रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
१६८ रसिकप्रिया
सूर्य्य भगवान् को परम प्रिय है। शोभा को धारण करनेवाले सधर और अमृत
को धारण करनेवाले मधुर अधर की समता भी इसी से दी जाती है। पर
इसमें सुगंध नहीं है, अतः तेरे सर्प रूपी केशों से आच्छादित कुच रूपी मलय-
गिरि को देख सुनकर इसका हृदय (सुगंधित हो जाने की) आशा में उलझ
जाता है। अतः यह बंधुजीव का निर्गंध हार सुगंधित होना चाहता है, जरा
इसे अपनी गर्दन में डाल तो लो।
अलंकार—रूपक ।
अन्यच्च, यथा—( सवैया )
(३६८) मत्तगयंदनि साथ सदा इनि थावर जंगम जंतु बिदारयो ।
ता दिन तें कहि केसव बंधन बेधन कै बहुधा बिधि मारयो ।
सो अपराध सुधारन सोधि यहै इनि साधन साधु बिचारयो ।
पावन-पुंज तिहारो हियो यह चाहत है अब हार बिहारयो ।६।
शब्दार्थ—मत्तगयंदनि = मतवाले हाथियों के । इनि = इस (गजमुक्ता-
हार ने)। थावर = स्थावर, अचर । जंगम = चर । जंतु = जीव । बंधन
कै = बंधन में डालकर, गुहकर, पिरोकर । बेधन कै = बेधों (छेदों) से ।
बहुधा = अनेक प्रकार से । बिधि = ब्रह्मा । सुधारन = शुद्धि के लिए । सोध =
(शोध) परिष्कार । साधन = उपाय । साधु = ठीक, अच्छा ।
भावार्थ—(मानवती नायिका के पास नायक ने गजमुक्ताओं की माला
भेजी है, सखी उससे कह रही है) इसने (अर्थात् इस हार के मोतियों ने)
मतवाले हाथियों (के मस्तक) के साथ रहकर सदा (पहले बराबर) चर
और अचर जीवों का नाश किया । उस दोष के कारण ब्रह्मा ने इसे बिंधवा-
कर और बँधवाकर (छेद करवाकर और पिरोकर) अनेक प्रकार के कष्ट
दिए । उस दोष की शांति के लिए इसने अब यही उचित उपाय विचारा है
कि तेरे हृदय में, जो पवित्रता का आगार है, यह विहार करे (जिससे इसके
पाप का नाश हो जाय—तू इस माला को गले में पहन ले)।
सूचना—स्तनों की उपमा शंभु से दी जाती है, सखी का लक्ष्य 'पावन-
पुंज हियो' से उसी ओर है।
श्रीकृष्णजू को दान उपाय, यथा-(कवित्त)
(३६६) हँसति हँसति आई आनि इक गाथा गाई,
कहहु कन्हाई याको भाउ समझाइकै ।
पीवैं क्यों अधर-मधु दंपति एक ही बार,
रदन करज थल दीजहि बताइकै ।
६—सोध०-काज यहै सब साधन मंत्र बिचारे । हियो—हिये ।
दशम प्रभाव १६६
यह परिरंभन कहावै कौन केसोदास,
मेरी सौं जौ मोसों तुम राखहु दुराइकै ।
राधिका की अधिकाई कहा कहौं लीनो आजु,
आपनो पियारो पीउ आपुहीं मनाइकै ॥१०॥
शब्दार्थ—गाथा = प्राकृत भाषा का मात्रिक छंद । भाउ = भाव,
तात्पर्य । रदन थल = दंताघात का स्थान । करज = नख । करज थल = नख-
क्षत का स्थान । परिरंभन = आलिंगन । अधिकाई = विशेषता ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) श्रीकृष्ण के मान करने की बात सुन-
कर राधिका हँसती हँसती आईं और आकर श्रीकृष्ण को एक गाथा सुनाई। सुना-
कर उन्होंने पूछा कि 'इसका तात्पर्य तो मुझको समझा दीजिए । (इसमें दंपति
के एक साथ ही अधरपान की जो बात कही गई है वह) कैसे संभव है कि प्रिय
और प्रेमिका परस्पर एक दूसरे का अधर-मधु-पान करें (दंत एवम् नखक्षत की
बात जो कही गई है वह) दंतक्षत एवम् नखक्षत करने का स्थान कौन सा है ?
इस प्रकार (स्वयम् आलिंगन करती हुई) आलिंगन करने की बात जो इसमें
कही गई है वह कौन सा आलिंगन कहलाता है ? तुम्हें मेरी शपथ अगर
मुझसे कोई बात छिपा रखो ।' राधिका की विशेषता तो देख, उसने स्वयम् ही
आज अपने प्यारे पति को मना लिया (हम लोगों की आवश्यकता ही न पड़ी) ।
सूचना—'यह परिरंभन कहावै कौन' कहती हुई नायिका ने आलिंगन-
दान किया है । यही दान उपाय है ।
अलंकार—पर्यायोक्ति ( छल से कार्यसिद्धि ) ।
अथ भेद-लक्षण—( दोहा )
(३७०) सुख दै कै सब सखिनि कहँ, आपु लेइ अपनाइ ।
तब सु छुड़ावै मान कों, बरनौ भेद बनाइ ॥११॥
भावार्थ—जहां सखियों को अपनी ओर मिला लिया जाय और वे ही
मान'छुड़ाएँ, वहाँ भेद उपाय होता है ।
श्रीराधिकाजू को भेद उपाय, यथा—( सवैया )
(३७१) केसव धाइ खवासिनि तोहि सखी सकुचैं सब आपनी घातैं ।
मोहिं तौ माई कहेहीं बनै अब बाँधि दई बिधि तो कहँ तातैं ।
नेक हरें हरें बोलि बताइ ल्यौं हौं डरपौं गड़ि जाइ न जातैं ।
माखन सो मेरे मोहन को मन काठ सी तेरी कठेठो ये बातैं ॥१२॥
१०—गाथा-गाहा । कहहु-कहो धौं । एक हों-पु एकै । रदन०-उरज
करज । दीजहि-दीजै जू । केसोदास-केसोराय । राखहु-राखि हौ । ११—
सु छुड़ावै०-जु मनावै मानिनिहि । छुड़ावै-छिड़ावै । बनाइ-सुनाइ । १२—
तो-ती । जातैं-पातैं ।
२०० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—धाइ = धात्री । खवासिनि = दहेज में वधू के साथ आने-
वाली लौंडी । अपनी घातैं = अपने स्वार्थ से । माई = हे सखी । तातैं = इस
कारण । नेक = जरा । हरैं हरैं बोलि = धीरे से बोलो । बलाइ ल्यों = बलैया
लेती हूँ । डरपों = डरती हूँ । जातैं = जिससे, इससे । माखन सो = मक्खन
