संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें( 11 )
अथं वेदारम्भसंस्कारविधिर्विधीयते
'वेदारम्भ' उसे कहते हैं—'जो गायत्रीमन्त्र से लेके
साङ्गोपाङ्ग* चारों वेदों के अध्ययन करने के लिए नियम धारण
करना होता है।
समय:—जो दिन उपनयन-संस्कार का है, वही वेदारम्भ
का है। यदि उस दिवस में न हो सके अथवा करने की इच्छा
न हो तो दूसरे दिन करे। यदि दूसरा दिन भी अनुकूल न हो
तो एक वर्ष के भीतर किसी दिन करे।
विधि:—जो वेदारम्भ का दिन ठहराया हो, उस दिन
प्रातःकाल शुद्धोदक से स्नान कराके, शुद्ध वस्त्र पहिना, पश्चात्
कार्यकर्त्ता अर्थात् पिता, यदि पिता न हो तो आचार्य बालक
को लेके उत्तमासन पर वेदी के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठे।
तत्पश्चात् पृष्ठ ९-२१ तक ईश्वरस्तुति**, प्रार्थनोपासना,
स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण करके, पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे
( भूर्भुवः स्वः ) इस मन्त्र से अग्न्याधान पृ० ३० में लिखे प्रमाणे
- अङ्ग—शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष। उपाङ्ग—
पूर्वमीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त। उपवेद—
आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थवेद अर्थात् शिल्पशास्त्र।
ब्राह्मण—ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ। वेद—ऋक्, यजुः,
साम और अथर्व इन सबको क्रम से पढ़ें।
** जो उपनयन किये पश्चात् उसी दिन वेदारम्भ करे, उसको पुनः
वेदारम्भ के आदि में ईश्वरस्तुति, प्रार्थनोपासना और स्वस्तिवाचन,
शान्तिकरण् करना आवश्यक नहीं।