संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
६०- कुटीमें लौटनेपर वसिष्ठजीको अपने शरीरकी जगह एक ध्यानस्थ सिद्धका दर्शन, उनके सङ्कल्पकी निवृत्तिसे कुटीका उपसंहार, सिद्धका नीचे गिरना और वसिष्ठजीसे उसका अपने वैराग्यपूर्ण जीवनका वृत्तान्त बताना
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन * ५९३
आगको बुझा देनेवाली उस अन्धाधुंध वर्षासे ढम-ढमकी घनी घोर आवाज हो रही थी। उस समय सारे समुद्र नदियोंके समूहोंद्वारा, जिनमें गङ्गा एक छोटी तरङ्ग-सी जान पडती थी, भरे जा रहे थे। आकाशवर्ती भयानक मेघोंकी ही भाँति वे सरिताएँ भी अपनी जलराशिसे समुद्रोंको परिपूर्ण कर रही थीं। पर्वतोंका आधारपीठ भूतल जीर्ण-शीर्ण होकर खण्ड-खण्ड हो चुका था, इसलिये उन पर्वतोंके तटप्रान्त गल गये थे। इधर उन्हें प्रलय-कालकी वायु उड़ा रही थी। इस अवस्थामें उन लुढ़कते हुए पर्वतोंके गिरनेसे संसारके सारे समुद्र उनके द्वारा संकीर्ण-से हो रहे थे। समुद्रकी तरङ्गोंद्वारा ऊपर फेंके गये प्रस्तरखण्डोंसे बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देनेवाली प्रलयवायु समुद्रकी गर्जनाके समान भीषण एवं गम्भीर घोष करती हुई त्रिलोकीकी सारी दिशाओंके तटप्रान्तको नष्ट-भ्रष्ट किये देती थी। प्रचण्ड वायुके टकरानेसे पर्वत-समूहोंकी गुफाओंमें जो भौंय-भाँयकी आवाज उठ रही थी, उससे सारा संसार व्याप्त हो गया था। लोकपालोंके नगर झोंके खा-खाकर चक्कर काटते हुए सब ओर गिर रहे थे। बड़े-बड़े पर्वतोंके विस्तृत भाग नष्ट हो गये थे।
उस समय धूम और भस्मके बादल प्रकट होने लगे, पानीकी बाढ़से जनपद और नगरोंके समूह प्रणाशी होने लगे। ऊँची-ऊँची तरङ्गे उठने लगीं और भूतल तथा पर्वत डूबने लगे। भँवरोंमें पड़कर घर्घर-ध्वनि करने-वाले और आपसमें टकराकर एक दूसरेको विदीर्ण कर देनेके लिये उद्यत ऊँचे-ऊँचे पर्वत समुद्रमें बिखरे पत्तोंके समान चक्कर काट रहे थे। घूमते हुए सैकड़ों धूमकेतुओंके उत्पात उठ रहे थे। इससे इस जगत्की ओर देखना अत्यन्त कठिन हो गया था। सातवें पातालतकका सारा संसार अपने स्थानसे च्युत हुए द्वीपों और सागरोंसहित भूमण्डलके बड़े-बड़े खण्डों और लुढ़कते हुए अन्य पाताल-मण्डलोंसे पूर्ण-सा जान पड़ता था। नीचे सातवें पातालतक, मध्यमें भूमण्डल एवं पर्वतोंतक और ऊपर आकाश-मण्डलतक एकार्णव बना हुआ सारा जगत् प्रलय-वायुसे परिपूर्ण हो गया था।
( सर्ग ७६-७७ )
बढ़ते हुए एकार्णवका तथा परिवारसहित ब्रह्माके निर्वाणका वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब वायु, वर्षा, हिम और दूसरे-दूसरे उत्पातोंके आगमनसे भूमण्डल नष्ट-भ्रष्ट हो गया, तब समुद्रके जलका वेग इस तरह बढ़ने लगा जैसे कलियुगमें राजाका वेग। वह एकार्णव आकाश-गङ्गा-के प्रवाहमें पड़ी हुई मेघधाराओके गिरनेसे वेगपूर्वक बढ़ने लगा। तत्काल प्रकट हो मेरु और मन्दराचलके समान प्रकाशित होनेवाली सहस्रों सरिताओने भी उसे बढ़ानेमें योग दिया। इस प्रकार जलसे भरे होनेके कारण वह एकार्णव उच्चताके अभिमानसे युक्त हो गया। उसने बड़े-बड़े