संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
९२ संस्कारविधिः
भूख लगे, तब-तब तीनों वर्णों के लड़के इन तीनों पदार्थों ही
का सेवन करें, अन्य पदार्थ कुछ न खावें-पीवें।
विधिः—अब जिस दिन उपनयन करना हो, उसके पूर्व
दिन में सब सामग्री इकट्ठी कर याथातथ्य शोधन आदि कर
‘लेवे और उस दिन पृष्ठ ९-२८वें तक कुण्ड के समीप सब
सामग्री धर, प्रातःकाल बालक का क्षौर करा, शुद्ध जल से
स्नान करावे। उत्तम वस्त्र पहना, यज्ञमण्डप में पिता वा आचार्य
बालक को मिष्टान्नादि का भोजन कराके वेदी के पश्चिमभाग
में सुन्दर आसन पर पूर्वाभिमुख बैठावे। बालक का पिता और
पृष्ठ २८-२९ में लिखे प्रमाणे ऋत्विज् लोग भी पूर्वोक्त प्रकार
अपने-अपने आसन पर बैठ, यथावत् आचमनादि क्रिया करें।
पश्चात् कार्यकर्त्ता बालक के मुख से—
ब्रह्मचर्य्यमागाम्, ब्रह्मचार्य्यसानि ॥
ये वचन बुलवाके आचार्य*—
ओं येनेन्द्राय बृहस्पतिर्वासः पर्यदधादमृतम्।
तेन त्वा परिदधाम्यायुषे दीर्घायुत्वाय बलाय वर्चसे ॥
इस मन्त्र को बोलके बालक को सुन्दर वस्त्र और उपवस्त्र
पहनावे। पश्चात् बालक आचार्य के सम्मुख बैठे और यज्ञोपवीत
हाथ में लेके—
ओं यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ १ ॥
- ‘आचार्य’ उसको कहते हैं कि जो साङ्गोपाङ्ग वेदों के शब्द, अर्थ,
सम्बन्ध और क्रिया का जाननेहारा, छल, कपटरहित, अतिप्रेम
से सबको विद्या का दाता, परोपकारी तन, मन और धन से सबको
सुख बढ़ाने में तत्पर, महाशय, पक्षपात किसी का न करे और
सत्योपदेष्टा, सबका हितैषी, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय होवे।
उपनयनप्रकरणम् ९३
यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि ॥ २ ॥
इन मन्त्रों को बोलके आचार्य बायें स्कन्धे के ऊपर कण्ठ
के पास से शिर बीच में निकाल, दाहिने हाथ के नीचे बग़ल
में निकाल कटि तक धारण करावे। तत्पश्चात् बालक को अपने
दाहिने ओर साथ बैठाके ईश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन
और शान्तिकरण का पाठ करके समिदाधान, अग्न्याधान कर
(ओम् अदितेऽनुमन्यस्व०) इत्यादि पूर्वोक्त चार मन्त्रों से पूर्वोक्त
रीति से कुण्ड के चारों ओर जल छिटका, पश्चात् आज्याहुति
करने का आरम्भ करना।
वेदी में प्रदीप्त हुई समिधा को लक्ष में धर, चमसा में
आज्यस्थाली से घी ले, आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति
आहुति चार तथा पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे आज्याहुति आठ,
तीनों मिलके सोलह घृत की आहुति देके, पश्चात् बालक के
हाथ से प्रधानहोम, जो विशेष शाकल्य बनाया हो, उसकी
आहुतियाँ निम्नलिखित मन्त्रों से दिलानी—(ओं भूर्भुवः स्वः।
अग्न आयूंषि०) पृष्ठ ३४ में लिखे प्रमाणे चार आज्याहुति देवें।
तत्पश्चात्—
ओम् अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तत्ते प्रब्रवीमि तच्छकेयम्।
तेनर्ध्यासमिदमहमनृतात् सत्यमुपैमि स्वाहा ॥
इदमग्नये—इदन्न मम ॥ १ ॥
ओं वायो व्रतपते० * स्वाहा ॥ इदं वायवे—इदन्न मम ॥ २ ॥
ओम् सूर्य व्रतपते० स्वाहा ॥ इदं सूर्याय—इदन्न मम ॥ ३ ॥
ओम् चन्द्र व्रतपते० स्वाहा ॥ इदं चन्द्राय—इदन्न मम ॥ ४ ॥
ओम् व्रतानां व्रतपते० स्वाहा ॥
इदमिन्द्राय व्रतपतये—इदन्न मम ॥ ५ ॥
- इसके आगे 'व्रतं चरिष्यामि' इत्यादि सम्पूर्ण मन्त्र बोलना चाहिए।
९४ संस्कारविधिः
इन पाँच मन्त्रों से पाँच आज्याहुति दिलानी। उसके पीछे
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३३
में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् आहुति एक और पृष्ठ ३३ में लिखे
प्रमाणे प्राजापत्याहुति एक, ये सब मिलके छह घृत की आहुति
देनी। सब मिलके पन्द्रह आहुति बालक के हाथ से दिलानी।
उसके पश्चात् आचार्य यज्ञकुण्ड के उत्तर की ओर
पूर्वाभिमुख बैठे और बालक आचार्य के सम्मुख पश्चिम में
मुख करके बैठे। तत्पश्चात् आचार्य बालक की ओर देखके—
ओम् आगन्त्रा समगन्महि प्र सुमर्त्य युयोतन।
अरिष्टाः संचरेमहि स्वस्ति चरतादयम्॥ १॥
इस मन्त्र का जप करे।
माणवकवाक्यम्—‘‘ओं ब्रह्मचर्यमागामुप मा नयस्व’’।
आचार्योक्तिः—‘‘को नामासि¹?’’
