संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
५४ संस्कारविधिः
य॒स्यै ते॑ य॒ज्ञियो॒ गर्भो॒ यस्यै॒ योनि॑र्हिर॒ण्ययी॑ ।
अङ्गान्यहु॑ता॒ यस्य॒ तं मा॒त्रा सर्म॑जीगम॒थ् स्वाहा॑ ॥ २ ॥
—यजुः० अ० ८ । मं० २८, २९ ॥
पुमाग्ंसौ मित्रावरुणौ पुमाग्ंसावश्विनावुभौ ।
पुमानग्निश्च वायुश्च पुमान् गर्भस्तवोदरे स्वाहा ॥ १ ॥
पुमानग्निः पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः ।
पुमाग्ंसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननु जायताग्ं स्वाहा ॥ २ ॥
—सामवेदे ॥
इन मन्त्रों से आहुति देकर पूर्वलिखित सामान्यप्रकरण की
शान्त्याहुति देके, पुनः ३६ पृष्ठ में लिखे प्रमाणे पूर्णाहुति देवें।
पुनः स्त्री के भोजन-छादन का सुनियम करे। कोई मादक मद्य
आदि, रेचक हरीतकी आदि, क्षार अतिलवणादि, अत्यम्ल
अर्थात् अधिक खटाई, रूक्ष चणे आदि, तीक्ष्ण अधिक लालमिर्ची
आदि स्त्री कभी न खावे, किन्तु घृत, दुग्ध, मिष्ट, सोमलता
अर्थात् गुडूच्यादि ओषधि, चावल, मिष्ट, दधि, गेहूँ, उर्द, मूँग,
तूअर आदि अन्न और पुष्टिकारक शाक खावें। उसमें ऋतु-ऋतु
के मसाले—गर्मी में ठण्डे सफेद इलायची आदि और सर्दी में
केशर, कस्तूरी आदि डालकर खाया करे। युक्ताहार-विहार सदा
किया करे। दूध में सुंठि और ब्राह्मी ओषधि का सेवन स्त्री
विशेष किया करे, जिससे सन्तान अतिबुद्धिमान्, रोगरहित, शुभ
गुण-कर्म-स्वभाववाला होवे ॥
॥ इति गर्भाधानविधिः समाप्तः ॥
३ अथ पुंसवनम्
'पुंसवन' संस्कार का समय गर्भस्थिति-ज्ञान हुए समय
से दूसरे वा तीसरे महीने में है। उसी समय पुंसवन संस्कार
करना चाहिए, जिससे पुरुषत्व अर्थात् वीर्य का लाभ होवे।
यावत् बालक के जन्म हुए पश्चात् दो महीने न बीत जावें,
तबतक पुरुष ब्रह्मचारी रहकर स्वप्न में भी वीर्य को नष्ट न होने
देवे। भोजन-छादन, शयन-जागरणादि व्यवहार उसी प्रकार से
करे, जिससे वीर्य स्थिर रहे और दूसरा सन्तान भी उत्तम होवे।
अत्र प्रमाणानि
पुमाꣳ॒सौ मित्रावरुणौ पुमाꣳ॒सावश्विनावुभौ।
पुमान॒ग्निश्च॑ वायु॒श्च पुमान् गर्भस्तवोदरे॥ १॥
पुमान॒ग्निः पुमा॒निन्द्रः पुमा॒न्देवो बृहस्पतिः।
पुमाꣳ॒सं पुत्रं विन्दस्व तं पुमाननु जायताम्॥ २॥
—सामवेदे ॥
श॒मीम॑श्व॒त्थ आरू॑ढ॒स्तत्र॑ पुं॒सवनं॑ कृ॒तम्।
तद्वै पु॒त्रस्य॑ वेद॒नं तत् स्त्रीष्वा भरा॑मसि॥ १॥
पुं॒सि वै रेतो॑ भव॒ति तत् स्त्रियामनु॑ षिच्यते।
तद्वै पु॒त्रस्य॑ वेद॒नं तत् प्र॒जाप॑तिरब्रवीत्॥ २॥
प्र॒जाप॑तिरनु॑मतिः सिनी॒वाल्य॑चीक्लृपत्।
स्त्रैषू॑य॒मन्यत्र॑ दध॒त् पुमां॑समु दधदि॒ह॥ ३॥
—अथर्व० का० ६। सू० ११॥
इन मन्त्रों का यही अभिप्राय है कि पुरुष को वीर्यवान्
५६ संस्कारविधिः
होना चाहिए।
इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का प्रमाण—
अथास्यै मण्डलागारच्छायायां दक्षिणस्यां
नासिकायामजीतामोषधीं नस्तः करोति ॥ १ ॥
प्रजावज्जीवपुत्राभ्यां हैके ॥ २ ॥
गर्भ के दूसरे वा तीसरे महीने में वटवृक्ष की जटा वा
उसकी पत्ती लेके स्त्री के दक्षिण नासापुट से सुँघावे और कुछ
अन्य पुष्ट अर्थात् गुडच जो गिलोय वा ब्राह्मी ओषधि खिलावे।
ऐसा ही पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण है—
अथ पुंसवनं पुरा स्पन्दत इति मासे द्वितीये तृतीये वा ॥
इसके अनन्तर 'पुंसवनं' उसको कहते हैं, जो पूर्व ऋतुदान
देकर गर्भस्थिति से दूसरे वा तीसरे महीने में पुंसवन-संस्कार
किया जाता है। इसी प्रकार गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रों में