की भाँति ( मृदु ) । कठेठी = कठोर ।
भावार्थ—( नायक ने सखी को अपनी ओर मिला लिया है, वह नायिका
से कह रही है ) हे सखी, धाय और दासी सब अपनी गाँ से तुझे सकुचती हैं ।
पर मुझे तो कहना ही पड़ता है (कहाँ तक संकोच करूँ)। ब्रह्मा ने मुझे तेरे साथ
बांध दिया है, इसीलिए (नहीं तो मुझे क्या पड़ी थी)। मैं तेरी बलैया लेती हूँ,
थोड़ा धीरे धीरे बोल, मुझे डर लगता है कि मेरे मोहन का मन मक्खन की तरह
मृदु है और तेरी बातें काठ की तरह कठोर हैं—कहीं ये उसमें गड़ न जाएँ ।
अलंकार—धर्मलुप्तोपमा ( माखन सो मेरे मोहन को मन ), पूर्णोपमा
( काठ सी तेरी कठेठी बातें), विषम ( कहाँ मृदु मन कहाँ काठ सी बातें ) ।
श्रीकृष्णजू को भेद उपाय, यथा—( सवैया )
( ३७२) काहूँ कह्यो 'हरि रूठि रहे' तब तें बहु बुद्धि बितर्क बढ़ावै ।
सोधि सबै अपनो सो रही धन मीत रहैं सु उपाय न पावै ।
हाँ वह रीति इहाँ यह केसव ज्यों दुहुँ ओर जरे कों जरावै ।
बूझति हौं पिय प्यारी तिहारी सु मान करै कि मनावन आवै ।१३।
शब्दार्थ—सोधि रही = विचार करके थक गई । मीत = (मित्र) प्रिय ।
भावार्थ—( नायिका ने सखी को अपनी ओर मिला लिया है । वह
नायक से कह रही है ) किसी ने कहीं कह दिया कि श्रीकृष्ण रूठे हुए हैं ।
जब से ऐसा सुना तभी से वह अपनी बुद्धि में अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क कर
रही हैं। अपनी वाली सब कुछ कर धरकर वह थक गई । 'धन भी रहे और
मित्र भी न जाय' ऐसा कोई उपाय उसे दिखाई नहीं देता । वह तो यहाँ
दशा है और यहाँ यह कि आप मान किए बैठे हैं आप भी उसे कष्ट दे रहे हैं
(औरों ने वह कथा सुनाकर कष्ट दिया ) । उस बेचारी की तो वही दशा है
कि दोनो ओर से जल रही है ( उसे इस स्थिति से निकालनेवाला कौन है) ।
इससे मैं आप ही से पूछती हूँ कि वह ऐसी हालत में स्वयम् मान करे या आप
को मनाने के लिए यहाँ दौड़ी आए ?
अलंकार—लोकोक्ति ।
१३—बहु-यह । रहै-मिलै । सु-सो । ज्यों-जौ । कों-को । जरावै-
जुड़ावै । बूझति-पूछति ।
दशम प्रभाव २०१
अथ प्रणति-लक्षण-( दोहा )
((३७३) अति हित तें अति काम तें, अति अपराधहिं जानि ।
पाइ परै प्रीतम प्रिया, ताकों प्रनति बखानि ।१४।
भावार्थ—अत्यंत प्रेम, अत्यंत काम-वासना अथवा अत्यंत अपराध के
कारण जहाँ प्रिय प्रिया के पैरों पड़े वहाँ प्रणति से मानमोचन होता है ।
श्रीराधिकाजू की प्रेम तें प्रणति, यथा-( सवैया )
(३७४) तैं चितयो जु न सूधे तऊ जऊ प्रेम ककै पिय पाउ गह्यो हो ।
मोहिं बिलोकि बिलोकि अलीन, अलोक अलोक प्रंबाह बह्यो हो ।
बूझति हौं सखी सीस दियेँ तिनु और सबै हिय हेतु रह्यो हो ।
कान्हहि आएँ मनावन तोसों में मान किधौँ अपमान कह्यो हो।१५
शब्दार्थ—सूधे = सीधे । तऊ = तदपि, तो भी । जऊ = यद्यपि । बिलोकि
= देखो । अलीन = सखियों को । अलीक=कलंक, बदनामी । .बूझति हौं = मैं
पूछती हूँ । सीस दियेँ तिनु = ( मुहावरा ) सिर पर तिनका धरकर, नम्रता-
पूर्वक, अत्यंत दीनता से ।
भावार्थ— ( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, विचार तो !
तूने यद्यपि सीधे नहीं देखा, फिर भी नायक ने अत्यंत प्रेम दिखा दिखाकर तेरे
पैर पकड़े । और नहीं तो मेरा मुँह देख और इन सखियों को ( इनका ही
मुँह ) देख ( और मान करना छोड़ दे ) । बदनामी का कैसा झूठा प्रवाह
फैला हुआ है । मैं सिर पर तिनका धरकर ( अपनी सत्यता और दीनता का
प्रमाण देकर ) तुझसे पूछती हूँ । हृदय के प्रेम की बातें तो तू जाने दे ( और
बातों की कोई गिनती नहीं ) पर यह तो बतला कि स्वयम् ( उलटे ) कृष्ण
ही तुझे मनाने आए हैं इसमें मान माना जाए या अपमान ?
श्रीराधिकाजू की अति काम तें प्रणति, यथा-(सवैया)
(३७५) बोलति नाहिं बुलाएँहुँ बोल कहा लगी मोहिं बकाएहीं मारन ।
सो परयो पाइनि बूझि सखी सब देति हैं ज्यों जुवती जिहि कारन ।
हठु छाँडिकै कंठ लगाइ उठाइ कहा लगी ऐंठि अकास निहारन ।
कौन भए नहिं द्वै दिन ए दिन तू ही लगी कछु ऊलट पारन ।१६।
१४-अपराधहिं-पराध तौं । १५-चितयो-चितई । जु न-नहिं । तऊ०-
जऊ तऊ । प्रेम-प्रीति । जऊ०-तजि प्रेम को प्रीतम । हो-है । बूझति-
पूछति । कान्हहि-कान्ह जु । १६-बोलति०-न बोलति आप । बकाएहीं-
बनाइयै । ऐंठि-बैठि, भेदि । कोने०-कानों भए नट द्वै दिन ये तिन तें हो लगी
कछु, कौनी भए नटि द्वै दिन ये तिन तें ही लगी, कोनु भयो दिन द्वै पै तुही कछु
लागी है ।
२०२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—बूझि = समझ, विचार । ज्यो-जी, प्राण । ऐंठि = अकड़कर ।
उलट पारना = उलटी ( बातें ) करना ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से) यदि तू स्वयम् नहीं बोलती है
तो बुलाने से तो बोल । क्या मुझे यों बका-बकाकर मार डालने पर लगी है ?