बालकोक्तिः—‘‘एतन्नामास्मि²।’’
तत्पश्चात्—
ओम् आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ऽ ऊ॒र्जे द॑धातन।
म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥ १॥
यो वः॑ शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह नः॑।
उ॒श॒तीरि॑व मा॒तरः॑॥ २॥
तस्मा॒ऽ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ।
आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥ ३॥
इन तीन मन्त्रों को पढ़के बटुक की दक्षिण हस्ताञ्जलि
१. तेरा नाम क्या है, ऐसा पूछना।
२. मेरा यह नाम है।
उपनयनप्रकरणम् ९५
शुद्धोदक से भरनी।
तत्पश्चात् आचार्य अपनी हस्ताञ्जलि भरके—
ओँ तत्स॑वि॒तुर्वृ॑णीमहे व॒यं दे॒वस्य॑ भोर्ज॒नम्।
श्रेष्ठं॑ स॒र्व॒धात॑मं तुरं॒ भग॑स्य धीमहि॥४॥
इस मन्त्र को पढ़के आचार्य अपनी अञ्जलि का जल
बालक की अञ्जलि में छोड़के, बालक की हस्ताञ्जलि
अङ्गुष्ठसहित पकड़के—
ओम् देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो
हस्ताभ्यां हस्तं गृह्णाम्यसौ*।
इस मन्त्र को पढ़के बालक की हस्ताञ्जलि का जल नीचे
पात्र में छुड़ा देना। इसी प्रकार दूसरी बार, अर्थात् प्रथम आचार्य
अपनी अञ्जलि भर, बालक की अञ्जलि में अपनी अञ्जलि
का जल भरके, अङ्गुष्ठसहित हाथ पकड़के—
ओँ सविता ते हस्तमग्रभीत्, असौ॥
इस मन्त्र से पात्र में छुड़वा दे। पुनः इसी प्रकार तीसरी
बार आचार्य अपने हाथ में जल भर, पुनः बालक की अञ्जलि
में भर, अङ्गुष्ठसहित हाथ पकड़के—
ओम् अग्निराचार्यस्तव, असौ॥
तीसरी बार बालक की अञ्जलि का जल छुड़वाके, बाहर
निकल सूर्य के सामने खड़े रह उसे देखके आचार्य—
ओँ देव सवितरेष ते ब्रह्मचारी तं गोपाय स मामृत॥
इस एक और पृष्ठ ७९ में लिखे प्रमाणे (तच्चक्षुर्देवहितम्०)
इस दूसरे मन्त्र को पढ़के बालक को सूर्यावलोकन करा,
- 'असौ' इस पद के स्थान में बालक का सम्बोधनान्त नामोच्चारण
सर्वत्र करना चाहिए।
९६ संस्कारविधिः
बालकसहित आचार्य सभामण्डप में आ, यज्ञकुण्ड की उत्तरबाजू
की ओर बैठके—
ओं युवा॑ सु॒वासा॒ परिवी॑त॒ आगा॒त् स उ॒ श्रेया॑न् भवति॒
जाय॑मानः॥
इस तथा—
ओं सूर्यस्यावृतमन्वावर्त्तस्व, असौ*॥
इस मन्त्र को पढ़े और बालक आचार्य की प्रदक्षिणा करके
आचार्य के सम्मुख बैठे। पश्चात् आचार्य बालक के दक्षिण
स्कन्धे पर अपने हाथ से स्पर्श और पश्चात् अपने हाथ को
वस्त्र से आच्छादित करके—
ओं प्राणानां ग्रन्थिरसि मा विस्रसोऽन्तक इदं ते परि-
ददामि, अमुम्॥ १॥
इस मन्त्र को बोलने के पश्चात्—
ओं अहुर इदं ते परिददामि, अमुम्॥ २॥
इस मन्त्र से उदर पर। और—
ओं कृशन इदं ते परिददामि, अमुम्॥ ३॥
इस मन्त्र से हृदय।
ओं प्रजापतये त्वा परिददामि, असौ॥ ४॥
इस मन्त्र को बोलके दक्षिण स्कन्ध, और—
ओं देवाय त्वा सवित्रे परिददामि, असौ॥ ५॥
इस मन्त्र को बोलके वाम हाथ से बायें स्कन्ध पर स्पर्श
करके, बालक के हृदय पर हाथ धरके—
ओं तं धीरासः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो३ मनसा
देवयन्तः॥ ६॥
इस मन्त्र को बोलके आचार्य संम्मुख रहकर बालक के
- ‘असौ’ और ‘अमुम्’ इन दोनों पदों के स्थान में सर्वत्र बालक
का नामोच्चारण करना चाहिए।
उपनयनप्रकरणम् ९७
दक्षिण हृदय पर अपना हाथ रखके—
ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु।
मम वाचमेकमना जुषस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥
आचार्य इस प्रतिज्ञामन्त्र को बोले।
अर्थात् ‘हे शिष्य बालक! तेरे हृदय को मैं अपने अधीन
करता हूँ। तेरा चित्त मेरे चित्त के अनुकूल सदा रहे .और तू
मेरी वाणी को एकाग्र मन हो प्रीति से सुनकर उसके अर्थ का
सेवन किया कर और आज से तेरी प्रतिज्ञा के अनुकूल बृहस्पति
परमात्मा तुझको मुझसे युक्त करे’। यह प्रतिज्ञा करावे।
इसी प्रकार शिष्य भी आचार्य से प्रतिज्ञा करावे कि—
‘हे आचार्य ! आपके हृदय को मैं अपनी उत्तम शिक्षा और विद्या
की उन्नति में धारण करता हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल आपका
चित्त सदा रहे। आप मेरी वाणी को एकाग्र होके सुनिए और
परमात्मा मेरे लिए आपको सदा नियुक्त रक्खे’।
इस प्रकार दोनों प्रतिज्ञा करके—
आचार्योक्तिः—को नामाऽसि ?