भी लिखा है।
अथ क्रियारम्भः—पृष्ठ ९ से २१वें पृष्ठ के शान्तिकरणपर्यन्त
कहे प्रमाणे (विश्वानि देव०) इत्यादि चारों वेदों के मन्त्रों से
यजमान और पुरोहितादि ईश्वरोपासना करें और जितने पुरुष
वहाँ उपस्थित हों, वे भी परमेश्वरोपासना में चित्त लगावें और
पृष्ठ १३-१७ में कहे प्रमाणे स्वस्तिवाचन तथा पृष्ठ १८-२१
में लिखे प्रमाणे शान्तिकरण करके पृष्ठ २२ में लिखे प्रमाणे
यज्ञदेश, यज्ञशाला तथा पृष्ठ २३ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड,
यज्ञसमिधा, होम के द्रव्य और स्थालीपाक आदि करके और
पृष्ठ ३०-३२ में लिखे प्रमाणे (अयन्त इध्म०) इत्यादि [इत्यादि
मन्त्रों से समिदाधान], (ओम् अदिते०) इत्यादि चार [मन्त्रों
से] मन्त्रोक्त कर्म [जल-प्रोक्षण] और आघारावाज्यभागाहुति
४ तथा व्याहृति आहुति ४ और पृष्ठ ३२ में [लिखे प्रमाणे]
पुंसवनप्रकरणम् ५७
( ओं प्रजापतये स्वाहा ), पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे ( ओं यदस्य
कर्मणो० ) दो आहुति देकर नीचे लिखे हुए दोनों मन्त्रों से
दो आहुति घृत की देवें—
ओम् आ ते गर्भो योनिमेतु पुमान् बाण इवेषुधिम्।
आ वीरो जायतां पुत्रस्ते दशमास्यः स्वाहा ॥ १ ॥
ओम् अग्निर्हैतु प्रथमो देवतानां सोऽस्यै प्रजां मुञ्चतु मृत्यु-
पाशात् । तदयं राजा वरुणोऽनुमन्यतां यथेयं स्त्री पौत्रमघं न
रोदात् स्वाहा ॥ २ ॥
इन दोनों मन्त्रों को बोलके दो आहुति किये पश्चात् एकान्त
में पत्नी के हृदय पर हाथ धरके यह निम्नलिखित मन्त्र पति
बोले—
ओम् यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ।
मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं माहं पौत्रमघं नियाम् ॥
तत्पश्चात् पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामवेद का
महावामदेव्यगान गाके जो-जो पुरुष वा स्त्री संस्कार-समय पर
आये हों, उनको विदा कर दे।
पुनः वटवृक्ष के कोमल कूपल और गिलोय को महीन
बाँट, कपड़े में छान, गर्भिणी स्त्री के दक्षिण नासापुट में सुँघावे।
तत्पश्चात्—
हिर॒ण्य॒ग॒र्भः सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ भूतस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ऽआसीत्।
स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ १ ॥
—यजुः० अ० १३। मं० ४॥
अ॒द्भ्यः सम्भृ॑तः पृथि॒व्यै रसा॑च्च वि॒श्वक॑र्मणः॒ सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ ।
तस्य॑ त्वष्टा॑ वि॒दध॑द्रू॒पमे॑ति॒ तन्मर्त्य॑स्य दे॒वत्वमा॒जान॒मग्रे॑ ॥ २ ॥
—यजुः० अ० ३१। मं० १७॥
५८ संस्कारविधिः
इन दो मन्त्रों को बोलके पति अपनी गर्भिणी पत्नी के
गर्भाशय पर हाथ धरके यह मन्त्र बोले—
सु॒प॒र्णोऽसि॑ ग॒रुत्माँस्त्रिवृत्ते॑ शिरो॑ गाय॒त्रं चक्षु॑र्बृहद्रथन्त॒रे
प॒क्षौ। स्तोम॑ऽआ॒त्मा छन्दाँ॒स्यङ्गा॑नि॒ यजूं॑षि॒ नाम॑।
साम॑ ते त॒नूर्वाम॑दे॒व्यं य॒ज्ञाय॒ज्ञियं॒ पुच्छं॒ धिष्ण्या॑: श॒फाः।
सु॒प॒र्णोऽसि॑ ग॒रुत्मान्॒ दिवं॑ गच्छ॒ स्वः॑ पत॥
—य० अ० १२। मं० ४॥
इसके पश्चात् स्त्री सुनियम, युक्ताहार-विहार करे। विशेषकर
गिलोय, ब्राह्मी ओषधि और सुंठी को दूध के साथ थोड़ी-थोड़ी
खाया करे और अधिक शयन और अधिक भाषण, अधिक
खारा, खट्टा, तीखा, कड़वा, रेचक हरड़े आदि न खावे। सूक्ष्म
आहार करे। क्रोध, द्वेष, लोभादि में न फँसे, चित्त को सदा
प्रसन्न रक्खे इत्यादि शुभाचरण करे॥
॥ इति पुंसवनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
अथ सीमन्तोन्नयनम्
अब तीसरा संस्कार ‘सीमन्तोन्नयन’ कहते हैं, जिससे
