संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
९—संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता, ज्ञानका उत्तम माहात्म्य, श्रीराममें प्रश्नकर्ताके गुणोंकी अधिकताका वर्णन, जीवन्मुक्तिरूप फलके हेतुभूत वैराग्य आदि गुणोंका तथा शमका विशेषरूपसे निरूपण
८० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उपयुक्त बहुत-से स्मृति-ग्रन्थों तथा यज्ञविधायक शास्त्रोंका निर्माण किया। तत्पश्चात् इस कालचक्रके चलते रहनेपर जब उस क्रमका विनाश हो गया तथा लोग प्रतिदिन भोजनमात्रपरायण और खाद्य पदार्थोंके उपार्जनमें तत्पर हो गये, तब हमलोगों ने उनकी दीनताका विनाश करने तथा लोकमें आत्मतत्त्वज्ञानके प्रचारके लिये बड़े-बड़े ज्ञानोत्पादक शास्त्रोंका उपदेश किया। यह अध्यात्मविद्या प्रथमतः राजसमाजमें उपदिष्ट हुई। तदनन्तर इसका प्रसार लोकमें हुआ। इसी कारण इसे 'राजविद्या' कहा गया है। रघुनन्दन ! राजविद्या एवं राजगुह्य नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, उस उत्तम अध्यात्मज्ञानको पाकर राजालोग दुःखरहित हो परमानन्दको प्राप्त हो गये। श्रीराम ! कालक्रमानुसार निर्मल कीर्तिवाले बहुसंख्यक राजाओंके स्वर्गवासी हो जानेपर इस समय तुम इस भूतलपर इन महाराज दशरथके यहाँ प्रकट हुए हो। शत्रुओंका मर्दन करनेवाले राम ! तुम्हारा मन अत्यन्त निर्मल है, इसीलिये किसी निमित्तके बिना स्वाभाविक ही तुम्हारे मनमें यह परम पावन तथा उत्तम वैराग्य जाग उठा है; क्योंकि समस्त विवेकशील पुरुषोंमें जिसकी ख्याति है, उस श्रेष्ठ पुरुषका भी वैराग्य किसी निमित्तको लेकर होता है, इसलिये वह राजस कहलाता है, परंतु तुम्हारे मनमें उत्पन्न हुआ यह वैराग्य अपूर्व है। यह किसी निमित्तकी अपेक्षा न रखकर स्वतः अपने विवेकसे उत्पन्न हुआ है और सत्पुरुषोंको आश्चर्यमें डालनेवाला है, अतः सात्त्विक है। जिन्हें निमित्तके बिना ही वैराग्य हो जाता है, वे ही महापुरुष तथा ज्ञानवान् हैं और उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध है।* जो लोग ज्ञानद्वारा इस सृष्टिपरम्पराका विचार करके वैराग्यको प्राप्त होते हैं, वे ही उत्तम पुरुष हैं।
श्रीराम ! जो लोग इस संसारकी असारता एवं दुःखरूपताको देखकर अपनी सांसारिक बुद्धिका परित्याग कर देते हैं, वे साँकलसे छूटे हुए गजराजोंकी भाँति संसार-बन्धनसे मुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। यह जगत्-परम्परा विभ्रम और अनन्त है। इसमें पड़ा हुआ महान् जीव देहाध्याससे युक्त रहता है, अतएव ज्ञानके बिना उसे परमपदकी प्राप्तिका मार्ग नहीं सूझता। परंतु रघुनन्दन ! जिनकी बुद्धि अगाध है—ऐसे विवेकशील पुरुष इस दुस्तर भवसागरको ज्ञानरूपी नौकाद्वारा क्षणमात्रमें ही पार कर जाते हैं। संसार-सागरसे उबारनेवाले उस ज्ञानरूप उपायको तुम अपनी बुद्धिसे, जो नित्य विवेक-वैराग्य