तेरा नाम क्या है?
बालकोक्तिः—[ असौ ] अहम्भोः।
मेरा अमुक नाम है। ऐसा उत्तर देवे।
आचार्यः—कस्य ब्रह्मचार्यसि?
तू किसका ब्रह्मचारी है?
बालकः—भवतः।
आपका।
आचार्य बालक की रक्षा के लिए—
इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्यग्निराचार्यस्तवाहमाचार्यस्तव असौ*॥
- ‘असौ’ इस पद के स्थान में सर्वत्र बालक का नामोच्चारण करना
चाहिए।
९८ संस्कारविधिः
इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात्—
ओं कस्य ब्रह्मचार्यसि प्राणस्य ब्रह्मचार्यसि कस्त्वा
कमुपनयते काय त्वा परिददामि ॥ १ ॥
ओं प्रजापतये त्वा परिददामि। देवाय त्वा सवित्रे
परिददामि। अद्भ्यस्त्वौषधीभ्यः परिददामि। द्यावापृथिवीभ्यां
त्वा परिददामि। विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः परिददामि। सर्वेभ्यस्त्वा
भूतेभ्यः परिद्दाम्यरिष्ट्यै ॥ २ ॥
इन मन्त्रों को बोल बालक को शिक्षा करे कि—'तू प्राण आदि
की विद्या के लिए यत्नवान् हो'।
यह उपनयन-संस्कार पूरा हुए पश्चात् यदि उसी दिन
वेदारम्भ करने का विचार पिता और आचार्य का हो तो उसी
दिन करना और जो दूसरे दिन का विचार हो तो पृष्ठ ३६-
३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करके संस्कार में आई
हुई स्त्रियों का बालक की माता और पुरुषों का बालक का
पिता सत्कार करके विदा करे और माता-पिता, आचार्य,
सम्बन्धी, इष्ट, मित्र सब मिलके—
'ओं त्वं जीव शरदः शतं वर्द्धमानः, आयुष्मान् तेजस्वी
वर्चस्वी भूयाः ॥'
इस प्रकार आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को सिधारें ॥
॥ इत्युपनयनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
( 11 )
अथं वेदारम्भसंस्कारविधिर्विधीयते
'वेदारम्भ' उसे कहते हैं—'जो गायत्रीमन्त्र से लेके
साङ्गोपाङ्ग* चारों वेदों के अध्ययन करने के लिए नियम धारण
करना होता है।
समय:—जो दिन उपनयन-संस्कार का है, वही वेदारम्भ
का है। यदि उस दिवस में न हो सके अथवा करने की इच्छा
न हो तो दूसरे दिन करे। यदि दूसरा दिन भी अनुकूल न हो
तो एक वर्ष के भीतर किसी दिन करे।
विधि:—जो वेदारम्भ का दिन ठहराया हो, उस दिन
प्रातःकाल शुद्धोदक से स्नान कराके, शुद्ध वस्त्र पहिना, पश्चात्
कार्यकर्त्ता अर्थात् पिता, यदि पिता न हो तो आचार्य बालक
को लेके उत्तमासन पर वेदी के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठे।
तत्पश्चात् पृष्ठ ९-२१ तक ईश्वरस्तुति**, प्रार्थनोपासना,
स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण करके, पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे
( भूर्भुवः स्वः ) इस मन्त्र से अग्न्याधान पृ० ३० में लिखे प्रमाणे
- अङ्ग—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष। उपाङ्ग—
पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त। उपवेद—
आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थवेद अर्थात् शिल्पशास्त्र।
ब्राह्मण—ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ। वेद—ऋक्, यजुः,
साम और अथर्व इन सबको क्रम से पढ़ें।
** जो उपनयन किये पश्चात् उसी दिन वेदारम्भ करे, उसको पुनः
वेदारम्भ के आदि में ईश्वरस्तुति, प्रार्थनोपासना और स्वस्तिवाचन,
शान्तिकरण् करना आवश्यक नहीं।
१००
संस्कारविधिः
( उद्बुध्य-स्वाग्ने० ) इस मन्त्र से अग्नि को प्रदीप्त करके, प्रदीप्त
समिधा पर पृष्ठ ३१ में लिखे प्रमाणे ( ओं अयन्त इध्म० ) इत्यादि
चार मन्त्रों से समिदाधान, पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे ( ओं
अदितेऽनुमन्यस्व० ) इत्यादि तीन मन्त्रों से कुण्ड के तीनों ओर
और ( ओम् देव सवितः० ) इस मन्त्र से कुण्ड के चारों ओर
जल छिटकाके, पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्य-
भागाहुति चार, व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३४-३५ में लिखे
प्रमाणे आज्याहुति आठ मिलके सोलह आज्याहुति देने के पश्चात्