गर्भिणी स्त्री का मन सन्तुष्ट, आरोग्य, गर्भ स्थिर, उत्कृष्ट होवे
और प्रतिदिन बढ़ता जावे। इसमें आगे प्रमाण लिखते हैं—
चतुर्थे गर्भमासे सीमन्तोन्नयनम् ॥ १ ॥
आपूर्यमाणपक्षे यदा पुंसा नक्षत्रेण चन्द्रमा युक्तः स्यात् ॥ २ ॥
अथास्यै युग्मेन शलालुग्रप्सेन त्रेण्या च शलल्या त्रिभिश्च
कुशपिञ्जूलैरूर्ध्वं सीमन्तं व्यूहति भूर्भुवःस्वरोमिति त्रिः
चतुर्वा ॥ —यह आश्वलायनगृह्यसूत्र ॥
पुंसवनवत् प्रथमे गर्भे मासे षष्ठेऽष्टमे वा ॥
—यह पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण ॥
इसी प्रकार गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्र में भी लिखा है।
अर्थ—गर्भमास से चौथे महीने में शुक्लपक्ष में जिस दिन
मूल आदि पुरुष नक्षत्रों से युक्त चन्द्रमा हो, उसी दिन
सीमन्तोन्नयन संस्कार करें और पुंसवन-संस्कार के तुल्य छठे,
आठवें महीने में पूर्वोक्त पक्ष, नक्षत्रयुक्त चन्द्रमा के दिन
सीमन्तोन्नयन-संस्कार करें ।
अथ विधिः—इसमें प्रथम ९-३१ पृष्ठ तक का विधि करके
(अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाण वेदी के
पूर्वादि दिशाओं में जल सेचन करके—
ओम् दे॒व स॑वि॒तः प्र सु॑व य॒ज्ञं प्र सु॑व य॒ज्ञप॑तिं॒ भगा॑य।
दि॒व्यो ग॑न्ध॒र्वः के॑त॒पूः केतं॑ नः पुनातु॒ वाच॒स्पति॒र्वाचं॑ नः
स्वद॑तु॒ स्वाहा॑ ॥ —य० अ० ३० । मं० ७ ॥
६० संस्कारविधिः
इस मन्त्र से कुण्ड के चारों ओर जल-सेचन करके
आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार—दोनों
मिलके आठ आहुति पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे करके—
ओम् प्रजापतये त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥
अर्थात् चावल, तिल और मूँग इन तीनों को समभाग
लेके—
ओम् प्रजापतये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥
अर्थात् धोके इनकी खिचड़ी बना उसमें पुष्कल घी डालके
निम्नलिखित मन्त्रों से आठ आहुति देवें—
ओं धा॒ता द॑दातु दा॒शुषे॒ प्राचींᳵ जी॒वातु॑म॒क्षित॑म् ।
व॒यं दे॒वस्य॑ धीमहि सु॒म॒तिं वा॒जिनी॑वतः॒ स्वाहा॑ ॥
इदं धात्रे—इदन्न मम ॥ १ ॥
ओं धा॒ता प्र॒जाना॑मु॒त रा॒य ई॑शे धा॒तेदं विश्वं॒ भुव॑नं
जजान॑ । धा॒ता कृ॒ष्टीरनि॑मिषा॒भि च॑ष्टे धा॒त्र इद्ध्व्यं
घृ॒तव॑ज्जुहोत॒ स्वाहा॑ ॥ इदं धात्रे—इदन्न मम ॥ २ ॥
ओं रा॒काम॒हं सु॒हवां॑ सुष्टु॒ती हु॑वे शृ॒णोतु॑ नः सु॒भगा॒ बोध॑तु
त्मना॑ । सीव्य॒त्वप॑: सू॒च्याच्छिद्य॑मा॑नया ददा॑तु वी॒रं
श॒तदा॑यमु॒क्थ्यं॒ स्वाहा॑ ॥ इदं राकायै—इदन्न मम ॥ ३ ॥
यास्ते॑ राके सु॒मत॑यः सु॒पेशा॑सो॒ याभि॑र्ददा॑सि दा॒शुषे॑
वसू॑नि । ताभि॑र्नो अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒पाग॑हि सहस्रपो॒षं सु॑भगे॒
ररा॑णा॒ स्वाहा॑ ॥ इदं राकायै—इदन्न मम ॥ ४ ॥
—ऋ० मं० २ । सू० ३२ । मं० ४, ५ ॥
नेज॑मेष॒ परा॑ पत सुपु॒त्रः पुन॒रा प॑त ।
अ॒स्यै मे॑ पु॒त्रका॑मायै॒ गर्भ॒मा धे॑हि॒ यः पुमा॒न्त्स्वाहा॑ ॥ ५ ॥
सीमन्तोन्नयनप्रकरणम् ६१
यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ह्युत्ता॑ना॒ गर्भ॑मा द॒धे।
ए॒वं तं गर्भ॑मा धेहि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे॒ स्वाहा॑ ॥ ६ ॥
विष्णो॒ः श्रेष्ठेन रू॒पेणा॒स्यां नार्या॑ गवी॒न्याम्।
पुमां॑सं पु॒त्राना धे॑हि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे॒ स्वाहा॑ ॥ ७ ॥
इन सात मन्त्रों से खिचड़ी की सात आहुति देके, पुनः
(भूर्भुवः स्वः। प्रजापते न त्व०) पृष्ठ ३४ में लिखित इससे
