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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

१९२ संस्कारविधिः
ब्रह्मचर्यकालः
इसमें छान्दोग्योपनिषद् के तृतीय प्रपाठक के सोलहवें खण्ड
का प्रमाण—
मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद ॥ १ ॥
पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विँशतिर्वर्षाणि तत्
प्रातःसवनं चतुर्विँशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं
तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदँसर्वं
वासयन्ति ॥ २ ॥
तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा
वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनँसवनमनुसन्तनुतेति
माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत
एत्यगदो ह भवति ॥ ३ ॥
अथ यानि चतुश्चत्वारिँशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनँ
सवनं चतुश्चत्वारिँशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं माध्यन्दिनँ
सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदँ
सर्वँ रोदयन्ति ॥ ४ ॥
तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा
रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनँ सवनं तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति
माहं प्राणानाँ रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत
एत्यगदो ह भवति ॥ ५ ॥
अथ यान्यष्टाचत्वारिँशद्वर्षाणि तत् तृतीयसवनमष्टा-
चत्वारिँ शदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या
अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदँसर्वमाददते ॥ ६ ॥

वेदारम्भप्रकरणम् ११३
तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा
आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुतेति माहं
प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो
हैव भवति ॥ ७ ॥
अर्थ:—जब बालक को पाँच वर्ष की आयु तक माता,
पाँच ये आठ तक पिता, आठ से अड़तालीस, चवालीस,
चालीस, छत्तीस, तीस तक अथवा पच्चीस वर्ष तक, तथा
कन्या को आठ से चौबीस, बाईस, बीस, अठारह, अथवा
सोलह वर्ष तक आचार्य की शिक्षा प्राप्त हो, तभी वे विद्यावान्
होकर धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के व्यवहारों में अतिचतुर होते
हैं ॥ १ ॥
इस मनुष्य-देह को यज्ञ अर्थात् इसे अच्छे प्रकार आयु,
बल आदि से सम्पन्न करने के लिए छोटे-से-छोटा पक्ष यह
है कि पुरुष चौबीस वर्षपर्यन्त ब्रह्मचर्य और सोलह वर्ष तक
कन्या यथावत् पूर्ण ब्रह्मचर्याश्रम करे। जैसे चौबीस अक्षर का
गायत्री छन्द होता है, वैसे करे, वह प्रातःसवन कहाता है। जिससे
इस मनुष्य-देह के मध्य वसुरूप प्राण प्राप्त होते हैं, जो बलवान्
होकर सब शुभ गुणों को शरीर, आत्मा और मन के बीच वास
कराते हैं ॥ २ ॥
जो कोई इस पच्चीस वर्ष के आयु से पूर्व ब्रह्मचारी को
विवाह वा विषयभोग करने का उपदेश करे, उसको वह ब्रह्मचारी
यह उत्तर देवे कि—देख ! यदि मेरे प्राण, मन और इन्द्रिय पच्चीस
वर्ष तक ब्रह्मचर्य से बलवान् न हुए तो मध्यम सवन जोकि
आगे चवालीस वर्ष तक का ब्रह्मचर्य कहा है, उसको पूर्ण करने
के लिए मुझमें सामर्थ्य न हो सकेगा। प्रथम कोटि का ब्रह्मचर्य
मध्यम कोटि के ब्रह्मचर्य को सिद्ध करता है, इसलिए क्या

१९४ संस्कारविधिः
मैं तुम्हारे सदृश मूर्ख हूँ जो इस शरीर, प्राण, अन्तःकरण और
आत्मा के संयोगरूप सब शुभ गुण-कर्म और स्वभाव के साधन
करनेवाले इस संघात को शीघ्र नष्ट करके अपने मनुष्य-देह
धारण के फल से विमुख रहूँ? और सब आश्रमों के मूल, सब
उत्तम कर्मों में उत्तम कर्म और सबके मुख्य कारण ब्रह्मचर्य
को खण्डित करके महादुःखसागर में कभी डूबूँ? किन्तु जो प्रथम
आयु में ब्रह्मचर्य करता है, वह ब्रह्मचर्य के सेवन से विद्या
को प्राप्त होके निश्चित रोगरहित होता है। इसलिए तुम मूर्ख
लोगों के कहने से ब्रह्मचर्य का लोप मैं कभी न करूँगा ॥ ३ ॥
और जो चवालीस वर्ष तक, अर्थात् जैसा चवालीस अक्षर
का त्रिष्टुप् छन्द होता है, तद्वत् जो मध्यम ब्रह्मचर्य करता है,
वह ब्रह्मचारी रुद्ररूप प्राणों को प्राप्त होता है कि जिसके आगे
किसी दुष्ट की दुष्टता नहीं चलती और वह सब दुष्ट कर्म
करनेवालों को सदा रुलाता रहता है ॥ ४ ॥
यदि मध्यम ब्रह्मचर्य के सेवन करनेवाले से कोई कहे
कि तू इस ब्रह्मचर्य को छोड़ विवाह करके आनन्द को प्राप्त
हो, उसको वह ब्रह्मचारी यह उत्तर देवे कि—जो सुख अधिक
ब्रह्मचर्याश्रम के सेवन से होता और विषय-सम्बन्धी भी अधिक
आनन्द होता है, वह ब्रह्मचर्य को न करने से स्वप्न में भी प्राप्त
नहीं होता, क्योंकि सांसारिक व्यवहार, विषय और परमार्थ-
सम्बन्धी पूर्ण सुख को ब्रह्मचारी ही प्राप्त होता है, अन्य कोई
नहीं। इसलिए मैं इस सर्वोत्तम सुख-प्राप्ति के साधन ब्रह्मचर्य
का लोप न करके विद्वान्, बलवान्, आयुष्मान्, धर्मात्मा होके
सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होऊँगा। तुम्हारे निर्बुद्धियों के कहने
से शीघ्र विवाह करके स्वयं और अपने कुल को नष्ट-भ्रष्ट कभी
न करूँगा ॥ ५ ॥
अब अड़तालीस वर्षपर्यन्त, जैसाकि अड़तालीस अक्षर का
जगती छन्द होता है, वैसे इस उत्तम ब्रह्मचर्य से पूर्णविद्या,