अच्छा, तू हीं विचार कि तेरा ऐसा नायक तेरे पैरों पड़ा जिसके लिए सब युवती
अपने प्राण देती हैं । हठ छोड़ दे और उठकर उन्हें गले लगा ले, तू अकड़-
कर आकाश क्या देखने लगी ? किसे ये दिन दूने नहीं लग रहे हैं—एक दिन
दो दिनों के समान हो गया है, तू कैसी उलटी बातें करने लगी है ।
सूचना—युवतियों के जी देने की बात कहने से लक्षित होता है कि
काम-प्रेरित प्रणति है ।
श्रीराधिकाजू की अति अपराध में प्रणति, यथा—( सवैया )
(३७६) केसवदास उदास भई दरसाइ दसा-दुख द्योस भरयो री ।
राति भए अधिरातकहू लौं बिनै बहु बंधुबधूनि करयो री ।
धाइ रही समुझाइ कछू न सखीनिहूँ के सिखए तें सरयो री ।
काहे तें मान्यौ न मानिनि तौलगि जौलगि पाइ न पीउ परयो री।१७।
शब्दार्थ—भरयो = बिताया । सरयो री = कुछ भी कार्य न सधा ।
भावार्थ—( रातभर सब लोग मनाते रहे पर नायिका ने मान न छोड़ा,
पर जब प्रिय ने पैर पकड़े तब उसने मान छोड़ दिया । सखी नायिका से
व्यंग्य कर रही है कि क्यों ऐसी क्या बात थी कि प्रिय के पैर पकड़ने पर ही
तूने मान छोड़ा ) हे सखी, तू अत्यंत उदास हो गई और दुख की दशा
दिखलाकर ( दुखी होकर किसी प्रकार ) तूने दिन बिताया । जब रात हुई
तो आधी रात तक देवरानी जिठानियों ने अनेक विनय की, फिर भी मान न
छूटा । धाय भी समझा बुझाकर थक गई, सखियों के सिखाने का भी कोई
फल न हुआ । ऐ मानिनी, तब तक तूने मान क्यों नहीं छोड़ा जब तक प्रियतम
पैरों नहीं पड़ा ?
सूचना—'प्रियतम के पैर पकड़ने पर मान जाना तथा और किसी के
मनाने से न मानना' यह बतलाता हैं कि नायक ने अपराध किया था ।
( दोहा )
(३७७) पियहि मनावै पाइ परि, प्रिया परम हित मानि ।
नापराध नहिं काम तें, बरनत ही रस-हानि ।१८।
भावार्थ—नायक के पैरों पड़ने में और नायिका के मान जाने में शुद्ध
प्रेम कहीं नहीं दिखाना चाहिए । उसमें अपराध अथवा काम की प्रेरणा होनी
१७—अधिरातकहू लौं—अधिरातक लों सु । सिखए तें—सिखए न । पीउ—
नाह । १८—नापराध—त्यों अपराधन, अति अपराधन, ना अपराधन ।
दशम प्रभाव २०३
चाहिए। नहीं तो रस-हानि होगी, ऐसा वर्णन रसात्मक न माना जाएगा ।
श्रीकृष्ण की प्रणति प्रति हित तें यथा- ( सवैया )
(३७८) नीरहिं तौ बिन मीन सरै, अरु मीन तौ नीरहिं के जिय जीजै ।
जा बिन और सुहाइ न केसव ताहि सुहाइ सु तौ सब कीजै ।
जा लगि मो पग लागत हे सु लगी पग अंक लगाइ न लीजै ।
हौं सिखऊँ अपनें सपनेहूँ तौ आवत लच्छि किवार न दीजै ।१६।
शब्दार्थ—सरै = काम चल जाता है । अरु = और (फिर भी) । नीरहिं
के जिय जीजै = जल के भरोसे ही जीता है । लच्छि = लक्ष्मी ।
भावार्थ— (सखी की उक्ति नायक प्रति ) सुनिए, चाहे बिना मछली के
जल का काम निकल जाय पर मछली तो बिना जल के जी ही नहीं सकती
(आपका काम चाहे नायिका के बिना भी चल जाए पर उस बेचारी का
काम तो आपके बिना चल ही नहीं सकता, वह जी नहीं सकती) । दूसरी
बात यह कि जिसके बिना कोई बात अच्छी नहीं लगती, उस (व्यक्ति)
को जो अच्छा लगे वह करना ही पड़ता है (आपको पहले बिना नायिका के
चैन नहीं पड़ता था अब उसके मन वाली क्यों नहीं करते ? ) । पहले जिससे
मिला देने के लिए आप मेरे पैरों पड़ा करते थे (मुझसे बिनती करते थे )
वही आपके पैरों पर आज पड़ी है उसे गले क्यों नहीं लगा लेते ? भला कोई
स्वप्न में भी आती लक्ष्मी के लिए किवाड़ लगाता है ? इससे मैं जो सिखा
रही हूँ उसे मान लीजिए ।
अलंकार—दृष्टांत और लोकोक्ति ।
अथ उपेक्षा-लक्षण-( दोहा )
(३७६) मान-मुचावन बात तजि, कहिये और प्रसंग ।
छूटि जात जहँ मान सो, कहत उपेक्षा अंग ।२०।
श्रीराधिकाजू की उपेक्षा, यथा- (कवित्त )
(३८०) चपला न चमकति चमक हथ्यारन की,
बोलत न मोर बंदी सयन-समाज के ।
जहाँ तहाँ गाजत न बाजत दमामे दीह,
देत न दिखाई दिनमनि लीने लाज के ।
चलि चलि चंदमुखी साँवरे सखा पै बेगि,
सोषक जु केसौदास अरि-सुख-साज के ।
चढ़ि चढ़ि पवन-तुरंगनि गगन घन,
चाहत फिरत चंद जोधा तमराज के ।२१।
१६—अरु-बरु । तौ-सो । हे-हो । २०—कहियै-कहिजै । जात-जाइै
जहँ-जिहि । सो-तहं । २१—दोह-दोए । जु-जे ।
:२०४ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—चपला = बिजली । सयन = ( सैन्य ) सेना । दमामे=नगाड़े ।
दीह = दीर्घ, बड़े । दिनमनि =सूर्य । लाज के लीने = लाज को लिए हुए,
मारे लज्जा के । साँवरे = श्रीकृष्ण । तमराज = अंधकार रूपी नृपति ।