एक, सब मिलाके आठ आहुति देवें और पृष्ठ ३३ में लिखे
प्रमाणे (ओं प्रजापतये०) मन्त्र से एक भात की और पृष्ठ ३३
में लिखे प्रमाणे (ओं यदस्य कर्मणो०) मन्त्र से एक खिचड़ी
की आहुति देवें। तत्पश्चात् (ओं त्वन्नो अग्ने०) पृष्ठ ३४-३५
में लिखे प्रमाणे आठ घृत की आहुति और (ओं भूरग्नये०)
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे चार, व्याहृतिमन्त्रों से चार आज्याहुति
देकर पति और पत्नी एकान्त में जाके उत्तमासन पर बैठ पति
पत्नी के पश्चात्=पृष्ठ की ओर बैठ—
ओम् सु॒मि॒त्रिया न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु
दुर्मि॒त्रिया॑स्तस्मै॑ सन्तु यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यञ्च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ १ ॥
—य० अ० ६ । मं० २२ ॥
मू॒र्द्धानं॑ दि॒वोऽअ॑र॒तिं पृ॑थि॒व्या वै॑श्वान॒रमृ॒तऽआ जा॒तम॒ग्निम्।
क॒विं स॒म्राज॒मति॑थिं॒ जना॑नामा॒सन्ना पात्रं॑ जनयन्त
दे॒वाः ॥ २ ॥ —य० अ० ७ । मं० २४॥
ओम् अयमूर्जावतो वृक्ष ऊर्जीव फलिनी भव।
पर्णं वनस्पतेऽनु त्वाऽनु त्वा सूयताँश्चरयिः ॥ ३ ॥
ओं येनादितेः सीमानं नयति प्रजापतिर्महते सौभगाय।
तेनाहमस्यै सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि ॥ ४ ॥
६२ संस्कारविधिः
ओं रा॒काम॒हꣳ सु॒हवांꣳ सु॒ष्टुती हु॑वे शृ॒णोतु॑ नः सु॒भगा॒ बोध॑तु॒
त्मना॑। सीव्य॒त्वप॑ः सू॒च्याच्छिद्य॑मानया ददा॑तु वी॒रꣳ
श॒तदा॑युमु॒ख्यम्॥५॥
ओं यास्ते॑ राके सु॒मतय॑ः सु॒पेश॑सो॒ याभि॒र्ददा॑सि दा॒शुषे
वसू॑नि। ताभि॑र्नो अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒पाग॑हि सहस्रपो॒षं सु॑भगे॒
ररा॑णा॒॥६॥
किं पश्यसि प्रजां पशून्त्सौभाग्यं मह्यं दीर्घायुष्ट्वं पत्युः ॥७॥
इन मन्त्रों को पढ़के पति अपने हाथ से स्वपत्नी के केशों
में सुगन्धित तेल डाल, कंघे से सुधार, हाथ में उदुम्बर अथवा
अर्जुन वृक्ष की शलाका वा कुशा की मृदु छीपी वा शाही पशु
के काँटे से अपनी पत्नी के केशों को स्वच्छ कर पट्टी निकाल
और पीछे की ओर जूड़ा सुन्दर बाँधकर यज्ञशाला में आवें।
उस समय वीणा आदि बाजे बजवावें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३६-
३७ में लिखे प्रमाणे सामवेद का गान करें। पश्चात्—
ओम् सोम एव नो राजेमा मानुषीः प्रजाः।
अविमुक्तचक्र आसीरंस्तीरे तुभ्यम् असौ*॥
आरम्भ में इस मन्त्र का गान करके, पश्चात् अन्य मन्त्रों
का गान करें।
तत्पश्चात् पूर्व आहुतियों के देने से बची हुई खिचड़ी में
पुष्कल घृत डालके गर्भिणी स्त्री अपना प्रतिबिम्ब उस घी में
देखे। उस समय पति स्त्री से पूछे—‘किं पश्यसि’? स्त्री उत्तर
देवे—‘‘प्रजां पश्यामि’’।
तत्पश्चात् एकान्त में वृद्ध, कुलीन, सौभाग्यवती, पुत्रवती,
- यहाँ किसी नदी का नामोच्चारण करें।
सीमन्तोन्नयनप्रकरणम् ६३
गर्भिणी अपने कुल की और ब्राह्मणों की स्त्रियाँ बैठें। प्रसन्नवदन
और प्रसन्नता की बातें करें और वह गर्भिणी स्त्री उस खिचड़ी
को खावे और वे वृद्ध समीप बैठी हुई उत्तम स्त्री लोग ऐसा
आशीर्वाद देवें—
ओम् वीरसूस्त्वं भव, जीवसूस्त्वं भव, जीवपत्नी त्वं भव ॥
ऐसे शुभ, माङ्गलिक वचन बोलें। तत्पश्चात् संस्कार में
आये हुए मनुष्यों का यथायोग्य सत्कार करके स्त्री स्त्रियों और
पुरुष पुरुषों को विदा करें ॥
॥ इति सीमन्तोन्नयनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
अथ जातकर्म-संस्कारविधिः
इसका समय, प्रमाण और कर्मविधि इस प्रकार करें।
