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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

**१८—सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता, क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका तथा सत्पुरुषोंकी दुर्लभताका प्रतिपादन**

वैराग्य-प्रकरण ] * कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता * ५३


जी भरकर तृप्त करता है। जैसे बालक गीली मिट्टीको लेकर नाना प्रकारके खिलौने बनाते हैं, उसी प्रकार काल भी बारंबार चौदह भुवन, विभिन्न वन, लोक-लोकान्तर, जीव-समुदाय तथा उनके नाना प्रकारके आचार-विचारोंकी सृष्टिकरता है। उन आचार-विचारोंकी प्रवृत्ति सत्ययुग और त्रेतामें अचल तथा द्वापर और कलिमें चल होती है। इन सबकी सृष्टि करनेमें काल कभी थकता नहीं।

(सर्ग २३—२५)


कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—महामुने ! जब जगत्में काल आदिके चरित्र ऐसे हैं, तब आप ही बताइये इस संसार-नामधारी प्रपञ्चमें मेरे-जैसे लोगोंकी क्या आस्था हो सकती है। मुने ! इन दैव (प्रारब्धकर्म) आदिके द्वारा की हुई सुख-दुःख आदिरूप प्रपञ्च-रचनाओंसे मोहित हुए हमलोग किसीके हाथ बिके हुए दासों तथा वनके मृगोंकी भाँति पराधीन हो रहे हैं। जैसे सर्प वायुको पीता है, उसी प्रकार यह क्रूर आचरण करनेवाला काल तरुण शरीरको बुढ़ापेमें पहुँचाकर समस्त प्राणि-समुदायको निरन्तर अपना ग्रास बनाता रहता है। काल निर्दयोंका राजा है। वह किसी भी आर्त प्राणीके ऊपर दया नहीं करता। सम्पूर्ण भूतोंपर दया करनेवाला उदार पुरुष तो इस संसारमें दुर्लभ हो गया है। मुने ! जगत्में जितनी भी प्राणियोंकी जातियाँ हैं, उन सबका वैभव अल्प एवं तुच्छ है तथा जितने भी भोगके स्थान हैं, वे सभी भयंकर और परिणाममें दुरन्त दुःखकी ही प्राप्ति करानेवाले हैं। प्राणियोंकी आयु अत्यन्त चपल (अस्थिर) है, मृत्यु बहुत ही निर्दय है। जवानी भी अधिक चञ्चल होती है और बाल्यावस्था मोहमें ही बीत जाती है । संसारी मनुष्य गाने-बजानेकी कलाके रस (अथवा विषया-नुसंधान) से कलङ्कित हैं । बन्धु-बान्धव संसारमें बाँधनेके लिये रस्सीके समान हैं । भोग इस जगत्के महान् रोग हैं तथा सुख आदिकी तृष्णाएँ मृगतृष्णाके समान हैं । बिना जीती हुई इन्द्रियाँ ही शत्रु हैं । सत्यस्वरूप आत्मा असत्य-सा हो गया अर्थात् जीवात्मा अज्ञानके कारण देहको ही अपना स्वरूप मानने लग गया । बिना जीता हुआ मन बन्धनका हेतु होनेसे आत्माका शत्रु है एवं अज्ञानवश यह जीवात्मा स्वयं ही अपने-आपपर उस मनके द्वारा प्रहार करता है । अहंकार ही कलङ्कका कारण है । बुद्धियाँ अत्यन्त कोमल (आत्म-निष्ठासे रहित) हैं। क्रियाएँ शास्त्रविरुद्ध होनेसे दुःखरूप फल देनेवाली हैं और लीलाएँ (शरीर और मनकी चेष्टाएँ) स्त्रीकी प्राप्तिमें ही केन्द्रित हैं, केवल स्त्रियाँ ही उनका विषय हो गयी हैं । इच्छाएँ विषयोंमें ही शोभा पाती हैं—वे भोगोंकी ओर ही दौड़ती हैं । परमात्म-स्फूर्तिरूप चमत्कार नष्ट हो गये हैं । स्त्रियाँ दोषोंकी सेनाएँ हैं तथा सम्पूर्ण विषय-रस वास्तवमें नीरस हैं ।

