सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ३३ )
अनुमानसे ज्ञात होता है । अनुमानका स्वरूप दिखाते हैं ( यद्वेद्येति ) जिससे जिस
वस्तुका ज्ञान होता है वह वस्तु उस ज्ञानसे अभिन्न होती, है जिस प्रकार ज्ञानसे
प्रतीयमान आत्मा ज्ञानसे भिन्न नहीं है नीलादि भी ज्ञान ग्राह्य है अतः नीलादिक
भी ज्ञानसे अभिन्न होंगे यदि भेद होता तो उत्पन्न वस्तु क्षणिक होनेसे विषय न
होनेके कारण ज्ञानका अर्थके साथ सम्बन्धही न होगा तादात्म्य ( सम्बन्ध ) के
नियामक जो वस्तुकी सत्ता है, वह है नहीं उत्पत्ति अर्थात्, ज्ञानका उत्पादक
विषय होनेसे सम्बन्ध होगा यह भी इन्द्रियादिके वेद्यत्व निराकरणसे निराकृत है
ग्राह्यग्राहकका भेद प्रतीति भी अद्वितीय चन्द्रमामें दो चन्द्र हैं इस प्रतीतिके समान
है भ्रान्तिका मूलभूत अविद्यादि न होनेसे भ्रम कैसे सम्भव होगा ऐसी शंकासे कहा
है (अनादिरीति ) अनादि कालसे निरन्तर अनुवर्तमान भेद वासना ही निमित्त
ह ॥ ३९ ॥
यथोक्तम्- “सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियो । भेदश्च
भ्रान्तिविज्ञानैर्हश्येतेन्दाविवाद्वयेः ” इति ॥ “अविभागोऽपि
बुद्ध्यात्मा विपर्यासितदर्शनै । ग्राह्यग्राहकसंविन्तिभेदवानिव
लक्ष्यते ” इति च ॥ न च रसवीर्य्यविपाकादिसमानमाशामो-
दकोपार्जितमोदकानां स्यादिति वेदितव्यं वस्तुतो वेद्यवे-
द्यकाकारविधुराया अपि बुद्धेर्व्यवहर्तृपरिज्ञानानुरोधेन विभि-
न्नग्राह्यग्राहकाकाररूपवत्तया तिमिराद्युपहताक्षणां केशोण्डुना-
डीज्ञानाभेदवदनाद्युपप्लववासनासामर्थ्याद्व्यवस्थोपपत्ते पर्य-
नुयोगात् ॥ ४० ॥
जिस प्रकार घट मृत्तिकाके साथ ही उपलब्ध होनेसे मृत्तिकासे भिन्न नहीं है,
तिसी प्रकार विज्ञानके साथ ही अर्थात् विज्ञानके विना नीलादि वस्तुका उपलम्भ न
होनेसे नीलादिक भी नीलादि बुद्धिसे भिन्न नहीं है इसी अभिप्रायसे कहते हैं ( सहो-
पलम्भनियमदित्यादि ) ग्राह्य ग्राहक भेद न होनेपरभी बुद्धिरूप आत्मा अनादि-
कालिक विपरीत वासनासे ग्राह्य, ग्राहक संवेदन भेदवान्के समान प्रतीत होता है
इसको आशा मोदकजन्य रस वीर्य्यके समान असम्भव नहीं कहसकते किन्तु वास्तव-
वमें ग्राह्यग्राहकादिस्वरूप भेद न होनेपर भी व्यवहार ज्ञानके लिये अनादि कालिक
१ " ग्राह्य ग्राहकात् अभिन्न, ग्राहकेनै सहैव उपलभ्यमानत्वात् यद् येन सहैवोपलभ्यते
तत तदभिन्नम्, यथा मृद्धट इत्य दि" अनुमान है
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