पर्वतोंको सूखे तिनकोंके समान पकड़कर अपनी विस्तृत भँवरोंमें डाल दिया। वे वहीं चक्कर काटने लगे। उस एकार्णवने ऊँची उठती हुई उत्ताल तरङ्गोंके अग्रभागसे सूर्यमण्डलको भी निगल लिया। प्रचण्ड वायुके द्वारा उत्पन्न किये गये अपूर्व जल-प्रवाहरूपी कुद्ध पर्वतोसे युक्त हुआ वह महार्णव महान् घुर्घुर और भयानक घर्घर ध्वनिका साथ अपने विशाल वेगको बढ़ाता जा रहा था। तरङ्गाट-तरङ्गों-के वारंबार एक-दूसरेसे टकरानेके कारण उसकी उच्चता बढ़ती जा रही थी और वह ऊपर-नीचे लाखों योजनोंतक फैले हुए उच्चतम पदार्थोंको भी आत्मसात् करता जा रहा था। पंखयुक्त पर्वतोंके समान उठी हुई अगण्य तरङ्ग-समूहरूपी भुजाओंद्वारा वह महासागर पुष्कर और आवर्तक नामक कल्पान्तकारी मेघोंका मानो आलिङ्गन कर रहा था। त्रिलोकीको अपना ग्रास बनाकर पूर्णतः तृप्त हो धीमे स्वरमें गीत-सा गा रहा था और उपद्रवरूपी कल्मषसे
५९४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ ]
अलंकृत अपनी तरङ्गमयी भुजाओंको उठाकर नृत्य-सा करता-जान पडता था। रघुनन्दन ! उस समय न तो आकाश था, न दिगन्त था, न नीचेका लोक था, न ऊपर-का लोक था, न कोई भूतवर्ग था और न कहीं सृष्टि ही थी । सर्वत्र केवल जल-ही-जल दृष्टिगोचर होता था।
रघुनन्दन ! जब तपोलोकपर्यन्त सारा जगत् प्रलय-कालके एकार्णवमें निमग्न हो गया, तब सत्यलोकके निकट आकाशमें स्थित होकर मैंने महान् प्रकाशसे युक्त ब्रह्मलोक-पर उसी प्रकार दृष्टि डाली, जैसे सूर्य प्रातःकाल संसार-पर अपनी प्रभा बिखेरते है । दृष्टि डालते ही समाधिमें अविचलभावसे स्थित हुए परमेष्ठी ब्रह्मा अपने मुख्य-मुख्य परिवारके साथ दिखायी दिये, वे ऐसे जान पड़ते थे मानो पत्थरकी बनी हुई प्रतिमा हो । वहाँ देवताओं तथा शुद्ध अन्तःकरणवाले मुनियोंका समुदाय भी बैठा था । शुक्र, बृहस्पति, इन्द्र, कुवेर, यम, सोम, वरुण, अग्नि तथा अन्य देवर्षि भी वहाँ देखनेमें आये । देव, गन्धर्व, सिद्ध और साध्योंके नायक भी वहाँ उपस्थित थे । वे सब-के-सब पद्मासन लगाये इस तरह ध्यानमग्न होकर बैठे थे, मानो चित्रमें अङ्कित किये गये हों । वे निष्प्राणके समान वहाँ चेष्टाशून्य होकर बैठे थे। तदनन्तर पूर्वोक्त बारह सूर्य भी उसी स्थानपर आये और उन्हीं लोगोंकी भाँति पद्मासन लगाकर ध्यानमें मग्न हो गये । इसके बाद दो ही घड़ीमें मैंने अपने सामने बैठे हुए ब्रह्माजीको इस अवस्थामें देखा। वे ब्रह्मका चरम साक्षात्कार प्राप्त करके अविद्याकल्पित सारे प्रपञ्चका बाध हो जानेसे निद्रारहित ( प्रबोधको प्राप्त ) हो गये थे। जैसे जगा हुआ पुरुष स्वप्नमें देखे गये पदार्थसमूहको बाधित और केवल अपनेको ही अवशिष्ट देखता है, वैसे ही वे आत्मावशिष्ट दिखायी दिये । फिर, ब्रह्मलोकमें ब्रह्माजीके परिवारके जितने लोग थे, उन सबको मैंने वहाँ वैसे ही तिरोहित पाया, जैसे तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंकी वासना तत्त्वज्ञानसे बाधित होकर अदृश्य हो जाती है। जैसे स्वप्नसे जगा हुआ पुरुष अपने सामनेके स्वप्नगत नगरको नहीं देखता है, वैसे ही