संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 65, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंसीमन्तोन्नयनप्रकरणम् ६१
यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ह्युत्ता॑ना॒ गर्भ॑मा द॒धे।
ए॒वं तं गर्भ॑मा धेहि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे॒ स्वाहा॑ ॥ ६ ॥
विष्णो॒ः श्रेष्ठेन रू॒पेणा॒स्यां नार्या॑ गवी॒न्याम्।
पुमां॑सं पु॒त्राना धे॑हि दश॒मे मा॒सि सूत॑वे॒ स्वाहा॑ ॥ ७ ॥
इन सात मन्त्रों से खिचड़ी की सात आहुति देके, पुनः
(भूर्भुवः स्वः। प्रजापते न त्व०) पृष्ठ ३४ में लिखित इससे
एक, सब मिलाके आठ आहुति देवें और पृष्ठ ३३ में लिखे
प्रमाणे (ओं प्रजापतये०) मन्त्र से एक भात की और पृष्ठ ३३
में लिखे प्रमाणे (ओं यदस्य कर्मणो०) मन्त्र से एक खिचड़ी
की आहुति देवें। तत्पश्चात् (ओं त्वन्नो अग्ने०) पृष्ठ ३४-३५
में लिखे प्रमाणे आठ घृत की आहुति और (ओं भूरग्नये०)
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे चार, व्याहृतिमन्त्रों से चार आज्याहुति
देकर पति और पत्नी एकान्त में जाके उत्तमासन पर बैठ पति
पत्नी के पश्चात्=पृष्ठ की ओर बैठ—
ओम् सु॒मि॒त्रिया न॒ऽआप॒ऽओष॑धयः सन्तु
दुर्मि॒त्रिया॑स्तस्मै॑ सन्तु यो॒ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यञ्च॑ व॒यं द्वि॒ष्मः ॥ १ ॥
—य० अ० ६ । मं० २२ ॥
मू॒र्द्धानं॑ दि॒वोऽअ॑र॒तिं पृ॑थि॒व्या वै॑श्वान॒रमृ॒तऽआ जा॒तम॒ग्निम्।
क॒विं स॒म्राज॒मति॑थिं॒ जना॑नामा॒सन्ना पात्रं॑ जनयन्त
दे॒वाः ॥ २ ॥ —य० अ० ७ । मं० २४॥
ओम् अयमूर्जावतो वृक्ष ऊर्जीव फलिनी भव।
पर्णं वनस्पतेऽनु त्वाऽनु त्वा सूयताँश्चरयिः ॥ ३ ॥
ओं येनादितेः सीमानं नयति प्रजापतिर्महते सौभगाय।
तेनाहमस्यै सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि ॥ ४ ॥