आदिसे समन्वित है, एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो; क्योंकि इस निर्दोष ज्ञानयुक्तिके बिना अनन्त विक्षेपोंसे परिपूर्ण ये सांसारिक दुःख और भय चिरकालतक हृदयको संतप्त करते रहते हैं। राघव ! श्रेष्ठ पुरुषोंमें शीत, उष्ण, वात आदि द्वन्द्वजनित दुःखोंको सहन करनेकी क्षमता ज्ञानके बलपर ही आती है, अन्यथा ज्ञानयुक्तिके अतिरिक्त वे किसी प्रकार सह्य नहीं हो सकते। दुःखकी चिन्ताएँ अज्ञानी मनुष्यको पद-पदपर आ घेरती हैं और समयानुसार उसे उसी प्रकार संतप्त करती रहती हैं, जैसे अग्निकी लपटें तृणको जलाकर भस्म कर डालती हैं; परंतु जिस प्रकार वर्षाके जलसे अभिषिक्त हुए वनपर उन अग्नि-ज्वालाओंका प्रभाव नहीं पड़ता, उसी तरह जिसे जाननेयोग्य अध्यात्मशास्त्रका ज्ञान प्राप्त हो गया है तथा जिसने भलीभाँति ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे ज्ञानी पुरुषको मानसिक व्यथाएँ संताप नहीं पहुँचा सकतीं। इस संसाररूपी मरुस्थलमें बहनेवाली वायु शारीरिक तथा मानसिक कष्टरूपी आवर्तोंसे परिपूर्ण है। यह क्षुब्ध होकर भी तत्त्वज्ञानीको वैसे ही पीड़ित नहीं कर सकती, जैसे प्रचण्ड आँधी कल्पवृक्षका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह तत्त्वज्ञानकी
* ते महान्तो महाप्राज्ञा निमित्तेन विनैव हि।
वैराग्यं जायते येषां तेषां ह्यमलमानसस्॥
(मुमुक्षु० ११। २४)
[ मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन * ८१
प्राप्तिके लिये, जो श्रुति आदिका प्रमाण देनेमें कुशल और आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञाता हो, ऐसे ज्ञानी पुरुषके पास जाकर प्रयत्नपूर्वक विनयभावसे प्रश्न करे। फिर जैसे केसरसे रँगा हुआ वस्त्र उसके रंगको पकड़ लेता है, उसी प्रकार जिससे प्रश्न किया गया है, उस प्रमाणकुशल तथा विशुद्ध चित्तवाले उपदेष्टाके वचनको प्रयत्नपूर्वक ग्रहण करना चाहिये। किंतु वाग्वक्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! जो तत्त्वका ज्ञाता नहीं है, अतएव जिसके वचन अग्राह्य हैं, ऐसे पुरुषसे जो तत्त्वविषयक प्रश्न करता है, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कोई नहीं है। इसी प्रकार जिससे पूछा गया है, उस प्रमाणकुशल तथा तत्त्वज्ञानी वक्ताके उपदेशका जो पुरुष यत्नपूर्वक अनुसरण नहीं करता, उससे बढ़कर दूसरा कोई नराधम नहीं है। अतः वक्ताके व्यवहार आदि कार्योंसे उसकी अज्ञता तथा तत्त्वज्ञताका पहले निर्णय करके जो पुरुष उससे प्रश्न करता है, वह प्रश्नकर्ता उत्कृष्ट बुद्धिवाला माना जाता है; परंतु जो मूर्ख जिज्ञासु उत्तम वक्ताका निर्णय किये बिना ही उससे प्रश्न करता है, वह अधम कहलाता है और उसे तत्त्वज्ञानरूप महान् अर्थकी प्राप्ति भी नहीं होती। ज्ञानीको भी चाहिये कि पूर्वापरका विवेचन करके उसका निश्चय करनेमें जिसकी बुद्धि समर्थ हो और जो