सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

५६- प्रकृतिरूपा कालरात्रिके परमतत्त्व शिवमें लीन होनेका वर्णन

५८८* अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

हैं और शेष जितने लोग हैं, वे भ्रमके ही भागी होते हैं।

मुने ! इस विद्याधरीको वैराग्यके कारण उत्पन्न अपने मनोरथको सिद्ध करनेकी इच्छा हुई। इसीलिये इसने अन्य बहुत-सी धारणाओंका अभ्यास करके उनके प्रभावसे आपका दर्शन प्राप्त किया। आदि-अन्तसे रहित एवं अनामय विद्यारूपा ब्रह्मकी चिन्मयी मायाशक्ति सब ओर व्याप्त है। इस जगत्‌में कोई भी कार्य न तो कभी उत्पन्न होते हैं और न नष्ट ही होते हैं। केवल चित् ही द्रव्य, काल और क्रियाके रूपमें प्रकाशित हो तप रही है। ये जो देश, काल, क्रिया, द्रव्य, मन और बुद्धि आदि हैं, सब-के-सब चेतनरूपी शिलाकी मूर्तियाँ हैं। इनका न कभी उदय होता है और न अस्त ही। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें। यह चिच्छक्ति ही शिलाका आकार धारण करके स्थित है। जैसे स्पन्दन वायुका स्वरूप है, उसी प्रकार सारा जगत्-समुदाय इस चिच्छक्तिका अभिन्न अङ्ग है। यह जो चितिरूपा शिवा है, आदि-अन्तसे रहित है। किंतु भ्रमसे सादि और सान्त बन जाती है। निराकार होती हुई भी साकार हो जगतूरूप अङ्गोंसे युक्त बनकर स्थित हो जाती है। जैसे महाकाशके भीतर दूसरे-दूसरे आकाश (घटाकाश, मठाकाश आदि) महाकाशकी सत्तासे ही विद्यमान हैं, अपना पृथक् अस्तित्व नहीं रखते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण जगत् शून्यरूप होते हुए भी शान्तस्वरूप सर्वव्यापी चेतनाकाश परमात्मामें उसीकी सत्तासे सर्वत्र विद्यमान है। परंतु वे अपनी पृथक् सत्ता नहीं रखते हैं, इस दृष्टिसे उनके विषयमें 'हैं' और 'नहीं हैं'—ये दोनों बातें कही जा सकती हैं। मुनिवर वसिष्ठ ! अब आप यहाँसे अपने जगत्‌को जाइये और इस समय अपने पूर्व-कल्पित एकान्तवर्ती आसनपर समाधि लगाकर परम शान्तिका अनुभव कीजिये। मेरे जो कल्पित बुद्धि आदि जागतिक पदार्थ हैं, वे प्रलयको प्राप्त हो परम अव्यक्त तत्त्वमें मिल जायँ; क्योंकि इस समय हम परब्रह्म परमात्मपदको प्राप्त हो रहे हैं। (सर्ग ७०)


पाषाण-शिलाके भीतर बसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन तथा ब्रह्माके संकल्पके उपसंहारसे सम्पूर्ण जगत्‌का संहार क्यों होता है, इसका विवेचन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! ऐसा कहकर वे भगवान् ब्रह्मा सम्पूर्ण ब्रह्मलोकवासियोंके साथ पद्मासन लगाकर बैठ गये और फिर कभी न टूटनेवाली समाधिमें स्थित हो गये। उन्हींका अनुसरण करती हुई वह वासनाकी अधिष्ठात्री देवी सती-साध्वी कुमारी विद्याधरी भी उन्हींकी भाँति ध्यानमग्न हो शान्त हो गयी। उसका कोई भी अंश (स्मृति-बीजभेद) शेष नहीं रह गया। वह आकाशरूपिणी (शून्यत्वमात्रा) हो गयी। ब्रह्माजीका संकल्प धीरे-धीरे विरस होने लगा। जिस समय उनके संकल्पमें विरसता आयी, उसी क्षणसे तुरंत ही पर्वत, द्वीप और समुद्रोंसहित पृथ्वीकी तृण, गुल्म, लता और धान आदिको उत्पन्न करनेकी सारी शक्ति धीरे-धीरे नष्ट होने लगी। जैसे हमलोगोंके अङ्ग संवेदनशक्तिके क्षीण होनेपर नीरस हो जाते हैं, उसी प्रकार ब्रह्माजीकी अङ्गभूता पृथ्वीकी संवेदनशक्तिका उपसंहार होनेसे वह नीरसताको प्राप्त हो गयी। ब्रह्माजीके द्वारा उपेक्षित होनेपर पृथ्वी आदि तथा असुर आदि—ये दो तरहके महाभूत सब ओरसे क्षुब्ध हो उठे। चन्द्रमा, सूर्य, वायु, इन्द्र, अग्नि और यम—ये सब-के-सब महाप्रलयके कोलाहलसे व्याकुल हो गये। उनका अधिकार एवं प्रभाव ब्रह्मलोकमें मिल गया। वे अपने स्थानसे नीचे गिरने लगे। भूकम्पोंके कारण बड़े-बड़े पर्वत जोर-जोरसे झूमने और झोंके खाने लगे, मानो वे झूला झूलनेके सुखका अनुभव कर रहे हों। उनके ऊपरकी वृक्षश्रेणियाँ

निर्वाण-प्रकरण उ०] * पाषाण-शिलाके भीतर धंसे हुए ब्रह्माण्डके महाप्रलयका वर्णन * ५८९


