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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

७८—मरे हुए विपश्चितोंके संसार-भ्रमणका तथा उत्तर दिशागामी विपश्चित्‌के भ्रमणका विशेष रूपसे वर्णन

६२२ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

मरकर जीव जब स्वप्नगत प्राणियोंसे वियुक्त होता है, तब इस जाग्रत्-संसारमें जागता है और निद्रासे मुक्त कहलाता है। जो स्वप्नका द्रष्टा है, वह स्वप्न-संसारमें अनेकानेक सुख-दुःख-दशाओंका, मोहका तथा रात और दिनके उलट-फेरका अनुभव करके वहाँ मरता—स्वप्न-शरीरका त्याग करता है। फिर निद्रा टूट जानेके कारण निद्राके अन्तमें वह यहाँ शयनस्थानमें मानो नया जन्म लेता है और जाग्रत्-शरीरसे सम्बद्ध होता है। तदनन्तर 'ये स्वप्नमें देखे गये बन्धु-बान्धव सत्य नहीं थे' इस विश्वाससे युक्त होता है। जैसे स्वप्न देखनेवाला पुरुष स्वप्नके संसारमें मृत्युको प्राप्त होकर अर्थात् स्वप्न-शरीरका त्याग करके दूसरे जाग्रन्मय स्वप्नको देखनेके लिये पुनः जन्म लेता या जाग्रत्-शरीरसे सम्बद्ध होता है, उसी तरह जाग्रन्मय स्वप्न देखनेवाला पुरुष जाग्रत्-संसारमें मृत्युको प्राप्त होकर दूसरे जाग्रन्मय स्वप्नको देखनेके लिये पुनर्जन्म ग्रहण करता है। जैसे एक जाग्रत्‌में मरकर दूसरे जाग्रत्‌में उत्पन्न हुआ पुरुष पूर्व जाग्रत् प्रपञ्चके विषयमें 'वह स्वप्न एवं असत् था' ऐसी प्रतीतिको नहीं प्राप्त होता, उसी तरह एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नको प्राप्त हुआ पुरुष बादवाले स्वप्नमें स्वप्नकी प्रतीतिको नहीं प्राप्त होता, वरं जाग्रत्‌की ही प्रतीति ग्रहण करता है। यह उसकी बुद्धिकी मूढ़ताका ही परिणाम है। जैसे बादवाले स्वप्नमें जाग्रत्‌की प्रतीति भ्रममात्र ही है, वैसे ही पूर्व-जाग्रत्‌को स्वप्न और असत् न समझना भी मूढ़ता ही है। स्वप्नद्रष्टा पुरुष स्वप्नमें भी फिर अन्य स्वप्न-दर्शनका अनुभव करता हुआ उस स्वप्नको ही जाग्रत्-रूपसे ग्रहण करता है। इस प्रकार जाग्रत् और स्वप्न नामकी दो अवस्थाओंमें जीव न तो स्वतः उत्पन्न होता है और न मरता ही है। किंतु उन-उन जाग्रत् और स्वप्नके शरीरोंमें अभिमान करता और छोड़ता है। यही उसका जन्म लेना और मरना है। स्वप्न-द्रष्टा जीव स्वप्नमें मरकर इस जागरण अवस्थामें जागा हुआ कहलाता है और इस जाग्रत्‌में मरा हुआ जीव अन्यत्र जाग्रत्रूप स्वप्नमें जागा हुआ कहा जाता है, (इस तरह स्वप्न और जाग्रत्‌की समता ही सिद्ध होती है)। एक स्वप्नसे दूसरे स्वप्नमें स्थिति होनेपर दूसरा स्वप्न ही पहले स्वप्नकी अपेक्षा वर्तमान होनेसे जाग्रत् समझा जाता है। इसी प्रकार जाग्रत्‌में मरकर दूसरे जाग्रत्रूप स्वप्नमें जगे हुए पुरुषके लिये पहली जाग्रदवस्था अवश्य ही स्वप्न हो जाती है। इस दृष्टिसे जाग्रत् और स्वप्न—दोनों ही अतीत घटनाके समान हैं। वर्तमानकालमें दोनोंमेंसे किसीकी भी सत्ता नहीं है। इस कारण वे परस्पर एक दूसरेके उपमान और उपमेय बने हुए हैं। वर्तमान अवस्थामें तो स्वप्न भी जाग्रत्‌के समान ही प्रतीत होता है और बीता हुआ जाग्रत् भी स्वप्नके समान ही है। वास्तवमें दोनों ही असत् हैं। केवल चिदाकाश ही स्वप्न और जाग्रत्‌के रूपमें स्फुरित होता है। सौभाग्यशाली रघुनन्दन ! जैसे स्वप्नमें दीखनेवाले नगर, पर्वत और गृह आदि चिन्मय आकाश ही हैं, उसी तरह जाग्रत्‌में भी ये नगर, पर्वत आदि चिदाकाशमय ही हैं। स्वप्न और जाग्रत्—दोनों अन्तमें विकल्प-शून्य, शान्त, अनन्त, एक चिन्मात्र ही शेष रह जाते हैं। इस प्रकार तत्त्वके विषयमें वादियोंका विवाद व्यर्थ है।
(सर्ग १०४-१०५)


चिदाकाशके स्वरूपका प्रतिपादन तथा जगत्‌की चिदाकाश-रूपताका वर्णन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—ब्रह्मन् ! चेतनाकाशरूप जो परब्रह्म है, वह कैसा है ? यह कृपापूर्वक फिर बताइये। आपके मुखारविन्दसे इस अमृतमय उपदेशको सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है।

