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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 316 में से

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पृष्ठ 45

( ३२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ बौद्ध-
न प्रथमः, अतीन्द्रियत्वात् षट्केन युगपद्योगर बाधक-
त्वाच्च । यथोक्तम्-“षट्केन युगपद्योगात् परमाणोः षडंशता ।
तेषां मप्येकदेशत्व पिण्डः स्यादणुमात्रकः” इति ॥ ३७ ॥
परमाणु पक्ष भी दूषित करते हैं “न प्रथमेति” परमाणुको अतीन्द्रिय = अप्रत्यक्ष
मानते हैं - परमाणु उसको कहते हैं - जो प्रातःकाल - गवाक्ष (झरोखा) द्वारा सूर्य
की किरणें घरके भीतर - प्रवेश होनेपर सूक्ष्म रज देखपडते हैं उसको त्रसरेणु कह-
ते हैं उसमें तीन द्वयणुक हैं एक द्वयणुकमे दो अणु होते हैं अणु और परमाणु दोनों
पर्यायशब्द हैं । तथा च उक्त त्रसरेणुका षष्ठ भाग परमाणु है- कोई कोई साठमें भाग
को परमाणु कहते हैं वह उक्त क्रमविरुद्ध होनेसे नैयायिकसिद्धान्तके अज्ञानमूलक हैं
नैयायिकोंने दृश्यमानसूक्ष्म रजको त्रिसरेणु माना है इसी अभिप्रायसे कहा है-
“जालान्तरे गते भानौ सूक्ष्मं यद्दृश्यते रजः ।
तस्य षष्ठो विभास्तु परमाणुः प्रकीर्तितः” इति ॥ ३७ ॥
तस्मात् स्वव्यतिरिक्तग्राह्यविरहात्तदात्मिका बुद्धिः स्वयमेव
स्वात्मरूपप्रकाशिका प्रकाशवदितिसिद्धम् । तदुक्तम्-“नान्योऽ-
नुभाव्यो बुद्ध्यास्ति तस्या नानुभवोऽपरः । ग्राह्यग्राहकवैधुर्यात्
स्वय सैव प्रकाशत.” इति ॥ ३८ ॥
उपसंहार “तस्मादिति” ज्ञानसे अतिरिक्त ग्राह्य न होनेसे ज्ञानात्मक बुद्धि को स्वय
स्वकीय रूपका दीपादि प्रकाशवत् प्रकाश करती है । इसमे प्रमाण भी कहते हैं
“तदुक्तमिति’ बुद्धिसे अनुभाव्य अन्य वस्तु नहीं है बुद्धिका अन्य कोई अनुभव है
भी नहीग्राह्यग्राहकशुन्य होनेसे स्वयमेव प्रकाशवती बुद्धि है ॥ ३८ ॥
ग्राह्यग्राहकयोरभेदश्चानुमातव्यः । यद्वेद्यते येन वेदनेन तत्ततो न
भिद्यते यथा ज्ञानेनात्मा। वेद्यन्ते तैश्च नीलादयः। भेदे हि सत्य-
धुना अनेनार्थस्य सम्बन्धित्व न स्यात् तादात्म्यस्य नियम-
हेतोरभावात्तदुत्पत्तेरनियामकत्वात् यश्चाय ग्राह्यग्राहकसंवि-
त्तीनां पृथगवभास । स एकस्मिंश्चन्द्रमसि द्वित्वावभास इव
भ्रमः । अत्राप्यनादिरविच्छिन्नप्रवाहभेदवासनेव निमित्तम्॥३९॥
वेद्यवेदकका अभेद विनाप्रमाण सिद्ध न होगा इसलिये कहते हैं-“ग्राह्यग्राहकयोरिति”
ग्राह्य घटादि द्वारा मन दोनोंका वेद्य अर्थात, ग्राह्यके अतिरिक्त वस्तुका अभाव