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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 318 में से

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पृष्ठ 66

६२ संस्कारविधिः
ओं रा॒काम॒हꣳ सु॒हवांꣳ सु॒ष्टुती हु॑वे शृ॒णोतु॑ नः सु॒भगा॒ बोध॑तु॒
त्मना॑। सीव्य॒त्वप॑ः सू॒च्याच्छिद्य॑मानया ददा॑तु वी॒रꣳ
श॒तदा॑युमु॒ख्यम्॥५॥
ओं यास्ते॑ राके सु॒मतय॑ः सु॒पेश॑सो॒ याभि॒र्ददा॑सि दा॒शुषे
वसू॑नि। ताभि॑र्नो अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒पाग॑हि सहस्रपो॒षं सु॑भगे॒
ररा॑णा॒॥६॥
किं पश्यसि प्रजां पशून्त्सौभाग्यं मह्यं दीर्घायुष्ट्वं पत्युः ॥७॥
इन मन्त्रों को पढ़के पति अपने हाथ से स्वपत्नी के केशों
में सुगन्धित तेल डाल, कंघे से सुधार, हाथ में उदुम्बर अथवा
अर्जुन वृक्ष की शलाका वा कुशा की मृदु छीपी वा शाही पशु
के काँटे से अपनी पत्नी के केशों को स्वच्छ कर पट्टी निकाल
और पीछे की ओर जूड़ा सुन्दर बाँधकर यज्ञशाला में आवें।
उस समय वीणा आदि बाजे बजवावें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३६-
३७ में लिखे प्रमाणे सामवेद का गान करें। पश्चात्—
ओम् सोम एव नो राजेमा मानुषीः प्रजाः।
अविमुक्तचक्र आसीरंस्तीरे तुभ्यम् असौ*॥
आरम्भ में इस मन्त्र का गान करके, पश्चात् अन्य मन्त्रों
का गान करें।
तत्पश्चात् पूर्व आहुतियों के देने से बची हुई खिचड़ी में
पुष्कल घृत डालके गर्भिणी स्त्री अपना प्रतिबिम्ब उस घी में
देखे। उस समय पति स्त्री से पूछे—‘किं पश्यसि’? स्त्री उत्तर
देवे—‘‘प्रजां पश्यामि’’।
तत्पश्चात् एकान्त में वृद्ध, कुलीन, सौभाग्यवती, पुत्रवती,

  • यहाँ किसी नदी का नामोच्चारण करें।