निन्दनीय न हो, ऐसे पुरुषको उसके पूछे हुए तत्त्वका उपदेश दे; परंतु जो आहार-निद्रा-भय-मैथुन आदि पशुधर्मसे संयुक्त है, ऐसे अधमको तत्त्वका उपदेश न दे। क्योंकि प्रश्नकर्ताकी श्रुति आदि प्रमाणोंद्वारा निर्णीत पदार्थके ग्रहणकी योग्यताका विचार किये बिना ही जो वक्ता उसे उपदेश देता है, उस पुरुषको ज्ञानीजन इस लोकमें महान् मूर्ख बतलाते हैं। रघुनन्दन ! तुम प्रशंसनीय गुणोंसे युक्त अत्यन्त श्रेष्ठ प्रश्नकर्ता हो और मैं उपदेश देना जानता हूँ, अतः हम दोनोंका यह समागम उचित ही है। शब्दार्थके ज्ञाता राम ! जनसमाजमें तुम महापुरुष माने जाते हो। तुममें रागका लेशमात्र भी नहीं है। तुम तत्त्वके ज्ञाता हो। इसलिये तुम्हारे प्रति किया हुआ उपदेश तुम्हारे अन्तर्हृदयमें चिपक जाता है, ठीक उसी तरह जैसे घोला हुआ रंग वस्त्रमें लग जाता है। तुम्हारी तीक्ष्ण बुद्धि उक्त पदार्थके ग्रहण करनेमें निपुण और परमार्थका विवेचन करनेवाली है। वह परमार्थ-विषयमें उसी प्रकार प्रवेश करती है, जैसे सूर्यकी किरणें जलके भीतर घुस जाती हैं। इसलिये मैं जिस पदार्थका उपदेश करूँ, उसे तुम 'यह तत्त्व-वस्तु है' यों निश्चय करके यत्नपूर्वक अपने हृदयमें पूर्णतया धारण कर लो।
मनुष्यको चाहिये कि वह विवेकहीन, अज्ञानी और दुर्जनोंसे प्रेम करनेवाले मनुष्यका दूरसे ही परित्याग करके साधु-महात्माओंकी सेवा करे; क्योंकि सदा सज्जनोंके सम्पर्कमें रहनेसे विवेककी उत्पत्ति होती है। यह विवेक एक वृक्षके समान है और भोग तथा मोक्ष उसके फल कहे गये हैं। उस मोक्षके द्वारपर निवास करनेवाले चार द्वारपाल बतलाये जाते हैं जिनके नाम हैं—शम, विचार, संतोष और चौथा साधुसंगम। मनुष्यको इन चारोंका ही प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये; क्योंकि इनका भलीभाँति सेवन होनेपर ये मोक्षरूपी राजमहलके द्वारको खोल देते हैं। यदि चारोंका सेवन न हो सके तो तीनका या दोका सेवन अवश्य करना चाहिये। दोका भी सेवन न हो सके तो सभी उपायोंद्वारा प्राणोंकी बाजी लगाकर भी एकका आश्रय तो अवश्य ही ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि जब एक वशमें आ जाता है, तब शेष तीनों भी अधीन हो जाते हैं।* विवेकी पुरुष तप, दान और
* मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारः परिकीर्तिताः ।
शमो विचारः सन्तोषश्चतुर्थः साधुसङ्गमः ॥
एते सेव्याः प्रयत्नेन चत्वारो द्वौ त्रयोऽथवा ।
द्वारमुद्घाटयन्त्येते मोक्षराजगृहे यथा ॥
