संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
प्रारंभिक पृष्ठ (भूमिका एवं विषय-सूची)
॥ श्रीहरिः ॥
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संक्षिप्त
योगवासिष्ठ
गीताप्रेस, गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR
कल्याण
[चित्र: चार मोक्ष-द्वार — विचार, शम, सन्तोष, साधुसङ्ग]
| वर्ष ३५ | संक्षिप्त योगवासिष्ठ-अङ्क | संख्या १ |
|---|
दुर्गति-नाशिनि दुर्गा जय जय, काल-विनाशिनि काली जय जय।
उमा रमा ब्रह्माणी जय जय, राधा सीता रुक्मणि जय जय॥
साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, जय शंकर।
हर हर शंकर दुखहर सुखकर अघ-तम-हर हर हर शंकर॥
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥
जय-जय दुर्गा, जय मा तारा। जय गणेश, जय शुभ-आगारा॥
जयति शिवा-शिव जानकि-राम। गौरी-शंकर सीता-राम॥
जय रघुनन्दन जय सिया-राम। व्रज-गोपी-प्रिय राधेश्याम॥
रघुपति राघव राजा राम। पतितपावन सीताराम॥
सं० २०५० द्वितीय संस्करण ५,०००
मूल्य—पैंसठ रुपये
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कल्याणमें बाहरके विज्ञापन नहीं छपते।
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कल्याणमें समालोचनाका स्तम्भ नहीं है।
जय पावक रवि चन्द्र जयति जय। सत्-चित्-आनँद भूमा जय जय॥
जय जय विश्वरूप हरि जय। जय हर अखिलात्मन् जय जय॥
जय विराट जय जगतपते। गौरीपति जय रमापते॥
सम्पादक—हनुमानप्रसाद पोद्दार, चिम्मनलाल गोस्वामी, एम्० ए०, शास्त्री
केशोराम अग्रवालद्वारा गोविन्दभवन-कार्यालयके लिये गीताप्रेस, गोरखपुरसे मुद्रित तथा प्रकाशित
॥ श्रीहरिः ॥
संक्षिप्त
योगवासिष्ठाङ्क
श्रीराम तीर्थयात्राके लिये पिता दशरथसे आज्ञा माँग रहे हैं (वैराग्य-प्रकरण, सर्ग ३) (पृष्ठ-संख्या १)
दशरथकी सभामें दिव्य महर्षियोंका अवतरण (वैराग्य-प्रकरण, सर्ग ३३) (पृष्ठ-सङ्ख्या १६)
लीलापर देवी सरस्वतीकी कृपा (उत्पत्ति-प्रकरण, सर्ग १५) (पृष्ठ-संख्या ९६)
ब्रह्माजी और बालक वसिष्ठमें बातचीत (मुमुक्षु-प्रकरण, सर्ग १०) (पृष्ठ-सङ्ख्या १४४)
ब्रह्माका राजहंसोंपर दस ब्रह्माओंको देखना (उत्पत्ति-प्रकरण, सर्ग ८५) (पृष्ठ-संख्या ३०४)
प्रह्लादके द्वारा भगवान् विष्णुकी पूजा (उपशम-प्रकरण, सर्ग ३२) (पृष्ठ-संख्या ३८४)
(इस पृष्ठ पर केवल चित्र/रेखाचित्र (Illustration) है, कोई देवनागरी या संस्कृत पाठ नहीं है।)
श्रीहरिः
संक्षिप्त योगवासिष्ठाङ्ककी विषय-सूची
| विषय | पृष्ठ-संख्या | विषय | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| १—महर्षि वसिष्ठजीको नमस्कार<br>(सुतीक्ष्ण, नि० प्र० उ० २१६ । २६) | १ | ३—जीवन्मुक्तके स्वरूपपर विचार, जगत्के मिथ्यात्व तथा द्विविध वासनाका निरूपण तथा भगवान् श्रीरामकी तीर्थ-यात्राका वर्णन | २३ |
