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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 51, कुल 316 में से

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पृष्ठ 51

( ४२ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [बौद्ध-
त्पादस्य हेतूपनिबन्धः' बीजादङ्कुरोऽङ्कुरात्काण्डकाण्डान्नालो
नालाद्गर्भस्ततः शूकं ततः पुष्पं ततःफलम् । न चात्र बाह्ये
समुदाये कारणं बीजादि कार्य्यमङ्कुरादि वा चेतयते । अहम-
ङ्कुरं निर्वर्त्तयामि अहं बीजेन निर्वर्त्तित इति । एवमाध्यात्मि-
केऽपि कारणद्वयमवगन्तव्यम् । पुरःस्थिते प्रमेयाब्धौ ग्रन्थ
विस्तरभीरुभिरुपरम्यते ॥५३॥
उक्त कार्यकारणभाव चेतनके बिना नहीं होसकेगा ऐसी आशङ्काम् कहते हैं
( प्रतीत्येति ) कारणकी सत्तामें उसके सम्बन्धसे उत्पत्तिमें अनुकूलता है वही धर्मता
धर्ममें स्थित है किसी कार्यमें भी कोई चेतन कहीं उपलब्ध नहीं होते हैं प्रतीत्य-
समुत्पादमें जो दो भेद कहे हैं उनमं हेतूपनिबन्धन यथा बीजसे अङ्कुर, अङ्कुरसे
काण्ड, काण्डसे नाल, नालमे गर्भ, गर्भसे शूक, शूकस पुष्प, पुष्पसे फल यह क्रम
है इस बाह्य समुदायमें बीजादि, कारण अथवा अङ्कुरादि कार्य कोई भी चेतन नहीं
है मैं बीजसे उत्पन्न हुआ किंवा मैं अङ्कुरको उत्पन्न करता हूं ऐसा ज्ञान भी
किसीको नहीं है । इसी प्रकार आध्यात्मिकमेंभी जानना । ग्रन्थ गौरवभयसे उस
विषयको छोडदिया इति + ॥ ५३ ॥
तात्पर्य-प्रत्ययोपनिबन्धन हेतूपनिबन्धनरूप प्रतीत्य समुत्पाद है वह बाह्य और आध्या
त्मिक भेदसे दो प्रकारकी है बाह्य कहचुका आध्यात्मिक हेतूपनिबन्धन इस प्रकार है "यदि
द्मविद्याप्रत्यया मस्कारा यावज्जातिप्रत्यय जरामरणादीति " अविद्या यदि न होती तो
सस्कार न होते इस प्रकार जाति (जन्म) भी नहीं होती यदि जाति न होती तो जरामर-
णादिक भी नहीं होते उसमें अविद्या ऐसा नहीं जानती कि में सस्कारको उत्पन्न करती हूँ
सस्कारको भी ऐसा ज्ञान नही कि मुझको अविद्याने उत्पन्न किया इसी प्रकार यावज्जातिको
भी ऐसा ज्ञान नहीं है मैं जरामरणादिकी उत्पादन करती हूं । न जरामरणादिको ऐसा ज्ञान है
कि मैं जातिसे उत्पन्न हूं । तथापि अविद्यादिक रहनेपर चेतनान्तरसे अनाधिष्ठित अचेतनमें
सस्कारादि स्वयं उत्पन्न होते हैं । जिस प्रकार बीजादिमें अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं । केवल
प्रचुरता मयोगसे अमुक उत्पन्न होता है एतावन्मात्र दृष्ट है । चेतनाधिष्ठान कहीं इसमें भी
दृष्ट नहीं।प्रत्ययोपानबन्धन पृथिवी, जल, तेज,वायु, आकाश, विज्ञान, धातुओंगे समूहमे काय
उत्पन्न होता है । पृथिवी शरीरको काठिन्य उत्पादन करती है जल स्नेह तेज शरीरके खाये
पिये वस्तुको पचाते हैं वायु श्वासादि सञ्चालन करता है आकाश शरीरके भीतर छिद्र बना
रखता है मनोविज्ञानको विज्ञान धातु उत्पादन करता है जब आध्यात्मिक पृथिव्यादि धातु
अविकल होते हैं तब शरीरकी उत्पत्ति होती है । उसमें पृथिव्यादिको यह ज्ञान नहीं कि मैं
शरीरका काठिन्यादि उत्पादन करता हूं न काठिन्यादिको ही यह ज्ञान है कि मुझे पृथिव्या-