सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

रतिमञ्जरी (कवि जयदेव - कामशास्त्र एवं शृंगार-रस लक्षण सटीक)

Ratimanjari of Kavi Jayadeva with Hindi Commentary

कवि जयदेव (सम्पादक: पण्डित रामदत्त शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished18 पृष्ठ

२. आलिङ्गन, चुम्बन, रति-बन्ध एवं ग्रन्थ उपसंहार

१० रतिमञ्जरी-
भगं करेण सन्ताड्य हस्तिनीरतिमादिशेत् ॥३१॥
टी०--हाथ से केश को पकड़कर सुदृढ़ ( अच्छी तरह ) जालबन्ध
करै । फिर हाथ से योनि को मर्द्दन कर हस्तिनी स्त्री से रति ( भोग )
करै ॥ ३१ ॥
अथ भगलक्षणम्-
कूर्मपृष्ठं गजस्कन्धं पद्मगन्धि सुगन्धि यत् ।
अलोमकं सुविस्तीर्णं भगं पञ्चविधं वरम् ॥३२॥
टी०--(१) कछुवा की पीठ के सदृश (२) हाथी के स्कन्ध के सदृश
(३) कमलगन्ध के सदृश सुगन्धयुक्त (४) लोमरहित (५) सुन्दर विस्तृत-
ये पाँच प्रकार के भग ( योनि ) उत्तम हैं ॥३२॥
अथ भगदोषः—
शीतलं निम्नमत्युच्चं गोजिह्वासदृशं खरम् ।
इत्युक्तं कामशास्त्रज्ञैर्भगदोषचतुष्टयम् ॥३३॥
टी०-( १ ) शीतल ( ठण्डी ) ( २ ) गहिरी ( ३ ) अतिशय ऊँची
( ४ ) गौ की जीभ के सदृश कठोर—ये चार प्रकार भग के दोष काम-
शास्त्र को जानने वालों ने कहा है ॥३३॥
अथ लिङ्गलक्षणम्-
मुसलं वंशकवीरं द्विविधं लिङ्गलक्षणम् ।
स्थूलं मुसलमित्युक्तं दीर्घं वंशकवीरकम् ॥३४॥
टी०-मुसल और वंशकबीर ये दो प्रकार के लिङ्ग होते हैं । स्थूल
श्लो० ३१—जालेन बन्धनं जालबन्धनम् ( जालसदृशबन्धनमित्यर्थः ) ।
श्लो० ३२-कूर्मपृष्ठं कूर्मपृष्ठसदृशम् । गजस्कन्धं गजस्कन्धसदृशम् । पद्मगन्ध-
वत् सुगन्धयुक्तम् । न विद्यन्ते लोमानि यस्मिन् तत् ।
श्लोक० ३३—स्त्रिया जितः स्त्रीजितः । नार्यां सत्यपरो नारीसत्यपरः । षडङ्गुलं
शरीरं यस्य सः । श्रीरस्यास्तीति श्रीमान् ।

भाषाटीकासहिता । ११
( मोटा ) लिङ्ग को मुसल कहा है, दीर्घ ( लम्बा ) लिङ्ग को वंशकबीर
कहा है ॥ ३४ ॥
अथ पुरुषाणां जातिभेदे शशपुरुषलक्षणम्--
स्त्रीजितो गायकश्चैव नारीसत्यपरः सुखी ।
षडंगुलशरीरश्च स श्रीमान् शशको मतः ॥३५॥
टी०—जो पुरुष स्त्री के वशीभूत हो गान करने वाला हो, स्त्री में
सत्य बोलने वाला हो, सुखी हो, छः अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, धनवान्
हो, वह शशक कहा गया है ॥ ३५ ॥
अथ मृगपुरुषलक्षणम्—
श्रेष्ठस्तु धार्मिकः श्रीमान् सत्यवादी प्रियंवदः ।
अष्टांगुलशरीरश्च रूपयुक्तो मृगो मतः ॥३६॥
टी०—जो पुरुष श्रेष्ठ ( अच्छा ) हो, धर्मात्मा हो, धनवान् हो,
सत्य बोलने वाला हो, प्रिय बोलने वाला हो, आठ अङ्गुल का लिङ्ग वाला
हो, रूपवान् हो, वह मृग जाति का पुरुष कहा गया है ॥३६॥
अथ वृषपुरुषलक्षणम्--
उपकारपरो नित्यं स्त्रीजितः श्लेष्मलः सुखी ।
दशांगुलशरीरश्च मनस्वी वृषभो मतः ॥३७॥
टी०—जो पुरुष नित्य परोपकारी हो, स्त्री के वशीभूत हो, कफ
प्रकृति वाला हो, सुखी हो, दश अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, मनस्वी हो,
वह पुरुष वृषभ जाति का कहा गया है ॥३७॥
अथ हयपुरुषलक्षणम्--
काष्ठतुल्यवपुर्धृष्टो मिथ्यावाद्यश्च निर्भयः ।
द्वादशांगुललिङ्गश्च दरिद्रश्च हयो मतः ॥३८॥
टी०—काष्ठ के सदृश कठोर शरीर वाला हो, ढीठ हो, झूठ बोलने
श्लो० ३८—काष्ठेन तुल्यं वपुर्यस्य सः । मिथ्या वाक् यस्य सः । भयान्नि-
ष्क्रान्तो निर्भयः । द्वादशांगुलं लिङ्गं यस्य सः ।

