सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

१७—लीलाका भूतलमें प्रवेश और उसके द्वारा अपने पूर्वजन्मके स्वजनोंके दर्शन, ज्येष्ठशर्माको माताके रूपमें लीलाका दर्शन न होनेका कारण

उत्पत्ति-प्रकरण ] * लीला और सरस्वतीका संवाद—सब कुछ ब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन * १२७

भी कहीं कभी कुछ भी उदित नहीं हुआ, केवल चिन्मय आकाशरूप परमात्मा ही स्थित है।

इस तरह विचार करनेसे यह सिद्ध हुआ कि कभी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ। जो कुछ जगत् आदि दृश्यरूपसे प्रतीत होता है, वह भी चिन्मय परमात्मा ही है। केवल चेतन आकाशरूप ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है।

लीला बोली—देवि ! जैसे प्रातःकालकी प्रभासे जगत्की रूप-सम्पत्ति सुस्पष्ट दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार आपने मुझे यह बहुत ही उत्तम और अद्भुत दृष्टि प्रदान की है। इस समय जबतक मैं तीव्र अभ्यास न होनेके कारण इस दृष्टिमें सुदृढ़ स्थिति नहीं प्राप्त कर लेती, तबतक आप अपने उपदेशद्वारा इस दृश्यकौतुकका—इस संसारका बाध करती रहें। देवि ! वह ब्राह्मण अपनी ब्राह्मणीके साथ पूर्वसृष्टिके जिस गाँव और घरमें रहता था, उस सृष्टिके उसी पर्वतीय ग्राममें आप मुझे ले चलिये। मैं उसे देखना चाहती हूँ।

श्रीसरस्वतीजीने कहा—लीले ! चेत्यरहित चिन्मय परमात्मरूप जो परम पावन दृष्टि है, उसका अवलम्बन करके तुम इस आकारका—इस देहके अभिमानका त्यागकर निर्मल हो जाओ। ( तात्पर्य यह कि पूर्वसृष्टिकी उस वस्तुको देखनेके लिये इस शरीरको भूल जाना आवश्यक है।) इस प्रकार जब तुम देहाभिमानरूप मलसे रहित हो जाओगी, तब हम दोनों साथ-साथ रहकर बिना किसी रुकावटके उस सृष्टिको देखेंगे। यह शरीर उस सृष्टिके दर्शनरूपी गृहद्वारके लिये एक सुदृढ़ अर्गला ( रुकावट ) के रूपमें स्थित है।

बेटी ! ये तीनों लोक मायामय होनेके कारण अमूर्त हैं। मिथ्या आग्रह या अज्ञानके कारण ये तुम्हें मूर्तिमान् प्रतीत होते हैं, जैसे सुवर्णको लोग अँगूठीके रूपमें देखते हैं। जैसे अँगूठीका रूप धारण करनेवाले सुवर्णमें अँगूठीपना नहीं है, उसी प्रकार जगत्का रूप धारण किये हुए ब्रह्ममें जगत् नहीं है। यह जगत् आकाशकी भाँति शून्य ही है; इसके रूपमें यहाँ जो कुछ दिखायी देता है, वह ब्रह्म ही है। ब्रह्ममें भ्रमवश माया दृष्टिगोचर होती है। यह सारा प्रपञ्च झूठा ही है। केवल अद्वितीय ब्रह्म ही, जिसका अहं ( आत्मा )-रूपसे अनुभव होता है, परमार्थ सत्य है। इस विषयमें उपनिषदोंके वाक्य, गुरुजनोंके उपदेश और अपना अनुभव प्रमाण है। जो ब्रह्म है, वही ब्रह्मको देखता है। जो ब्रह्म नहीं है, वह कदापि ब्रह्मको नहीं देख सकता। ब्रह्मका ही जो ऐसा स्वभाव है ( जो उसकी आवृत्त सत्ता है ), वही सृष्टि आदिके नामसे प्रसिद्ध है। जबतक अभ्यासयोगके द्वारा तुम्हारी भेदबुद्धि शान्त नहीं हो जाती, तबतक अब्रह्मरूप होनेके कारण निश्चय ही तुम ब्रह्मको नहीं देख सकती। ब्रह्मज्ञानका बारंबार अभ्यास करनेके कारण ब्रह्ममें अद्वैतभावसे जिनकी दृढ़ स्थिति हो गयी है, ऐसे हमलोग ही उस परमपदका साक्षात्कार करते हैं। जब अपने संकल्प ( मनोरथ ) से निर्मित हुआ नगर भी अपने इस शरीरसे प्राप्त नहीं हो सकता, तब दूसरेके संकल्पसे निर्मित नगरको दूसरा शरीर कैसे प्राप्त करेगा। अतः कार्यको समझनेवाली स्त्रियोंमें श्रेष्ठ लीले ! तुम इस देहाध्याससे रहित होकर चेतन ब्रह्ममय आकाशरूपिणी हो जाओ। तब तत्काल ही उस ग्रामका दर्शन करोगी। अतः शीघ्र वही कार्य करो।

लीलाने कहा—देवि ! आपने कहा है कि ब्राह्मण और ब्राह्मणीके जगत्में हम दोनों साथ-साथ चलेंगी; परंतु माताजी ! मैं यह पूछती हूँ कि हम दोनोंका साथ-साथ चलना कैसे हो सकता है। मैं तो इस शरीरको यहीं स्थापित करके शुद्ध सत्त्वका अनुसरण करनेवाले

१२८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

चित्तके द्वारा उस उत्तम आकाशमय लोकमें चली जाऊँगी। परंतु आप अपने इसी शरीरसे वहाँ कैसे जायेंगी ?

