संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
६—जीवन्मुक्तिका लक्षण, जगत्की असत्ता तथा ब्रह्मसे उसकी अभिन्नताका प्रतिपादन, परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन
उत्पत्ति-प्रकरण ] * परमात्माके ज्ञानकी महिमा और उसके स्वरूपका विवेचन * १०३
परमात्माके ज्ञानकी महिमा, उसके स्वरूपका विवेचन, दृश्य-जगत्के अत्यन्ताभाव एवं ब्रह्मरूपताका निरूपण तथा आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये योगवासिष्ठ ही सर्वोत्तम शास्त्र है—इसका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जिन परमात्म-देवकी चर्चा की गयी है, ये कहीं दूर नहीं रहते, सदा शरीरमें ही स्थित हैं और चिन्मय ( चेतन ) रूपसे विख्यात हैं। ये ही चिन्मय चन्द्रशेखर शिव हैं। ये ही चिन्मय गरुड़वाहन विष्णु हैं। ये ही चिन्मय सूर्य हैं तथा ये ही चिन्मय ब्रह्मा हैं। कार्य-कारणरूप इन परब्रह्म परमात्माका साक्षात्कार हो जानेपर इस साधन-परायणके हृदयकी गाँठ ( चिजडग्रन्थि ) खुल जाती है, सम्पूर्ण संशय छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं।
श्रीराम ! जब परमात्माका ज्ञान हो जाता है, तब विषके वेगके शान्त होनेपर जैसे विषूचिका मिट जाती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण दुःखोंकी परम्परा नष्ट हो जाती है।
श्रीरामजीने पूछा—ब्रह्मन् ! जिनका ज्ञान या साक्षात्कार होनेपर मन सम्पूर्ण मोह-महासागरके पार हो जायगा, उन परब्रह्म परमात्माका यथार्थ स्वरूप कैसा है ? इसका मेरे समक्ष वर्णन कीजिये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जिस ज्ञानरूपी महासागरमें नाश आदि विकारके बिना ही ज्यों-के-त्यों स्थित हुए इस संसारका अत्यन्त अभाव ही सिद्ध होता है, वही परमात्माका स्वरूप है। जो परम चिन्मय होनेके कारण अत्यन्त सूक्ष्म होकर भी अज्ञानी जनोंकी दृष्टिमें विशाल पाषाणकी भाँति स्थूलरूपसे स्थित प्रतीत होता है तथा अजड ( चिन्मय ) होता हुआ भी मूढ मनुष्योंके अन्तःकरणमें जडके तुल्य ही जान पड़ता है, वह परमात्माका स्वरूप है।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—मुने ! परमात्मा सत् है, यह कैसे जाना जाता है ? तथा इतने बड़े इस जगत् नामक दृश्यको असत् कैसे समझा जाता है ? आप कहते हैं इसकी उत्पत्ति हुई ही नहीं, यह बिना हुए ही प्रतीत हो रहा है; यह बात कैसे समझमें आये ?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! जैसे रूपहीन आकाशमें भ्रमवश नील, पीत आदि वर्णोंकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दमय ब्रह्ममें यह जगत्-सम्बन्धी भ्रम उत्पन्न हुआ है। इस भ्रमके अत्यन्ताभावके ज्ञानमें यदि पूरी दृढ़ता हो जाय, तभी ब्रह्मका स्वरूप ज्ञात होता है, दूसरे किसी कर्मसे नहीं। दृश्यके अत्यन्ताभावके सिवा दूसरी कोई शुभ गति नहीं है। ज्यों-के-त्यों स्थित हुए इस दृश्य-जगत्के अत्यन्ताभावका निश्चय हो जानेपर जो शेष रह जाता है, उसी परमार्थ वस्तुका बोध होता है। जिसका बोध होता है, वह परमात्मा उस जाननेवाले पुरुषका आत्मा ही हो जाता है। जबतक इस जगत् नामक दृश्यकी अपनी सत्ताका अत्यन्ताभाव अथवा मिथ्यात्व सिद्ध नहीं हो जाता, तबतक परम तत्त्वरूप परमात्माको कभी कोई जान नहीं सकता। असत् पदार्थकी सत्ता नहीं होती और सत् वस्तुका कभी अभाव नहीं होता। जो वस्तु स्वभावसे है ही नहीं, उसके निवारणमें— उसे मिथ्या समझकर त्याग देनेमें कौन-सी कठिनाई है ? यह जो विस्तृत जगत् दिखायी देता है, पहले उत्पन्न नहीं हुआ था। यह चिन्मात्र होनेके कारण निर्मल आत्मामें ही कल्पित है, अतः ब्रह्मरूप ही है। उससे अतिरिक्त इसकी कोई सत्ता नहीं है। जगत् नामसे न यह कभी उत्पन्न हुआ, न है और न दिखायी ही देता है। जैसे सुवर्णमें कल्पित कटक-कुण्डल आदिका सुवर्ण-दृष्टिसे अभाव ही है, उसी प्रकार ब्रह्ममें कल्पित जगत्का ब्रह्मदृष्टिसे अभाव ही सिद्ध होता है। अतः इसके परिमार्जनमें— इसे असत् समझ लेनेमें क्या परिश्रम है !