प्रधान* होमाहुति दिलाके, पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे
व्याहृति आहुति चार और स्विष्टकृद् आहुति एक तथा पृष्ठ
३५ में लिखे प्रमाणे प्राजापत्याहुति एक मिलकर छह आज्याहुति
बालक के हाथ से दिलानी। तत्पश्चात्—
ओम् अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु। यथा त्वमग्ने सुश्रवः
सुश्रवा असि। एवं मां सुश्रवः सौश्रवसं कुरु। यथा त्वमग्ने
देवानां यज्ञस्य निधिपा असि। एवमहं मनुष्याणां वेदस्य
निधिपो भूयासम् ॥
इस मन्त्र से वेदी के अग्नि को इकट्ठा करना।
तत्पश्चात् बालक कुण्ड की प्रदक्षिणा करके, पृष्ठ ३२ में
लिखे प्रमाणे (अदितेऽनुमन्यस्व०) इत्यादि चार मन्त्रों से कुण्ड
के सब ओर जलसिंचन करके, बालक कुण्ड के दक्षिण की
ओर उत्तराभिमुख खड़ा रहकर, घृत में भिजोके एक समिधा
हाथ में ले—
ओम् अग्नये समिधमाहार्षं बृहते जातवेदसे। यथा त्वमग्ने
समिधा समिध्यसऽ एवमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया
पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममाचार्यो मेधाव्यहम-
- 'प्रधान होम' उसको कहते हैं, जो संस्कार में मुख्य करके किया
जाता है।
वेदारम्भप्रकरणम् १०१
सान्यनिराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयास ँ
स्वाहा ॥
इस मन्त्र से समिधा वेदीस्थ अग्नि के मध्य में छोड़ देना।
इसी प्रकार दूसरी ओर तीसरी समिधा छोड़े।
पुनः पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्ने सुश्रवः
सुश्रवसं०) इस मन्त्र से वेदीस्थ अग्नि को इकट्ठा करके पृष्ठ
३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व०) इत्यादि चार
मन्त्रों से कुण्ड के सब ओर जलसेचन करके बालक वेदी के
पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठके वेदी की अग्नि पर दोनों हाथों
को थोड़ा-सा तपाके हाथ में जल लगा—
ओं तनूपा अग्नेऽसि तन्वं मे पाहि ॥ १ ॥
ओम् आयुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि ॥ २ ॥
ओं वर्चोदा अग्नेऽसि वर्चो मे देहि ॥ ३ ॥
ओं अग्ने यन्मे तन्वाऽऊनं तन्म आपृण ॥ ४ ॥
ओं मेधां मे देवः सविता आदधातु ॥ ५ ॥
ओं मेधां मे देवी सरस्वती आदधातु ॥ ६ ॥
ओं मेधामश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करस्रजौ ॥ ७ ॥
इन सात मन्त्रों से सात बार किञ्चित् हथेली उष्ण कर
जल-स्पर्श करके मुख-स्पर्श करना। तत्पश्चात् बालक—
ओं वाक् च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से मुख।
ओं प्राणश्च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से नासिका द्वार।
ओं चक्षुश्च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से दोनों नेत्र।
ओं श्रोत्रञ्च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से दोनों कान।
ओम् यशो बलञ्च म आप्यायताम् ॥ इस मन्त्र से दोनों
बाहुओं को स्पर्श करे।
१०२ संस्कारविधिः
ओं मयि मेधां मयि प्रजां मय्यग्निस्तेजो दधातु।
मयि मेधां मयि प्रजां मयीन्द्र इन्द्रियं दधातु।
मयि मेधां मयि प्रजां मयि सूर्यो भ्राजो दधातु।
यत्ते अग्ने .तेजोस्तेनाहं तेजस्वी भूयासम्।
यत्ते अग्ने वर्चस्तेनाहं वर्चस्वी भूयासम्।
यत्ते अग्ने हरस्तेनाहं हरस्वी भूयासम्॥
इन मन्त्रों से बालक परमेश्वर का उपस्थान करके कुण्ड
की उत्तरबाजू की ओर जाके जानू को भूमि में टेकके पूर्वाभिमुख
बैठे और आचार्य बालक के सम्मुख पश्चिमाभिमुख बैठे।
बालकोक्तिः—अधीहि भो॒: सावित्रीं भो अनुब्रूहि॥
अर्थात् आचार्य से बालक कहे कि—‘हे आचार्य! प्रथम
एक ओंकार, पश्चात् तीन महाव्याहृति, तत्पश्चात् सावित्री—ये
त्रिक अर्थात् तीनों मिलके परमात्मा के वाचक मन्त्र का मुझे
उपदेश कीजिए’।
तत्पश्चात् आचार्य एक वस्त्र अपने और बालक के कन्धे
पर रखके अपने हाथ से बालक के दोनों हाथों की अंगुलियों
को पकड़के नीचे लिखे प्रमाणे बालक को तीन बार करके
गायत्री मन्त्रोपदेश करे।
प्रथम बार—
ओं भूर्भुव॒ः स्व॒ः तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यम्।