महात्मन् ! दूषित बुद्धिने सबके अन्तःकरणको व्याकुल कर रक्खा है। अज्ञानके कारण सभी सन्तप्त हो रहे हैं । रागरूपी रोग दिनोंदिन बढ़ रहा है और वैराग्य दुर्लभ हो रहा है । आत्मदर्शनकी शक्ति रजोगुणसे नष्ट हो गयी है । अतः सत्त्वगुण नहीं प्राप्त होता, केवल तमोगुण बढ़ रहा है। इसलिये तत्त्व (सच्चिदानन्दघन परमात्मा) अत्यन्त दूर है । जीवन अस्थिर हो गया है। मृत्यु जल्दी ही आनेके लिये उत्सुक है । धैर्य शिथिल हो गया है और तुच्छ विषय-भोगोंके प्रति लोगोंकी आसक्ति प्रतिदिन बढ़ रही है । बुद्धि मूढ़तासे मलिन हो गयी है । शरीरका अन्तिम परिणाम एकमात्र पतन (विनाश) ही है । देहमें जरावस्था प्रज्वलित हो उठी है और पापकी ही बारंबार स्फुरणा होती है । जवानी भागी जा रही है । सत्सङ्ग दुर्लभ हो गया है।

५४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ

कभी कोई उत्तम आश्रय नहीं मिलता और सत्यभावका उदय तो कहीं हो ही नहीं रहा है। मन मोहसे आच्छन्न-सा हो रहा है। दूसरेको सुखी देखकर होनेवाला आत्म-संतोष मानो दूर चला गया है। उज्ज्वल करुणाका उदय नहीं हो रहा है और नीचता दूरसे निकट चली आ रही है। धीरता अधीरतामें परिणत हो रही है। जीवोंका काम केवल आवागमन—जन्मना-मरना रह गया है। दुष्टोंका सङ्ग पद-पदपर सुलभ है; परंतु सत्पुरुषोंका सङ्ग अत्यन्त दुर्लभ हो गया है। सम्पूर्ण पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं। वासना संसारमें बाँधनेवाली है और काल प्राणियोंकी परम्पराको नित्य कहीं अज्ञात स्थानमें लिये जाता है। दिशाएँ भी नहीं दिखायी देतीं।

देश भी विदेश-सा हो जाता है और पर्वत भी बिखर-कर ढह जाते हैं; फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरतामें क्या विश्वास है। सत्तामात्र ही जिसका स्वरूप है, वह काल आकाशको भी खा जाता है। चौदहों भुवनोंको भी अपना भोजन बना लेता है। पृथ्वी भी विनाशको प्राप्त हो जाती है। फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या विश्वास किया जा सकता है। कालवश समुद्र भी सूख जाते हैं, तारे भी टूटकर बिखर जाते हैं, सिद्ध भी नष्ट हो जाते हैं; फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या आस्था हो सकती है ? बड़े-बड़े दानव भी विदीर्ण हो जाते हैं। ध्रुव भी अध्रुवजीवी बन जाते हैं और अमर भी मरणको प्राप्त होते हैं; फिर मेरे-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या विश्वास हो सकता है ? काल अपने अगणित मुखोंसे इन्द्रको भी चबा जाता है, यमराजको भी वशमें कर लेता है और उसीके प्रभावसे वायु भी अवायु हो जाता है—अपना अस्तित्व खो बैठता है; फिर मुझ-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या विश्वास हो सकता है ?

