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संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

६१- श्रीवसिष्ठजी और सिद्धका आकाशमें अभीष्ट स्थानोंको जाना, वसिष्ठजीका मनोमय देहसे सिद्धादि लोकोंमें भ्रमण करना, श्रीवसिष्ठजीका अपनी सत्यसङ्कल्पताके कारण सबके दृष्टिपथमें आना, व्यवहारपरायण होना तथा 'पार्थिव वसिष्ठ' आदि संज्ञाओंको प्राप्त करना, पाषाणोपाख्यानकी समाप्ति और सबकी चिन्मय ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन

निर्वाण-प्रकरण उ० ] ❖ रुद्रकी छायारूपिणी कालरात्रिके स्वरूप तथा ताण्डव-नृत्यका वर्णन ❖ ५९७


चार पदार्थ ही दिखायी देते थे—एक तो वे नील गगनकी-सी आकृतिवाले भगवान् रुद्र ही दिखायी देते थे, जो आकाशके मध्यभागमें बिना किसी आधारके स्थित थे। दूसरा ब्रह्माण्ड-सदनका निचला भाग था, जो सातों पातालोंसे भी नीचे बहुत दूर दृष्टिगोचर होता था। वह पृथ्वी और आकाशके तल-भाग-सा जान पड़ता था। तीसरा पदार्थ था, ब्रह्माण्डमण्डलके ऊपरका भाग, जहाँ अत्यन्त दूर होनेके कारण दृष्टि नहीं पहुँचती थी; अतएव वह दुर्लक्ष्य आकाशके समान नीला जान पडता था। ब्रह्माण्डके वे ऊर्ध्व और अधोभाग अत्यन्त दूर होनेके कारण एक दूसरेसे विलग थे। उन दोनोंके बीचमें जो अनादि, अनन्त और विस्तृत ब्रह्मके समान निर्मल आकाश था, उसीको उस समय मैने चौथे पदार्थके रूपमें देखा था। इन चारोंके सिवा दूसरी कोई वस्तु यहाँ मेरे देखनेमें नहीं आयी।

पार्थिव पदार्थोंका वह भाग, जो ब्रह्माण्ड-कपाल कहलाता है, कमठदलके समान स्थित है। जल आदि वस्तुएँ आधाररूपसे आश्रय लेनेके लिये उसीकी ओर दौडती हैं, जैसे बच्चे अपनी माँकी ओर दौड़े जाते हैं। जैसे प्याससे प्राणी जलकी ओर भागे जाते हैं, उसी प्रकार वे जलादि पदार्थ ब्रह्माण्ड नामक महाशरीरके निकटतम भागकी ओर दौड़ते हैं। जैसे शरीरसे जुडे हुए हाथ-पैर आदि अवयव अपनी अत्यन्त दृढ़ संयोगकी स्थितिको नहीं छोड़ते हैं, वैसे ही तैजस आदि पदार्थ भीतरसे ब्रह्माण्ड-शरीरका ही आश्रय ले अपनी स्थितिको नहीं छोड़ते हैं।

इस ब्रह्माण्डको यद्यपि किसीने धारण नहीं किया है तथापि वह परमात्माकी अचिन्त्य धारणात्मिका शक्तिसे अच्छी तरह धारित ही है। उसीके कारण यह पतनोन्मुख होनेपर भी गिरता नहीं है। यह सारा जगत् आकाररहित होनेपर भी खमनगरके समान साकार दिखायी देता है। जैसे चैतन्य शक्तिका प्रकाश होता है, वैसा ही यह जगत् भी स्थित है। जैसे आकाशमें श्यामता और शून्यता है, जैसे वायुमें गतिशीलता है, उसी तरह चेतनाकाश परमात्मामें यह जगत् स्थित है।

(सर्ग ८०)