वेदारम्भप्रकरणम् १९५
पूर्णबल, पूर्णप्रज्ञा, पूर्ण शुभ गुण-कर्म-स्वभावयुक्त, सूर्यवत्
प्रकाशमान होकर ब्रह्मचारी सब विद्याओं को ग्रहण करता
है॥६॥
यदि कोई इस सर्वोत्तम धर्म से गिराना चाहे, उससे ब्रह्मचारी
उत्तर देवे कि—अरे छोकरों के छोकरे ! मुझसे दूर रहो। तुम्हारे
दुर्गन्धरूप भ्रष्ट वचनों से मैं दूर रहता हूँ। मैं इस उत्तम ब्रह्मचर्य
का लोप कभी न करूँगा। इसको पूर्ण करके सर्वरोगों से रहित,
सर्वविद्यादि शुभ गुण-कर्म-स्वभावसहित होऊँगा। इस मेरी शुभ
प्रतिज्ञा को परमात्मा अपनी कृपा से पूर्ण करे। जिससे मैं तुम
निर्बुद्धियों को उपदेश और विद्या पढ़ाके विशेष तुम्हारे बालकों
को आनन्दयुक्त कर सकूँ ॥७॥
चतस्रोऽवस्थाः शरीरस्य वृद्धियौवनं सम्पूर्णता
किञ्चित् परिहाणिश्चेति। तत्राषोडशाद् वृद्धिः। आपञ्च-
विंशतेर्यौवनम्। आचत्वारिंशतस्सम्पूर्णता। ततः किञ्चित्
परिहाणिश्चेति ॥ १ ॥
पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे।
समत्वागतवीर्यौ तौ जानीयात् कुशलो भिषक् ॥ २ ॥
यह धन्वन्तरिजीकृत सुश्रुतग्रन्थ का प्रमाण है॥
अर्थः—इस मनुष्य देह की चार अवस्थाएँ हैं—एक वृद्धि,
दूसरी यौवन, तीसरी सम्पूर्णता, चौथी किञ्चित्परिहाणि। इनमें
सोलहवें वर्ष तक वृद्धि होती है। जो कोई इस वृद्धि की अवस्था
में वीर्यादि धातुओं का नाश करेगा, वह कुल्हाड़े से काटे वृक्ष
वा डण्डे से फूटे घड़े के समान अपने सर्वस्व का नाश करके
पश्चात्ताप करेगा। पुनः उसके हाथ में सुधार कुछ भी न रहेगा।
दूसरी युवावस्था पच्चीसवें वर्ष तक होती है। जो कोई इसको
यथावत् संरक्षित न करेगा, वह अपनी भाग्यशीलता को नष्ट
कर देवेगा। तीसरी पूर्ण युवावस्था चालीसवें वर्ष में होती है।

१९६ संस्कारविधिः
जो कोई ब्रह्मचारी होकर पुनः ऋतुगामी, पर-स्त्रीत्यागी, एकस्त्रीव्रत,
गर्भ रहे पश्चात् एक वर्षपर्यन्त ब्रह्मचारी न रहेगा, वह भी बना-
बनाया धूल में मिल जाएगा और चौथी चालीसवें वर्ष से यावत्
निर्वीर्य न हो, तवात् किञ्चित् हानिरूप अवस्था है। जो किञ्चित्
हानि के बदले वीर्य की अधिक हानि करेगा, वह राजयक्ष्मा
और भगन्दरादि रोगों से पीड़ित हो जाएगा और जो इन चारों
अवस्थाओं को यथोक्त सुरक्षित रक्खेगा, वह सदा आनन्दित
होकर सब संसार को सुखी कर सकेगा ॥ १ ॥
अब इसमें इतना विशेष समझना चाहिए कि स्त्री और
पुरुष के शरीर में पूर्वोक्त चारों अवस्थाओं का एक-सा समय
नहीं है, किन्तु जितना सामर्थ्य पच्चीसवें वर्ष में पुरुष के शरीर
में होता है उतना सामर्थ्य स्त्री के शरीर में सोलहवें वर्ष में
हो जाता है। यदि बहुत शीघ्र विवाह करना चाहे तो २५ वर्ष
का पुरुष और १६ वर्ष की कन्या दोनों तुल्य सामर्थ्यवाले होते
हैं। इसलिए इस अवस्था में जो विवाह करना, वह अधम विवाह
है और जो सत्रहवें वर्ष की कन्या और ३० वर्ष का पुरुष,
अठारह वर्ष की कन्या और ३६ वर्ष का पुरुष, उन्नीस वर्ष
की कन्या और ३८ वर्ष का पुरुष विवाह करे तो इसको मध्यम
समय जानो और जो बीस, इक्कीस, बाईस, तेईस वा चौबीस
वर्ष की स्त्री और चालीस, बयालीस, चवालीस, छयालीस और
अड़तालीस वर्ष का पुरुष होकर विवाह करे, वह सर्वोत्तम है।
हे ब्रह्मचारिन्! इन बातों को तू ध्यान में रख, जोकि तुझे आगे
के आश्रमों में काम आवेंगी। जो मनुष्य अपने सन्तान, कुल,
सम्बन्धी और देश की उन्नति करना चाहें, वे इन पूर्वोक्त और
आगे कही हुई बातों का यथावत् आचरण करें ॥ २ ॥
श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी ।
पायूपस्थं हस्तपादं वाक् चैव दशमी स्मृता ॥ १ ॥

