संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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इस मन्त्र से आचार्य सुन्दर, चिकनी, प्रथम बनाके रक्खी
हुई मेखला* को बालक की कटि में बाँधके—
ओँ युवा॑ सु॒वासा॒ः परि॑वीत॒ आगा॒त् स उ॒ श्रेया॑न् भवति॒
जाय॑मानः। तं धीरा॑सः क॒वय॒ उन्न॑यन्ति स्वा॒ध्यो३॒ मन॑सा
दे॒वयन्तः॑॥
इस मन्त्र को बोलके दो शुद्ध कोपीन, दो अंगोछे, एक
उत्तरीय और दो कटिवस्त्र ब्रह्मचारी को आचार्य देवे और उनमें
से एक कोपीन, एक कटिवस्त्र और एक उपन्ना बालक को
आचार्य धारण करावे। तत्पश्चात् आचार्य दण्ड१ हाथ में लेके
सामने खड़ा रहे और बालक भी आचार्य के सामने हाथ जोड़—
ओं यो मे दण्डः परापतद्वैहायसोऽधिभूम्याम्।
तमहं पुनरादद आयुषे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय॥
इस मन्त्र को बोलके बालक आचार्य के हाथ से दण्ड
ले लेवे। तत्पश्चात् पिता ब्रह्मचारी को ब्रह्मचर्याश्रम का साधारण
उपदेश करे—
ब्रह्मचार्यसि असौ२ ॥ १॥ अपोऽशान॥ २॥
- ब्राह्मण को मुञ्ज वा दर्भ की, क्षत्रिय को धनुषसंज्ञक तृण वा वल्कल
की और वैश्य को ऊन वा शण की मेखला होनी चाहिए!
१. ब्राह्मण के बालक को खड़ा रख के भूमि से ललाट के केशों
तक पलाश वा बिल्व वृक्ष का, क्षत्रिय को वट वा खदिर का
ललाट भ्रू तक, वैश्य को पीलू अथवा गूलर वृक्ष का नासिक
के अग्रभाग तक दण्ड-प्रमाण है। और वे दण्ड चिकने सीधे हों,
अग्नि में जले, टेढ़े, कीड़ों के खाये हुए न हों। और एक-एक
मृगचर्म उनके बैठने के लिए, एक-एक जलपात्र, एक-एक उपपात्र
और एक-एक आचमनीय सब ब्रह्मचारियों को देना चाहिए।
२. ‘असौ’ इस पद के स्थान में ब्रह्मचारी का नाम सर्वत्र उच्चारण
करे।