सोष्यन्तीमद्भिरभ्युक्षति ॥
इत्यादि पारस्करगृह्यसूत्र का प्रमाण है।
इसी प्रकार आश्वलायन, गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्रों
में भी लिखा है।
जब प्रसव होने का समय आवे, तब निम्नलिखित मन्त्र
से गर्भिणी स्त्री के शरीर पर जल से मार्जन करे—
ओम् एज॑तु दश॑मास्यो॒ गर्भो॑ ज॒रायु॑णा स॒ह।
यथा॒यं वा॒युरेर्जति॒ यथा॑ समु॒द्र एज॑ति।
ए॒वायं दश॑मास्यो॒ अस्रं॑ज्जरायु॑णा स॒ह॥ १ ॥
—यजुः० अ० ८। मं० २८॥
इससे मार्जन करने के पश्चात्—
ओम् अवैतु पृश्निशेवलः शुने जरावत्तवे।
नैव मांसेन पीवरीं न कस्मिंश्चनायतनमव
जरायु पद्य॒ताम्॥
इस मन्त्र का जप करके पुनः मार्जन करे।
कुमारं जातं पुराऽन्यैरालम्भात् सर्पिर्मधुनी
हिरण्यनिकाषं हिरण्येन प्राशयेत् ॥
जब पुत्र का जन्म होवे तब प्रथम दायी आदि स्त्री लोग
बालक के शरीर का जरायु पृथक् कर मुख, नासिका, कान,
जातकर्मप्रकरणम् ६५
आँख आदि में से मल को शीघ्र दूर कर कोमल वस्त्र से पोंछ,
शुद्ध कर पिता के गोद में बालक को देवें। पिता जहाँ वायु
और शीत का प्रवेश न हो, वहाँ बैठके एक बीताभर नाड़ी को
छोड़, ऊपर सूत से बाँधके उस बन्धन के ऊपर से नाड़ीछेदन
करके किञ्चित् उष्ण जल से बालक को स्नान करा, शुद्ध वस्त्र
से पोंछ, नवीन शुद्ध वस्त्र पहिना जो प्रसूता-घर के बाहर पूर्वोक्त
प्रकार कुण्ड कर रखा हो अथवा तांबे के कुण्ड में समिधा
पूर्वलिखित प्रमाणे चयन कर पूर्वोक्त सामान्यविध्युक्त पृष्ठ ३०-
३२ में कहे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान करके, अग्नि को
प्रदीप्त करके सुगन्धित घृतादि वेदी के पास रखके, हाथ-पग
धोके एक पीठासन अर्थात् शुभासन पुरोहित* के लिए कुण्ड
के दक्षिण भाग में रक्खे, वह उसपर उत्तराभिमुख बैठे और
यजमान अर्थात् बालक का पिता हाथ-पग धोके वेदी के पश्चिम
भाग में आसन बिछा, उसपर उपवस्त्र ओढ़के पूर्वाभिमुख बैठे
तथा सब सामग्री अपने और पुरोहित के पास रखके पुरोहित
पद के स्वीकार के लिए बोले—
ओ३म् आ वसोः सदने सीद॥
तत्पश्चात् पुरोहित—ओ३म् सीदामि॥
बोलके आसन पर बैठके, पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाणे अयं
त इध्म० आदि चार मन्त्रों से वेदी में चन्दन की समिदाधान
करे और प्रदीप्त समिधा पर पूर्वोक्त सिद्ध किये घी की पृष्ठ
३३-३४ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार और
व्याहृति आहुति चार दोनों मिलके आठ आज्याहुति देनी।
तत्पश्चात्—
- धर्मात्मा, शास्त्रोक्त विधि का पूर्णरीति से जाननेहारा, विद्वान्, सद्धर्मी,
कुलीन, निर्व्यसनी, सुशील, वेदप्रिय, पूजनीय, सर्वोपकारी गृहस्थ
की पुरोहित संज्ञा है।
६६ संस्कारविधिः
ओं या तिरश्ची निपद्यते अहं विधरणी इति। तां त्वा
घृतस्य धारया यजे सꣳराधिनीमहम्। सꣳराधिन्यै देव्यै
देष्ट्र्यै स्वाहा॥ इदं संराधिन्यै—इदन्न मम॥ १ ॥
ओं विपश्चित् पुच्छमभरत् तद्धाता पुनराहरत्। परेहि त्वं
विपश्चित् पुमानयं जनिष्यतेऽसौ नाम स्वाहा। इदं
धात्रे—इदन्न मम॥ २ ॥
इन दोनों मन्त्रों से दो आज्याहुति करके, पृष्ठ ३६-३७ में
लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करके, ९-१२ पृष्ठ में लिखे
प्रमाणे ईश्वरोपासना करें।
तत्पश्चात् घी और मधु दोनों बरोबर मिलाके, जो प्रथम
सोने की शलाका कर रखी हो, उससे बालक की जीभ पर
“ओ३म्” यह अक्षर लिखके उसके दक्षिण कान में
“वेदोऽसीति” 'तेरा गुप्त नाम वेद है' ऐसा सुनाके पूर्व मिलाये
हुए घी और मधु को उस सोने की शलाका से बालक को