सोम (चन्द्रमा) भी कालवश व्योम (आकाश) में विलीन हो जाता है। मार्तण्ड (सूर्य) के भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं और अग्नि भी भग्ना (विनाश) को प्राप्त हो जाती है; फिर मुझ-जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या आस्था की जा सकती है ? जो काल (मृत्यु) को भी कवलित कर लेता है, नियतिको भी टाल देता है और अनन्त आकाशको भी अपने आपमें विलीन कर लेता है, उस महाकालके होते हुए मुझ जैसे मनुष्यकी स्थिरतापर क्या विश्वास किया जा सकता है ? जिसका कानोंसे श्रवण, वाणीसे वर्णन और नेत्रोंसे दर्शन नहीं होता, ऐसे अज्ञातस्वरूप एवं मायाके उत्पादक किसी सूक्ष्म तत्त्वके द्वारा चौदहों भुवन अपने-आपमें ही मायाद्वारा दिखाये जा रहे हैं। वह तत्त्व निर्गुण-निराकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही है। समष्टि अहंकाररूप कलाको प्राप्त होकर सबके भीतर निवास करनेवाला वह कालका भी कालरूप परमात्मतत्त्व सबसे महान् है। तीनों लोकोंमें ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो उसके द्वारा नष्ट न किया जा सके। स्वर्गमें देवता, भूतलपर मनुष्य और पातालमें सर्पोंकी सृष्टि उसीने की है। वही अपने संकल्पमात्रसे इन सबको जर्जर दशामें पहुँचा देता है। अनुरागयुक्त कामिनियोंने अपने चञ्चल लोचनोंद्वारा कटाक्षपूर्वक जिसकी ओर देखा है, उस पुरुषके मनको महान् विवेक भी स्वस्थ नहीं कर पाता। जो दूसरोंका उपकार करनेवाली है और दूसरोंकी पीड़ा देखकर संतप्त हो उठती है, अपनी आत्माको शान्ति प्रदान करनेवाली उस शीतल बुद्धिसे युक्त ज्ञानी महात्मा ही सुखी है—ऐसा मेरा विश्वास है। जैसे समुद्रमें उत्पन्न हो बड़वाग्निके मुँहमें गिरकर नष्ट होनेवाली असंख्य लहरोंको कोई गिन नहीं सकता, उसी तरह संसारमें उत्पन्न हो कालके मुँहमें पड़नेवाले अनन्त प्राणियोंकी गणना कौन कर सकता है। जैसे झाड़ियोंमें बैठे हुए मृग या पक्षी अपनी जिह्वाकी लोलुपताके कारण मोहवश जालमें पड़कर नष्ट हो जाते हैं, उसी तरह दुराशा-पाशमें बँधे हुए सभी मनुष्य दोषरूपी झाड़ियोंके मृग बने हुए हैं। सब-के-सब मोह-जालमें

वैराग्य-प्रकरण ] * सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता * ५५


फँसकर पुनर्जन्मरूपी जंगलमें नष्ट हो जाते हैं। इस संसारमें लोगोंकी आयु विभिन्न जन्मोंमें किये गये कुकर्मोंसे नष्ट हो रही है। यदि आकाशमें वृक्ष हो, उस वृक्षमें लता हो और उस लतासे गलेमें फाँसी लगाकर मनुष्यको लटका दिया जाय तो उससे जो दुःख होगा, वैसा ही दुःखमय फल उन कुकर्मोंका भी बताया गया है। उस दुःखकी निवृत्तिके लिये उपाय करना तो दूरकी बात है, उस उपायका विचार करनेवाले लोग भी यहाँ हैं या नहीं, हमें इसीका पता नहीं है। मुनीश्वर ! इस संसारमें लोगोंकी बुद्धि चञ्चल और मृदु है। उसी बुद्धिसे युक्त मनुष्य व्यर्थ ही अनेक संकल्प-विकल्पोंका जाल रचते हुए कहते हैं—'आज उत्सव है।' यह बड़ी सुहावनी ऋतु है, इसमें यात्रा करनी चाहिये, ये लोग हमारे भाई-बन्धु हैं और यह सुख विशिष्ट भोगोंसे युक्त है, इन्हीं संकल्पोंमें पड़े-पड़े वे सब लोग एक दिन कालके गालमें चले जाते हैं। (सर्ग २६)


सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता, क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका तथा सत्पुरुषोंकी दुर्लभताका प्रतिपादन

