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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 102

९८ संस्कारविधिः
इस मन्त्र को बोले। तत्पश्चात्—
ओं कस्य ब्रह्मचार्यसि प्राणस्य ब्रह्मचार्यसि कस्त्वा
कमुपनयते काय त्वा परिददामि ॥ १ ॥
ओं प्रजापतये त्वा परिददामि। देवाय त्वा सवित्रे
परिददामि। अद्भ्यस्त्वौषधीभ्यः परिददामि। द्यावापृथिवीभ्यां
त्वा परिददामि। विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः परिददामि। सर्वेभ्यस्त्वा
भूतेभ्यः परिद्दाम्यरिष्ट्यै ॥ २ ॥
इन मन्त्रों को बोल बालक को शिक्षा करे कि—'तू प्राण आदि
की विद्या के लिए यत्नवान् हो'।
यह उपनयन-संस्कार पूरा हुए पश्चात् यदि उसी दिन
वेदारम्भ करने का विचार पिता और आचार्य का हो तो उसी
दिन करना और जो दूसरे दिन का विचार हो तो पृष्ठ ३६-
३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करके संस्कार में आई
हुई स्त्रियों का बालक की माता और पुरुषों का बालक का
पिता सत्कार करके विदा करे और माता-पिता, आचार्य,
सम्बन्धी, इष्ट, मित्र सब मिलके—
'ओं त्वं जीव शरदः शतं वर्द्धमानः, आयुष्मान् तेजस्वी
वर्चस्वी भूयाः ॥'
इस प्रकार आशीर्वाद देके अपने-अपने घर को सिधारें ॥
॥ इत्युपनयनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