नीचे लिखे मन्त्र से थोड़ा-थोड़ा चटायवे—
ओं प्र ते ददामि मधुनो घृतस्य वेदं सवित्रा प्रसूतं मघोनाम्।
आयुष्मान् गुप्तो देवताभिः शतं जीव शरदो लोके अस्मिन्॥ १ ॥
ओम् भूस्त्वयि दधामि॥ २ ॥
ओं भुवस्त्वयि दधामि॥ ३ ॥
ओं स्वस्त्वयि दधामि॥ ४ ॥
ओं भूर्भुवः स्वस्सर्वं त्वयि दधामि॥ ५॥
ओं सद॑स॒स्पति॒मद्भु॑तं प्रि॒यमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म्।
स॒निं मे॒धाम॑यासिष॒ꣳ स्वाहा॑॥ ६॥
जातकर्मप्रकरणम् ६७
इन प्रत्येक मन्त्र से छह बार घृत-मधु प्राशन कराके
तत्पश्चात् चावल और जव को शुद्ध कर पानी से पीस, वस्त्र
से छान, एक पात्र में रखके हाथ के अंगूठा और अनामिका
से थोड़ा-सा लेके—
ओम् इदमाज्यमिदमन्नमिदमायुरिदममृतम् ॥
इस मन्त्र को बोलके बालक के मुख में एक बिन्दु छोड़
देवे। यह एक गोभिलीयगृह्यसूत्र का मत है, सबका नहीं।
पश्चात् बालक का पिता बालक के दक्षिण कान में मुख
लगाके निम्नलिखित मन्त्र बोले—
ओं मेधां ते देवः सविता मेधां देवी सरस्वती।
मेधां ते अश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥१॥
ओम् अग्निरायुष्मान्स वनस्पतिभिरायुष्माँस्तेन
त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि ॥२॥
ओं सोम आयुष्मान्स ओषधीभिरायुष्माँस्तेन०* ॥३॥
ओं ब्रह्माऽऽयुष्मत् तद् ब्राह्मणैरायुष्मत् तेन० ॥४॥
ओं देवा आयुष्मान्तस्तेऽमृतेनायुष्मन्तस्तेन० ॥५॥
ओम् ऋषय आयुष्मान्तस्ते व्रतैरायुष्मन्तस्तेन० ॥६॥
ओं पितर आयुष्मान्तस्ते स्वधाभिरायुष्मन्तस्तेन० ॥७॥
ओं यज्ञ आयुष्मान्स दक्षिणाभिरायुष्माँस्तेन० ॥८॥
ओं समुद्र आयुष्मान्स स्त्रवन्तीभिरायुष्माँस्तेन
त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि ॥९॥
- यहाँ पूर्व मन्त्र का शेष भाग (त्वा) इत्यादि उत्तर मन्त्रों के पश्चात्
बोले।
६८ संस्कारविधिः
इन नव मन्त्रों का जप करे। इसी प्रकार बाएँ कान पर
मुख धर ये ही नव मन्त्र पुनः जपे।
इसके पीछे बालक के कन्धों पर कोमल स्पर्श से, अर्थात्
बालक के स्कन्धों पर हाथ का बोझ न पड़े, इस प्रकार हाथ
धरके निम्नलिखित मन्त्र बोले—
ओम् इन्द्र॒ श्रेष्ठा॑नि॒ द्रवि॑णानि धेहि॒ चित्तिं॒ दक्ष॑स्य
सुभ॒गत्वम॒स्मे। पोषं॑ रयी॒णामरि॑ष्टिं तनू॒नां स्वा॒द्मानं॑ वा॒चः
सु॑दि॒नत्वमह्ना॑म्॥ १ ॥
अ॒स्मे प्र य॑न्धि मघवन्नृजीषि॒न्निन्द्र॑ रा॒यो वि॒श्ववा॑रस्य॒ भूरैः।
अ॒स्मे श॒तं श॒रदो॑ जी॒वसे॑ धा अ॒स्मे वी॒राञ्छश्व॑त इन्द्र
शिप्रिन्॥ २ ॥
ओम् अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव।
वेदो वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्॥ ३॥
इन तीन मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात्—
ओं त्र्या॒यु॒षं ज॒मद॑ग्नेः क॒श्यप॑स्य त्र्यायु॒षम्।
यद्दे॒वेषु॑ त्र्यायु॒षं तन्नो॑ऽअस्तु त्र्यायु॒षम्॥
इस मन्त्र का तीन बार जप करे।
तत्पश्चात् बालक के स्कन्धों पर से हाथ उठा ले और
जिस जगह पर बालक का जन्म हुआ हो वहाँ जाके—
ओं वेद ते भूमि हृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्।
वेदाहं तन्मां तद्विद्यात् पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः
शतँः शृणुयाम शरदः शतम्॥ १ ॥
इस मन्त्र का जप करे। तथा—
जातकर्मप्रकरणम् ६९
यत्ते सुसीमे हृदयꣳ हितमन्तः प्रजापतौ।
वेदाहं मन्ये तद् ब्रह्म माहं पौत्रमघं निगाम्॥२॥
यत् पृथिव्या अनामृतं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्।
वेदामृतस्याहं नाम माहं पौत्रमघꣳ रिषम्॥३॥
इन्द्राग्नी शर्म यच्छतं प्रजायै मे प्रजापतिः।