इतना टुकड़ा एक-एक पद का शुद्ध उच्चारण बालक से
कराके, दूसरी बार—
ओं भूर्भुव॒ः स्व॒ः तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑
धीमहि।
एक-एक पद से यथावत् धीरे-धीरे उच्चारण करवाके,
वेदारम्भप्रकरणम्. १०३
तीसरी बार—
ओं भूर्भुव॒: स्व॒: तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑
धीमहि। धियो॒ यो न॑: प्रचो॒दया॑त्॥
धीरे-धीरे इस मन्त्र को बुलवाके संक्षेप से इसका अर्थ
भी नीचे लिखे प्रमाणे आचार्य सुनावे—
अर्थ:—(ओ३म्) यह मुख्य परमेश्वर का नाम है, जिस
नाम के साथ अन्य सब नाम लग जाते हैं। (भू:) जो प्राण
का भी प्राण, (भुव:) सब दुःखों से छुड़ानेहारा, (स्व:) स्वयं
सुखस्वरूप और अपने उपासकों को सब सुखों की प्राप्ति
करानेहारा है, उस (सवितु:) सब जगत् की उत्पत्ति करनेवाले,
सूर्यादि प्रकाशकों के भी प्रकाशक, समग्र ऐश्वर्य के दाता,
(देवस्य) कामना करने योग्य, सर्वत्र विजय करानेहारे परमात्मा
का जो (वरेण्यम्) अतिश्रेष्ठ ग्रहण और ध्यान करने योग्य
(भर्ग:) सब क्लेशों को भस्म करनेवाला, पवित्र, शुद्ध स्वरूप
है, (तत्) उसे हम लोग (धीमहि) धारण करें। (य:) वह
परमात्मा (न:) हमारी (धिय:) बुद्धियों को उत्तम गुण-कर्म-
स्वभावों में (प्रचोदयात्) प्रेरित करे। इसी प्रयोजन के लिए
इस जगदीश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना करना और इससे भिन्न
किसी को उपास्य, इष्टदेव, उसके तुल्य वा उससे अधिक नहीं
मानना चाहिए।
इस प्रकार अर्थ सुनाये पश्चात्—
ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु।
मम वाचमेकव्रतो जुषस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥
इस मन्त्र से बालक और आचार्य पूर्ववत् दृढ़ प्रतिज्ञा
करके—
ओम् इयं दुरुक्तं परिबाधमाना वर्णं पवित्रं पुनती म आगात्।
प्राणापानाभ्यां बलमादधाना स्वसा देवी सुभगा मेखलेयम्॥
१०४ संस्कारविधिः
इस मन्त्र से आचार्य सुन्दर, चिकनी, प्रथम बनाके रक्खी
हुई मेखला* को बालक की कटि में बाँधके—
ओँ युवा॑ सु॒वासा॒ः परि॑वीत॒ आगा॒त् स उ॒ श्रेया॑न् भवति॒
जाय॑मानः। तं धीरा॑सः क॒वय॒ उन्न॑यन्ति स्वा॒ध्यो३॒ मन॑सा
दे॒वयन्तः॑॥
इस मन्त्र को बोलके दो शुद्ध कोपीन, दो अंगोछे, एक
उत्तरीय और दो कटिवस्त्र ब्रह्मचारी को आचार्य देवे और उनमें
से एक कोपीन, एक कटिवस्त्र और एक उपन्ना बालक को
आचार्य धारण करावे। तत्पश्चात् आचार्य दण्ड१ हाथ में लेके
सामने खड़ा रहे और बालक भी आचार्य के सामने हाथ जोड़—
ओं यो मे दण्डः परापतद्वैहायसोऽधिभूम्याम्।
तमहं पुनरादद आयुषे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय॥
इस मन्त्र को बोलके बालक आचार्य के हाथ से दण्ड
ले लेवे। तत्पश्चात् पिता ब्रह्मचारी को ब्रह्मचर्याश्रम का साधारण
उपदेश करे—
ब्रह्मचार्यसि असौ२ ॥ १॥ अपोऽशान॥ २॥
- ब्राह्मण को मुञ्ज वा दर्भ की, क्षत्रिय को धनुषसंज्ञक तृण वा वल्कल
की और वैश्य को ऊन वा शण की मेखला होनी चाहिए!
१. ब्राह्मण के बालक को खड़ा रख के भूमि से ललाट के केशों
तक पलाश वा बिल्व वृक्ष का, क्षत्रिय को वट वा खदिर का
ललाट भ्रू तक, वैश्य को पीलू अथवा गूलर वृक्ष का नासिक
के अग्रभाग तक दण्ड-प्रमाण है। और वे दण्ड चिकने सीधे हों,
अग्नि में जले, टेढ़े, कीड़ों के खाये हुए न हों। और एक-एक
मृगचर्म उनके बैठने के लिए, एक-एक जलपात्र, एक-एक उपपात्र
और एक-एक आचमनीय सब ब्रह्मचारियों को देना चाहिए।
२. ‘असौ’ इस पद के स्थान में ब्रह्मचारी का नाम सर्वत्र उच्चारण
करे।
वेदआरम्भप्रकरणम् १०५
कर्म कुरु ॥ ३ ॥ दिवा मा स्वाप्सीः ॥ ४ ॥ आचार्याधीनो
वेदमधीष्व ॥ ५ ॥ द्वादश वर्षाणि प्रतिवेदं ब्रह्मचर्यं गृहाण वा
ब्रह्मचर्यं चर ॥ ६ ॥ आचार्याधीनो भवान्यत्राधर्माचरणात् ॥ ७ ॥
क्रोधानृते वर्जय ॥ ८ ॥ मैथुनं वर्जय ॥ ९ ॥ उपरि शय्यां
वर्जय ॥ १० ॥ कौशीलवगन्धाञ्जनानि वर्जय ॥ ११ ॥
अत्यन्तं स्नानं भोजनं निद्रां जागरणं निन्दां लोभमोह-