१२ रतिमञ्जरी-
बाला हो, भय रहित हो, बारह अङ्गुल का लिङ्ग वाला हो, निर्धन हो,
वह अश्व जाति का पुरुष कहा गया है ॥३८॥
अथाऽऽसनानि-
अतृप्ता रमणे नार्यो रमन्ते न यदा तदा ।
नानाबन्धैर्वक्ष्यमाणै रन्तव्याः कामिभिः स्त्रियः ॥३९॥
टी०-जब स्त्री स्वामी में अतृप्त होकर रमण न करै तब आगे कहे
जाने वाले अनेक आसनों द्वारा पुरुषों से स्त्री रमण करने योग्य है ॥३९॥
अथ षोडशासननामानि-
पद्मासनो नागपादो लतावेष्टोऽर्द्धसम्पुटः ।
कुलिशः सुन्दरश्चैव तथा केशरसंज्ञकः ॥४०॥
टी०-( १ ) पद्मा ( कमला ) सन । ( २ ) नागपाद ( ३ ) लतावेष्ट
( ४ ) अर्द्धसम्पुट ( ५ ) कुलिश ( ६ ) सुन्दर ( ७ ) केशर ॥४०॥
हिल्लोलो नरसिंहोऽपि विपरीतस्तथा परः ।
क्षुद्गारो धेनुकश्चैव उत्कण्ठश्च ततः परः ॥४१॥
टी०-(८) हिल्लोल (९) नृसिंह (१०) विपरीत (११) क्षुद्गार (१२)
धेनुक (१३) उत्कण्ठ ॥४१॥
सिंहासनो रतिर्नागो विद्याधरस्तु षोडश ॥४२॥
टी०-(१४) सिंहासन (१५) रतिनाग (१६) विद्याधर-ये षोडश
( सोळह ) आसन हैं ॥ ४२ ॥
अथ पद्मासनलक्षणम्-
हस्ताभ्यां च समालिङ्ग्य नारी पद्मासनोपरि ।
रमेद्गाढं समाकृष्य बन्धोऽयं पद्मसंज्ञकः ॥४३॥
टी०-पुरुष दोनों हाथों से स्त्री को आलिङ्गन कर दृढ़ बाथ भरकर
पद्मासन के ऊपर रमण करै, यह पद्मासन कहा है ॥४३॥

भाषाटीकासहिता । १३
अथ नागपादासनलक्षणम्—
स्कन्धे पादौ समाधाय योनौ लिङ्गं प्रवेश्य च।
कामी रमेद्दृढं नारीं नागपादासनं स्मृतम् ॥४४॥
टी०—दोनों पैरों को कन्धे पर रखकर योनि में लिङ्ग को प्रवेश कर
कामी पुरुष नारी से दृढ रमण करै, इसको नागपाद नाम आसन कहा है ॥
अथ लतावेष्टनासनलक्षणम्—
बाहुभ्यां पादयुग्माभ्यां वेष्टयित्वा रमेत् स्त्रियम् ।
लिंगेन ताडयेद्योनिं लतावेष्टोऽयमुच्यते ॥४५॥
टी०—कामी पुरुष दोनों हाथों और दोनों पैरों से स्त्री को लपेट
कर रमण करै। और लिङ्ग से भग को ताडन करे, यह लतावेष्ट नामका
आसन कहा गया है। जैसे लता वृक्ष में लिपटती है वैसे स्त्री में लिपट
जाने से यह लतावेष्ट नाम से प्रसिद्ध है ॥ ४५ ॥
अर्द्धसम्पुटासनलक्षणम्—
अन्तरिक्षे स्त्रियः पादौ कृत्वा स्वस्य च भूतले ।
हस्ताभ्यां मर्दनं कृत्वा स्तनयोश्च निरन्तरम् ।
कामी रमेत्स्त्रियं तूर्णं बन्धोऽयमर्द्धसम्पुटः ॥४६॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री के दोनों पैरों को ऊपर उठा कर अपने दोनों
पैरों को पृथ्वी पर रखकर दोनों हाथों से स्तनों को निरन्तर मर्दन करके
स्त्री से शीघ्र रमण करै, यह अर्द्धसम्पुट आसन है ॥ ४६ ॥
अथ कुलिशासनलक्षणम्—
स्त्रीपादद्वयमास्फाल्य हठाल्लिंगेन ताडनम् ।
योनौ कुर्यात्सदा कामी बन्धः कुलिशसंज्ञकः ॥४७॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री के दोनों पैरों को मर्दन कर हठ से योनि में
लिङ्ग से सदा ताडन करै, यह कुलिश नाम आसन है ॥ ४७ ॥