भावार्थ—( सखी उक्ति नायिका प्रति—वर्षा के समय नायिका ने मान
किया है सखी विषयांतर करके नायिका का मानमोचन करना चाहती है) यह
बिजली नहीं चमक रही है, हथियारों की चमक है । ये मोर नहीं बोल रहे हैं,
सेना के वंदी हैं ( जो वीरों की प्रशस्ति पढ़ रहे हैं ) । जहाँ तहाँ बादल नहीं
गरज रहे हैं, बड़े बड़े नगाड़े बज रहे हैं । इसके आतंक से भय के कारण
लज्जित होकर सूर्य ने अपना मुंह छिपा लिया है ( वह बादलों के आवरण से
प्रकृत्या ढका नहीं है, सेना से भयभीत होकर छिप गया है ) । इसलिए हे चंद्र-
मुखी, श्याम-सखा के पास तू शीघ्र ही चल क्योंकि वे शत्रु के सुखों के शोषक
हैं ( शत्रु को नष्ट करनेवाले हैं ) । ये बादल आकाश में नहीं घूम
रहे हैं, महाराज अंधकार के ये वीर हैं जो वायु रूपी घोड़ों पर चढ़कर
चंद्रमा को ढूँढ़ते फिर रहे हैं ( तू चंद्रमुखी है कहीं तेरे ही ऊपर आक्रमण
न कर बैठें ) ।
अलंकार—अपह्नति और रूपक का संकर ।
श्रीकृष्णजू की उपेक्षा, यथा—( कबित्त )
(३८१) केसौदास दिनराति केतकी की भावै भाँति,
जिय में बसति जाति नैननि में नलिनी ।
माधवो को पीवै मधु सूझत न अंध कहँ,
सेबती सेवन कही सेई गंधफलिनी ।
और हौ कहति बात कान्ह काहे कों लजात,
ऐसे तौ खिस्याइ सो जु होइ मनमलिनी ।
देखौ नहीं प्रानपति निर्लज्ज अली की गति,
मालती सों मिल्यो चाहै लियें साथ अलिनी ।२२।
शब्दार्थ—केतकी = केवड़ा । भाँति = रंगढंग । जाति = जाती, चमेली ।
नलिनी=कमलिनी । सेवती = सफेद गुलाब । गंधफलिनी = गंधफली, चंपे की
कली ( मिलाइए—एतस्य कलिका गंधफली स्यादथ केसरे-अमरकोश, २।६४,
गंधः फलं साध्यमस्याः-व्याख्यासुधा । प्रियंगौ स्त्री गन्धफली चम्पकस्य च
कोरके-रुद्रः ) । गंधफली प्रियंगु ( काकुनी ) और चंपे की कली दोनो को
कहते हैं, चंपे की कली को गंधफली इसलिए कहते हैं कि उसमें सुगंध ही फल
होता है । प्रानपति = प्यारे स्वामी ( मालिक ) ।
२२—भावै-भरै । भाँति-बास । पीवै-पिये । कहँ-कछू, कहूँ । कही-
चाहि । औरै-ओर, औरौ । देखौ०-देखहु धौं । लिये साथ-लीने संग ।
दशम प्रभाव २०५
भावार्थ-(सखी की उक्ति नायक प्रति) हे कृष्ण, इस निर्लज्ज भौंरे का
चालचलन नहीं देखते, इसे दिनरात केतकी के रंगढंग अच्छे लगते हैं, चमेली
इसके मन में बसती है और कमलिनी नेत्रों में। यह माधवी का मधु
( मकरंद, पुष्परस ) पीता है, देखो इस अंधे को कुछ सूझता भी नहीं, सेवती
का सेवन करने की इच्छा करते करते इसने चंपे की कली का भी सेवन कर
लिया (यद्यपि भौंरे चंपे के पास नहीं जाते, पर यह उसके पास भी मर्यादा को
छोड़कर चला गया )। कहिए आप लज्जित क्यों हो रहे हैं, इस प्रकार तो
मलिन मनवाले व्यक्ति लज्जित होते हैं। मैं तो अभी और कहनेवाली हूँ।
देखिए वह निर्लज्ज अपनी भ्रमरी को साथ लिए मालती से मिलने आया है।
सूचना--अमर का वर्णन उपेक्षा है। 'काहे को लजात' से स्पष्ट है कि
श्रीकृष्ण इस वर्णन को अपने चरित्र से मिलता पाकर मान छोड़कर संकुचित
हो रहे हैं।
अलंकार-अन्यौक्ति ( अथवा अप्पय दीक्षित का प्रस्तुतांकुर ) ।
अथ प्रसंगविध्वंस-लक्षण-( दोहा )
(३८२) उपजि परै भय चित्तभ्रम, छूटि जाइ जहँ मान ।
सो प्रसंगविध्वंस कबि केसवदास बखान ।२३।
भावार्थ-भय के कारण चित्तविभ्रम होकर जहाँ मान छूट जाय वहाँ
प्रसंगविध्वंस उपाय होता है ।
श्रीराधिकाजू को प्रसंगविध्वंस, यथा-(सवैया)
(३८३) केकी न केसव काम के किंकर बोलत डोलत देत दुहाई ।
कामनिसा यह कामिनि कोऊ रिसाइगि तासहुँ ह्वैहै रिसाई ।
गाजति नाहिंन मेघघटा यह बाजति डौंडी सखी सुखदाई ।
भोर भएँ फिरि कीबौ अबोलौ सु बोलौ अबै बलि बोलि कन्हाई २४'
शब्दार्थ-केकी=मोर। किंकर = सेवक । कोऊ रिसाइगी = यदि कोई
नायिका मान करेगी। तासहुँ ह्वैहै रिसाई = उस पर (काम महाराज ) क्रोध
करेंगे। गाजत=गरजते हैं। डौंडी=डुग्गी ( कामदेव की ) । कीबौ=
करना। अबोलौ = मौन, मान । बलि = हे नायिका । बोलि = बुलवाकर ।
भावार्थ-(सखी की उक्ति नायिका प्रति) हे सखी ये मयूर नहीं प्रत्युत
काम के सेवक बोल रहे हैं, जो घूम घूमकर ( काम की ) दुहाई दे रहे हैं कि
इस कामरात्रि में यदि कोई कामिनी मान करेगी तो उस पर महाराज काम-
देव रुष्ट होंगे। यह बादल की घटा नहीं गरज रही है, सुखदायी ( काम की)
डुग्गी बज रही है । इसलिए, सबेरा होने पर फिर मौन ग्रहण कर लेना इस
समय तो कृष्ण को बुलवाकर उन्हें इस (राजघोषणा) का समाचार सुना दो ।