| २—भगवान् श्रीरामको नमस्कार<br>(वसिष्ठ, नि० प्र० पू० २ । ६०) | १ | ४—तीर्थ-यात्रासे लौटे हुए श्रीरामकी दिनचर्या एवं पिताके घरमें निवास, राजा दशरथके यहाँ विश्वामित्रका आगमन और राजाद्वारा उनका सत्कार | २५ |
| ३—योगवासिष्ठमें भगवान् श्रीरामके स्वरूप तथा माहात्म्यका प्रतिपादन | २ | ५—विश्वामित्रका अपने यज्ञकी रक्षाके लिये श्रीरामको माँगना और राजा दशरथका उन्हें देनेमें अपनी असमर्थता दिखाना | २८ |
| ४—कल्याण ('शिव') | ३ | ६—विश्वामित्रका रोष, वसिष्ठजीका राजा दशरथको समझाना, राजा दशरथका श्रीरामको बुलानेके लिये द्वारपालको भेजना तथा श्रीरामके सेवकोंका महाराजसे श्रीरामकी वैराग्यपूर्ण स्थितिका वर्णन करना | ३० |
| ५—एकश्लोकी योगवासिष्ठ (तत्त्वचिन्तक स्वामीजी श्रीअनिरुद्धाचार्यजी वेंकटाचार्यजी महाराज) | ४ | ७—विश्वामित्र आदिकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर उनका मस्तक सूँघना और मुनिके पूछनेपर श्रीरामका अपने विचार-मूलक वैराग्यका कारण बताना | ३३ |
| ६—वासिष्ठ-बोध-सार [ कविता ] (पाण्डेय श्रीरामनारायणदत्तजी शास्त्री 'राम') | ४ | ८—धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन | ३६ |
| ७—योगवासिष्ठकी श्रेष्ठता और समीचीनता<br>(पण्डित श्रीजानकीनाथजी शर्मा) | ५ | ९—अहंकार और चित्तके दोष | ३८ |
| ८—योगवासिष्ठकी आजके आत्मशान्ति, विश्व-शान्तिके इच्छुक विश्वको चुनौती तथा इस क्षणका ज्ञान-बन्धुत्व एवं शमाभास<br>(श्रीरामनिवासजी शर्मा) | ९ | १०—तृष्णाकी निन्दा | ४० |
| ९—भगवान् वसिष्ठकी जय (श्रीसूरजचंदजी सत्यप्रेमी 'डाँगीजी') | १० | ११—शरीर-निन्दा | ४३ |
| १०—योगवासिष्ठका साध्य-साधन | ११ | १२—बाल्यावस्थाके दोष | ४६ |
| ११—योगवासिष्ठका दुरुपयोग नहीं होना चाहिये<br>(भक्त श्रीरामशरणदासजी) | १५ | १३—युवावस्थाके दोष | ४७ |
| १२—श्रीगुरुवर-वसिष्ठ-स्तवन [ कविता ]<br>(पं० श्रीरामनारायणजी त्रिपाठी 'मित्र' शास्त्री) | १६ | १४—स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण | ४९ |
| वैराग्य-प्रकरण | १५—वृद्धावस्थाकी दुःखरूपता | ५० | |
| १—सुतीक्ष्ण और अगस्ति, कारुण्य और अग्निवेश्य, सुरुचि तथा देवदूत और अरिष्टनेमि एवं वाल्मीकिके संवादका उल्लेख करते हुए भगवान्के श्रीरामावतारमें ऋषियोंके शापको कारण बताना | १७ | १६—कालके स्वरूपका विवेचन | ५१ |
| २—इस शास्त्रके अधिकारीका निरूपण, रामायणके अनुशीलनकी महिमा, भरद्वाजको ब्रह्माजीका वरदान तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे वाल्मीकिका भरद्वाजको संसार-दुःखसे छुटकारा पानेके निमित्त उपदेश देनेके लिये प्रवृत्त होना | २१ | १७—कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता | ५३ |
| १८—सांसारिक वस्तुओंकी निस्सारता, क्षणभङ्गुरता और दुःखरूपताका तथा सत्पुरुषोंकी दुर्लभताका प्रतिपादन | ५५ |