यथायं न प्रमीयते पुत्रो जनित्र्या अधि॥४॥
यददश्चन्द्रमसि कृष्णं पृथिव्या हृदयꣳ श्रितम्।
तदहं विद्वाꣳस्तत् पश्यन्माहं पौत्रमघꣳ रुदम्॥५॥
इन मन्त्रों को पढ़ता हुआ सुगन्धित जल से प्रसूता के शरीर
का मार्जन करे।
कोऽसि कतमोऽस्येषोऽस्यमृतोऽसि ।
आहस्पत्यं मासं प्रविशासौ ॥६॥
स त्वाह्ने परिददात्वहस्त्वा रात्र्यै परिददातु रात्रिस्त्वा-
होरात्राभ्यां परिददात्वहोरात्रौ त्वाईमासेभ्यः परि-
दत्तामर्द्धमासास्त्वा मासेभ्यः परिददतु मासास्त्वृतुभ्यः
परिददत्वृतवस्त्वा संवत्सराय परिददतु संवत्सर-
स्त्वायुषे जरायै परिददात्वसौ ॥७॥
इन मन्त्रों को पढ़के बालक को आशीर्वाद देवे। पुनः—
अङ्गादङ्गात् सꣳस्रवसि हृदयादधिजायसे।
प्राणं ते प्राणेन सन्दधामि जीव मे यावदायुषम्॥८॥
अङ्गादङ्गात् संभवसि हृदयादधिजायसे।
वेदो वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्॥९॥
अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमस्तृतं भव।
आत्माऽसि पुत्र मा मृथाः स जीव शरदः शतम्॥१०॥
पशूनां त्वा हिङ्कारेणाभिजिघ्राम्यसौ ॥११॥
७० संस्कारविधिः
इन मन्त्रों को पढ़के पुत्र के शिर का आघ्राण करे अर्थात्
सूंघे। इसी प्रकार जब-जब परदेश से आवे वा जावे, तब-
तब भी इस क्रिया को करे, जिससे पुत्र और पिता-माता में
अति प्रेम बढ़े।
ओम् इडासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनथाः।
सा त्वं वीरवती भव याऽस्मान्वीरवतोऽकरत्॥
इस मन्त्र से ईश्वर की प्रार्थना करके, प्रसूता स्त्री को प्रसन्न
करके, पश्चात् स्त्री के दोनों स्तन किञ्चित् उष्ण, सुगन्धित
जल से प्रक्षालन कर पोंछके—
ओम् इमथँ स्तन॒मूर्ज॑स्वन्तं धया॒पां प्रपी॑नमग्ने स॒रि॒रस्य॒ मध्यें।
उत्सं॑ जुषस्व॒ मधु॑मन्तमर्वन्त्समु॒द्रिय॒थँ सद॑न॒मा वि॑शस्व॥
इस मन्त्र को पढ़के दक्षिण स्तन प्रथम बालक के मुख
में देवे। इसके पश्चात्—
ओं यस्ते॒ स्तन॑: शश॒यो यो म॑यो॒भूर्यो र॑त्न॒धा व॑सु॒विद्यः सु॒दत्र॑:।
येन॒ विश्वा॒ पुष्य॑सि॒ वार्या॑णि॒ सर॑स्वति॒ तमि॒ह धात॑वे कः॥
इस मन्त्र को पढ़के वाम स्तन बालक के मुख में देवे।
तत्पश्चात्—
ओम् आपो देवेषु जाग्रथ यथा देवेषु जाग्रथ।
एवमस्याथँ सूतिकायाथँ सपुत्रिकायां जाग्रथ॥
इस मन्त्र से प्रसूता स्त्री के शिर की ओर एक कलश
जल से पूर्ण भरके दश रात्रि तक वहीं धर रक्खे तथा प्रसूता
स्त्री प्रसूत-स्थान में दश दिन तक रहे। वहाँ नित्य सायं और
प्रातःकाल सन्धिवेला में निम्नलिखित दो मन्त्रों से भात और
सरसों मिलाके दश दिन तक बराबर आहुतियाँ देवे—
जातकर्मप्रकरणम् ७१
ओम् शण्डामर्का उपवीरः शौण्डिकेय उलूखलः।
मलिम्लुचो द्रोणासश्च्यवनो नश्यतादितः स्वाहा॥ इदं
शण्डामर्काभ्यामुपवीराय शौण्डिकेयायोलूखलाय मलि-
म्लुचाय द्रोणेभ्यश्च्यवनाय—इदन्न मम॥१॥
ओम् आलिखन्ननिमिषः किंवदन्त उपश्रुतिर्हर्यक्षः कुम्भी-
शत्रुः पात्रपाणिर्नृमणिर्हन्त्रीमुखः सर्षपारुणश्च्यवनो
नश्यतादितः स्वाहा॥ इदमालिखतेऽनिमिषाय किंवदन्द्या
उपश्रुतये हर्यक्षाय कुम्भीशत्रवे पात्रपाणये नृमणये
हन्त्रीमुखाय सर्षपारुणाय च्यवनाय—इदन्न मम॥२॥
इन मन्त्रों से १० दिन तक होम करके पश्चात् अच्छे-
अच्छे विद्वान्, धार्मिक, वैदिक मत वाले बाहर खड़े रहकर और
बालक का पिता भीतर रहकर आशीर्वादरूपी नीचे लिखे मन्त्रों
का पाठ आनन्दित होके करें—
मा नौ॑ हासिषु॒र्ऋष॑यो॒ दैव्या॒ ये त॑नू॒पा ये न॑स्त॒न्वऽस्तनू॒जाः।
अम॑र्त्या॒ मर्त्या॑ँअ॒भि नः॒ सच॑ध्व॒मायु॑र्धत्त॒ प्रतरं॒ जीव॑सै नः॥१॥