२३-छूटि--भूलि । कबि-कहि । २४-तासहुँ-ताकहूँ । भएँ-
भयो। सु-जु ।
२०६ रसिकप्रिया
सूचना—यहाँ सखी ने कामोद्दीपन का भय दिखाकर मानमोचन किया
है, अतः प्रसंगविध्वंस है ।
अलंकार—शुद्धापह्नुति ।
श्रीकृष्णजू को प्रसंगविध्वंस, यथा-(कबित्त)
(३८४) कोकनि की कारिका कहति काहू सारिका सों,
दुरि दुरि हित चित्त चौगुनो बढ़ायो है ।
सूकि रही सकुचनि बापुरी सुकी तौ, कहि
काहू सों सकै न देह दुखनि डढ़ायो है ।
उठि चलौ न्याउ कीजै अब कैं मनाइ दीजै,
नीकें ही में केसोदास कलह बढ़ायो है ।
मानत न एते पर उलटि मनावै बह,
ऐसो ही सयान स्याम सुकहि पढ़ायो ।२५।
शब्दार्थ—कोकन की कारिका = कोकशास्त्र के सिद्धांत, कामशास्त्र
की बातें । सारिका = मैना । सूकि रही = सूखती जा रही है । बापुरी =
बेचारी । सुकी=सुग्गी । न्याउ कीजै = फैसला कर दीजिए, झगड़ा निपटा
दीजिए । नीकें ही में = अच्छे भले में । कलह = झगड़ा । सयान = चतुराई
(की पद्धति) ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति नायक से) हे श्याम, आपने सुग्गे को न जाने
कैसी चतुराई की बातें सिखा रखी हैं कि वह सुग्गी से मान कर बैठा है, मानता
ही नहीं । वह किसी मैना से कोकशास्त्र की बातें कर रहा था । छिप छिपकर
उसने प्रेम और चित्त दोनों ही चौगुने बढ़ा लिए हैं (उसका प्रेम भी बढ़ गया
है और मन भी) । बेचारी सुग्गी (उसकी कथा सुन सुनकर और उसकी करतूत
देख देखकर) मारे संकोच के सूखती जा रही है । वह किसी से इस बात को
कह नहीं सकती, उसका शरीर दुखों से जल रहा है । इतनी ढिठाई करने पर भी
सुग्गा मानता नहीं है (वही मान कर बैठा है) और सुग्गी ही उलटे उसे
मना रही है । आप चलकर दोनों के झगड़े का निपटारा कर दीजिए । थोड़े
के लिए उसने इतना झगड़ा बढ़ा रखा है ।
सूचना—शुक और शुकी के झगड़े के कारण नायक को भय हुआ और
उसका मान छूट गया, यही प्रसंगविध्वंस है । यहाँ शुक के चरित्र से श्रीकृष्ण
का चरित्र भी मिलता है अतः उपेक्षा की संभावना होती है । पर दोनों में
२५—चढ़ायो-बढ़ायो । सूकि-सोचि । नीकें ही-नेक ही । डढ़ायो-
-उठायो, बढ़ायो । बह-बरु ।
दशम प्रभाव २०७
अंतर यह है कि प्रसंगविध्वंस में भय होता है और उपेक्षा में भय नहीं । यदि
कोई सारूप्य निर्देश भयरहित होगा तो उपेक्षा होगी और भय की संभावना
होगी तो प्रसंगविध्वंस । श्रीकृष्ण के पालतू पक्षियों में से शुकी का सूख जाना
स्पष्ट भय का कारण है, अतः यहाँ अन्योक्ति होते हुए भी उपेक्षा न होकर
प्रसंग विध्वंस ही होगा । दूसरी बात यह है कि भय पहले होता है, आत्मसाम्य
काज्ञान तदनंतर । इसी से भय प्रधान होगा, आत्मसाम्य गौण ।
अलंकार—अन्योक्ति ।
( दोहा )
(३८५) देश काल बुधि बचन तें, कल धुनि कोमल गान ।
सोभा सुभ सौगंध तें, सुख ही छूटत मान ।२६।
शब्दार्थ—सोगंध = सुगंध । सुख ही = सरलता से ।
भावार्थ—देश, समय, बुद्धिपूर्वक कहे वचन, सुंदर ध्वनि, सुंदर गान,
शोभा-दर्शन, अच्छी सुगंध से सहज ही मान छूट जाता है ।
यथा—( कबित्त )
(३८६) घनन की घोर सुनि, मोरनि को सोर सुनि,
सुनि सुनि केसव अलाप अलीजन को ।
दामिनी दमक देखि देह की दिपति देखि,
देखि सुभ-सेज देखि सदन सुबन को ।
कुंकुम की बास, घनसार की सुबास भयो,
फूलनि की बास, मन फूलिकै मिलन को ।
हँसि हँसि बोले दोऊ, अनहीं मनाएँ मान,
छुटि गयो एकै बार राधिका रमन को ।२७।
शब्दार्थ—घन = बादल । घोर = ध्वनि । अलाप = राग । अलीजन =
सखियाँ । दामिनी = बिजली । दमक = चमक । सुबन = रमणीय बाटिका ।
कुंकुम = केसर । घनसार = कपूर । फूलिकै = उत्साहित होकर । अनहीं
मनाएँ = बिना मनाए ही । एकै बार = एक साथ ही । राधिका रमन =
राधिका और उनके रमण श्रीकृष्ण दोनो का ।
सूचना—'घनन की घोर' समय है ( वर्षा ), 'मोरन को सोर' कल
ध्वनि है, 'अलाप अलीजन को' कोमल गान है 'दामिनी दमक' और 'देह की
दिपति' शोभा है, 'सुभ सेज' और 'सुबन' देश हैं, 'कुंकुमादि की सुबास'
सुगंध है और हंसकर बोलना बुद्धिवचन है ।
२७-देह-दीप । सुभ-सुख । सदन-सुंदर । भयो-नयो, नए । बोले-
मिले । अनहीं-बिनही । गयो ०-गो एकहि । बार-बेर ।
२०८ रसिकप्रिया
व्याकरण—'अन' का प्रयोग बिना के अर्थ में किया गया है ।
( दोहा )
(३८७) इहि बिधि मान छुड़ावहीँ, आपुस में नर नारि ।
पल पल प्रीति बढ़ावहीँ, केसवदास बिचारि ।२८।
(३८८) प्रिया न प्रीतम सों करै, अति हठ केसवदास ।