( ४ )
१९—जागतिक पदार्थोंकी परिवर्तनशीलता एवं अस्थिरताका वर्णन ... ५८
२०—श्रीरामकी प्रबल वैराग्यपूर्ण जिज्ञासा तथा तत्त्वज्ञानके उपदेशके लिये प्रार्थना ... ५९
२१—श्रीरामचन्द्रजीका भाषण सुनकर सबका आश्चर्य-चकित होना, आकाशसे फूलोंकी वर्षा, सिद्ध पुरुषोंके उद्गार, राजसभामें सिद्धों और महर्षियोंका आगमन तथा उन सबके द्वारा श्रीरामके वचनोंकी प्रशंसा ... ६२
मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरण
१—विश्वामित्रजीका श्रीरामको तत्त्वज्ञानसम्पन्न बताते हुए उनके सामने शुकदेवजीका दृष्टान्त उपस्थित करना, शुकदेवजीका तत्त्वज्ञान प्राप्त करके परमात्मामें लीन होना ... ६५
२—विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश करनेके लिये अनुरोध करना और वसिष्ठजीका उसे स्वीकार कर लेना ... ६८
३—जगत्की भ्रमरूपता एवं मिथ्यात्वका निरूपण, सदेह और विदेह मुक्तिकी समानता तथा शास्त्र-नियन्त्रित पौरुषकी महत्ताका वर्णन ... ६९
४—शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा, पुरुषार्थसे भिन्न प्रारब्धवादका खण्डन तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन ... ७१
५—ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण ... ७३
६—विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन ... ७४
७—पुरुषार्थकी प्रबलता बताते हुए दैवके स्वरूपका विवेचन तथा शुभ वासनासे युक्त होकर सत्कर्म करनेकी प्रेरणा ... ७६
८—श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन, ज्ञानप्राप्तिका विस्तार, श्रीरामजीके वैराग्यकी प्रशंसा, वक्ता और प्रश्नकर्ताके लक्षण आदिका विशेषरूपसे वर्णन ... ७७
९—संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता, ज्ञानका उत्तम माहात्म्य, श्रीराममें प्रश्नकर्ताके गुणोंकी अधिकताका वर्णन, जीवन्मुक्तिरूप फलके हेतुभूत वैराग्य आदि गुणोंका तथा शमका विशेषरूपसे निरूपण ... ८२
१०—विचार, संतोष और सत्समागमका विशेष-रूपसे वर्णन तथा चारों गुणोंमेंसे एक ही गुणके सेवनसे सद्गतिका कथन ... ८७
११—प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन, ग्रन्थकी प्रशंसा, शान्ति, ब्रह्म, द्रष्टा और दृश्यका विवेचन, परस्पर सहायक प्रज्ञा और सदाचारका वर्णन ... ९०
उत्पत्ति-प्रकरण
१—दृश्य जगत्के मिथ्यात्वका निरूपण, दृश्य ही बन्धन है और उसका निवारण होनेसे ही मोक्ष होता है, इसका प्रतिपादन तथा द्रष्टाके हृदयमें ही दृश्यकी स्थितिका कथन ... ९६
२—द्रष्टाकी मनोरूपता और उसके संकल्परूपमय जगत्की असत्ता तथा ज्ञाताके कैवल्यकी ही मोक्षरूपताका प्रतिपादन ... ९७