भयशोकान् वर्जय ॥ १२ ॥ प्रतिदिनं रात्रेः पश्चिमे यामे
चोत्थायावश्यकं कृत्वा दन्तधावनस्नानसन्ध्योपासनेश्वर-
स्तुतिप्रार्थनोपासनायोगाभ्यासान्नित्यमाचर ॥ १३ ॥ क्षुरकृत्यं
वर्जय ॥ १४ ॥ मांसरूक्षाहारं मद्यादिपानं च वर्जय ॥ १५ ॥
गवाश्वहस्त्युष्ट्रादियानं वर्जय ॥ १६ ॥ अन्तर्ग्रामनिवासोपा-
नच्छत्रधारणं वर्जय ॥ १७ ॥ अकामतः स्वयमिन्द्रियस्पर्शेन
वीर्यस्खलनं विहाय वीर्यं शरीरे संरक्ष्योर्ध्वरेताः सततं
भव ॥ १८ ॥ तैलाभ्यङ्गमर्दनात्यम्लातितिक्तकषायक्षार-
रेचनद्रव्याणि मा सेवस्व ॥ १९ ॥ नित्यं युक्ताहारविहारवान्
विद्योपार्जने च यत्नवान् भव ॥ २० ॥ सुशीलो मितभाषी
सभ्यो भव ॥ २१ ॥ मेखलादण्डधारणभैक्ष्यचर्य्यसमिदा-
धानोदकस्पर्शनाचार्यप्रियाचरणप्रातः सायमभिवादनविद्या-
संचयजितेन्द्रियत्वादीन्येते ते नित्यधर्माः ॥ २२ ॥
अर्थः—तू आज से ब्रह्मचारी है ॥ १ ॥ नित्य सन्ध्योपासन,
भोजन के पूर्व शुद्ध जल का आचमन किया कर ॥ २ ॥ दुष्ट
कर्मों को छोड़ धर्म किया कर ॥ ३ ॥ दिन में शयन कभी मत
कर ॥ ४ ॥ आचार्य के अधीन रहके नित्य साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ने
में पुरुषार्थ किया कर ॥ ५ ॥ एक-एक साङ्गोपाङ्ग वेद के लिए
१०६ संस्कारविधिः
बारह-बारह वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्य अर्थात् ४८ वर्ष तक वा जबतक
साङ्गोपाङ्ग चारों वेद पूरे होवें, तबतक अखण्डित ब्रह्मचर्य
कर ॥ ६ ॥ आचार्य के अधीन धर्माचरण में रहा कर, परन्तु यदि
आचार्य अधर्माचरण वा अधर्म करने का उपदेश करे, उसको
तू कभी मत मान और उसका आचरण मत कर ॥ ७ ॥ क्रोध
और मिथ्याभाषण करना छोड़ दे ॥ ८ ॥ आठ* प्रकार के मैथुन
को छोड़ देना ॥ ९ ॥ भूमि में शयन करना, पलङ्ग आदि पर
कभी न सोना ॥ १० ॥ कौशीलव अर्थात् गाना, बजाना, तथा
नृत्य आदि निन्दित कर्म, गन्ध और अञ्जन का सेवन मत
कर ॥ ११ ॥ अति स्नान, अति भोजन, अधिक निद्रा, अधिक
जागरण, निन्दा, लोभ, मोह, भय, शोक का ग्रहण कभी मत
कर ॥ १२ ॥ रात्रि के चौथे प्रहर में जाग, आवश्यक शौचादि,
दन्तधावन, स्नान, सन्ध्योपासन, ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना और
उपासना, योगाभ्यास का आचरण नित्य किया कर ॥ १३ ॥ क्षौर
मत करा ॥ १४ ॥ मांस, रूखा, शुष्क, अन्न मत खा और मद्यादि
मत पी ॥ १५ ॥ बैल, घोड़ा, हाथी, ऊँट आदि की सवारी मत
कर ॥ १६ ॥ गाँव में निवास, जूता और छत्र का धारण मत
कर ॥ १७ ॥ लघुशङ्का के बिना उपस्थ इन्द्रिय के स्पर्श से
वीर्यस्खलन कभी न करके, वीर्य को शरीर में रखके निरन्तर
ऊर्ध्वरेता अर्थात् वीर्य को नीचे मत गिरने दे, इस प्रकार यत्न
से वर्ता कर ॥ १८ ॥ तैलादि से अङ्गमर्दन, उबटना, अतिखट्टा
इमली आदि, अतितीखा लालमिर्ची आदि, कसेला हरड़े आदि,
क्षार, अधिक. लवण आदि और रेचक जमालगोटा आदि द्रव्यों
क़ा सेवन मत कर ॥ १९ ॥ नित्य युक्ति से आहार-विहार करके
विद्या-ग्रहण में यत्नशील हो ॥ २० ॥ सुशील, थोड़ा बोलनेवाला,
- स्त्री का ध्यान, कथा, स्पर्श, क्रीड़ा, दर्शन, आलिङ्गन, एकान्तवास
और समागम, यह आठ प्रकार का मैथुन कहाता है, जो इनको
छोड़ देता है, वही ब्रह्मचारी होता है।
वेदारम्भप्रकरणम् १०७
सभा में बैठनेयोग्य गुण ग्रहण कर॥ २१ ॥ मेखला और दण्ड
का धारण, भिक्षाचरण, अग्निहोत्र, स्नान, सन्ध्योपासन, आचार्य
का प्रियाचरण, प्रातःसायं आचार्य को नमस्कार करना ये तेरे
नित्य करने के कर्म और जो निषेध किये वे नित्य न करने
के कर्म हैं॥ २२ ॥
जब पिता यह उपदेश कर चुके, तब बालक पिता को
नमस्कार कर, हाथ जोड़के कहे कि—'जैसा आपने उपदेश
किया है, मैं वैसा ही करूँगा।'
तत्पश्चात् ब्रह्मचारी यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, कुण्ड
के पश्चिम भाग में खड़ा रहके, माता-पिता, भाई-बहिन, मामा,
मौसी, चाचा आदि से लेके जो भिक्षा देने में नकार न करें,
उनसे भिक्षा* माँगे और जितनी भिक्षा मिले, उसे आचार्य के
आगे धर दे। तत्पश्चात् आचार्य उसमें से कुछ थोड़ा-सा अन्न