—अथर्व० कां० ६। अनु० ४। सू० ४१॥
इ॒मं जी॒वेभ्यः॑ परि॒धिं द॑धामि॒ मैषां॒ नु गा॒दप॑रो॒ अर्थ॑मे॒तम्।
श॒तं जीव॑न्तः श॒रदः॑ पु॒रूची॒स्तिरो मृ॒त्युं द॑धतां॒ पर्व॑तेन॥२॥
—अथर्व० कां० १२। अनु० २। मं० २३॥
वि॒स्वाँन्नो॒ अभ॑यं कृणोतु॒ यः सु॒त्रामा॑ जी॒रदा॑नुः सु॒दानु॑ः।
इ॒हेमे वी॒रा ब॒हवो॑ भवन्तु॒ गोम॒दश्व॑व॒न्मय्य॑स्तु पु॒ष्टम्॥३॥
—अथर्व० कां० १८। अनु० ३। मं० ६१॥
॥ इति जातकर्मसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
२. नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म व कर्णवेध संस्कार
अथ नामकरणसंस्कारविधिं
वक्ष्यामः
अत्र प्रमाणम्—नाम चास्मै दद्युः ॥ १ ॥
घोषवदाद्यन्तरन्तःस्थमभिनिष्ठानान्तं द्व्यक्षरम् ॥ २ ॥
चतुरक्षरं वा ॥ ३ ॥
द्व्यक्षरं प्रतिष्ठाकामश्चतुरक्षरं ब्रह्मवर्चसकामः ॥ ४ ॥
युग्मानि त्वेव पुंसाम् ॥ ५ ॥
अयुजानि स्त्रीणाम् ॥ ६ ॥
अभिवादनीय च समीक्षेत तन्मातापितरौ
विदध्यातामोपनयनात् ॥ ७ ॥
—इत्याश्वलायनगृह्यसूत्रेषु ॥
दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति—द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा
घोषवदाद्यन्तरन्तःस्थं दीर्घाभिनिष्ठानान्तं कृतं कुर्यान्न
तद्धितम्, अयुजाक्षरमाकारान्तञ्च स्त्रियै। शर्म ब्राह्मणस्य
वर्म क्षत्रियस्य गुप्तेति वैश्यस्य ॥
इसी प्रकार गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्र में भी लिखा है ॥
अर्थात् जन्मे हुए बालक का सुन्दर नाम धरे।
नामकरण का काल—जिस दिन जन्म हो उस दिन से
लेके १० दिन छोड़ ग्यारहवें वा एक सौ एकवें अथवा दूसरे
वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो, नाम धरे।
नामकरणप्रकरणम् ७३
जिस दिन नाम धरना हो उस दिन अति प्रसन्नता से इष्ट-
मित्र, हितैषी लोगों को बुला यथावत् सत्कार कर क्रिया का
आरम्भ यजमान—बालक का पिता और ऋत्विज् करें।
पुनः पृष्ठ ९-३४ में लिखे प्रमाणे सब मनुष्य ईश्वरोपासना,
स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण और सामान्य प्रकरणस्थ सम्पूर्ण
विधि करके आधारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति
चार और पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे (त्वन्नो अग्ने०) इत्यादि
आठ मन्त्रों से आठ आहुति, अर्थात् सब मिलाके १६ घृताहुति
करें।
तपश्चात् बालक को शुद्ध जल से स्नान करा, शुद्ध वस्त्र
पहनाके उसकी माता कुण्ड के समीप बालक के पिता के पीछे
से आ दक्षिणभाग में होकर बालक का मस्तक उत्तर दिशा में
रखके बालक के पिता के हाथ में देवे और स्त्री पुनः उसी
प्रकार पति के पीछे होकर उत्तरभाग में पूर्वाभिमुख बैठे।
तत्पश्चात् पिता उस बालक को उत्तर में शिर और दक्षिण में
पग करके अपनी पत्नी को देवे। पश्चात् जो उसी संस्कार के
लिए कर्त्तव्य हो, उस प्रथम प्रधानहोम को करे। पूर्वोक्त प्रकार
घृत और सब शाकल्य सिद्ध कर रक्खे। उसमें से प्रथम घी
का चमचा भरके—
ओम् प्रजापतये स्वाहा॥
इस मन्त्र से एक आहुति देकर पीछे जिस तिथि, जिस
नक्षत्र में बालक का जन्म हुआ हो उस तिथि और उस नक्षत्र
का नाम लेके उस तिथि और उस नक्षत्र के देवता के नाम
से चार आहुति देनी, अर्थात् एक तिथि, दूसरी तिथि के देवता,
तीसरी नक्षत्र और चौथी नक्षत्र के देवता के नाम से, अर्थात्
तिथि, नक्षत्र और उनके देवताओं के नाम के अन्त में चतुर्थी
विभक्ति का रूप और स्वाहान्त बोलके चार घी की आहुति
देवे। जैसे किसी का जन्म प्रतिपदा और अश्विनी नक्षत्र में