३—मनके स्वरूपका विवेचन, मन एवं मनःकल्पित दृश्य जगत्की असत्ताका निरूपण तथा महाप्रलय-कालमें समस्त जगत्को अपनेमें लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते हैं और वे ही सबके मूल हैं, इसका प्रतिपादन ... ९९
४—ज्ञानसे ही परासिद्धि या परमात्मप्राप्तिका प्रतिपादन तथा ज्ञानके उपायोंमें सत्सङ्ग एवं सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायकी प्रशंसा ... १०२
५—परमात्माके ज्ञानकी महिमा, उसके स्वरूपका विवेचन, दृश्य जगत्के अत्यन्ताभाव एवं ब्रह्मरूपताका निरूपण तथा आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये योगवासिष्ठ ही सर्वोत्तम शास्त्र है—इसका प्रतिपादन ... १०३
६—जीवन्मुक्तिका लक्षण, जगत्की असत्ता तथा ब्रह्मसे उसकी अभिन्नताका प्रतिपादन, परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका वर्णन ... १०५
७—जगत्की ब्रह्मसे अभिन्नता, परमार्थ-तत्त्वका लक्षण, महाप्रलयकालमें जगत्के अधिष्ठानका विचार तथा जगत्की ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... १०७
( ५ )
| ८—ब्रह्ममें जगत्का अध्यारोप, जीव एवं जगत्के रूपमें ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन ... १०९ | वहाँ युद्धका आयोजन देखना; शूरके लक्षण तथा दिग्माहवकी परिभाषा ... १३७ |
| ९—भेदके निराकरणपूर्वक एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड सत्ताका वर्णन तथा जगत्की पृथक् सत्ताका खण्डन ... १११ | २०—लीला और सरस्वतीका आकाशमें विमानपर स्थित हो युद्धका दृश्य देखना ... १३९ |
| १०—जगत्के अत्यन्ताभावका प्रतिपादन, मण्डपोपाख्यानका आरम्भ, राजा पद्म तथा रानी लीलाका परस्पर अनुराग, लीलाका सरस्वतीकी आराधना करके वर पाना और रणभूमिमे पतिके मारे जानेसे अत्यन्त व्याकुल होना ... ११४ | २१—युद्धका वर्णन तथा उभयपक्षको सहायता देनेवाले विभिन्न जनपदों और स्थानोंका उल्लेख ... १४१ |
| ११—सरस्वतीकी आज्ञासे पतिके शवको फूलोंकी ढेरीमें रखकर समाधिस्थित हुई लीलाका पतिके वासनामय स्वरूप एवं राजवैभवको देखना तथा समाधिसे उठकर पुनः राजसभामें सभासदोंका दर्शन करना ... ११८ | २२—युद्धका उपसंहार, राजा विदूरथके शयनागारमें गवाक्षरन्ध्रसे लीला और सरस्वतीका प्रवेश तथा सूक्ष्म चिन्मय शरीरकी सर्वत्र गमनशक्तिका प्रतिपादन ... १४३ |
| १२—लीलाका सरस्वतीसे कृत्रिम और अकृत्रिम सृष्टिके विषयमें पूछना और सरस्वतीका इस विषयको समझानेके लिये लीलाके जीवनसे मिलते-जुलते एक ब्राह्मण-दम्पतिके जीवनका वृत्तान्त सुनाना ... १२१ | २३—राजा पद्मके भवनमें सरस्वती और लीलाका प्रवेश और राजाद्वारा उनका पूजन, मन्त्रीद्वारा राजाका जन्मवृत्तान्त-वर्णन, राजा विदूरथ और सरस्वती देवीकी बातचीत, वसिष्ठजीद्वारा अज्ञानावस्थामें जगत् और स्वप्नकी सत्यताका वर्णन, सरस्वतीद्वारा विदूरथको वर-प्रदान, नगरपर शत्रु का आक्रमण और नगरकी दुरावस्थाका कथन, भयभीत हुई राजमहिषीद्वारा राज्ञीकी शरणमें आना, लीलाको दूसरे वररूप राजा पद्मकी प्राप्ति ... १४६ |