लेके वह सब भिक्षा बालक को दे देवे और वह बालक उस
भिक्षा को अपने भोजन के लिए रख छोड़े।
तत्पश्चात् बालक को शुभासन पर बैठाके पृष्ठ ३६-३७
में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करना। तत्पश्चात् बालक पूर्व
रक्खी हुई भिक्षा का भोजन करे। पश्चात् सायंकाल तक विश्राम
और गृहाश्रम-संस्कार में लिखा सन्ध्योपासन आचार्य बालक
के हाथ से करावे।
और पश्चात् ब्रह्मचारीसहित आचार्य कुण्ड के पश्चिम भाग
में आसन पर पूर्वाभिमुख बैठे और स्थालीपाक अर्थात् पृष्ठ २८
- ब्राह्मण का बालक यदि पुरुष से भिक्षा माँगे तो "भवान् भिक्षां
ददातु" और जो स्त्री से माँगे तो "भवती भिक्षां ददातु" और
क्षत्रिय का बालक "भिक्षां भवान् ददातु" और स्त्री से "भिक्षां
भवती ददातु", वैश्य का बालक "भिक्षां ददातु भवान्" और
"भिक्षां ददातु भवती" ऐसा वाक्य बोले।
१०८ संस्कारविधिः
में लिखे प्रमाणे भात बना, उसमें घी डाल पात्र में रख पृष्ठ
३१ में लिखे प्रमाणे समिदाधान कर, पुनः समिधा प्रदीप्त कर
आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार दोनों
मिलके आठ आज्याहुति देनी।
तत्पश्चात् ब्रह्मचारी खड़ा होके पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे
(ओम् अग्ने सुश्रवः) इस मन्त्र से [वेदीस्थ अग्नि को इकट्ठा
करके, पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये समिध०) इस
मन्त्र से तीन समिधाओं की आहुति देवे। तत्पश्चात् बालक
बैठके यज्ञकुण्ड को अग्नि से अपना हाथ तपा, पृष्ठ १०१ में
लिखे प्रमाणे पूर्ववत् मुख का स्पर्श करके अङ्गस्पर्श करे।
तत्पश्चात् पृष्ठ २८ में लिखे प्रमाणे बनाये हुए भात को
बालक आचार्य को होम और भोजन के लिए देवे। पुनः आचार्य
उस भात में से आहुति के अनुमान भात को स्थाली में लेके,
उसमें घी मिला—
ओं सद॑स॒स्पति॒मद्भुतं प्रियमिन्द्र॑स्य॒ काम्य॑म्।
स॒निं मे॒धाम॑यासिष॒ स्वाहा॑॥
इदं सदसस्पतये इदन्न मम॥ १॥
ओं तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि।
धियो॒ यो न॑ः प्रचो॒दया॑त् स्वाहा॑॥
इदं सवित्रे—इदन्न मम॥ २॥
ओम् ऋषिभ्यः स्वाहा॥ इदम् ऋषिभ्यः—इदन्न मम॥ ३॥
इन तीन मन्त्रों से तीन और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं
यदस्य कर्मणो०) इस मन्त्र से चौथी आहुति देवे। तत्पश्चात्
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३४-
३५ में लिखे प्रमाणे (ओं त्वन्नो०) इन आठ मन्त्रों से आठ
आज्याहुति मिलके बारह आज्याहुति देके ब्रह्मचारी शुभासन पर
वेदारम्भप्रकरणम् १०९
पूर्वाभिमुख बैठके, पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान
आचार्य के साथ करके—
'अमुकगोत्रोत्पन्नोऽहं भो भवन्तमभिवादये ॥'
ऐसा वाक्य बोलके आचार्य का वन्दन करे और आचार्य—
'आयुष्मान् विद्यावान् भव सौम्य ॥'
ऐसा आशीर्वाद देके, पश्चात् होम से बचे हुए हविष्य
अन्न और दूसरे भी सुन्दर मिष्टान्न का भोजन आचार्य के साथ
अर्थात् पृथक्-पृथक् बैठके करें।
तत्पश्चात् हस्त-मुख प्रक्षालन करके, जो निमन्त्रण से
संस्कार में आये हों, उन्हें यथायोग्य भोजन करा, तत्पश्चात्
स्त्रियों को स्त्री और पुरुषों को पुरुष प्रीतिपूर्वक विदा करें और
सब जने बालक को निम्नलिखित—
'हे बालक ! त्वमीश्वरकृपया विद्वान् शरीरात्मबलयुक्तः
कुशली वीर्यवान् अरोगः सर्वा विद्या अधीत्याऽस्मान् दिदृक्षुः
सन्नागम्याः ॥'
ऐसा आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को चले जाएँ।
तत्पश्चात् ब्रह्मचारी तीन दिन तक भूमि में शयन, प्रातःसायं
पृष्ठ १०० में लिखे प्रमाणे (अग्ने सुश्रवः०) इस मन्त्र से वेदीस्थ
अग्नि को इकट्ठा कर, (अग्नये समिध०) इस मन्त्र से समिधा
होम और पृष्ठ १०१ में लिखे प्रमाणे मुख आदि अङ्गस्पर्श
आचार्य करावे तथा तीन दिन तक पृष्ठ १०८ में लिखे प्रमाणे
(सदसस्पति०) इत्यादि चार स्थालीपाक की आहुति पूर्वोक्त
रीति से ब्रह्मचारी के हाथ से करवावे और तीन दिन तक क्षार-