रुद्रकी छायारूपिणी कालरात्रिके स्वरूप तथा ताण्डव-नृत्यका वर्णन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन! तदनन्तर उस समय उस महाकाशमें मैने देखा, भगवान् रुद्र मत्त-से होकर अखण्ड ताण्डवमें प्रवृत्त हो रहे हैं। उनकी आकृति बहुत दूरतक फैली हुई थी। उनका शरीर आकाशके समान ही व्यापक दिखायी देता था। उनका आकार बहुत बड़ा था। उन्हें देखकर ऐसा लगता था, मानो एकार्णवका जल ही तत्काल देह धारण करके खड़ा हो गया हो। इसके बाद मुझे दिखायी दिया कि उनके शरीरसे छाया-सी निकल रही है, जो ताण्डव-नृत्यमें उनका अनुकरण एवं अनुसरण करनेवाली है। उस समय मेरे मनमें यह प्रश्न उठा कि द्वादश सूर्योंके विद्यमान न रहनेपर जब आकाशमें महान् अन्धकार छा रहा है, तब यह छाया कैसे स्थित हुई है ? मै इस प्रकार विचार कर ही रहा था कि वह तत्काल नृत्य करती हुई शीघ्रतापूर्वक उनके आगे जाकर खड़ी हो गयी। उसका शरीर भी बहुत विस्तृत था तथा वह भी अपने तीन नेत्रोंसे सुशोभित हो रही थी। उसका रंग घोर काला था। वह बहुत ही दुर्बल थी। उसके अङ्गोंमें नस-नाड़ियोंके जाल सुस्पष्ट दिखायी देते थे। वह जरासे जर्जर हो रही थी। आकृति विशाल थी, मुखपर आगकी ज्वालाएँ व्याप्त थीं। वनके चञ्चल पत्र-पुष्प आदि मुकुट बनकर उसके मस्तककी शोभा बढ़ाते थे। वह कोयलेके समान काली थी मानो काली रात्रि ही उसका रूप धारण करके आ गयी हो, अन्धकारलक्ष्मी ही मूर्तिमती

५९८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हो गयी हो । वह बहुत लंबी थी । उसका मुँह विकराल दिखायी देता था । वह इस तरह खड़ी थी मानो आकाशको नापनेके लिये उद्यत हो । अपने बड़े-बड़े घुटनों और भुजाओंके भ्रमणसे वह समस्त दिशाओंको मानो नाप लेना चाहती थी । वह ऐसी दुर्बल थी मानो बहुत कालतक उसे उपवास करना पड़ा हो । उसके विशाल शरीरमें सर्वत्र गड्ढे-ही-गड्ढे दीख रहे थे । वह काजलकी-सी काली और मेघमालाकी भाँति वायुके वेगसे चञ्चल जान पड़ती थी । जब वह बहुत बड़ी और दुर्बल होनेके कारण खड़ी होनेमें भी असमर्थ हो गयी, तब विधाताने मानो उसे नस-नाड़ियोंकी लंबी रस्सियोंसे बाँध दिया ( जिससे वह अच्छी तरह खड़ी रह सके ) । नस-नाड़ियों और अँतड़ियोंकी रस्सियोंद्वारा उसके सिर और हाथ-पैर आदि सभी अङ्ग इस तरह बँधे हुए दिखायी देते थे, मानो मूलसे लेकर शाखाओंके अग्रभागतक सूतोंसे बँधी हुई काँटेदार वृक्षकी झाड़ी हो । अनेक वर्णोंके सूर्यादि देवताओं तथा दानवोंके मस्तकरूपी कमलोंके समूहोंकी माला उसके कण्ठमें शोभा दे रही थी । हुतासे प्रज्वलित तथा निर्मल प्रभासे पूर्ण अग्निकी ज्वाला ही उसके लिये आँचल थी । उसके लंबे-लंबे कानोंमें नाग झूल रहे थे । उसने दो मनुष्योंकी लाशोंको कुण्डलके रूपमें धारण कर रखा था । जैसे सूखी लौकीकी लतामें दो बड़े-बड़े फल लटक रहे हों, उसी प्रकार उसकी छातीमें कुछ-कुछ हिलते हुए काले रंगके दो स्तन दिखायी देते थे, जो बहुत बड़े होनेके कारण जाँघ-तक लटक रहे थे । उसके शरीरको देखकर मैंने यह अनुमान कर लिया कि यह वही कालरात्रि है, जिसके विषयमें साधु पुरुषोंने यह निर्णय किया है कि 'ये भगवती काली हैं।' उसके तीन नेत्र आगकी ज्वालासे परिपूर्ण थे । ललाटप्रान्त इन्द्रनील मणिके समान चमक रहा था । उसकी दोनों ठोढ़ियों गहरी होनेके कारण भयंकर जान पड़ती थीं । वात-स्कन्ध ( प्रवह आदि वायु )-रूपी तागोंमें पिरोयी हुई तारावलियाँ उसके कण्ठदेशमें मुक्ताहारका काम दे रही थीं । वह वर्षा करनेवाले कल्पान्त-कालके मेघोंकी भाँति शोभा पानेवाली भ्रमणशील भुजाओंद्वारा सम्पूर्ण दिङ्मण्डलको व्याप्त करके खड़ी थी । वे भुजाएँ अपने नखोंकी कान्ति बिखेर रही थीं । हिमालय और सुमेरु पर्वत उसके दोनों कानोंमें चाँदी और सोनेकी बालियाँ बनकर शोभा बढ़ा रहे थे । ब्रह्माण्डरूपी घुँघुरुओंसे बनी हुई विशाल माला उसके कटिभागमें करधनीका काम दे रही थी । शिखर, वन और नगररूपी पुष्पगुच्छोंसे युक्त तथा पुराने नगर, वन, द्वीप और ग्रामरूपी कोमल पल्लवोंसे अलंकृत सातों कुलपर्वत उस भगवती कालीके गलेकी पुष्पमालाएँ बने हुए थे ।