१४ रतिमञ्जरी-
रतिसुन्दरासनलक्षणम्-
नारीपादद्वयं स्वामी धारयेदूर्ध्वदेशतः ।
कुचौ धृत्वा पिबेद्वक्त्रं बन्धोऽयं रतिसुन्दरः ॥४८॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के दोनों पगों को ऊपर रक्खै । स्तनों को
पकड़ कर मुख का चुम्बन करै, यह रतिसुन्दर नाम आसन है ॥ ४८ ॥
केशरासनलक्षणम्-
स्त्रिया जङ्घे समापीड्य दोर्भ्यां गात्रस्य मर्दनम् ।
पुनः प्रपीडयेद्योनिं बन्धः केसरसंज्ञकः ॥४९॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के दोनों जङ्घे को मर्दन कर और दोनों
हाथों से शरीर का मर्दन फिर योनि को लिङ्ग से ताडन करै यह
केसरासन कहा है ॥ ४९ ॥
अथ नृसिंहासनलक्षणम्-
पादौ सम्पीड्य योनौ च हठाल्लिङ्गप्रवेशनम् ।
हस्ताभ्यां वेष्टनं गाढं बन्धो नृसिंहसंज्ञकः ॥५०॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री की योनि का मर्दन कर हठ से योनि में
लिङ्ग प्रवेश कर दोनों हाथों से दृढ लिपट कर रमण करै यह नृसिंह
नाम आसन कहा है ॥ ५० ॥
अथ विपरीतासनलक्षणम्-
अंशावेकं पदं कृत्वा द्वितीयं कटिसंस्थितम् ।
नारीं च सुरमेत्कामी विपरीतासनं स्मृतम् ॥५१॥
टी०-कामी पुरुष स्त्री के एक पैर को अपने जङ्घे पर रख कर
दूसरे पैर को कमर के समीप कर नारी से अच्छी तरह रमण करै यह
विपरीतासन कहा गया है ॥ ५१ ॥
अथ क्षुद्रारासनलक्षणम्-
पार्श्वोपरि पदौ कृत्वा योनिं लिंगेन ताडयेत् ।

भाषाटीकासहिता । १५
बाहुभ्यां ताडयेद्गाढं क्षुद्गारो बन्धसंज्ञकः ॥५२॥
टी०—स्त्री के दोनों पगों को अपने पसवाड़े पर रख लिङ्ग से
योनि को ताडन करै । और दोनों हाथों से दृढ ताडन करै, यह क्षुद्रारा-
सन कहा है ॥ ५२ ॥
धेनुकासनलक्षणम्—
सुप्तां स्त्रियं समालिंग्य स्वयं सुप्तो रमेत्पुनः ।
यल्लिगं चालयेद्योनौ बन्धोऽयं धेनुकः स्मृतः ॥५३॥
टी०—सोती हुई स्त्री को आलिङ्गन कर आप भी सोता हुआ जिस
हेतु योनि में लिंग चलाता हुआ कामी रमण करता है इस लिये धेनुक
नाम का यह आसन कहा गया है ॥ ५३ ॥
उत्कण्ठासनलक्षणम्—
नारीपादौ च हस्तेन धारयेद्गलके पुनः ।
स्तनार्पितकरः कामी बन्धश्चोत्कण्ठसंज्ञकः ॥५४॥
टी०—कामी पुरुष के दोनों पगों को हाथ से कण्ठ में रख फिर
अपने दोनों हाथों को स्तन पर धरै, यह उत्कण्ठासन है ॥ ५४ ॥
अथ सिंहासनबन्धलक्षणम्—
स्वीये जङ्घाद्वये कामी कृत्वा योषित्पदद्वयम् ।
स्तनौ धृत्वा रमेन्नारीबन्धः सिंहासनो मतः ॥५५॥
टी०--कामी पुरुष अपने दोनों जंघे पर स्त्री के दोनों पैरों को रख-
कर स्तनों को मर्दन कर स्त्री से रमण करै, यह सिंहासन बन्ध कहा है ॥
अथ रतिनागबन्धलक्षणम्—
पीडयेदुरुयुग्मेन कामुकः कामिनीं यदि ।
रतिनागः समाख्यातः कामिनीनां मनोहरः ॥५६॥
टी०—कामी पुरुष स्त्री को दोनों उरुओं से पीड़ित कर उसके साथ