३. उपनयन (यज्ञोपवीत) एवं वेदारम्भ संस्कार (गुरुकुल प्रवेश एवं ब्रह्मचर्य नियम)

वेदारम्भप्रकरणम् ११७
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैषां श्रोत्रादीन्यनुपूर्वशः।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैषां पाय्वादीनि प्रचक्षते ॥२॥
एकादशं मनो ज्ञेयं स्वगुणेनोभयात्मकम्।
यस्मिन् जिते जितावेतौ भवतः पञ्चकौ गणौ ॥३॥
इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारिषु।
संयमे यत्नमातिष्ठेद् विद्वान् यन्तेव वाजिनाम् ॥४॥
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम्।
संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिं नियच्छति ॥५॥
वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपांसि च।
न विप्रभावदुष्टस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ॥६॥
वशे कृत्वेन्द्रियग्रामं संयम्य च मनस्तथा।
सर्वान् संसाधयेदर्थानक्षिण्वन् योगतस्तनुम् ॥७॥
यमान्सेवेत सततं न नियमान्केवलान्बुधः।
यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन् ॥८॥
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्द्धन्त आयुर्विद्या यशो बलम् ॥९॥
अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः।
अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥१०॥
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न बन्धुभिः।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मं योऽनूचानः स नो महान् ॥११॥
न तेन वृद्धो भवति येनास्य पलितं शिरः।
यो वै युवाप्यधीयानस्तं देवाः स्थविरं विदुः ॥१२॥
यथा काष्ठमयो हस्ती यथा चर्ममयो मृगः।
यश्च विप्रोऽनधीयानस्त्रयस्ते नाम बिभ्रति ॥१३॥

११८ संस्कारविधिः
सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥ १४ ॥
वेदमेव सदाभ्यस्येत् तपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ १५ ॥
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ॥ १६ ॥
यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्य्यधिगच्छति ।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥ १७ ॥
श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि ।
अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ १८ ॥
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ १९ ॥
—मनु० ॥
अर्थः—कान, त्वचा, नेत्र, जीभ, नासिका, गुदा, उपस्थ
(मूत्र का मार्ग) हाथ, पग, वाणी—ये दस इन्द्रियाँ इस शरीर
में हैं ॥ १ ॥
इनमें कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रिय और गुदा आदि पाँच
कर्मेन्द्रिय कहाते हैं ॥ २ ॥
ग्यारहवाँ इन्द्रिय मन है। वह अपने स्मृति आदि गुणों से
दोनों प्रकार के इन्द्रियों से सम्बन्ध करता है कि जिस मन के
जीतने में ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय दोनों जीत लिये जाते हैं ॥ ३ ॥
जैसे सारथि घोड़े को कुपथ में नहीं जाने देता, वैसे विद्वान्
ब्रह्मचारी आकर्षण करनेवाले विषयों में जाते हुए इन्द्रियों को
रोकने में सदा प्रयत्न किया करे ॥ ४ ॥
ब्रह्मचारी इन्द्रियों के साथ मन लगाने से निःसन्देह दोषी
हो जाता है और उन पूर्वोक्त १० इन्द्रियों को वश में करके

वेदारम्भप्रकरणम् ११९
ही पश्चात् सिद्धि को प्राप्त होता है॥५॥
जिसका ब्राह्मणपन (सम्मान नहीं चाहना वा इन्द्रियों को
वश में रखना आदि) बिगड़ा वा जिसका विशेष प्रभाव (वर्णाश्रम
के गुण-कर्म) बिगड़े हैं, उस पुरुष के वेद पढ़ना, त्याग
(संन्यास) लेना, यज्ञ (अग्निहोत्रादि) करना, नियम (ब्रह्मचर्याश्रम
आदि) करना, तप (निन्दा-स्तुति और हानि-लाभ आदि द्वन्द्वों
का सहन) करना आदि कर्म कदापि सिद्ध नहीं हो सकते।
इसलिए ब्रह्मचारी को चाहिए कि अपने नियम-धर्मों का यथावत्
पालन करके सिद्धि को प्राप्त होवे॥६॥
ब्रह्मचारी पुरुष सब इन्द्रियों को वश में कर और आत्मा
के साथ मन को संयुक्त करके योगाभ्यास से शरीर को किञ्चित्-
किञ्चित् पीड़ा देता हुआ अपने सब प्रयोजनों को सिद्ध करे॥७॥
बुद्धिमान् ब्रह्मचारी को चाहिए कि यमों का सेवन नित्य
करे, केवल नियमों का नहीं, क्योंकि यमों१ को न करता हुआ
और केवल नियमों२ का सेवन करता हुआ भी अपने कर्त्तव्य
से पतित हो जाता है। इसलिए यमसेवनपूर्वक नियमसेवन नित्य
किया करे॥८॥
अभिवादन करने का जिसका स्वभाव और विद्या वा
अवस्था में वृद्ध पुरुषों का जो नित्य सेवन करता है, उसकी
अवस्था, विद्या, कीर्ति और बल इन चारों की नित्य उन्नति
हुआ करती हैं। इसलिए ब्रह्मचारी को चाहिए कि आचार्य, माता-
१. अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः। निर्वैरता, सत्य बोलना,
चोरीत्याग, वीर्यरक्षण और विषयभोग में घृणा से ५ यम हैं।
२. शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः।
शौच, सन्तोष, तप (हानि लाभ आदि द्वन्द्व का सहना) स्वाध्याय
(वेद का पढ़ना), ईश्वरप्रणिधान (सर्वस्व ईश्वरार्पण) ये पाँच
नियम कहाते हैं।

