संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 61, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुंसवनप्रकरणम् ५७
( ओं प्रजापतये स्वाहा ), पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे ( ओं यदस्य
कर्मणो० ) दो आहुति देकर नीचे लिखे हुए दोनों मन्त्रों से
दो आहुति घृत की देवें—
ओम् आ ते गर्भो योनिमेतु पुमान् बाण इवेषुधिम्।
आ वीरो जायतां पुत्रस्ते दशमास्यः स्वाहा ॥ १ ॥
ओम् अग्निर्हैतु प्रथमो देवतानां सोऽस्यै प्रजां मुञ्चतु मृत्यु-
पाशात् । तदयं राजा वरुणोऽनुमन्यतां यथेयं स्त्री पौत्रमघं न
रोदात् स्वाहा ॥ २ ॥
इन दोनों मन्त्रों को बोलके दो आहुति किये पश्चात् एकान्त
में पत्नी के हृदय पर हाथ धरके यह निम्नलिखित मन्त्र पति
बोले—
ओम् यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ।
मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं माहं पौत्रमघं नियाम् ॥
तत्पश्चात् पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामवेद का
महावामदेव्यगान गाके जो-जो पुरुष वा स्त्री संस्कार-समय पर
आये हों, उनको विदा कर दे।
पुनः वटवृक्ष के कोमल कूपल और गिलोय को महीन
बाँट, कपड़े में छान, गर्भिणी स्त्री के दक्षिण नासापुट में सुँघावे।
तत्पश्चात्—
हिर॒ण्य॒ग॒र्भः सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ भूतस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ऽआसीत्।
स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ १ ॥
—यजुः० अ० १३। मं० ४॥
अ॒द्भ्यः सम्भृ॑तः पृथि॒व्यै रसा॑च्च वि॒श्वक॑र्मणः॒ सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ ।
तस्य॑ त्वष्टा॑ वि॒दध॑द्रू॒पमे॑ति॒ तन्मर्त्य॑स्य दे॒वत्वमा॒जान॒मग्रे॑ ॥ २ ॥
—यजुः० अ० ३१। मं० १७॥