मैंने वहाँ किसीको भी नहीं देखा । उस समय वह ब्रह्मलोक तथा उनका ब्रह्माण्ड, जो ब्रह्माजीके सङ्कल्पसे ही बना था, निर्जन वन-सा सूना हो गया । जैसे भूतलपर अकस्मात् कोई भयङ्कर दुर्घटना होनेसे कोई नगर सर्वथा नष्ट हो गया हो, वही दशा उस ब्रह्माण्डकी हुई थी । तदनन्तर आकाशमें स्थित हुए मैंने ध्यान लगाकर यह जाना कि सभी लोग ब्रह्माजीके समान ही नाम-रूपका परित्याग करके निर्वाण-पदको प्राप्त हो गये हैं। वासनाका लय हो जाने-पर वे सब-के-सब अपने विशुद्ध ब्रह्मरूपमें स्थित हो जाने-के कारण अदृश्य हो गये थे । जैसे जगे हुए पुरुषोंके स्वप्नलोक उनके स्वप्नरूपमें ही लीन हो जानेसे दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। जैसे स्वप्नमें अपना शरीर आकाशमें उड़ता दिखायी देता है, किंतु जागनेपर वह वासना शान्त हो जानेके कारण कुछ भी नहीं दीखता है, इसी प्रकार जाग्रत्-कालमें भी वासना रहनेपर ही शरीर दिखायी देता है । तत्त्वज्ञानके द्वारा वासनाका सर्वथा क्षय हो जानेपर कुछ भी नहीं दिखायी देता । वासनाका क्षय होनेसे द्रष्टा, दृश्य और दर्शनरूपी रोग शान्त हो जाता है, वासनाकी सत्ता रहनेपर ही यह सृष्टिनामक पिशाची प्रकट होती है।
रघुनन्दन! सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माको सृष्टि रचनेकी इच्छा उत्पन्न होती है । तदनन्तर पूर्वकालकी जगत् वासनाओं-का जगद्रूपमें उद्भव होता है । इसलिये वासनाकी शान्ति-को निर्वाण समझना चाहिये और वासनाकी सत्ताको ही संसाररूपी भ्रम जानना चाहिये । चित्तकी वृत्तिको जगा-कर बहिर्मुख कर देनेसे बन्धन होता है और उसे परमात्मामें लीन कर देनेपर निर्वाण प्राप्त होता है । चित्तवृत्तिका जागरण ही संसाररूपी शिशुको प्रकट करनेवाला गर्भाशय है । उससे उत्पन्न हुआ यह जगत् असत् होकर भी सत्के समान भासित होता है। चित्तके संकल्पका जाग्रत्
निर्वाण-प्रकरण उ० ] * ब्रह्मलोकवासियों तथा द्वादश सूर्योंका निर्वाण * ५९५
होना ही बन्धन बताया गया है और उसे भुलाकर—आत्मामें लीन करके अपने चैतन्य-स्वरूपका अनुभव करना ही मोक्ष कहा गया है। रघुनन्दन ! बन्ध, मोक्ष आदिकी सारी शङ्काएँ छोड़कर निर्वाणरूप, वासनाशून्य, अनन्त, अनादि, विशुद्ध, केवल बोधस्वरूप, द्वैताद्वैतसे रहित, परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप हुए आकाशके समान विशद अन्तःकरणसे युक्त, बन्धनमुक्त तथा शान्तभावसे स्थित रहना चाहिये।
( सर्ग ७८-७९ )
ब्रह्मलोकवासियों तथा द्वादश सूर्योंका निर्वाण, अहंकाराभिमानी रुद्रदेवका आविर्भाव, उनके अवयवों तथा आयुधका विवेचन, उनके द्वारा एकार्णवके जलका पान तथा शून्य ब्रह्माण्डकी चेतनाकाशरूपताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! इस तरह ब्रह्मलोकके वे सभी निवासी जैसे बत्ती जल जानेसे दीपक बुझ जाते हैं, वैसे ही वासनाका नाश होनेसे अदृश्य हो गये। ब्रह्माजीके ब्रह्मलीन हो जानेपर पूर्वोक्त बारह सूर्य अपनी प्रभासे प्रकाशित हो पृथ्वी आदि जगत्की भाँति उस ब्रह्मलोकको भी जलाने लगे । ब्रह्माजीके लोकको दग्ध