१२० संस्कारविधिः
पिता, अतिथि, महात्मा आदि अपने बड़ों को नित्य नमस्कार
और उनका सेवन किया करे ॥९॥
अज्ञ अर्थात् जो कुछ नहीं पढ़ा, वह निश्चय करके बालक
होता और जो मन्त्रद, अर्थात् दूसरे को विचार देनेवाला, विद्या
पढ़ा, विद्याविचार में निपुण है, वह पिता-स्थानीय होता है,
क्योंकि जिस कारण सत्पुरुषों ने अज्ञ जन को बालक कहा
और मन्त्रद को पिता ही कहा है, इससे प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम
सम्पन्न होकर ज्ञानवान्, विद्यावान् अवश्य होना चाहिए ॥१०॥
धर्मवेत्ता ऋषिजनों ने न वर्षों, न पके केशों, वा झूलते
हुए अङ्गों, न धन और न बन्धुजनों से बड़प्पन माना, किन्तु
यही धर्म निश्चय किया कि जो हम लोगों में वाद-विवाद में
उत्तर देनेवाला, अर्थात् वक्ता हो वह बड़ा है। इससे ब्रह्मचर्याश्रम-
सम्पन्न होकर विद्यावान् होना चाहिए। जिससे कि संसार में
बड़प्पन, प्रतिष्ठा पावें और दूसरों को उत्तर देने में अति निपुण
हों ॥११॥
उस कारण से वृद्ध नहीं होता कि जिससे इसका शिर
झूल जाए, केश पक जावें, किन्तु जो जवान भी पढ़ा हुआ
विद्वान् है, उसको विद्वानों ने वृद्ध जाना और माना है। इससे
ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर विद्या पढ़नी चाहिए ॥१२॥
जैसे काठ का कठपूतला हाथी वा जैसे चमड़े का बनाया
हुआ मृग हो, वैसे बिना पढ़ा हुआ विप्र, अर्थात् ब्राह्मण वा
बुद्धिमान् जन होता है । उक्त वे हाथी, मृग और विप्र तीनों
नाममात्र धारण करते हैं। इस कारण ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर
विद्या पढ़नी चाहिए ॥१३॥
ब्राह्मण विष के समान उत्तम मान से नित्य उदासीनता
रक्खे और अमृत के समान अपमान की आकांक्षा सर्वदा करे,
अर्थात् ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के लिए भिक्षामात्र माँगते भी कभी
मान की इच्छा न करे ॥१४॥

वेदारम्भप्रकरणम् १२१
द्विजोत्तम अर्थात् ब्राह्मणादिकों में उत्तम, सज्जन पुरुष
सर्वकाल तपश्चर्या करता हुआ वेद ही का अभ्यास करे । जिस
कारण ब्राह्मण वा बुद्धिमान् जन को वेदाभ्यास करना इस संसार
में परम तप कहा है, इससे ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर अवश्य
वेदविद्याध्ययन करे ॥ १५ ॥
जो ब्रह्मण-क्षत्रिय और वैश्य वेद को न पढ़कर अन्य शास्त्रों
में श्रम करता है, वह जीवता ही अपने वंश के सहित शूद्रपन
को प्राप्त हो जाता है । इससे ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर वेदविद्या
अवश्य पढ़े ॥ १६ ॥
जैसे फावड़े से खोदता हुआ मनुष्य जल को प्राप्त होता
है, वैसे गुरु की सेवा करनेवाला पुरुष गुरुजनों ने जो पाई हुई
विद्या है, उसको प्राप्त होता है । इस कारण ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न
होकर गुरुजन की सेवा कर उनसे सुने और वेद पढ़े ॥ १७ ॥
उत्तम विद्या की श्रद्धा करता हुआ पुरुष अपने से न्यून
से भी विद्या पावे तो ग्रहण करे । नीच जाति से भी उत्तम धर्म
का ग्रहण करे और निन्द्य कुल से भी स्त्रियों में उत्तम स्त्री
का ग्रहण करे, यह नीति है । इससे गृहस्थाश्रम से पूर्व-पूर्व
ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न होकर कहीं से न कहीं से उत्तम विद्या
पढ़े, उत्तम धर्म सीखे और ब्रह्मचर्य के अनन्तर गृहाश्रम में उत्तम
स्त्री से विवाह करे, क्योंकि ॥ १८ ॥
विष से भी अमृत का ग्रहण करना, बालक से भी उत्तम
वचन को लेना और नाना प्रकार के शिल्प काम—सबसे अच्छे
प्रकार ग्रहण करने चाहिएँ । इस कारण ब्रह्मचर्याश्रम-सम्पन्न
होकर देश-देश पर्यटन कर उत्तम गुण सीखे ॥ १९ ॥
यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि, नो इतराणि ।
यान्यस्माकꣳसुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि ।
एके चास्मच्छ्रेयाꣳसो ब्राह्मणाः, तेषां त्वयासनेन प्रश्व-
सितव्यम् ॥ १ ॥ —तैत्तिरी० प्रपा० ७। अनु० ११ ॥