बहुरथौ हाथ न आवई, जौ ह्वै जाइ उदास ।२६।
भावार्थ — हाथ न आवई=वश में नहीं होता, अनुकूल नहीं रह जाता ।
(३८६) बारहि बार न कीजिये, बारक कीजै मान ।
कहि केसव ज्यों आप में, सदा बढ़ै सनमान ।३०।
शब्दार्थ—बारक=( केवल ) एक बार । ज्यों=जिस प्रकार । आप
में=परस्पर ।
(३६०) प्रीति बिना भय होय नहिं, भय बिन होइ न प्रीति ।
प्रीति रहै जहँ भय रहै, यहै मान की रीति ।३१।
भावार्थ—प्रेम के बिना भय नहीं होता और भय के बिना प्रेम नहीं
होता, अतः दोनो साथ साथ रहते हैं । यही मान का कारण और ढंग है ।
(३६१) गर्ब, व्यसन, धन-त्याग तें, निष्ठुर बचन प्रवास ।
लालन बिप्रियकरन तें, पिय तें होइ उदास ।३२।
तात्पर्य—नायक से नायिका इन कारणों से उदास होती है—गर्व से,
व्यसन से, धन के नष्ट होने से, कड़ी बातों से, प्रवास में रहने से, लोभ में
पड़ने से, मन के विरुद्ध कार्य करने से ।
(३६२) मान बिबिध बरने बिबुध, जहाँ बिबिध बुधिबास ।
केसव करुना करि कछू, कहियत बिरह-प्रवास ।३३।
शब्दार्थ—बिबुध = विशेष पंडित । बुधिवास = अनेक प्रकार की बुद्धि-
पूर्वक की गई युक्तियों का निवास जहां था । करुना करि = करुणा के द्वारा
होनेवाले । बिरह-प्रवास = प्रवास के कारण उत्पन्न विरह ।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां विप्रलंभ-
शृंगारिमानमोचनं नाम दशमः प्रभावः ।१०।
३०—कीजिये-कीजई । ३१—जहँ-जिहिं । ३२—करन तें--करन तिय ।
३३—बिबिध०--बिरह। बिबुध--बिबिध । कहियत--कीजत बिरह प्रकास ।
१४
एकादश प्रभाव
अथ करुणाविरह-लक्षण—(दोहा)
(३६३) छूटि जात केसव जहाँ, सुख के सबै उपाय।
करुनारस उपजत तहाँ, आपुन तें अकुलाय।१।
(३६४) सुख में दुख क्यों बरनियै, यह बरनत व्यौहार।
तदपि प्रसंगहि पाइ कछु, बरनत मति-अनुसार।२।
अथ राधिकाजू को प्रच्छन्न करुणाविरह, यथा—(सवैया)
(३६५) मैं पठई मति लेन सखी सु रही मिलिकै मिलिबे कहँ आनै।
जाइ मिले दिन ही दृग-दूत दयाल सों देहदसा न बखानै।
प्रेत पैज कियें तन प्राननि जोग के और प्रयोग निदानै।
लाज तें बोलन पाऊँ न केसव ऐसें ही कोऊ कहा दुख जानै।३।
शब्दार्थ—आनै = ले आए। प्रेत = प्रेरित करता है। पैज = प्रतिज्ञा।
और = अन्य, दूसरे। निदानै = निदान कर, खोजकर, सोचकर।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति मन से) मैंने मति रूपी सखी को नायक
को ले आने के लिए भेजा पर वह तो वहीं उनसे मिलकर रह गई, उन्हें मुझसे
मिलाने के लिए कौन लाता। इतना ही नहीं नेत्र रूपी दूत भी दयालु
(नायक) से जा मिले, जाकर मेरी देहदशा का वर्णन नहीं किया। योग के
अन्य प्रयोग सोचकर अब मेरा शरीर प्रतिज्ञा करके (कि अवश्य भेंट होगी)
प्राणों को भेज रहा है (देखें क्या होता है)। मै लज्जा के कारण कुछ कह
नहीं सकती और बिना कहे यों ही मेरे इस (कठिन) दुख को कोई जान
भी कैसे सकता है ?
सूचना—प्राणों के भेजने से यहाँ करुणाविरह है। किसी से कुछ नहीं
कहती, मन ही मन सोचती रहती है, अतः प्रच्छन्न है।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश करुणाविरह, यथा—(कबित्त)
(३६६) हरित हरित हार हेरत हियो हरतु,
हारी हौं हरिननैनी हरि न कहूँ लहौं।
बनमाली ब्रज पर बरषत बनमाली,
बनमाली दूर दुख केसव कैसें सहौं।
२—यह-नहि। ३-कै-कौ। निदानै-निधानै, निधानै दिनानै।
कियें--करै।
२१० रसिकप्रिया !
हृदय-कमल-नैन देखिकै कमल नैन,
होहुँगी कमलनैनि और हौं कहा कहौं ।
आप घने घनस्याम घनहीं से होत घन,
सावन के द्योस घनस्याम बिनु क्यों रहौं ।४।
शब्दार्थ—हरित हरित = हरे हरे । हार = खेत, जंगल । हरत = हर लेते
हैं । हरिननैनी = मृगनैत्री (चपलतापूर्वक चारों ओर देखनेवाली) । वनमाली =
वन से घिरा हुआ प्रदेश । बनमाली = ( बन = जल + माली = समूह से युक्त )
बादल । बनमाली = श्रीकृष्ण ! हृदय कमल नैन = हृदय की आँख से, ध्यान
करके । कमलनैनि = जलपूर्ण नेत्रवाली (कमल = जल) । आप = जल । घने =
अत्यधिक । घन से = बहुत । घनहीं = हथौड़े की भांति ।
भावार्थ—( विरहिणी नायिका किसी सखी के साथ घूम रही है और
कह रही है ) इन हरे हरे खेतों को देखकर तेरा हृदय मुग्ध हो गया है, पर मैं
परेशान हो गई, मैं हरिणनेत्री होकर ( चंचलतापूर्वक इधर उधर देखती हुई
भी ) हरि को कहीं भी देख नहीं पाती हूँ । वनों से घिरे हुए ब्रज पर जल से
भरे हुए बादल बरस रहे हैं । वनमाली (श्रीकृष्ण) दूर हैं, मैं दुःख कैसे सहूँ !
