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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 111

वेदारम्भप्रकरणम् १०७
सभा में बैठनेयोग्य गुण ग्रहण कर॥ २१ ॥ मेखला और दण्ड
का धारण, भिक्षाचरण, अग्निहोत्र, स्नान, सन्ध्योपासन, आचार्य
का प्रियाचरण, प्रातःसायं आचार्य को नमस्कार करना ये तेरे
नित्य करने के कर्म और जो निषेध किये वे नित्य न करने
के कर्म हैं॥ २२ ॥
जब पिता यह उपदेश कर चुके, तब बालक पिता को
नमस्कार कर, हाथ जोड़के कहे कि—'जैसा आपने उपदेश
किया है, मैं वैसा ही करूँगा।'
तत्पश्चात् ब्रह्मचारी यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, कुण्ड
के पश्चिम भाग में खड़ा रहके, माता-पिता, भाई-बहिन, मामा,
मौसी, चाचा आदि से लेके जो भिक्षा देने में नकार न करें,
उनसे भिक्षा* माँगे और जितनी भिक्षा मिले, उसे आचार्य के
आगे धर दे। तत्पश्चात् आचार्य उसमें से कुछ थोड़ा-सा अन्न
लेके वह सब भिक्षा बालक को दे देवे और वह बालक उस
भिक्षा को अपने भोजन के लिए रख छोड़े।
तत्पश्चात् बालक को शुभासन पर बैठाके पृष्ठ ३६-३७
में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करना। तत्पश्चात् बालक पूर्व
रक्खी हुई भिक्षा का भोजन करे। पश्चात् सायंकाल तक विश्राम
और गृहाश्रम-संस्कार में लिखा सन्ध्योपासन आचार्य बालक
के हाथ से करावे।
और पश्चात् ब्रह्मचारीसहित आचार्य कुण्ड के पश्चिम भाग
में आसन पर पूर्वाभिमुख बैठे और स्थालीपाक अर्थात् पृष्ठ २८

  • ब्राह्मण का बालक यदि पुरुष से भिक्षा माँगे तो "भवान् भिक्षां
    ददातु" और जो स्त्री से माँगे तो "भवती भिक्षां ददातु" और
    क्षत्रिय का बालक "भिक्षां भवान् ददातु" और स्त्री से "भिक्षां
    भवती ददातु", वैश्य का बालक "भिक्षां ददातु भवान्" और
    "भिक्षां ददातु भवती" ऐसा वाक्य बोले।