लवणरहित पदार्थ का भोजन ब्रह्मचारी किया करे।
तत्पश्चात् पाठशाला में जाके गुरु के समीप विद्याभ्यास
करने के समय की प्रतिज्ञा करे तथा आचार्य भी करे।
११० संस्कारविधिः
आ॒चार्य॑ उप॒नय॑मानो ब्रह्मचारिणं॑ कृणुते॒ गर्भ॑म॒न्तः।
तं रात्री॑स्ति॒स्र उदरे॑ बिभर्त्ति॒ तं जा॒तं द्रष्टुम॒भिसंय॑न्ति दे॒वाः॥ १॥
इ॒यं समि॒त्पृथिवी द्यौर्द्वितीया॒तान्तरि॑क्षं स॒मिधा॑ पृणाति।
ब्र॒ह्म॒चारी स॒मिधा॒ मेख॑लया॒ श्रमे॑ण लो॒काँस्तप॑सा पिपर्ति॥ २॥
ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ति समिधा॒ समि॑द्धः काष्णं॑ वसा॑नो दीक्षि॒तो
दी॒र्घश्म॑श्रुः। स स॒द्य ए॑ति॒ पूर्व॑स्मा॒दुत्तरं॑ समु॒द्रं लो॒कान्त्सं॒गृह्य॑
मुहु॑रा॒चरि॑क्रत्॥ ३॥
ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण॒ तप॑सा राजा॑ रा॒ष्ट्रं वि र॑क्षति।
आ॒चार्यो॑ ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण ब्रह्मचारिण॑मिच्छते॥ ४॥
ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण क॒न्या॒३॑ युवानं॑ विन्दते॒ पति॑म्॥ ५॥
ब्र॒ह्म॒चारी ब्रह्म॒ भ्राज॑द्विभर्त्ति॒ तस्मि॒न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ स॒मोताः॑।
प्रा॒णा॒पा॒नौ ज॒नय॒न्नाद् व्या॒नं वाचं॑ म॒नो हृद॑यं॒ ब्रह्म॑ मे॒धाम्॥ ६॥
—अथर्व० कां० ११। सू० ५॥
संक्षेप से भाषार्थः—आचार्य ब्रह्मचारी को प्रतिज्ञापूर्वक
समीप रखके तीन रात्रिपर्यन्त गृहाश्रम के प्रकरण में लिखे
सन्ध्योपासनादि सत्पुरुषों के आचार की शिक्षा कर, उसके आत्मा
के भीतर गर्भरूप विद्या स्थापन करने के लिए उसे धारण कर
और पूर्ण विद्वान् बना देता है और जब वह पूर्ण ब्रह्मचर्य और
विद्या को पूर्ण करके घर को आता है, तब उसे देखने के लिए
सब विद्वान् लोग सम्मुख जाकर बड़ा मान्य करते हैं॥ १॥
जो यह ब्रह्मचारी वेदारम्भ के समय तीन समिधा अग्नि
में होमकर, ब्रह्मचर्य के व्रत का नियमपूर्वक सेवन करके, विद्या
पूर्ण करने को दृढ़ोत्साही होता है, वह जानो पृथिवी, सूर्य और
अन्तरिक्ष के सदृश सबका पालन करता है, क्योंकि वह
वेदारम्भप्रकरणम् १११
समिदाधान, मेखलादि चिह्नों का धारण और परिश्रम से विद्या
पूर्ण करके, इस ब्रह्मचर्यानुष्ठानरूप तप से सब लोगों को सद्गुण
और आनन्द से तृप्त कर देता है॥ २ ॥
जब विद्या से प्रकाशित और मृगचर्मादि धारण कर दीक्षित
होके दीर्घश्मश्रुः=४० वर्ष तक दाढ़ी, मूँछ आदि पञ्च केशों
का धारण करनेवाला ब्रह्मचारी होता है, वह पूर्व समुद्ररूप
ब्रह्मचर्यानुष्ठान को पूर्ण करके गुरुकुल से उत्तर समुद्र अर्थात्
गृहाश्रम को शीघ्र प्राप्त होता है। वह सब लोकों का संग्रह करके
बारम्बार पुरुषार्थ और जगत् को सत्योपदेश से आनन्दित कर
देता है॥ ३॥
वही राजा उत्तम होता है, जो पूर्ण ब्रह्मचर्यरूप तपश्चरण
से पूर्ण विद्वान्, सुशिक्षित, सुशील, जितेन्द्रिय होकर राज्य का
विविध प्रकार से पालन करता है और वही विद्वान् ब्रह्मचारी
की इच्छा करता और आचार्य हो सकता है, जो यथावत् ब्रह्मचर्य
से सम्पूर्ण विद्याओं को पढ़ता है॥ ४ ॥
जैसे लड़के पूर्ण ब्रह्मचर्य और पूर्ण विद्या पढ़, पूर्ण जवान
होके अपने सदृश कन्या से विवाह करें, वैसे कन्या भी अखण्ड
ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या पढ़, पूर्ण युवति हो, अपने तुल्य पूर्ण
युवावस्थावाले पति को प्राप्त होवे॥ ५॥
जब ब्रह्मचारी ब्रह्म अर्थात् साङ्गोपाङ्ग चारों वेदों को शब्द,
अर्थ और सम्बन्ध के ज्ञानपूर्वक धारण करता है, तभी प्रकाशमान
होता, उसमें सम्पूर्ण दिव्य गुण निवास करते और सब विद्वान्
उससे मित्रता करते हैं। वह ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य ही से प्राण,
दीर्घजीवन, दुःख-क्लेशों का नाश, सम्पूर्ण विद्याओं में व्यापकता,
उत्तम वाणी, पवित्र आत्मा, शुद्ध हृदय, परमात्मा और श्रेष्ठ प्रजा
को धारण करके, सब मनुष्यों के हित के लिए सब विद्याओं
का प्रकाश करता है॥ ६॥