श्रीराम ! उस देवीके अङ्गोंमें मैंने पुर, नगर, ऋतु, तीनों लोक, मास तथा दिन-रातरूपी फूलोंकी मालाएँ देखी थीं । उसके शरीरमें व्यक्त रूपसे स्थित नगर, ग्राम और पर्वत आदि मानो पुनर्जन्म पानेके आनन्दसे उल्लसित हो उसके साथ-साथ नाच रहे थे । कभी-कभी वह नहीं नाचती थी तो भी पर्वत, वन और काननोंसहित नाना आकारवाला सारा जगत्, जो मरकर फिर लौटा था, नाचता ही रहता था । वह कालरात्रि जब चतुराईके साथ नृत्य करने लगती थी, तब चन्द्रमा, सूर्य, दिन और रात उसके नखाग्र-भागकी रेखाओंके भीतर विद्यमान प्रभामें मिलकर घूमते हुए सुवर्ण-सूत्रके समान दीर्घाकार प्रतीत होते थे । जब भगवती कालरात्रिका ताण्डव-नृत्य होने लगता था, तब इन्द्र आदि देवता और असुर अपनी-अपनी अधिकार-प्रवृत्तिसे और-ही-और बनकर वायुसे उड़ाये गये मच्छरोंके समान अथवा अस्थिर विद्युत्के समान आते-जाते दिखायी देते थे । भगवतीके शरीरमें जो सर्ग दिखायी देता था, उसमें सृष्टि-प्रलय, सुख-दुःख, भव-अभव,

निर्वाण-प्रकरण उ० ] * रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्मसत्ताकी ही स्फूर्ति * ५९९

इच्छा-अनिच्छा, विधि-निषेध, जन्म-मरण एवं भ्रम आदि विभिन्न प्रकारके भाव कभी सदा एक साथ और कभी पृथक्-पृथक् रूपसे सुशोभित होते थे । सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त देवी कालरात्रि चैतन्य-शक्तिरूपा जगन्मयी, अनन्त एवं विशाल आकाशकोशके सदृश विशुद्ध शरीरवाली है । वह देवी ( सूप ) कुदाल, ओखली, चटाई, फाल, घट, पिटारी, मूसल, डोल या बाल्टी, बटलोई और खम्भे—इत्यादि वस्तुओंको भी फूलके समान मानकर उनकी माला धारण करके नृत्य करती थी ।
(सर्ग ८१)


रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्म-सत्ताकी ही स्फूर्तिका प्रतिपादन तथा सच्चिदानन्दघनका विलास ही रुद्रदेवका नृत्य है—इसका कथन

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—भगवन् ! जब प्रलयकालमें सब कुछ नष्ट हो गया, तब वह देवी कालरात्रि अपने किस शरीरसे नाच रही थी ? सूप, फाल और घट आदिसे ( जो उस समय नष्ट हो चुके थे ) उसका माला धारण करना क्या है ? यदि ये सब वस्तुएँ थीं ही तो फिर त्रिलोकीका नाश क्या हुआ ? और यदि त्रिलोकी नष्ट हो गयी थी तो कालीके शरीरमें इन सब वस्तुओंकी स्थिति क्यों और कैसे सम्भव हुई ? निर्वाणको प्राप्त हुआ जगत् फिर आकर नाचने कैसे लगा ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! वास्तवमें न वह पुरुष था, न वह स्त्री थी, न वह नृत्य हुआ न वे दोनों रुद्र और काली वैसे विशेषणोंसे युक्त ही थे । उनके आचार-व्यवहार भी वैसे नहीं थे और उनकी वे आकृतियाँ भी नहीं थीं । जो कारणोंका भी परम कारण है,—वह अनादि, चिन्मय आकाशस्वरूप, अनन्त, शान्त, प्रकाशरूप, अविनाशी, सर्वव्यापी, सच्चिदानन्दघन, शिवस्वरूप साक्षात् ब्रह्म ही भैरव ( रुद्र ) के आकारमें दिखायी देता था । जगत्का नाश हो जानेपर उस रुद्रदेवके रूपमें स्थित हुआ वह चेतनाकाशस्वरूप परमात्मा ही था । चेतन होनेके कारण वह परमात्मा अपने चैतन्यस्वभाव वैभवको छोड़कर नहीं रह सकता । जैसे सुवर्ण कटक-कुण्डल आदिके रूपमें अवस्थित होता ही है, वह उन आकृतियोंका सर्वथा त्याग करके नहीं रहता, उसी प्रकार परमात्मा भी लीलाके लिये उमा, महेश्वर आदि सगुणरूप धारण करता ही है। वह अपने लीला-स्वभावको सर्वथा छोड़ नहीं सकता । बुद्धिमान् रघुनन्दन ! तुम्हीं बताओ, सुवर्ण कटक-कुण्डल आदि आकृतियोंको क्यों नहीं धारण करेगा ? क्योंकि वह उसका स्वभाव है। इसी प्रकार ब्रह्म भी सङ्कल्पद्वारा एकसे अनेक रूपमें प्रकट होता है, यह उसका श्रुतिप्रसिद्ध स्वभाव है। कोई भी पदार्थ अपने स्वभावके बिना कैसे रह सकता है ?

रघुनन्दन ! जन्म, मरण, माया, मोह, मन्दता, अवस्तुता, वस्तुता, विवेक, बन्ध, मोक्ष, शुभ, अशुभ, विद्या, अविद्या, निराकारता, साकारता, क्षणकाल, दीर्घकाल, सत्, असत्, सदसद्भाव, मूर्खता, पाण्डित्य, देश, काल, क्रिया, द्रव्य, कलना, केलि, कल्पना, रूप आदि विषयोंका बाह्य इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण, उन्हीं विषयोंका मनके द्वारा चिन्तन, ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, तेज, जल, वायु, आकाश तथा पृथिवी आदिके रूपमें जो यह दृश्य-प्रपञ्च फैला हुआ है, यह सब शुद्ध, निरामय चेतनाकाशरूप परमात्मा ही है । यह अपनी शुद्ध चिदाकाशरूपताका परित्याग न करता हुआ ही सर्वरूप होकर स्थित है । मैंने जिस चिन्मय परमाकाशका वर्णन किया है, वह परमात्मा ही यहाँ शिव कहा गया है। यह सनातन पुरुष है । यही विष्णुरूपसे स्थित होता है