देवी सरस्वतीने कहा—बेटी ! जैसे तुम्हारा संकल्परूपमय आकाश, वृक्ष आदि सांकल्पिक सत्तासे सत् होता हुआ भी वास्तवमें शून्यरूप ही है, उसी तरह शुद्ध सत्त्वगुणका कार्यभूत जो मेरा शरीर है, यह चेतन परमात्माका ही प्रकाश है—इसके रूपमें चेतन परमात्मा-की ही प्रतीति होती है। अतः इसका उससे भेद नहीं है। ऐसा जो मेरा यह दिव्य शरीर है, इसका त्याग करके मैं नहीं जाऊँगी। जैसे वायु गन्धको प्राप्त होती है, उसी तरह मैं इसी शरीरसे ब्राह्मण-ब्राह्मणीके उस देशमें पहुँच सकती हूँ। भद्रे ! ये देह आदि परब्रह्मसे परिपूर्ण होकर ही स्थित हैं, अतः अपनी उत्कृष्ट महिमामें स्थित परब्रह्म ही हैं। इस सत्यको हमलोग बिना किसी विघ्न-बाधाके देखते हैं, किंतु तुम ऐसा नहीं देखती (क्योंकि तुम्हें अभी दृढ़ तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है)।

जैसे सुवर्णमें कटकत्व, जलमें तरङ्गत्व और स्वप्नके नगर एवं संकल्प-कल्पित पुर आदिमें सत्यत्व नहीं है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दरूप ब्रह्ममें कल्पनातीत अनामय आत्मस्वभावसे पृथक् कोई वस्तु नहीं है। जो कुछ भी यह दृश्य प्रपञ्च भासित हो रहा है, वह सब ब्रह्मका ही निर्मल विकास है। जैसे परम उत्तम चन्द्रकान्तमणिकी भ्रमवश काचके समान प्रतीति होती है, वैसे ही ब्रह्मके विशुद्ध विकासकी भ्रान्तिवश दृश्यरूप-से प्रतीति हो रही है।

लीलाने पूछा—देवि ! कृपया यह बताइये कि इतने दीर्घकालसे किसने हमलोगोंको द्वैत और अद्वैतके द्विविध विकल्पोंद्वारा भ्रममें डाल रखा है।

श्रीसरस्वतीजीने कहा—चञ्चले ! तुम चिरकालसे अविचारद्वारा व्याकुल होकर भटक रही हो। अविचार स्वभावसे उत्पन्न होता है और विचारसे उसका नाश हो जाता है। विचारद्वारा अविचारका पलक मारते-मारते नाश हो जाता है। यह अविचाररूप अविद्या विचार या विवेकसे बाधित होकर ब्रह्मसत्ता हो जाती है—ब्रह्मके सत्-स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये अविद्याका अस्तित्व नहीं है। अतः न तो कहीं अविचार है न अविद्या है, न बन्धन है और न मोक्ष ही है। यह जगत् शुद्ध बोधस्वरूप (चिन्मय ब्रह्म) ही है। चूँकि इतने समयतक तुमने इसका विचार नहीं किया, इसलिये तुम्हें बोध नहीं हुआ। तुम भ्रान्त एवं व्याकुल ही बनी रह गयीं। आजसे तुम्हारे चित्तमें वासनाका क्षयरूप बीज पड़ गया है। इसलिये अब तुम विवेकशालिनी, प्रबुद्ध एवं विमुक्त हो। एकमात्र ब्रह्मके चिन्तनरूप उत्तम निर्विकल्प समाधिके मनमें आरूढ़ होनेपर जब द्रष्टा, दृश्य और दृष्टिका अत्यन्ता-मात्र हो जायगा तथा हृदयमें यह वासना-क्षयरूप बीज कुछ अङ्कुरित हो जायगा, तब राग-द्वेष आदि दृष्टियाँ क्रमशः उदित नहीं होंगी, संसारकी उत्पत्ति भी निर्मूल हो जायगी और निर्विकल्प समाधि पूर्णतः स्थिरताको प्राप्त होगी। इस तरह निर्विकल्प समाधिके स्थिर होने-पर कुछ कालके अनन्तर मायाकाश और उसके कार्योंके अधिष्ठान-स्वरूप निर्मल आत्माके साक्षात्कारसे तुम भ्रान्ति-ज्ञानरूप कालिमाके कलङ्कसे शून्य होकर सम्पूर्ण प्राणियोंकी भ्रान्तियोंका, उनकी कार्यभूत वासनाओंका और उनकी कारणभूत अविद्याका जहाँ अन्त हो जाता है, उस मोक्षरूप परम पुरुषार्थमें प्रतिष्ठित हो जाओगी।

(सर्ग २१)