१२२ संस्कारविधिः
ऋतं तपः सत्यं तपः श्रुतं तपः शान्तं तपो दमस्त-
पश्शमस्तपो दानं तपो यज्ञस्तपो ब्रह्म भूर्भुवः सुवर्ब्रह्मैत-
दुपास्वैतत्तपः॥ २॥ —तैत्तिरी० प्रपा० १०। अनु० ८॥
अर्थः—हे शिष्य! जो आनन्दित, पापरहित, अर्थात् अन्याय,
अधर्माचरणरहित, न्याय-धर्माचरणसहित कर्म हैं, उन्हीं का सेवन
तू किया करना, इनसे विरुद्ध अधर्माचरण कभी मत करना।
हे शिष्य! जो तेरे माता-पिता, आचार्य आदि हम लोगों के अच्छे,
धर्मयुक्त, उत्तम कर्म हैं, उन्हीं का आचरण तू कर और जो
हमारे दुष्ट कर्म हों, उनका आचरण कभी मत कर। हे ब्रह्मचारिन्!
जो हमारे मध्य में धर्मात्मा, श्रेष्ठ ब्रह्मवित् विद्वान् हैं, उन्हीं के
समीप बैठना, संग करना और उन्हीं का विश्वास किया कर॥ १॥
हे शिष्य! तू जो यथार्थ का ग्रहण, सत्य मानना, सत्य
बोलना, वेदादि सत्यशास्त्रों का सुनना, अपने मन को अधर्माचरण
में न जाने देना, श्रोत्रादि इन्द्रियों को दुष्टाचार से रोक श्रेष्ठाचार
में लगाना, क्रोधादि के त्याग से शान्त रहना, विद्या आदि शुभ
गुणों का दान करना, अग्निहोत्रादि और विद्वानों का संग कर।
जितने भूमि, अन्तरिक्ष और सूर्यादि लोकों में पदार्थ हैं, उनका
यथाशक्ति ज्ञान कर और योगाभ्यास, प्राणायाम, एक ब्रह्म—परमात्मा
की उपासना कर। ये सब कर्म करना ही तप कहाता है॥ २॥
ऋतञ्च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यञ्च स्वाध्यायप्रवचने
च। तपश्च स्वाध्या०। दमश्च स्वाध्या०। शमश्च स्वाध्या०।
अग्नयश्च स्वाध्या०। अग्निहोत्रं च स्वाध्या०। सत्यमिति
सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः।
स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि
तपः॥ ३॥ —तैत्तिरी० प्रपा० ७। अनु० ९॥
अर्थः—हे ब्रह्मचारिन्! तू सत्य धारण कर, पढ़ और पढ़ाया
कर और सत्योपदेश करना कभी मत छोड़, सदा सत्य बोल,
पढ़ और पढ़ाया कर। हर्ष-शोकादि छोड़, प्राणायाम-योगाभ्यास

वेदारम्भप्रकरणम् १२३
कर तथा पढ़ और पढ़ाया भी कर। अपने इन्द्रियों को बुरे कामों
से हटा अच्छे कामों में चला, विद्या का ग्रहण कर और कराया
कर। अपने अन्तःकरण और आत्मा को अन्यायाचरण से हटा
न्यायाचरण में प्रवृत्त कर और कराया कर तथा पढ़ और सदा
पढ़ाया कर। अग्निविद्या के सेवनपूर्वक विद्या को पढ़ और पढ़ाया
कर । अग्निहोत्र करता हुआ पढ़ और पढ़ाया कर। 'सत्यवादी
होना तप'—सत्यवचा राथीतर आचार्य; 'न्यायाचरण में कष्ट
सहना तप'—तपो नित्य पौरुशिष्टि आचार्य; 'और धर्म में
चलके पढ़ना-पढ़ाना और सत्योपदेश करना ही तप है' यह
नाक मौद्गल्य आचार्य का मत है और सब आचार्यों के मत
में यही पूर्वोक्त तप, यही पूर्वोक्त तप है, ऐसा तू जान ॥ ३ ॥
इत्यादि उपदेश तीन दिन के भीतर आचार्य वा बालक
का पिता करे।
तत्पश्चात् घर को छोड़ गुरुकुल में जावे। यदि पुत्र हो
तो पुरुषों की पाठशाला और कन्या हो तो स्त्रियों की पाठशाला
में भेजें। यदि घर में वर्णोच्चारण की शिक्षा यथावत् न हुई हो
तो आचार्य बालकों को और कन्याओं को स्त्री पाणिनिमुनिकृत
वर्णोच्चारणशिक्षा एक महीने के भीतर पढ़ा देवें। पुनः
पाणिनिमुनिकृत अष्टाध्यायी का पाठ पदच्छेद, अर्थसहित आठ
महीने में, अथवा एक वर्ष में पढ़ाकर, धातुपाठ और दश लकारों
के रूप सधवाना तथा दश प्रक्रिया भी सधवानी। पुनः
पाणिनिमुनिकृत लिङ्गानुशासन और उणादिगण, गणपाठ तथा
अष्टाध्यायीस्थ ण्वुल् और तृच् प्रत्ययाद्यन्त सुबन्तरूप छह महीने
के भीतर सधवा देवें। पुनः दूसरी बार अष्टाध्यायी पदार्थोंक्ति,
समास, शङ्का-समाधान, उत्सर्ग अपवाद* अन्वयपूर्वक पढ़ावें
और संस्कृतभाषण का भी अभ्यास कराते जाएँ। आठ महीने

  • जिस सूत्र का अधिक विषय हो वह उत्सर्ग और जो किसी सूत्र
    के बड़े विषय में से थोड़े में प्रवृत्त हो वह अपवाद कहाता है।