| १३—लीला और सरस्वतीका संवाद-जगत्की असत्ता एव अजातवादकी स्थापना ... १२४ | २४—राजा विदूरथका विशाल सेनाके साथ युद्धके लिये प्रयाण, युद्धारम्भ, लीलाके पूछनेपर सरस्वतीद्वारा राजा सिन्धुके विजयी होनेमें हेतु-कथन, विदूरथ और राजा सिन्धुके दिव्यास्त्रोंद्वारा किये गये युद्धका सविस्तर वर्णन, राजा विदूरथकी पराजय और देशपर राजा सिन्धुके अधिकारका कथन १५१ |
| १४—लीला और सरस्वतीका संवाद—सब कुछ चिन्मात्र ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन ... १२६ | २५—राजा विदूरथकी मृत्यु, संसारकी असत्यता और द्वितीय लीलाकी वासनारूपताका वर्णन, लीलाके गमनमार्ग और स्वामी पद्मकी प्राप्तिका कथन, पदार्थोंकी नियति, मरणक्रम, भोग और कर्म, गुण एवं आचारके अनुसार आयुके मानका वर्णन, आदि-सृष्टि से लेकर जीवकी विचित्र गतियों तथा ईश्वरकी स्थितिका निरूपण ... १५५ |
| १५—वासनाओंके क्षयका उपाय और ब्रह्मचिन्तनके अभ्यासका निरूपण ... १२९ | २६—राजा विदूरथका वासनामय यमपुरीमें गमन-लीला और सरस्वतीद्वारा उसका अनुगमन और पूर्व-शरीरकी प्राप्तिका वर्णन, लीलाके शरीरकी असत्यताका कथन, समाधिमें स्थित लीलाके शरीरका विनाश, लीलाके साथ वार्तालाप और राजा पद्मके पुनरुज्जीवनका कथन, गन्ध... |
| १६—सरस्वती और लीलाका ज्ञानदेहके द्वारा आकाशमें गमन और उसका वर्णन ... १३० | |
| १७—लीलाका भूतलमें प्रवेश और उसके द्वारा अपने पूर्वजन्मके स्वजनोंके दर्शन, ज्येष्ठशर्माको माताके रूपमें लीलाका दर्शन न होनेका कारण ... १३१ | |
| १८—लीलाकी सत्य-सङ्कल्पता, उसे अपने अनेक जन्मोंकी स्मृति, लीला और सरस्वतीका आकाशमें भ्रमण तथा परम व्योम—परमात्माकी अनादि-अनन्त सत्ताका प्रतिपादन ... १३३ | |
| १९—लीलाद्वारा ब्रह्माण्डोंका निरीक्षण, दोनों देवियोंका भारतवर्षमें लीलाके पतिके राज्यमें जाना और |
( ६ )
| उठनेसे नगर और अन्तःपुरमें उत्सव, लीलोपाख्यानके प्रयोजनका विस्तारसे कथन ... १६७ | ३९—मनकी परमात्मरूपता, ब्रह्मकी विविध शक्ति, सबकी ब्रह्मरूपता, मनके संकल्पसे ही सृष्टि-विस्तार तथा वासना एवं मनके नाशसे ही श्रेयकी प्राप्तिका प्रतिपादन ... १९६ |
| २७—सृष्टिकी असत्यता तथा सबकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन ... १७५ | ४०—जगत्की चित्तरूपता, वासनायुक्त मनके दोष, मनका महान् वैभव तथा उसे वशमें करनेका उपाय ... १९८ |
| २८—जगत्की असत्ता या भ्रमरूपताका प्रतिपादन तथा नियति और पौरुषका विवेचन ... १७७ | ४१—चित्तरूपी रोगकी चिकित्साके उपाय तथा मनोनिग्रहसे लाभ ... २०१ |
