संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
५४- रुद्र और काली आदिके रूपमें चिन्मय परमात्मसत्ताकी ही स्फूर्तिका प्रतिपादन तथा सच्चिदानन्दघनका विलास ही रुद्रदेवका नृत्य है—इसका कथन
[निर्वाण-प्रकरण उ०] * विद्याधरीका पाषाण-जगत्के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना * ७८५
सीपीमें चाँदी, मृगतृष्णामें जल और एक चन्द्रमामें दो चन्द्रमाकी बुद्धि मिथ्या ही है, उसी प्रकार आतिवाहिक (सूक्ष्म) शरीरमें आधिभौतिकता (स्थूल-रूपता) की बुद्धि भी मायासे ही हो रही है, वह वास्तविक नहीं है। जो असत् है, उसे सत्य मान लिया गया है और जो सत्य है, उसे असत् समझ लिया गया है। अहो! जीवके अविचारसे उत्पन्न हुए इस मोहकी कैसी महिमा है! जो आदि प्रत्यक्ष (सूक्ष्मशरीर) को छोड़कर इस वर्तमान प्रत्यक्ष (स्थूलशरीर) में ही सत्यबुद्धि करके स्थित है। वह मानो मृगतृष्णाका जल पीकर तृप्तिका अनुभव करता हुआ सुखपूर्वक बैठा है।
विषयोंका जो सुख है, वह क्षणभङ्गुर है, इसका सबको बारंबार अनुभव होता है। इसलिये उस सुख-को दुःखरूप ही कहा गया है तथा जो नित्य, अनादि और अनन्त आत्मसुख है, उसीको वास्तविक सुख बताया गया है। अज्ञानीकी दृष्टिमे यह जगद्रूप भ्रान्ति ही सत्यरूपताको प्राप्त हो गयी है। मदिरा पीकर मतवाले हुए पुरुषको ये सुस्थिर वृक्ष और पर्वत ही नाचते-से प्रतीत होते है। जो योगियोंके प्रत्यक्ष अनुभवमें आये हुए, सर्वत्र अप्रतिहत, अद्वैत बोधरूप, पूर्णानन्दैकरस चित्-स्वरूप ब्रह्मकी सत्ता प्रत्यक्ष होनेपर भी दूसरे तुच्छ प्रत्यक्ष नेत्र आदि इन्द्रियोंसे दीखनेवाले रूप आदि विषयको सत्य मानकर उसका आश्रय लेते हैं, वे महान् मूर्ख हैं। अपने-आपको ही धोखा देनेवाले उस तृणतुल्य अधम पुरुषोंसे हमारा कोई प्रयोजन नहीं है।
(सर्ग ६८)
विद्याधरीका पाषाण-जगत्के ब्रह्माजीको ही अपना पति बताना और उन्हें समाधिसे जगाना, उनके और देवतादिके द्वारा वसिष्ठजीका स्वागत-सत्कार, वसिष्ठजीके पूछनेपर ब्रह्माजीका उन्हें अपने यथार्थ स्वरूपका परिचय देना और उस कुमारी नारीको वासनाकी देवी बताना
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम! तदनन्तर अबाध चेष्टावाली वह विद्याधरी उस शिलाके भीतर स्थित हुई सृष्टिमें प्रविष्ट हुई। फिर मैं भी उसके साथ संकल्परूप होकर वहाँ जा पहुँचा। वह उद्यमशील तथा उत्कृष्ट शोभासे युक्त नारी उस जगत्के ब्रह्मलोकमें पहुँचकर ब्रह्माजीके सामने बैठ गयी और बोली—'मुनिश्रेष्ठ! यही मेरे पति हैं, जो मेरा पालन करते हैं। इन्होंने पूर्वकालमें मेरे साथ विवाह करनेके लिये अपने मनके द्वारा मुझे उत्पन्न किया था। ये पुरातन पुरुष हैं और मैं भी अब जरावस्थाको आ पहुँची हूँ। इन्होंने आजतक मेरे साथ विवाह नहीं किया; इसलिये मैं विरक्त हो गयी हूँ। इनको भी वैराग्य हो गया है। ये उस परम पदको प्राप्त करना चाहते हैं, जहाँ न कोई द्रष्टा है, न दृश्य है और न शून्य ही है। इसलिये मुनीश्वर! आप मुझको और इनको भी तत्त्वज्ञानका उपदेश देकर उस परब्रह्म परमात्माके पथमें लगा दीजिये, जो वैज्ञानिक प्रपञ्चनरूप रहनेवाली सारी सृष्टियोके मूल कारण हैं।'
मुझसे ऐसा कहकर वह उन ब्रह्माजीको जगानेके लिये इस प्रकार बोली—'नाथ! ये मुनिनाथ वसिष्ठजी आज इस घरमें पधारे हैं। ये मुनि दूसरे ब्रह्माण्ड-रूपी घरमें रहनेवाले ब्रह्माजीके पुत्र हैं। प्रभो! गृहस्थके घरपर आये हुए अतिथिके योग्य पूजाद्वारा आप इन गृहागत महर्षिका पूजन कीजिये। समाधिसे उठिये और अर्घ्य, पाद्य देकर इन मुनीश्वरकी पूजा कीजिये; क्योंकि आप-जैसे महात्माओंको महापुरुषोंकी पूजासे प्राप्त होनेवाला महान् फल ही रुचता है।'
श्रीराम! उस विद्याधरीके ऐसा कहनेपर वे परम बुद्धिमान् ब्रह्माजी समाधिसे जाग उठे। नीतिके ज्ञाता उन विद्वान् ब्रह्माने धीरेसे अपनी आँखें खोलीं। मानो शिशिर ऋतुकी समाप्ति होनेपर वसन्त ऋतुने पृथ्वीपर