८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शास्त्रके श्रवण-मनन आदिका उत्तम पात्र होता है। जैसे तेजस्वियोंमें सूर्य सर्वश्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार वह लोगोंमें आभूषणके समान आदरणीय होता है। जैसे शीतकी अधिकताके कारण जल जमकर पत्थरके सदृश हो जाता है, उसी प्रकार अविवेकियोंकी बुद्धि मन्दता—घनताको प्राप्त होकर अत्यन्त जड हो जाती है। रघुकुलभूषण राम ! तुम्हारा अन्तःकरण तो सूर्योदय होनेपर खिले हुए कमलकी भाँति सौजन्य आदि गुण एवं शास्त्रार्थकी दृष्टियोंसे विकसित हो गया है। मनुष्यको उचित है कि वह पहले आवागमनके चक्रसे छूटनेके लिये शास्त्राभ्यास और सत्संगतिपूर्वक तपस्या एवं इन्द्रियनिग्रहद्वारा अपनी बुद्धिका ही संवर्द्धन करे। यह संसार विषवृक्षके समान है। यह विपत्तियोंका एकमात्र स्थान है, जो अज्ञानी मनुष्यको सदा मोहित करता रहता है; इसलिये यत्नद्वारा अज्ञानका विनाश कर डालना ही उचित है। * जैसे मेघरहित आकाशमें निर्मल एवं पूर्ण मण्डलवाले चन्द्रमाको देखकर दृष्टि प्रसन्न होती है, उसी प्रकार यह पूर्वोक्त परमार्थ वस्तुदृष्टि ज्ञानीमें यथार्थ वस्तुके साथ एकरसताको प्राप्त होकर प्रसन्न हो जाती है। जिसकी बुद्धि पूर्वापरके विचारसे सूक्ष्मतम अर्थको ग्रहण करनेमें निपुण और चतुरतासे शोभित होकर पूर्ण विकसित हो गयी है, वही 'पुमान्' अर्थात् पुरुष कहा जाता है। श्रीराम ! तुम्हारा हृदय अज्ञानसे रहित अतएव विशुद्ध शान्ति आदि गुणोंसे विकसित एवं उत्तम विचारकी शीतल चाँदनीसे प्रकाशित है। उस हृदयसे युक्त होकर तुम उसी प्रकार सुशोभित हो रहे हो, जैसे निर्मल चन्द्रमासे आकाशकी शोभा होती है।
(सर्ग १०-११)
संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता, ज्ञानका उत्तम माहात्म्य, श्रीराममें प्रश्नकर्ताके गुणोंकी अधिकताका वर्णन, जीवन्मुक्तिरूप फलके हेतुभूत वैराग्य आदि गुणोंका तथा शमका विशेषरूपसे निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तुम्हारा मन उत्तम गुणोंसे परिपूर्ण है। तुम हमारे योग्य शिष्य हो और प्रश्न करनेका ढंग भी तुम्हें भलीभाँति ज्ञात है। तुम कही हुई बातको विशेषरूपसे समझ लेते हो, इसीलिये मैं आदरपूर्वक तुम्हें उपदेश देनेको उद्यत हुआ हूँ। अब तुम अपनी बुद्धिको, जो रजोगुण और तमोगुणसे रहित और शुद्ध सत्त्वगुणका अनुसरण करनेवाली है, आत्मामें स्थापित करके ज्ञानोपदेश श्रवण करनेके लिये तैयार हो जाओ। प्रश्नकर्तामें जितने गुण होने चाहिये, वे सभी गुण तुममें वर्तमान हैं और जैसे समुद्रमें रत्न आदि सम्पत्तियाँ भरी रहती हैं, उसी तरह वक्ताके सभी गुण मुझमें विद्यमान हैं। वत्स ! जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके सम्पर्कसे चन्द्रकान्तमणिमें आर्द्रता आ जाती है, उसी तरह तुम भी ज्ञानके संसर्गसे उत्पन्न हुए वैराग्यको प्राप्त हुए हो। तुम तो सर्वथा शुद्ध हो। तुम्हारा बाल्यावस्थासे ही शुद्ध, विस्तृत तथा अविच्छिन्न सद्गुणोंके साथ सम्बन्ध चला आ रहा है—ठीक उसी तरह जैसे कमलका अपने विस्तारवाले, निर्मल एवं दीर्घ तन्तुओंसे लगाव रहता है। इसलिये तुम्हीं इस कथाको सुननेके योग्य अधिकारी हो। अब मैं इस मोक्षकथाका वर्णन करूँगा, तुम सावधान होकर इसे सुनो। यह कथा उस परमपदसे सम्बन्ध रखनेवाली है, जिसका साक्षात्कार हो जानेपर जितने लौकिक कार्य तथा जितनी लौकिक दृष्टियाँ हैं, वे सब-के-सब पूर्णतया शान्त हो जाते हैं।