| २९—ब्रह्मकी सर्वरूपता तथा उसमें भेदका अभाव, परमात्मासे जीवकी उत्पत्ति और उसके स्वरूपका विवेचन, परमात्मासे ही मनकी उत्पत्ति, मनका भ्रम ही जगत् है—इसका प्रतिपादन तथा जीव-चित्त आदिकी एकता ... १७८ | ४२—मनोनाशके उपायभूत वासना-त्यागका उपदेश, अविद्या-वासनाके दोष तथा इसके विनाशके उपायकी जिज्ञासा ... २०२ |
| ३०—चित्तका विलास ही द्वैत है, त्याग और ज्ञानसे ही अज्ञानसहित मनका क्षय होता है—इसका प्रतिपादन तथा भोक्ता जीवके स्वरूपका वर्णन १७९ | ४३—अविद्याके विनाशके हेतुभूत आत्मदर्शनका, विशुद्ध परमात्मस्वरूपका तथा असंकल्पसे वासनाक्षयका प्रतिपादन ... २०४ |
| ३१—परमार्थसत्ताका विवेचन, बीजमें वृक्षकी भाँति परमात्मामें जगत्की त्रैकालिक स्थितिका निरूपण तथा ब्रह्मसे पृथक् उसकी सत्ता नहीं है—इसका प्रतिपादन ... १८२ | ४४—अविद्याकी बन्धनकारितापर आश्चर्य; चेष्टा देहमें नहीं, देहीमें है—इसका प्रतिपादन तथा अज्ञानकी सात भूमिकाओंका वर्णन ... २०६ |
| ३२—जगत्की ब्रह्मसे पृथक् सत्ताका खण्डन, भेदकी व्यावहारिकता तथा चित्तकी ही दृश्यरूपताका प्रतिपादन ... १८५ | ४५—ज्ञानकी सात भूमिकाओंका विशद विवेचन २०७ |
| ३३—यह दृश्य-प्रपञ्च मनका विलासमात्र है, इसका ब्रह्माजीके द्वारा अपने अनुभवके अनुसार प्रतिपादन ... १८६ | ४६—मायिक रूपका निराकरण करके सन्मात्रत्वका प्रदर्शन, अविद्याके स्वरूपका निरूपण, संक्षेपमें ज्ञानभूमिका एवं जीवात्माके वास्तविक स्वरूपका वर्णन ... २१५ |
| ३४—स्थूल-शरीरकी निन्दा, मनोमय शरीरकी विशेषता, उसे सत्कर्ममें लगानेकी प्रेरणा, ब्रह्मा और उनके द्वारा निर्मित जगत्की मनोमयता, जीवका स्वरूप और उसकी विविध सांसारिक गति तथा सृष्टिके दोष एवं मिथ्यात्वका उपदेश ... १८८ | स्थिति-प्रकरण<br><br>१—चित्तरूपसे जगत्का वर्णन, जगत्की स्थितिका खण्डन करके पूर्णानन्दस्वरूप सन्मात्रकी स्थितिका कथन, मनको ही जगत्का कारण बताकर उसके नाश होनेपर जगत्की शून्यताका कथन २१८ |
| ३५—जीवोंकी चौदह श्रेणियों तथा परब्रह्म परमात्मासे ही उत्पन्न होनेके कारण सबकी ब्रह्मरूपता ... १९० | २—स्वरूपकी विस्मृतिसे ही भेद्भ्रमकी अनुभूति, चित्तशुद्धि एवं जाग्रत् आदि अवस्थाओंके शोधनसे ही भ्रम-निवारणपूर्वक आत्मबोधकी प्राप्ति तथा वैराग्यमूलक विवेकसे ही मोक्षलाभका वर्णन ... २२० |
| ३६—कर्ता और कर्मकी सहोत्पत्ति एवं अभिन्नता तथा चित्त और कर्मकी एकताका प्रतिपादन ... १९२ | ३—उपासनाओंके अनुसार फलकी प्राप्ति तथा जाग्रत्-स्वप्न अवस्थाओंका वर्णन, मनको सत्य आत्मामें लगानेका आदेश, मनको भावनाके अनुसार रूप और फलकी प्राप्ति तथा भावनाके त्यागसे विचारद्वारा ब्रह्मभावकी प्राप्तिका प्रतिपादन ... २२२ |
| ३७—मनका स्वरूप तथा उसकी विभिन्न संज्ञाओंपर विचार ... १९३ | |
| ३८—मनके द्वारा जगत्के विस्तार तथा अज्ञानीके उपदेशके लिये कल्पित त्रिविध आकाशका निरूपण एवं मनको परमात्मचिन्तनमें लगानेकी आवश्यकता ... १९५ |