हृदयकमल के नेत्रों से कमलनेत्रवाले श्रीकृष्ण को देखकर मैं जलपूर्ण नेत्रवाली
हो जाऊँगी ( उनका ध्यान करने से मेरे नेत्रों में आँसू छलक आएँगे ) । और
अधिक मैं क्या कहूँ अत्यधिक जल से भरे हुए अत्यंत काले ये बादल हथौड़े
की भाँति कष्टदायक प्रतीत होते हैं । इन सावन के दिनों में भला घनश्याम
के बिना मैं कैसे रह सकती हूँ ( जी सकती हूँ ) ।
सूचना—नायिका का अत्यंत दुःखप्रकाश होने से करुणविरह है, सहेली
बातें कर रही है, अतः प्रकाश है ।
अलंकार—यमक ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न करुणविरह, यथा—( कवित्त )
(३६७) जैसें मिल्यो प्रथम स्त्रवन-मग जाइ मन,
रवन भवन कीने अलिक अलक में ।
मन मिलें मिले नैन केसौदास सबिलास,
छबि-आस भूलि रहे कपोल-फलक में ।
नैन मिलें मिल्यो ज्ञान सकल सयान सजि,
तजि अभिमान भूल्यो तन की झलक में ।
४—हियो-हिये । हरत-हेरात । घने०-घनघने । सावन०-घतनि के घोष,
स्यामनि के द्यौस ।
एकादश प्रभाव २११
तैसें छल बल साधि राधिकै मिलन कहँ,
चाहत कियो पयान प्रानहूँ पलक में ।५।
शब्दार्थ—रवन = ( रमरण ) रमणीय । भवन=घर । अलिक = ललाट ।
अलक = केश, लट । सविलास=आनंदपूर्वक । फलक = पट्टी, स्थान । सयान
सजि=चतुरतापूर्वक । झलक = कांति । पलक=( एक पल ) क्षण भर में ।
भावार्थ—(नायक की उक्ति आत्मगत) जिस प्रकार पहले कानों के मार्ग
से मन जाकर उनसे मिला ( कानों से उनकी सुंदरता का वर्णन सुनकर देखने
के लिए लालायित हुआ और जाकर मिला ) फिर वहाँ वह उनके भालपट्ट
और लट में अपना रमणीय घर बनाकर रहने लगा । मन के जा मिलने से
नेत्र भी आनंदपूर्वक जा मिले और छवि की आशा में अपने को भूलकर कपोल-
देश में रहने लगे । नेत्रों के मिलने से अब चातुर्यसहित ज्ञान (चेतना) भी जा
मिला । उसने अपना अभिमान ( अहंता ) त्याग दिया और वह शरीर की
चमक में मुग्ध रह गया । ठीक उसी प्रकार अब छलबलपूर्वक राधिका से
मिलने के लिए क्षण भर में प्राण भी प्रस्थान करना चाहते हैं।
सूचना—प्राण त्यागने की अवस्था उपस्थित होने की बात कहने से
करुण-विरह और आत्मगत होने से प्रच्छन्न है ।
अलंकार—एकावली ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश करुणाविरह, यथा—( सवैया )
(३६८) है तरुनाई तरंगिनि-पूर अपूरब पूरबराग रँगे पय ।
केसवदास जिहाज मनोरथ, संभ्रम बिभ्रम, भूरि भरे भय ।
तर्क तरंग तरंगित तुंग तिमिंगिल सूल बिसालनि के चय ।
कान्ह कछू करुनामय हे सखि तैं ही किये करुना-बरुनालय ।६।
शब्दार्थ—तरुनाई=युवावस्था । तरंगिनि = नदी । पूर = प्रवाह । अपू-
रब = अपूर्व, अद्वितीय । पूरबराग = पूर्वराग । पय=जल । संभ्रम = आतुरता ।
विभ्रम=चक्कर, आवर्त । भूरि भरे भय = अत्यधिक भय से भरे । तरंग =
लहर । तरंगित = लहरातीं हुई । तुंग = ऊँची । तिमिंगिल = बड़े बड़े जलजीव
जो तिमि ( मछली ) को निगल जाते हैं । सूल = ( शूलं ) कष्ट । चय =
समूह । हे = थे । बरुनालय = समुद्र ।
भावार्थ—( बहिरंग सखी की उक्ति नायिका से ) हे सखी ( पहले )
कृष्ण के हृदय में तो किंचित् ही करुणा ( शोक ) थी, तुम्हीं ने उन्हें शोक-
५-जैसे-ऐसे । कीने-किये । राधिकै०-राधिका कुञ्जैरि ।
२४२ रसिकप्रिया
सागर बना दिया । तुम्हारा यौवन ही नदी का भीषण प्रवाह है, जिसमें
पूर्वराग से युक्त होना ही जल है । इस नदी को पार करने के लिए मनोरथ
का ही जहाज है, आतुरता ही आवर्त्त है । इसी प्रकार उसमें अनेक भय
( के कारण ) भरे हुए हैं । तर्क की ऊँची लहरें उठ रही हैं बड़े बड़े कष्ट ही
दीर्घकाय जलजंतु हैं ( तेरे यौवन की इस नदी के जा मिलने से नायक अब
शोक के समुद्र ही हो गए हैं ) ।
सूचना—श्रीकृष्ण को शोक-समुद्र ( करुणा-वरुणालय ) कहने से करुणा-
विरह और बहिरंग सखी की उक्ति होने से प्रकाश है ।
अलंकार—सांग रूपक ।
अथ प्रवासविरह-लक्षण—( दोहा )
(३६६) केसव कौनहु काज तें, पिय परदेसहिं जाइ ।
तासों कहत प्रवास सब, कबि कोबिंद समुझाइ ।७।
सूचना—इसके बाद हस्तलिखित प्रति और लीथोवाली प्रति में यह
सवैया दिया गया है, जो मुद्रित प्रतियों में नहीं है—
जानै कहा मेरी दीरघ साँस लै नैन नवाइ दुकाइ बिथाहू ।
माथौ न दुखिहै सूघे निहारौ पखारौ नहीं मुख जौ न अन्हाहू ।
ऐसें ही केसव क्यों रहै प्रान सु आपनी पीर सुनावहु काहू ।
काहे तें भोर को भोजनौ छोड़यो तौ पानो न पीवौ जौ पान न खाहू ॥
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न प्रवासविरह, यथा—( सवैया )