१२४ संस्कारविधि:
के भीतर इतना पढ़ना-पढ़ाना चाहिए।
तत्पश्चात् पतञ्जलिमुनिकृत महाभाष्य, जिसमें वर्ण
उच्चारणशिक्षा, अष्टाध्यायी, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिगण,
लिङ्गानुशासन इन छह ग्रन्थों की व्याख्या यथावत् लिखी है,
डेढ़ वर्ष में अर्थात् अठारह महीने में इसको पढ़ना-पढ़ाना। इस
प्रकार शिक्षा और व्याकरणशास्त्र को तीन वर्ष पाँच महीने वा
नौ महीने, अथवा ४ वर्ष के भीतर पूरा कर सब संस्कृतविद्या
के मर्मस्थलों को समझने के योग्य होवे।
तत्पश्चात् यास्कमुनिकृत निघण्टु निरुक्त तथा कात्यायनादि
मुनिकृत कोश डेढ़ वर्ष के भीतर पढ़के, अव्यार्थ आप्तमुनिकृत
वाच्यवाचक सम्बन्धरूप यौगिक*, योगरूढ़ि और रूढ़ि तीन
प्रकार के शब्दों के अर्थ यथावत् जानें। तत्पश्चात् पिङ्गलाचार्यकृत
पिङ्गलसूत्र छन्दोग्रन्थ भाष्यसहित तीन महीने में पढ़ और तीन
महीने में श्लोकादिरचनविद्या को सीखें। पुनः यास्कमुनिकृत
काव्यालङ्कारसूत्र, वात्स्यायनमुनिकृत भाष्यसहित आकाङ्क्षा,
योग्यता, आसत्ति और तात्पर्यार्थ अन्वयसहित पढ़के, इसी के
साथ मनुस्मृति, विदुरनीति और किसी प्रकरण में से १० सर्ग
वाल्मीकीय रामायण के, ये सब एक वर्ष के भीतर पढ़ें और
पढ़ावें तथा एक वर्ष में सूर्यसिद्धान्तादि में से किसी एक सिद्धान्त
से गणितविद्या, जिसमें बीजगणित, रेखागणित और पाटीगणित,
जिसको अङ्कगणित भी कहते हैं, पढ़ें और पढ़ावें। निघण्टु से
लेके ज्योतिषपर्यन्त वेदाङ्गों को चार वर्ष के भीतर पढ़ें।
तत्पश्चात् जैमिनिमुनिकृत सूत्र पूर्वमीमांसा व्यासमुनिकृत
व्याख्यासहित, कणादमुनिकृत वैशेषिकसूत्ररूप शास्त्र को
गौतममुनिकृत प्रशस्तपादभाष्यसहित, वात्स्यायनमुनिकृत भाष्य-

  • यौगिक—जो क्रिया के साथ सम्बन्ध रक्खे। जैसे पाचक याजकादि।
    योगरूढ़ि—जैसे पङ्कजादि। रूढ़ि—जैसे धन, वन इत्यादि।

वेदारम्भप्रकरणम् १२५
सहित गौतम मुनिकृत सूत्ररूप न्यायशास्त्र, व्यासमुनिकृतभाष्य-
सहित पतञ्जलिमुनिकृत योगसूत्र योगशास्त्र, भागुरिमुनिकृत-
भाष्ययुक्त कपिलाचार्यकृत सूत्रस्वरूप सांख्यशास्त्र, जैमिनि वा
बौधायन आदि मुनिकृत व्याख्यासहित व्यासमुनिकृत शारीरक-
सूत्र तथा ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय,
तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक दश उपनिषद्,
व्यासादिमुनिकृत व्याख्यासहित वेदान्तशास्त्र, इन छह शास्त्रों को
दो वर्ष के भीतर पढ़ लेवें।
तत्पश्चात् बह्वृच् ऐतरेय ऋग्वेद का ब्राह्मण, आश्वलायनकृत
श्रौत तथा गृह्यसूत्र* और कल्पसूत्र पद-क्रम और व्याकरणादि
के सहाय से छन्द, स्वर, पदार्थ, अन्वय, भावार्थसहित ऋग्वेद
का पठन तीन वर्ष के भीतर करें। इसी प्रकार यजुर्वेद को
शतपथब्राह्मण और पदादि के सहित दो वर्ष, तथा सामब्राह्मण
और पदादि तथा गानसहित सामवेद को दो वर्ष, तथा गोपथब्राह्मण
और पदादि के सहित अथर्ववेद को दो वर्ष के भीतर पढ़ें और
पढ़ावें। सब मिलके ९ [नौ] वर्षों के भीतर चारों वेदों को
पढ़ना और पढ़ाना चाहिए।
पुनः ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद, जिसको वैद्यकशास्त्र
कहते हैं, जिसमें धन्वन्तरिजीकृत सुश्रुत और निघण्टु तथा
पतञ्जलि ऋषिकृत चरक आदि आर्षग्रन्थ हैं, इनको तीन वर्ष
के भीतर पढ़ें। जैसे सुश्रुत में शस्त्र लिखे हैं, बनाकर शरीर
के सब अवयवों को चीरके देखें तथा जो उसमें शारीरकादि
विद्या लिखी है, उसका साक्षात् करें।
तत्पश्चात् यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद, जिसको शस्त्रास्त्र-
विद्या कहते हैं, जिसमें अङ्गिरा आदि ऋषिकृत ग्रन्थ हैं, जो

  • ब्राह्मण वा जो सूत्र वेदविरुद्ध हिंसापरक हो, उसका प्रमाण न
    करना।

१२६ संस्कारविधिः
इस समय बहुधा नहीं मिलते, तीन वर्ष में पढ़ें और पढ़ावें।
पुनः सामवेद का उपवेद गान्धर्ववेद, जिसमें नारदसंहितादि
ग्रन्थ हैं, उन्हें पढ़के स्वर, राग, रागिणी, समय, वादित्र, ग्राम,
ताल, मूर्च्छना आदि का अभ्यास यथावत् तीन वर्ष के भीतर
करें।
तत्पश्चात् अथर्ववेद का उपवेद अर्थवेद, जिसको
शिल्पशास्त्र कहते हैं, जिसमें विश्वकर्मा, त्वष्टा और मयकृत
संहिता-ग्रन्थ हैं, उनको छह वर्ष के भीतर पढ़के विमान, तार,
भूगर्भादि विद्याओं का साक्षात् करें।
शिक्षा से लेके आयुर्वेद तक इन १४ चौदह विद्याओं को
३१ इकतीस वर्षों में पढ़के, महाविद्वान् होकर अपने और सब
जगत् के कल्याण और उन्नति करने में सदा प्रयत्न किया करें॥
॥ इति वेदारम्भसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