एकं वा संप्रयत्नेन प्राणांस्त्यक्त्वा समाश्रयेत् । एकस्मिन् वशगे यान्ति चत्वारोऽपि वशं यतः ॥
(मुमुक्षु० ११। ५९-६१)
* संसारविषवृक्षोऽयमेकमास्पदमपदाम् । अज्ञं सम्मोहयेन्नित्यं मौर्य्ये यत्नेन नाशयेत् ॥
(मुमुक्षु० ११। ६९)
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] ४ संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता तथा ज्ञानका उत्तम माहात्म्य * ८३
श्रीराम ! संसाररूपी विषके आवेशसे उत्पन्न हुई विषूचिका बड़ी दुस्सह होती है। विषनिवारक गारुडमन्त्रसे ही उसका समूल नाश होता है। जीव और ब्रह्मका एकात्मबोध ही वह गारुडमन्त्र है। वही परमार्थज्ञानका भी मूलमन्त्र है। सत्पुरुषोंके साथ शास्त्रानुशीलन करनेसे निःसन्देह उस योगकी प्राप्ति होती है।
शास्त्रचिन्तन करनेपर इसी जन्ममें अवश्य ही सम्पूर्ण दुःखोंका समूल विनाश होता है—ऐसा मानना चाहिये; इसलिये उन विवेकशील सत्पुरुषोंको अवहेलनाकी दृष्टिसे नहीं देखना चाहिये। जिस विवेकी पुरुषको सम्यग्दृष्टिकी उपलब्धि हो चुकी है, वह पुरानी केंचुलका त्याग करके संतापरहित हुए सर्पकी भाँति मानसिक व्यथाओंसे परिपूर्ण इस संसारके अनुरागका परित्याग करके संतापरहित हो जाता है। उसका अन्तःकरण शीतल हो जाता है। वह सम्पूर्ण जगत्को विनोदपूर्वक इन्द्रजालकी तरह सुखरूप देखता है; परन्तु जो उस सम्यग्दृष्टिसे रहित है, उसके लिये यह संसार परम दुःखदायी ही है। यह संसारानुराग बड़ा ही कष्टदायक है। यह अनर्थकी आशङ्का किये बिना ही मोहवश विषयोंमें फँसे हुए पुरुषोंको सर्पकी तरह डँस लेता है, खड्गकी भाँति काट डालता है, भालेके समान बेध देता है, रस्सीकी तरह आवेष्टित कर लेता है, आगके सदृश जला देता है, रात्रिकी तरह अंधा बना देता है, सिरपर गिरे हुए पत्थरके समान मूर्च्छित कर देता है, विचार-शक्तिको हर लेता है, मर्यादाका विनाश कर देता है और मोहरूपी अन्धकूपमें गिरा देता है। तृष्णा तुम्हें जर्जर कर देती है। अधिक क्या, संसारमें ऐसा कोई दुःख नहीं है जो संसारी मनुष्यको तृष्णासे न प्राप्त होता हो। यह विषयमोहरूपिणी विषूचिका दुष्परिणामवाली है। यह नरक-नगररूप शरीर-समुदायके साथ अनुराग उत्पन्न करनेवाली है। यदि इसकी चिकित्सा न की जाय तो यह अवश्य ही उन-उन हजारों नारकीय दुर्गत्तियोंको प्राप्ति कराती है, जहाँ नरकोंमें पाषाणभक्षण, खड्गद्वारा अङ्गोंका छेदन, पर्वतशिखरसे निपातन, पत्थरद्वारा घट्टन और अग्निदाहको हिमाभिषेककी भाँति, अङ्गोंके झुलसनेको चन्दनके लेपकी तरह, असिपत्रवाले वृक्षोंके वनमें दौड़ने, कीड़ोंके द्वारा शरीरमें छिद्र किये जाने और लोहेकी गरम जंजीरोंद्वारा देहके लपेटनेको शरीर-रक्षाके समान, युद्धमें काम आनेवाले अग्नि-बुझे