१०४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अब मैं बहुत-सी युक्तियोंद्वारा इस विषयका कुछ विस्तारके साथ इस तरह प्रतिपादन करूँगा, जिससे अबाधित (परमार्थ) तत्त्वका स्वयं ही अनुभव हो जाता है। जो पहले (सृष्टिके आरम्भमें) ही उत्पन्न नहीं हुआ, उसका यहाँ अस्तित्व कैसे हो सकता है। मरुभूमिमें जलपूर्ण नदीकी सत्ता कैसे सम्भव है। भ्रमसे प्रतीत होनेवाले द्वितीय चन्द्रमामें ग्रहभाव कैसे हो सकता है। जैसे वन्ध्याका पुत्र नहीं होता, जैसे मरुभूमिमें जलकी सरिता नहीं बहती और जैसे आकाशमें वृक्ष नहीं होता, उसी तरह जगत्-रूप भ्रमकी भी कहीं सत्ता नहीं है। श्रीराम! यह जो कुछ दिखायी देता है, वह सब रोग-शोकसे रहित ब्रह्म ही है। इस विषयका मैं आगे चलकर केवल वाणीद्वारा ही नहीं, युक्तियोंसे भी प्रतिपादन करूँगा। उदारबुद्धि रघुनन्दन! तत्त्वज्ञ पुरुष जिस विषयका युक्तियोद्वारा वर्णन करते हैं, उसकी अवहेलना करना कदापि उचित नहीं है। जो मूढ़बुद्धि मानव युक्तियुक्त वस्तुका अनादर करके कष्टसाध्य (युक्तिशून्य) वस्तुमें आग्रह रखता है, उसे विद्वान् लोग अज्ञानी ही समझते हैं।
श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन्! यह किस युक्तिसे जाना जाता है कि यह दृश्यमान जगत् ब्रह्म ही है? यह बात कैसे सिद्ध होती है? यदि युक्तियोंद्वारा इस विषयका अनुभव हो जाय, तब तो फिर जाननेयोग्य कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन! यह मिथ्याज्ञान-रूपिणी विषूचिका चिरकालसे दृढमूल हो गयी है। इसीका नाम जगत् है और इसीको अविचार कहते हैं। यह ज्ञानके बिना निवृत्त नहीं होती। जो जिस पदार्थको पाना चाहता है और उसके लिये पूरा प्रयत्न करता है, वह उस पदार्थको अवश्य प्राप्त कर लेता है। परंतु यह बात तभी सम्भव होती है, जब वह बीचमें ही थककर या ऊबकर प्रयत्नसे मुँह न मोड़ ले।
श्रीरामजीने पूछा—शास्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरुदेव! आत्मज्ञानकी प्राप्ति करानेके लिये कौन-सा शास्त्र मुख्य है, जिसका ज्ञान प्राप्त कर लेनेपर मनुष्यको फिर कभी शोक नहीं होता?
श्रीवसिष्ठजीने कहा—महामते! जिन शास्त्रोंमें मुख्यतः आत्मज्ञानका ही प्रतिपादन हुआ है, उनमें यह महारामायण नामक शास्त्र ही सबमें श्रेष्ठ और शुभ है। इस उत्तम इतिहासका श्रवण करनेसे बोध प्राप्त हो जाता है। इसे समस्त इतिहासोंका सार कहा गया है। इस वाङ्मय (शास्त्र) का श्रवण कर लेनेपर कभी क्षीण न होनेवाली जीवन्मुक्ति स्वयं ही प्रकट हो जाती है। इसलिये यही सबकी अपेक्षा अत्यन्त पावन है। जैसे स्वप्न आदिके रहते हुए ही यह स्वप्न है, ऐसा ज्ञान हो जानेपर उस स्वप्नके सच्चे होनेकी भावना नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार इस शास्त्रका विचार करनेसे जब यह समझमें आ जाता है कि सारा जगत् स्वप्नके समान मिथ्या है, तब यह दृश्य-जगत् ज्यों-का-त्यों स्थित रहकर भी ज्ञानीकी दृष्टिमें अस्तको प्राप्त हो जाता है। आत्मज्ञानके लिये अपेक्षित जो-जो युक्तियाँ इस शास्त्रमें हैं, वे ही दूसरे ग्रन्थोंमें भी उपलब्ध होती हैं। इसीलिये विद्वान् पुरुष इस महारामायणको सम्पूर्ण विज्ञान-शास्त्ररूपी धनका कोष (खजाना) मानते हैं। जो पुरुष प्रतिदिन इस महारामायणका श्रवण करता है, उसमें उत्कृष्ट चमत्कार आ जाता है। उसकी बुद्धि अन्य ग्रन्थोंके स्वाध्यायसे उत्पन्न हुए बोधकी अपेक्षा उत्तम बोधको प्राप्त कर लेती है, इसमें संशय नहीं। किसी दुष्कर्मके फलका उदय होनेके कारण जिसकी इस ग्रन्थके प्रति रुचि अथवा श्रद्धा नहीं है, जिसे यह शास्त्र नहीं रुचता, वह दूसरे किसी ज्ञानप्रधान सत्-शास्त्रका विचार करे (उससे हमारा कोई द्वेष नहीं है)। जैसे उत्तम औषधका पान करनेपर स्वयं ही नीरोगता प्राप्त हो जाती है, उसी तरह इस योगवासिष्ठ महारामायणका श्रवण कर लेनेपर जीवन्मुक्तिका स्वयं अनुभव होने लगता है।
(सर्ग ७-८)