फट्फट शब्दके साथ टूट-टूटकर गिरने लगीं। भूकम्पके कारण कैलास, मेरु और मन्दराचलकी कन्दराएँ हिलने लगीं, और कल्पवृक्षोंसे टूटकर लाल रंगके पुष्पगुच्छोंकी वर्षा होने लगी। रघुनन्दन ! लोकान्तर-पर्वत, नगर, समुद्र और वनपर्यन्त सारा जगत् कल्पान्तकालकी उत्पात-वायुके झोकेसे परस्पर टकराकर हताहत होते हुए प्राणियोंके कोलाहलसे व्याप्त एवं जीर्ण-शीर्ण हो गया, मानो रुद्रदेवके बाणोंसे दग्ध हुआ त्रिपुर-नगर भरे हुए समुद्रमें गिर रहा हो।

रघुनन्दन ! जब विराट्रूप स्वयम्भू ब्रह्माने अपने प्राणोंका आकर्षण एवं निरोध किया, तब वातस्कन्धनामसे स्थित आकाशजन्मा वायुने अपनी मर्यादा (ग्रह, नक्षत्र आदिको धारण करनेकी जिम्मेदारी) छोड़ दी। ब्रह्माजीने जब प्राणवायुरूप वातस्कन्धका अपने भीतर उपसंहार करना आरम्भ किया, तब पूर्वोक्त मर्यादाको त्यागकर साम्यावस्थाको पहुँचनेके लिये वायुमें क्षोभ उत्पन्न हुआ और उस क्षोभ-के कारण निराधार होकर आकाशमण्डलसे तारे टूट-टूटकर वैसे ही भूमिपर गिरने लगे, जैसे कहीं आग लगनेपर यदि जोरसे हवा चलती हो तो बड़े-बड़े लुआठे उड़ने और गिरने लगते हैं। उस समय आकाशसे भूतलपर गिरते हुए तारे वृक्षसे झड़ते हुए फूलोंके समान जान पड़ते थे। ब्रह्माजीका संकल्परूप ईंधन जब प्रलयोन्मुख हो गया, तब जैसे जलती हुई लपटें बुझ जाती हैं, वैसे ही सिद्धोंकी गतियाँ भी शान्त हो गयीं, अपनी शक्तिका नाश हो जानेपर प्रलय-वायुके वेगसे पतली रुईके समान आकाशमें उड़ते और भटकते हुए सिद्धसमुदाय मूक होकर नीचे गिरने लगे। भूकम्पसे चञ्चल हुए देवगिरि सुमेरुके शिखर, इन्द्रादि देवताओंके नगरों तथा कल्पवृक्षोंके समूहोंसहित धड़ाधड़ धराशायी होने लगे।

रघुनन्दन ! पहले न तो कोई असत् वस्तु थी और न सत् ही; किंतु सभी विकारोंसे रहित एकमात्र चिन्मय परमाकाश ही था; जो अकेला ही सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त था। उसी परमाकाशने अपने स्वरूपका परित्याग न करके निर्विकार रहते हुए ही अपनी आकाशताको अपनेसे भिन्न वस्तुके रूपमें कल्पना की। उसे अपनेसे पृथक् चेत्यके रूपमें जाना, चिद्रूप होनेसे वह चेतन कहा गया है। जैसे लोग संकल्प-नगरको शून्यरूप होते हुए भी साकार देखते हैं, वैसे ही अजन्मा परमात्मा शून्यरूप आकाशको ही देहरूप देखने लगा। आकाशमें आकाशको ही अपना शरीर मानने लगा। श्रीराम ! इस प्रकार विचार करनेसे सिद्ध होता है कि ये जो ब्रह्मा हैं, वे ही यह वर्तमान जगत् बनकर स्थित हैं। विराट् ब्रह्माका जो देह है, वही यह जगत् है। संकल्पाकाररूप ब्रह्माजीको जो भ्रम हुआ है, वही इस जगत्-के रूपमें भासित हो रहा है और उसीको ब्रह्माण्ड कहा गया है। संकल्पसे ही जिसकी कल्पना हुई है, वह यह सारा जगत् आकाशरूप ही है। वास्तवमें न तो जगत् है और न कहीं त्वत्ता-मत्ता ('तुम' और 'मैं' के भाव) ही हैं। चिन्मात्र परब्रह्म परमात्मा स्वयं ही अद्वैत आत्मा-काशमें जगत् आदिरूप प्रकाशसे प्रकाशित हो आह्लाद या अनुभवका विषय हो रहा है। जैसे वायु अपनी गति-शीलताके कारण अनुभवमें आती रहती है। यह जगत् अद्वैतको छोड़ देनेपर कुछ है, ऐसा जान पड़ता है और द्वैतको त्याग देनेपर कुछ भी नहीं है, ऐसा प्रतीत होता है। वास्तवमें जगत् द्वैत और अद्वैत—दोनोंसे रहित, शून्य, निर्मल और निरामय चेतनाकाशरूप ही समझो। राघवेन्द्र ! अनादि, नित्यानुभवरूप जो एकमात्र साक्षी चेतन है, वही दृश्य बनकर स्थित है। उसमें भिन्न दूसरी कोई दृश्य नामक वस्तु नहीं है। सत्यसुन्दर-रूप परमात्मामें जो अनेक प्रकारके अज्ञान प्रतीत होते हैं, वे ही विचित्र भ्रम पैदा करके सुविस्तृत दृश्य जगद्रूप महान् दृश्य उपस्थित करते हैं। (सर्ग ७१-७२)