१६ रतिमञ्जरी—
रमण करै । यह कामिनियों के मनको हरने वाला रतिनाग नाम आसन
कहा है ॥ ५६ ॥
अथ विद्याधरासनलक्षणम्—
नार्याश्चोरुयुगं धृत्वा कराभ्यां ताडयेत्पुनः ।
रमयेन्निर्भरं कामी बन्धो विद्याधरो मतः ॥५७॥
टी०—कामी पुरुष दोनों हाथों से स्त्री के दोनों जङ्घे को धारण कर
फिर योनि ताडन करता हुआ दृढ रमण करै, यह विद्याधर नाम आसन
कहा है ॥ ५७ ॥
अथ कामिजनप्रशंसा—
स्त्रियमानीय यत्नेन विधृत्य चरणद्वयम् ।
वशं नयति यः कामी रतिशास्त्रविचक्षणः ॥५८॥
टी०—जो कामी पुरुष यत्न से स्त्री को लाकर उसके दोनों चरणों
को धर कर वशीभूत करता है, वह रतिशास्त्र का पण्डित है ॥ ५८ ॥
रतिशास्त्रं समाकर्ण्य बन्धान् पद्मादिषोडश ।
नानाविधरतिं कुर्यात्कामिन्या कामुको जनः ॥५९॥
टी०—कामी पुरुष रतिशास्त्र को सुनकर पद्मादि सोलह आसन को
जानकर कामिनी के साथ अनेक प्रकार से रति करै ॥ ५९ ॥
सर्वशास्त्रार्थवक्त्रेण जयदेवेन धीमता ।
मञ्जरी रतिशास्त्रस्य कृत्वा नीता समाप्तताम् ॥६०॥
टी०—सब शास्त्रों का अर्थ मुख में है जिसके ऐसा बुद्धिमान् जय-
देव कवि ने रतिशास्त्र की मञ्जरी समाप्त की ॥ ६० ॥

ॐ विक्रेयसंस्कृतपुस्तकानि ॐ
अन्योक्तिसाहस्री—पं० श्रीबदरीनाथझा कृत ॥=)
अर्थसंग्रह—पं० श्रीराजनारायणशास्त्रीकृत सं० टी० भा० टी० १)
अलङ्कारसारमञ्जरी—म०म० पं० श्रीनारायणशास्त्रीखिस्तेकृत ।=)
उत्कीर्णलेखाञ्जलि—श्रीजयचन्द्रविद्यालङ्कारकृत सं.टी.भा०टी० ।।।)
मेघदूत—सं० टी०, श्रीमन्नालालअभिमन्युकृत भा० टी० १।)
छन्दःकौमुदी--म० म० पं० श्रीनारायणशास्त्री खिस्ते कृत ।=)
जातकमाला—प० श्री बटुकनाथशास्त्रीखिस्ते कृत सं० टी० २)
तर्कभाषा—पं० श्री राजनारायणशास्त्री कृत सं०टी०, भा०टी० १)
नैषधीयचरित--पं० श्रीऋषीश्वरनाथभट्ट कृत हि० टी० ६)
पञ्चतन्त्र—प्रथमतन्त्र, श्रीमन्नालालअभिमन्यु कृत हि० टी० २।।)
पालिजातकावलि--प्रो० श्रीबटुकनाथशर्माकृत सं.टी.,भा.टी. २।)
प्रसन्नराघव नाटक--पं० श्रीरामचन्द्रमिश्रकृत ,, ,, ३)
मुद्राराक्षस नाटक-पं०श्रीब्रह्मानन्दशुक्लकृत सं.टी.भा.टी. २) २ ॥)
मृच्छकटिक नाटक-,, ,, ,, ,, ५) ६)
रघुवंश महाकाव्य--१-२सर्ग, सञ्जीवनी, हिन्दी टीका सहित १)
रामवनगमन—पं० श्रीराजनारायणशास्त्रीकृत सं०टी०भा०टी० १।)
विदुलोपाख्यान—,, ,, ,, ,, ॥=)
वैदिकसूक्तसंग्रह—पं० श्रीवेणीरामशर्मागौडकृत ,, ,, १।)
सावित्र्युपाख्यान—पं० श्रीब्रह्मानन्दशुक्लकृत सं०टी० भा०टी० १।)
संस्कृतसाहित्य का सम्पूर्णेतिहास--श्रीहजूररामशास्त्रीकृत ॥)
हर्षचरितसारदीपिका--पं० श्रीब्रह्मानन्दशुक्लकृत हिन्दी ॥)
सर्वविधपुस्तकप्राप्तिस्थानम्—
मास्टर खेलाड़ीलाल ऐण्ड सन्स
संस्कृत बुकडिपो,
कचौड़ीगली, बनारस-१