्यता
है वचनहीसे सर्वज्ञका अस्तित्व है अतः सर्वज्ञोक्तिसे अतिरिक्त प्रमाणान्तरके बिना
दोनों सिद्ध नहीं होसकते असर्वज्ञप्रणीत निर्मूल वाक्यसे सर्वज्ञकी सिद्धि मानने-
वाले स्ववचनविरोध भी नहीं जानते हैं ॥ ११ ॥
सर्वज्ञसदृशं किञ्चिद्यदि पश्येम सम्प्रति । उपमानेन सर्वज्ञं जानी-
याम ततो वयम् ॥ उपदेशोऽपि बुद्धस्य धर्माधर्मादिगोचर अन्यथा
नोपपद्येत सार्वज्ञ्यं यदि नाभवत्॥"इत्यादि । अत्र प्रतिविधीयते यदभ्य
सर्वज्ञके सदृश कोई दृष्ट हो तो उपमानसे सर्वज्ञकी प्रतीति होती सोभी नहीं ( उप-
देशोपीत्यादि ) श्लोकद्वयमे अर्थापत्तिका भी अविषय कहते हैं । यदि कोई सर्वज्ञ
न हो तो बुद्धका धर्माधर्मादि विषयक उपदेश भी अनुपपन्न होगा अतः सर्वज्ञ मानना