12
अथ समावर्त्तनसंस्कारविधिं
वक्ष्यामः
‘समावर्त्तन संस्कार’ उसे कहते हैं कि जिसमें ब्रह्मचर्यव्रत,
साङ्गोपाङ्ग वेदविद्या, उत्तम शिक्षा और पदार्थविज्ञान को पूर्ण
रीति से प्राप्त होके विवाह-विधानपूर्वक गृहाश्रम को ग्रहण करने
के लिए विद्यालय को छोड़के घर की ओर आना होता है।
इसमें प्रमाण—
वेदसमाप्तिं वाचयीत ॥
कल्याणैः सह सम्प्रयोगः ॥
स्नातकायोपस्थिताय। राज्ञे च। आचार्यश्वशुरपितृव्य-
मातुलानां च। दधनि मध्वानीय। सर्पिर्वा मध्वलाभे। विष्टरः
पाद्यमर्घ्यमाचमनीयं मधुपर्कः ॥
—यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है।
तथा पारस्करगृह्यसूत्र में कहा है—
वेदग्ँ समाप्य स्नायाद्। ब्रह्मचर्यं वाष्टाचत्वारिंशकम्।
त्रय एव स्नातका भवन्ति—विद्यास्नातको व्रतस्नातको
विद्याव्रतस्नातकश्चेति ॥
अर्थः—जब वेदों की समाप्ति हो तब समावर्त्तनसंस्कार
करे। सदा पुण्यात्मा पुरुषों के सब व्यवहारों में साझा रक्खे।
राजा, आचार्य, श्वसुर, चाचा और मामा आदि का अपूर्वागमन
जब हो और स्नातक अर्थात् जब विद्या और ब्रह्मचर्य पूर्ण करके
ब्रह्मचारी घर को आवे, तब प्रथम पाद्यम्=पग धोने का जल,
अर्घ्यम्=मुखप्रक्षालन के लिए जल और आचमन के लिए जल

१२८ संस्कारविधिः
देके शुभासन पर बैठा, दही में मधु अथवा सहत न मिले तो
घी मिलाके, एक अच्छे पात्र में धर इन्हें मधुपर्क देना होता
है और विद्यास्नातक, व्रतस्नातक तथा विद्याव्रतस्नातक ये तीन *
प्रकार के स्नातक होते हैं। इस कारण वेद की समाप्ति और
अड़तालीस वर्ष का ब्रह्मचर्य समाप्त करके ब्रह्मचारी विद्याव्रत
स्नान करे।
तं प्रतीतं स्वधर्मेण धर्मदायहरं पितुः।
स्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत् प्रथमं गवा॥
—मनु० ३।३॥
अर्थः—जो विद्वान् माता-पिता का पुत्र, शिष्य, ब्रह्मचारी
हो, वह स्वधर्म से यथावत् युक्त पितृस्थानी उस आचार्य को
उत्तम आसन पर बैठा, पुष्पमाला पहनाकर प्रथम गोदान देवे।
यथाशक्ति वस्त्र, धनादि भी देकर सत्कार करे॥
तानि॒ कल्प॑न्द् ब्रह्म॒चारी स॑लि॒लस्य॑ पृ॒ष्ठे तपो॑ऽतिष्ठत्तप्यमा॑नः
समु॒द्रे। स स्ना॒तो ब॒भ्रुः पि॑ङ्ग॒लः पृ॑थि॒व्यां ब॒हु रो॑चते॥
—अथर्व० कां० ११। प्रपा० २४। व० १६। मं० २६॥
अर्थ—जो ब्रह्मचारी समुद्र के समान गम्भीर, बड़े उत्तम
व्रत—ब्रह्मचर्य में निवास कर महातप करता हुआ वेदपठन,
वीर्यनिग्रह, आचार्य के प्रियाचरणादि कर्मों को पूरा कर पश्चात्
पृ० १३० में लिखे अनुसार स्नानविधि करके पूर्ण विद्याओं को
धरता, सुन्दर वर्णयुक्त होके पृथिवी में अनेक शुभ गुण-कर्म
और स्वभाव से प्रकाशमान होता है, वही धन्यवाद के योग्य है।

  • जो केवल विद्या को समाप्त तथा ब्रह्मचर्यव्रत को न समाप्त करके
    स्नान करता है वह विद्यास्नातक, जो ब्रह्मचर्यव्रत को समाप्त तथा
    विद्या को न समाप्त करके स्नान करता है, वह व्रतस्नातक और
    जो विद्या तथा ब्रह्मचर्यव्रत दोनों को समाप्त करके स्नान करता
    है, वह विद्याव्रतस्नातक कहाता है।

