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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

जातकर्मप्रकरणम् ६५
आँख आदि में से मल को शीघ्र दूर कर कोमल वस्त्र से पोंछ,
शुद्ध कर पिता के गोद में बालक को देवें। पिता जहाँ वायु
और शीत का प्रवेश न हो, वहाँ बैठके एक बीताभर नाड़ी को
छोड़, ऊपर सूत से बाँधके उस बन्धन के ऊपर से नाड़ीछेदन
करके किञ्चित् उष्ण जल से बालक को स्नान करा, शुद्ध वस्त्र
से पोंछ, नवीन शुद्ध वस्त्र पहिना जो प्रसूता-घर के बाहर पूर्वोक्त
प्रकार कुण्ड कर रखा हो अथवा तांबे के कुण्ड में समिधा
पूर्वलिखित प्रमाणे चयन कर पूर्वोक्त सामान्यविध्युक्त पृष्ठ ३०-
३२ में कहे प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधान करके, अग्नि को
प्रदीप्त करके सुगन्धित घृतादि वेदी के पास रखके, हाथ-पग
धोके एक पीठासन अर्थात् शुभासन पुरोहित* के लिए कुण्ड
के दक्षिण भाग में रक्खे, वह उसपर उत्तराभिमुख बैठे और
यजमान अर्थात् बालक का पिता हाथ-पग धोके वेदी के पश्चिम
भाग में आसन बिछा, उसपर उपवस्त्र ओढ़के पूर्वाभिमुख बैठे
तथा सब सामग्री अपने और पुरोहित के पास रखके पुरोहित
पद के स्वीकार के लिए बोले—
ओ३म् आ वसोः सदने सीद॥
तत्पश्चात् पुरोहित—ओ३म् सीदामि॥
बोलके आसन पर बैठके, पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाणे अयं
त इध्म० आदि चार मन्त्रों से वेदी में चन्दन की समिदाधान
करे और प्रदीप्त समिधा पर पूर्वोक्त सिद्ध किये घी की पृष्ठ
३३-३४ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार और
व्याहृति आहुति चार दोनों मिलके आठ आज्याहुति देनी।
तत्पश्चात्—

  • धर्मात्मा, शास्त्रोक्त विधि का पूर्णरीति से जाननेहारा, विद्वान्, सद्धर्मी,
    कुलीन, निर्व्यसनी, सुशील, वेदप्रिय, पूजनीय, सर्वोपकारी गृहस्थ
    की पुरोहित संज्ञा है।