बाणोंकी धारावाहिक वृष्टिको ग्रीष्मऋतुमें विनोदके लिये किये गये जलयन्त्रोंके फुब्बारोंकी बूँद-वर्षाके सदृश, सिरके काटे जानेको सुखनिद्राके तुल्य, मुख बंद करके बलपूर्वक किये गये मूकीभावको स्वाभाविक मुखमुद्राके समान और अकिञ्चित्करताको महती सम्पद्वृद्धिकी तरह सहन करना पड़ता है। राघव ! इस प्रकार सहस्रों कष्टप्रद चेष्टाओंसे परिपूर्ण इस दारुण संसारचक्रमें उपर्युक्त उपदेशकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; बल्कि ऐसा विचार और निश्चय अवश्य करना चाहिये कि शास्त्रानुशीलनसे निश्चय ही कल्याण होता है। सत्पुरुषोंके साथ शास्त्रचिन्तन करनेसे जिसका देहाभिमान नष्ट हो गया है, उसे तत्त्वका ज्ञान हो जानेसे सर्वव्यापक आत्माका स्वरूप विदित हो जाता है। वह शुद्ध बुद्धिद्वारा परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है और अज्ञानरूपी घने बादलके विलीन हो जानेपर उसके मोहका विनाश हो जाता है। फिर तो उसके लिये यह जगत्में विचरण करना रमणीय हो जाता है।
श्रीराम ! जिन्हें आत्मस्वरूपका ज्ञान हो गया है, ऐसे उत्तम बुद्धिसम्पन्न महापुरुष इस पूर्वोक्त दृष्टिका अवलम्बन करके इस संसारमें विचरते हैं। उन्हें न शोक होता है, न कामना होती है और न वे शुभाशुभकी याचना ही करते हैं। वे इस संसारमें सब कुछ करते हुए भी अकर्त्ताके समान रहते हैं। वे हेय और उपादेयके पक्षपातसे रहित होकर अपने आत्मामें स्थित रहते हैं, पवित्रतासे रहते हैं और सत्-शास्त्रोंमें प्रतिपादित स्वच्छ कर्म करते हुए सन्मार्गपर चलते हैं। अन्य लोगोंकी दृष्टिसे वे सोते हैं,
८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जाते हैं, कर्म करते हैं और बोलते हैं; परन्तु वास्तवमें वे न आते हैं न जाते हैं, न कर्म करते हैं और न बोलते ही हैं। क्योंकि परमानन्दस्वरूप परमात्माको प्राप्त हुआ पुरुष न तो इन्द्रजालरूप मायिक कार्य करता है और न सांसारिक वासनाओंके पीछे ही दौड़ता है। वह बालकोंकी-सी भ्रममूलक चपलताका परित्याग करके पूर्वकथित परमात्माके स्वरूपमें ही सदा विराजमान रहता है। इस प्रकारकी स्थितियाँ आत्मतत्त्वके साक्षात्कारके अतिरिक्त अन्य उपायसे नहीं उपलब्ध होतीं। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह जीवनपर्यन्त आत्माकी ही खोज करे, उसीकी उपासना करे और उसीका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे। इसके अतिरिक्त उसके लिये और कोई कर्तव्य नहीं है।