समावर्त्तनप्रकरणम् १२९
इसका समय—पृष्ठ ११२-११३ तक में लिखे प्रमाणे
जानना, परन्तु जब विद्या, हस्तक्रिया, ब्रह्मचर्यव्रत भी पूरा होवे,
तभी गृहाश्रम की इच्छा स्त्री और पुरुष करें। विवाह के स्थान
दो हैं—एक आचार्य का घर दूसरा अपना घर। दोनों ठिकानों
में से किसी एक ठिकाने आगे विवाह में लिखे प्रमाणे सब
विधि करे। इस संस्कार का विधि पूरा करके पश्चात् विवाह
करे।
विधि—जो शुभ दिन समावर्त्तन का नियत करे, उस दिन
आचार्य के घर में पृ० २३ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड आदि
बनाके सब शाकल्य और सामग्री संस्कार दिन से पूर्व दिन
में जोड़ रक्खे और स्थालीपाक* बनाके तथा घृतादि और पात्रादि
यज्ञशाला में वेदी के समीप रक्खे, पुनः पृ० २९ में लिखे प्रमाणे
यथावत् चारों दिशाओं में आसन बिछा बैठ, पृ० ९ से पृ०
२१ तक में ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण करे और
जितने वहाँ पुरुष आये हों, वे भी एकाग्रचित्त होके ईश्वर के
ध्यान में मग्न होवें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे
अग्न्याधान, समिदाधान करके पृ० ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी
के चारों ओर उदक-सेचन करके आसन पर पूर्वाभिमुख आचार्य
बैठके पृ० ३२ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार
और पृ० ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृ०
३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ और पृ० ३३ में
लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् आहुति एक और प्राजापत्याहुति
एक—ये सब मिलके अठारह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्
ब्रह्मचारी पृ० १०० में लिखे० (ओम् अग्ने सुश्रवः०) इस मन्त्र
से कुण्ड का अग्नि कुण्ड के मध्य में इकट्ठा करे। तत्पश्चात्
पृ० १०० में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये समिध०) इस मन्त्र

  • जोकि पूर्व पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे भात आदि बनाकर रक्खा
    हो।

१३० संस्कारविधिः
से कुण्ड में तीन समिधा होमकर, पृ० १०१ में लिखे प्रमाणे
(ओम् तनूपा०) इत्यादि सात मन्त्रों से दक्षिण हस्ताञ्जलि आग
पर थोड़ी-सी तपा, उस जल से मुखस्पर्श और तत्पश्चात् पृ०
१०१ में लिखे प्रमाणे (ओं वाक् च म०) इत्यादि मन्त्रों से
उक्त प्रमाणे अङ्ग-स्पर्श करे। पुनः सुगन्धादि औषधयुक्त जल
से भरे हुए आठ घड़े वेदी के उत्तरभाग में जो पूर्व से रक्खे
हुए हों, उन घड़ों में से—
ओं ये अप्स्वन्तरग्नयः प्रविष्टा गोह्य उपगोह्यो मयूषो
मनोहास्खलो विरुजस्तनूदूषुरिन्द्रियहा तान् विजहामि यो
रोचनस्तमिह गृह्णामि ॥
इस मन्त्र को पढ़, एक घड़े को ग्रहण करके, उस घड़े
में से जल लेके—'
ओं तेन मामभिसिञ्चामि श्रियै यशसे ब्रह्मणे
ब्रह्मवर्चसाय ॥
इस मन्त्र को बोलके स्नान करना। तत्पश्चात् उपरिकथित
(ओं ये अप्स्वन्तर०) इस मन्त्र को बोलके दूसरे घड़े को ले,
उसमें से लोटे में जल लेके—
ओं येन श्रियमकृणुतां येनावमृशताथँ सुराम्।
येनाक्ष्यावभ्यसिञ्चितां यद्द्वां तदश्विना यशः ॥
इस मन्त्र को बोलके स्नान करना।
तत्पश्चात् पूर्ववत् ऊपर के (ओं ये अप्स्वन्तर०) इसी
मन्त्र का पाठ बोलके वेदी के उत्तर में रक्खे घड़ों में से तीन
घड़ों को लेके पृ० ९४-९५ में लिखे हुए (ओं आपो हि ष्ठा०)
इन तीन मन्त्रों को बोलके, उन घड़ों के जल से स्नान करना।
तत्पश्चात् आठ घड़ों में से रहे हुए तीन घड़ों को लेके (ओं
आपो हि ष्ठा०) इन्हीं तीन मन्त्रों को बोलके स्नान करे। पुनः—

समावर्त्तनप्रकरणम् १३१
ओम् उदु॑त्त॒मं व॑रु॒ण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मँ श्र॑थाय ।
अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम॒ ॥
इस मन्त्र को बोलके ब्रह्मचारी अपनी मेखला और दण्ड
को छोड़े। तत्पश्चात् वह स्नातक ब्रह्मचारी सूर्य के सम्मुख खड़ा
रहकर—
ओम् उद्यन् भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थात् प्रातर्याव-
भिरस्थाद् दशसनिरसि दशसनिं मा कुर्वाविदन् मा गमय।
उद्यन् भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थाद् दिवा यावभिर-
स्थाच्छतसनिरसि शतसनिं मा कुर्वाविदन् मा गमय। उद्यन्
भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थात् सायं यावभिरस्थात् सहस्त्र-
सनिरसि सहस्त्रसनिं मा कुर्वाविदन् मा गमय॥
इस मन्त्र से परमात्मा का उपस्थान—स्तुति करके, तत्पश्चात्
दही वा तिल प्राशन करके, जटा-लोम और नख वपन अर्थात्
छेदन कराके—
ओम् अन्नाद्याय व्यूहध्वं सोमो राजायमागमत्।
स मे मुखं प्रमाक्ष्य॑ते यशसा च भगेन च॥
इस मन्त्र को बोलके ब्रह्मचारी उदुम्बर की लकड़ी से
दन्तधावन करे। तत्पश्चात् सुगन्धित द्रव्य शरीर पर मलके शुद्ध
जल से स्नान कर, शरीर को पोंछ, अधोवस्त्र अर्थात् धोती वा
पीताम्बर धारण करके, सुगन्धयुक्त चन्दनादि का अनुलेपन करे।
तत्पश्चात् चक्षु, मुख और नासिका के छिद्रों का—
ओं प्राणापानौ मे तर्पय चक्षुर्मे तर्पय श्रोत्रं मे तर्पय॥
इस मन्त्र से स्पर्श करके, हाथ में जल ले, अपसव्य और
दक्षिणमुख होके—
ओं पितरः शुन्धध्वम्॥
इस मन्त्र से जल भूमि पर छोड़के, सव्य होके—