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * राजा विपश्चित्‌के सामन्तोंका वध * ६२३

श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे समान रूप-रंगवाले दो जुडवें भाइयोंके व्यवहारके लिये दो पृथक् नाम रखे जाते हैं, वैसे ही अखण्ड सच्चिदानन्दघन स्फटिक शिलामें प्रतिबिम्बकी भाँति स्थित हुए जो दो प्रपञ्च हैं, उनके व्यवहारके लिये दो नाम रख दिये गये हैं—जाग्रत् और स्वप्न । जैसे दो जलोंमें भेद नहीं होता, उसी प्रकार इन जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओंमें भी वास्तविक भेद नहीं है; क्योंकि वे दोनों ही एक, निर्मल चिन्मात्र आकाशरूप ही हैं। जिसमें सब कुछ लीन होता है, जिससे सबका प्रादुर्भाव होता है, जो सर्वरूप है, जो सब ओर व्याप्त है तथा जो नित्य सर्वमय है, उस परब्रह्म परमात्माको ही चेतनाकाश या चिदाकाश कहते हैं। स्वर्गमें, भूतलमें, बाहर-भीतर तथा दूसरेमें जो सम नामक ज्योतिःस्वरूप परमतत्त्व प्रकाशित हो रहा है, वह चिदाकाश कहलाता है। सम्पूर्ण विश्व जिसका अङ्ग है, जिस नित्य सर्वव्यापी परमात्मामें यह मूर्त और अमूर्त जगत् उसी तरह प्रकट है, जैसे मजबूत तागेमें माला, उसीको चिदाकाश कहते हैं। सुषुप्ति और प्रलयरूप निद्राकी निवृत्ति होनेपर जिससे विश्व प्रकट होता है और जिसकी विक्षेपशक्तिके शान्त होनेपर उसका लय हो जाता है, उस परब्रह्म परमात्माको चिदाकाश कहते हैं। जिसके उन्मेष और निमेषसे (पलकोंके उठाने और गिरानेसे ) जगत्‌की सत्ताके लय और उदय होते हैं, जो स्वानुभवरूप होकर अपने हृदयमें स्थित है,उसे चेतनाकाश समझना चाहिये। श्रुतिने 'यह नहीं, यह नहीं' इस प्रकार निषेधमुखसे सबका निराकरण करके जिसे उस निषेधकी अवधि बताकर उसके तटस्थ लक्षणका सर्वथा निर्णय कर दिया है तथा जो सदा सब कुछ होकर भी वस्तुतः कुछ नहीं है, वह सर्वाधार परमात्मा चिदाकाश कहलाता है। बाह्य और आभ्यन्तर त्रिगोंसे युक्त यह इस तरह दृष्टिगोचर होनेवाला सारा विश्व जैसा है, उसी रूपमें चेतनाकाशमय ही है। अतः इन्द्रियोंसे विषयोंका अनुभव करते हुए भी अन्तःकरणको वासनाशून्य रखकर तत्त्वज्ञानद्वारा शुद्ध-बुद्ध एकमात्र सच्चिदानन्दघनरूप हो सुषुप्तिकी भाँति स्थित रहना चाहिये। वासनाशून्य शान्तचित्त हो जीवित रहते हुए भी पाषाणके समान मौन धारणकर सच्चिदानन्दघन परमात्मामें निमग्न रहते हुए ही बोलना, चलना और खाना-पीना चाहिये।<br><br>पृथ्वी आदिसे रहित जो स्वप्न-जगत् है और पृथ्वी आदिसे युक्त जो जाग्रत्‌कालका जगत् है—ये दोनों ही प्रकारके जगत् चिदाकाशरूप हैं। जैसे स्वप्न आदि अवस्थाओंमें केवल चिन्मयमणि (आत्मा) ही विभिन्न वस्तुओंके रूपमें भासित होती है, उसी प्रकार इस जाग्रत्‌कालिक दृश्यप्रपञ्चके रूपमें केवल चिदाकाश ही स्फुरित हो रहा है। इस चिदाकाशका जो स्वानुभवैकगम्य निराकार रूप है, वही भूतल आदिके रूपसे दृश्य नाम धारण करके प्रतीतिका विषय हो रहा है। (सर्ग १०६-१०७)

राजा विपश्चित्‌के सामन्तोंका वध, उत्तर दिशाके सेनापतिको घायल होकर आना तथा शत्रुओंके आक्रमणसे राजपरिवार और प्रजामें घबराहट

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस भूतल आदिके रूपसे दृश्यकी प्रतीति होना ही अविद्या है। जिन अज्ञानियोंके अन्तःकरणमें अविद्या विद्यमान रहती है, उनकी उस अविद्याका (ज्ञानके बिना) कोई अन्त नहीं है, जिस प्रकार ब्रह्मका कोई अन्त नहीं है। इस विषयमें मैं तुम्हें एक कथा कहता हूँ, सुनो। लोकालोक पर्वतकीकिसी स्वर्णमयी-सी शिलाके भीतर विद्यमान चिदाकाशके एक कोनेमें किसी प्रदेशके अन्तर्गत एक त्रिलोकी बसी हुई है, जो इसी त्रैलोक्यके समान है और वहाँ भी यहाँकी व्यवस्थाके अनुसार देश, काल आदिकी मर्यादा नियत है। वहाँ जम्बूद्वीप नामक एक भूभाग है, जो सम्पूर्ण भूमण्डलका भूषणरूप है। वहाँकी समतल भूमिपर जहाँ गमनागमनादि