जिस पुरुषको अपने अनुभव, शास्त्रवचन और गुरुके उपदेशकी एकवाक्यताका निश्चय हो गया है वह निरन्तर किये गये उपर्युक्त अभ्यासके द्वारा परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है। चाहे भारी-से-भारी आपत्ति क्यों न आ पड़े, परन्तु जो शास्त्र और उसके अर्थकी अवहेलना करनेवाले तथा तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंकी अवज्ञा करनेवाले हैं—ऐसे मूर्खोंका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। क्योंकि भूतलपर मनुष्योंको जितना कष्ट अपने शरीरमें स्थित अकेली मूर्खतासे प्राप्त होता है, उतना दुःख शारीरिक क्लेश, विष, आपत्ति और मानसिक व्यथाएँ नहीं दे सकतीं। जिनकी बुद्धि कुछ भी उत्तम संस्कारोंसे संस्कृत हो चुकी है, उनकी मूर्खताका विनाश करनेमें जैसा यह शास्त्र समर्थ है, वैसा अन्य कोई शास्त्र नहीं है। जैसे खैरसे काँटे उत्पन्न होते हैं, उसी तरह जितनी दुस्तर आपत्तियाँ और अधम कुत्सित योनियाँ हैं, वे सभी मूर्खतासे पैदा होती हैं। जिस संसारी पुरुषको मोक्षके उपायभूत इस शास्त्ररूप प्रकाशकी प्राप्ति हो गयी है वह मोहान्धकारमें भी पुनः अन्धताको नहीं प्राप्त होता। तृष्णा मानवरूपी कमलको तभीतक संकुचित करती है, जबतक विवेकरूपी सूर्यकी निर्मल प्रभाका उदय नहीं होता। रघुनन्दन ! जैसे इस संसारमें भगवान् विष्णु एवं शंकर आदि तथा अन्यान्य महर्षिगण जीवन्मुक्त हो विचरते रहते हैं, उसी प्रकार तुम भी सांसारिक दुःखसे छुटकारा पानेके लिये मेरे-जैसे आत्मीयजनोंके साथ बैठकर गुरूपदेश एवं शास्त्रप्रमाणद्वारा अपने स्वरूप-को जानकर जगत्में विहार करो। इस जगत्में सुख तो तुच्छ-से-तुच्छ तिनकेके सदृश है, परंतु दुःखोंका तो अन्त ही नहीं है; इसलिये जो दुःखरूप परिणामसे परिपूर्ण है, उन लौकिक सुखोंमें आस्था नहीं करनी चाहिये।
ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह परम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये जो अनन्त और आयासरहित है, उस परम पदको प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करे; क्योंकि जिनका मन संतापरहित होकर सर्वोत्कृष्ट परम पदरूप परमात्मामें लीन हो गया है, वे ही पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं और उन्हींको परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। जो दुरात्मा पुरुष राज्य आदि जागतिक सुखोंके उपलब्ध होनेपर उनके उत्तम भोगोंके आस्वादनमात्रसे ही तृप्त बने रहते हैं, उन्हें तो तुम अंधे मेढक समझो।* जिनकी बुद्धि अज्ञानके कारण मन्द पड़ गयी है, वे मूर्ख वञ्चकों, प्रबल दुराचारियों, लौकिक भोगोंमें रचे-पचे रहनेवालों और मित्रका-सा व्यवहार करनेवाले शत्रुओंमें आसक्ति करने लगते हैं, जिससे उन्हें एक संकटसे दूसरे संकटकी, एक दुःखसे दूसरे दुःखकी, एक भयसे दूसरे भयकी और एक नरकसे दूसरे नरककी प्राप्ति होती रहती है।† इसलिये उत्तम विवेकका आश्रय
* संभोगाशनमात्रेण राज्यादिषु सुखेषु च।
संतुष्टा दुष्टमनसो विद्धि तानन्धदर्दुरान् ॥
( मुमुक्षु० १३ । २६ )
† ये शठेषु दुरन्तेषु दुष्कृतारम्भशालिषु ।
द्विपत्सु मित्ररूपेषु भक्ता वै भोगभोगिषु ॥
ते यान्ति दुर्गमाद् दुर्गं दुःखाद् दुःखं भयाद्भयम् ।
नरकान्नरकं मूढा मोहमन्थरबुद्धयः ॥
( मुमुक्षु० १३ । २७-२८ )