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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

११० संस्कारविधिः
आ॒चार्य॑ उप॒नय॑मानो ब्रह्मचारिणं॑ कृणुते॒ गर्भ॑म॒न्तः।
तं रात्री॑स्ति॒स्र उदरे॑ बिभर्त्ति॒ तं जा॒तं द्रष्टुम॒भिसंय॑न्ति दे॒वाः॥ १॥
इ॒यं समि॒त्पृथिवी द्यौर्द्वितीया॒तान्तरि॑क्षं स॒मिधा॑ पृणाति।
ब्र॒ह्म॒चारी स॒मिधा॒ मेख॑लया॒ श्रमे॑ण लो॒काँस्तप॑सा पिपर्ति॥ २॥
ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ति समिधा॒ समि॑द्धः काष्णं॑ वसा॑नो दीक्षि॒तो
दी॒र्घश्म॑श्रुः। स स॒द्य ए॑ति॒ पूर्व॑स्मा॒दुत्तरं॑ समु॒द्रं लो॒कान्त्सं॒गृह्य॑
मुहु॑रा॒चरि॑क्रत्॥ ३॥
ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण॒ तप॑सा राजा॑ रा॒ष्ट्रं वि र॑क्षति।
आ॒चार्यो॑ ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण ब्रह्मचारिण॑मिच्छते॥ ४॥
ब्र॒ह्म॒चर्ये॑ण क॒न्या॒३॑ युवानं॑ विन्दते॒ पति॑म्॥ ५॥
ब्र॒ह्म॒चारी ब्रह्म॒ भ्राज॑द्विभर्त्ति॒ तस्मि॒न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ स॒मोताः॑।
प्रा॒णा॒पा॒नौ ज॒नय॒न्नाद् व्या॒नं वाचं॑ म॒नो हृद॑यं॒ ब्रह्म॑ मे॒धाम्॥ ६॥
—अथर्व० कां० ११। सू० ५॥
संक्षेप से भाषार्थः—आचार्य ब्रह्मचारी को प्रतिज्ञापूर्वक
समीप रखके तीन रात्रिपर्यन्त गृहाश्रम के प्रकरण में लिखे
सन्ध्योपासनादि सत्पुरुषों के आचार की शिक्षा कर, उसके आत्मा
के भीतर गर्भरूप विद्या स्थापन करने के लिए उसे धारण कर
और पूर्ण विद्वान् बना देता है और जब वह पूर्ण ब्रह्मचर्य और
विद्या को पूर्ण करके घर को आता है, तब उसे देखने के लिए
सब विद्वान् लोग सम्मुख जाकर बड़ा मान्य करते हैं॥ १॥
जो यह ब्रह्मचारी वेदारम्भ के समय तीन समिधा अग्नि
में होमकर, ब्रह्मचर्य के व्रत का नियमपूर्वक सेवन करके, विद्या
पूर्ण करने को दृढ़ोत्साही होता है, वह जानो पृथिवी, सूर्य और
अन्तरिक्ष के सदृश सबका पालन करता है, क्योंकि वह