करके उन्हींकी भाँति ध्यानपरायण हो वे भी तैलरहित दीपककी भाँति शान्त हो गये—निर्वाण पदको प्राप्त हो गये । तदनन्तर जैसे रातमें अन्धकार भूमण्डलको व्याप्त कर लेता है, वैसे ही उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त उस एकार्णवकी बाढ़ने विधाताके उस लोकको भी जलसे आप्लावित कर दिया । इस प्रकार जब ब्रह्मलोकपर्यन्त वह सारा ब्रह्माण्ड एकार्णवके जलसे परिपूर्ण हो गया, तब वे कल्पान्तकारी मेघ छिन्न-भिन्न हो उस जलराशिमें ही विलीन हो गये ।
इसी बीचमें मैने वहाँ एक भयङ्कर रूप देखा, जो आकाशके मध्यभागसे प्रकट हुआ था । उसे देखकर मै कुछ डर गया । उसकी आकृति कल्पान्तकालिक जगत्के समान काली थी । उसने सारे आकाशको व्याप्त कर रखा था और देखनेमें ऐसा जान पडता था, मानो कल्पभरकी सारी रातोंका एकत्र संचित हुआ अन्धकार ही देह धारण करके खडा हो गया हो । वह प्रातःकालके एक लाख सूर्योंका प्रकाशमान तेज अकेले ही धारण करता था । उसके तीन नेत्र थे, जो तीन सूर्योंके समान दिखायी देते थे और सुस्थिर विद्युत्-समूहके समान भयंकर जान पडते थे । उन नेत्रोंकी प्रभासे उसका मुखमण्डल अत्यन्त देदीप्यमान दिखायी देता था । वह पुरुष अपने अङ्गोंसे ज्वालापुञ्ज बिखेर रहा था । उसके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र थे । उसने अपने हाथमें एक त्रिशूल ले रखा था । उस अनन्त आकाशमें उसका वह विशाल शरीर व्याप्त हो रहा था । वह पुरुष आगेकी ओर बढा आ रहा था । आकाशके समान विशाल और मेघके समान श्याम शरीरको धारण करके वह खडा था । एकार्णवमें डूबे हुए ब्रह्माण्डसे बाहर आकाशमें उसकी स्थिति थी । वह ऐसा प्रतीत होता था मानो आकाश हाथ-पैर आदि शरीरको धारण करके दृष्टिपथमें आ रहा हो । अपनी नासिकासे निकली हुई साँसके आने-जानेसे वह उस एकार्णवको कम्पित किये दे रहा था । वह अपने बाहुदण्डसे क्षीरसागरको विक्षुब्ध कर देनेवाले भगवान् विष्णुके समान जान पडता था । ऐसा लगता था, मानो उस कल्पान्तकालीन महासागरकी जलराशि ही पुरुषरूप धारण करके खडी हो गयी हो अथवा जिसका कोई कारण नहीं, वह सबका कारणभूत अहंकार ही मूर्तिमान् होकर आ गया हो या कुलपर्वतोंका समूह ही अपने पंखसमूहोंद्वारा उडनेकी लीला करता हुआ समस्त
५९६ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
आकाशको परिपूर्ण करके ऊपरको उठ गया हो। उसके हाथमें त्रिशूल था और उसके तीन नेत्र थे। इन लक्षणोंसे मैने पहचान लिया कि ये भगवान् रुद्र हैं। तब मैने दूरसे ही उन परमेश्वरको नमस्कार किया।
श्रीरामजीने पूछा—मुने ! रुद्रदेवने वैसा भयंकर रूप क्यों धारण किया था ? वे काले और विशालकाय क्यो हुए थे ? उनके पाँच मुख कौन-कौन और कैसे हैं ? वे कैसे और कौन-सी दस भुजाएँ धारण करके वहाँ उपस्थित हुए ? उनके तीन नेत्र कौन-कौन-से थे ? उनका शरीर ऐसा भयंकर क्यों था ? वे अकेले क्यों थे ? वहाँ प्रकट होनेमें उनका प्रयोजन क्या था ? वे किससे प्रेरित होकर आये थे ? उन्होने वहाँ क्या किया था ? और उनकी छाया कौन थी ? ये सब बातें मुझे बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वे परमेश्वर वहाँ अहंकारके अभिमानीरूपसे रुद्रनामधारी होकर प्रकट हुए थे। उस समय उनकी जो मूर्ति दिखायी दी थी, वह निर्मल आकाशरूपी ही थी। वे महातेजस्वी भगवान् रुद्र आकाशरूपधारी होनेके कारण आकाशके समान ही श्यामवर्णसे युक्त दिखायी देते थे। चेतनाकाशमात्र ही उनका सारभूत स्वरूप है, इसलिये वे आकाशात्मा कहे गये हैं। सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा और सर्वव्यापी होनेके कारण ही वे विशालकाय बताये गये हैं। उन अहंकाररूपी रुद्रकी प्रत्येक शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाली जो पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, उन्हींको ज्ञानी पुरुष उन रुद्रदेवके पाँच मुख बताते हैं। इसीलिये ज्ञानेन्द्रियाँ सब ओरसे प्रकाशस्वभाव कही गयी हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) तथा उनके पाँच विषय (बोलना, ग्रहण करना, विचरना, मलत्याग करना और विषयसुखकी उपलब्धि कराना)—ये दस क्रमशः उनकी दाहिनी-बायाँ भुजाएँ हैं। उस प्रलयकालमें सम्पूर्ण भूतोंसे परित्यक्त होकर आकाशमात्र रूपधारी वे रुद्रदेव एक क्षणतक वहाँ सबको विक्षुब्ध करते हुए-से स्थित रहते हैं। फिर कारणभूत अहंकार-शरीरसे रहित हो परम शान्त हो जाते हैं। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण; भूत, भविष्य और वर्तमान—ये तीन काल; चित्त, अहंकार और बुद्धि—ये त्रिविध अन्तःकरण; अ, उ और म्—ये प्रणवके तीन अक्षर तथा ऋक्, साम और यजुष्—ये तीन वेद ही उन भगवान् रुद्रदेवके नेत्ररूपसे स्थित हैं। उन्होंने अपनी मुट्ठीमें त्रिलोकीरूप त्रिशूलको धारण कर रखा है। उस समय समस्त भूतगणोंमें भी उनके सिवा दूसरा कोई स्थित नहीं था। इसलिये वे वहाँ अहंकारात्मक रुद्रके रूपमें देहाभिमानी-से होकर खड़े थे।
श्रीराम ! तदनन्तर मैने देखा, वे परमेश्वर वहाँ उद्यमपूर्वक श्वास-वायुके वेगसे उस महासागरको पी जानेके कार्यमें प्रवृत्त हुए। उनके फैले हुए मुखका भीतरी भाग ज्वालामालाओंसे व्याप्त दिखायी देता था। उनकी श्वास-वायुसे आकृष्ट हुआ महासागर उनके भीतर उसी तरह समा गया, मानो वह बड़वानलमें विलीन हो गया हो। अहंकारस्वरूप भगवान् रुद्र ही कल्पपर्यन्त बड़वानल होकर समुद्रमें निवास करते है और उसका जल पीते रहते हैं। किंतु प्रलयकालमें वे सारे समुद्रको ही पी जाते हैं। जैसे जल पातालमें, साँप बिलमें और पाँचों प्राणवायु प्राणियोंके मुखाकाशमें प्रविष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार वह सारा समुद्र वेगपूर्वक रुद्रदेवके मुखके भीतर एक ही क्षणमें समा गया। उन श्यामरूपधारी रुद्रने थोडी ही देरमें उस जलको इस तरह पी लिया, जैसे सूर्यदेव अन्धकारको और सत्पुरुषोका सङ्ग दोष-समूहको पी जाता—नष्ट कर देता है। तत्पश्चात् ब्रह्मलोकसे लेकर पातालतक सारा स्थान धूलि, धूम, वायु, समुद्र तथा भूतगणोंसे रहित होकर शून्य, सम एवं शान्त आकाशमात्र रह गया। रघुनन्दन ! उस समय वहाँ आकाशके समान निर्मल तथा चेष्टारहित केवल ये