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—तात ! मुनीश्वर ! इस जगत्का स्वरूप अत्यन्त अरमणीय (अभद्र) है, तो भी यह ऊपरसे मनोरम प्रतीत होता है। इसमें कोई ऐसा पदार्थ मेरी दृष्टिमें नहीं आता, जिसके प्राप्त होनेसे चित्त-को अत्यन्त विश्राम (परम सुख) मिल सके। बाल्यावस्था विचित्र प्रकारसे कल्पित क्रीडा-कौतुकमें ही चपलता-पूर्वक बीत जाती है। युवावस्था आनेपर मनरूपी मृग स्त्रीरूपिणी गुफाओंमें ही रमता हुआ जीर्ण हो जाता है; फिर वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर जब यह शरीर जर्जर हो जाता है, उस समय जनसमुदाय केवल दुःख-ही-दुःख भोगता रहता है (उसे कहीं कभी भी सुख-शान्ति-का लेश भी प्राप्त नहीं होता)। बुढ़ापारूपी हिमकी वर्षासे जब देहरूपिणी कमलिनी नष्ट हो जाती है, उस समय प्राणरूपी भ्रमर इसे छोड़कर दूर, बहुत दूर चला जाता है। उस दशामें उस मनुष्यके लिये यह संसार-रूपी सरोवर शुष्क (नष्ट) हो जाता है। इस संसारमें तृष्णा नामकी नदी निरन्तर बहती रहती है, जिसने अपने प्रबल प्रवाहके वेगसे यहाँके समस्त अनन्त पदार्थों-को ग्रस लिया है (नष्ट कर दिया है)। यह संतोष-रूपी तटवर्ती वृक्षकी जड खोदनेमें बड़ी दक्ष है। संसाररूपी समुद्रमें चमड़ेसे मढ़ी हुई शरीररूपिणी नौका क्षुधा, पिपासा आदि विविध तरङ्गोंसे आहत हो हिलती-डोलती हुई इधर-उधर घूम रही है। पाँच इन्द्रिय नामक ग्राह इसे टक्कर मारकर डुबानेके लिये उद्यत रहते हैं। इस तरह यह नौका क्रमशः नीचे जा रही है—डूबना चाहती है। इसमें धैर्य और वैराग्यसे सुशोभित होनेवाले विवेकी जीव नहीं बैठे हैं। जहाँ तृष्णारूपिणी लताओंका ही प्राबल्य है, ऐसे संसाररूपी वनोंमें विचरनेवाले ये मनरूपी बंदर कामरूपी वृक्षोंकी सैकड़ों शाखाओंपर भटकते हुए अपनी आयु नष्ट करते हैं, परंतु कभी मनोवाञ्छित फल नहीं पाते। महर्षे ! आपत्तियोंकी प्राप्ति होनेपर भी दुःख और मोह जिनसे दूर ही रहते हैं, स्वास्थ्य और सम्पत्तिमें भी जो अहंकार-शून्य मनसे सुशोभित होते हैं तथा सुन्दरी रमणियों जिनके अन्तःकरणमे चोट नहीं पहुँचातीं (विकार नहीं उत्पन्न करतीं), ऐसे महात्मा पुरुष इस समय अत्यन्त दुर्लभ हैं। जो हाथियोंकी सेनारूपी तरङ्गोसे उद्वेलित होनेवाले समर-सागरको अपने बल-विक्रमके द्वारा पार कर जाते हैं, मेरी दृष्टिमें वे शूरवीर नहीं हैं। मैं तो उन्हींको शूरवीर मानता हूँ, जो मनरूपी उत्ताल तरङ्गोंसे पूर्ण इस देह और इन्द्रिय-रूपी समुद्रको विवेक, वैराग्य आदिके द्वारा बाँध जाते हैं।*


* कृच्छ्रेषु दूरास्त विषादमोहाः स्वास्थ्येषु नोत्सिक्तमनोऽभिरामाः ।
सुदुर्लभाः सम्प्रति सुन्दरीभिरनाहतान्तःकरणा महान्तः ॥
तरन्ति मातङ्गघटातरङ्गं रणाम्बुधिं ये नहि ते न शूराः ।
शूरास्त एवेह मनस्तरङ्गं देहेन्द्रियम्भोधिमिमं तरन्ति ॥
(वैराग्य० २७ । ८-९)