(४००) तूँ करिहै कहि धौं कब गौनहि नंदकुमार तौ गौन कियोई ।
मोहि महा डर तो डर को न रहै लटि लै जिनि को धौं लियोई ।
ऐसी न बूझियै केसव तोहि बिचारै जु बीच बिचार बियोई ।
तेरे ही जीय जियै जिनको जिय रे जिय ता बिन तूँ ब जियोई।८।
शब्दार्थ—गौनहि = गमन । लटि = क्षीण होकर । बियो = दूसरा ।
भावार्थ—( नायिका की उक्ति प्राण से ) हे प्राण, नंदकुमार तो गए,
अब तू कब गमन करेगा ? मुझे तो बड़ा डर तेरे हृदय का है । कहीं वह
दुर्बलता-क्षीणता का बहाना लेकर रह न जाय, प्रत्युत उसने यह बहाना ले ही
लिया । तुझे वैसा नहीं करना चाहिए जैसा तू इस समय दूसरे प्रकार का
विचार करके करने लगा है ( गमन न करके रहना चाहता है ) । तेरे ही जी
८—कहि-कब । कब-कहि । मोहि-मोहि तो मोह । रहै-रह्यो । लै जिनि
कौ धौं-लाभ । ऐसी-ऐसो । बिचारै-बिचारयो ।
एकादश प्रभाव २१३
से जिनका जी जीता है (जो तुझे प्राणों की भाँति प्यार करते हैं) ऐसे
श्रीकृष्ण के बिना भी तू अब भी जी रहा है ? (यह कार्य ठीक नहीं) ।
सूचना—'नंदकुमार तौ गौन कियोई' से प्रवासविरह । प्राणों के प्रति
उक्ति होने से प्रच्छन्न है ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश प्रवासविरह-वर्णन, यथा—(कवित्त)
(४०१) कौन कें न प्रीति, को न प्रीतमहिं बिछुरत,
याही कें अनोखो पतिव्रत गाइयत है ।
केसौदास जतन कियैं ही भलें आवै हाथ,
और कहा पच्छिनि के पाछें धाइयत है ।
उठि चलि जौ न मानै काहू की बलाइ जानै,
मानसै जु पहिचानै ताकें आइयत है ।
याकें तौ है आजु ही मिलौं कि मरि जाउँ ऐसें,
आगि लागें मेरी माई मेह पाइयत है ।६।
शब्दार्थ—कौन कें०= किसके (हृदय में) प्रेम नहीं होता। को न
प्रीतमहिं बिछुरत = किसे प्रियवियोग नहीं होता। जतन······धाइयतु है =
(पिंजड़े से निकलकर उड़ जानेवाला) पक्षी यत्न करने से ही हाथ आता
है, नहीं तो क्या कोई पक्षी के पीछे पीछे दौड़ता फिरता है (अर्थात् नहीं) ।
बलाइ=बला। उठि चलि० = यदि नहीं मानती है तो चल उठ चलूं, किसी
की बला जाने (मुझे क्या)। मानसै= मनुष्य को। मानसै जु० = जो
मनुष्य को पहचाने उसी के यहाँ आया जाता है (यह तो जैसे आदमी ही नहीं
पहचानती) । मरि जाउँ = मर जाऊँ (मरकर जा मिलूँ) । माई = संबोधन
में । मेह = (मेघ) जल । आगि लागें० = भला कहीं आग लगने पर (मनाने
से) पानी बरसता है ।
उक्ति—सखी की उक्ति सखी से ।
अलंकार—लोकोक्ति ।
सूचना—सखियों की परस्पर बातचीत है, अतः बात बाहर तक पहुँच
चुकी है इसी से प्रकाश है ।
श्रीराधिकाजू को विरह-भयविभ्रम, यथा—(सवैया)
(४०२) कोकिल केकी कुलाहल हूल उठी उर में मति की गति लूली।
केसव सीत सुगंध समीर गयो उड़ि धीरज ज्यों तन तूली।
६—याही कें-तेरे ही । कियैं ही-करें ही। चलि-चलौ। मानसै-मान
सों। तौ है०-तो है नोखो व्रत । ऐसें-माई, × । माई-आली ।
२१४ रसिकप्रिया
जै मुनि जै मुनि कै बची जोन्ह की जामिनी, पै न अजौं सुधि भूली ।
क्यों जियै कैसो करौं बहुरचौ बिष सी बिसनी बिसवासिनी फूली ।१०।
शब्दार्थ-केकी=मयूर । कुलाहल = (कोलाहल) शोर । हूल = पीड़ा ।
लूली=पंगुल । तूली = रूई (वाला) । मुनि = अगस्त्य मुनि । बिष सी=विष
की भाँति कष्टदायिनी । बिसनी = कमलिनी । बिसवासिनी = ( ब्रजभाषा का
विशिष्ट प्रयोग ) विश्वासघातिनी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, कोयल और मोरों
का कोलाहल सुनकर उस विरहिणी नायिका के हृदय में पीड़ा होने लगी और
उसकी बुद्धि पंगु हो गई (वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई) । शीतल एवम् सुगंधित
वायु के चलने से शरीर से धैर्य रूई की भाँति उड़ गया । ( उस दिन तो समुद्र
का शोषण करनेवाले ) अगस्त्य मुनि का बार-बार जयकार करके वह उस
चाँदनी रात्रि में बची (क्योंकि चंद्रमा समुद्र का पुत्र है, अपने पिता के शोषक
के नाम से डर जाएगा) पर उस दिन उसे जो कष्ट उस चाँदनी रात्रि से मिला
उसके कारण वह उसे आज तक भूल नहीं सकी । अब ( प्रभात के समय )
वह कैसे जी सकेगी और क्या करेगी, क्योंकि विष की भाँति मार डालनेवाली
विश्वासघातिनी कमलिनी भी फूलने लगी है ।
सूचना -विरहावस्था में संयोग की सुखदायिनी वस्तुएँ दुःखद हो जाती हैं ।
इसी का वर्णन केसवदासजी ने 'विरह-भयविभ्रम' नाम से अलग कर दिया है ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न प्रवासविरह, यथा—( सवैया )
(४०३) जिनि बोलि सुबोल अमोल, सबै अँग केलिकलोलनि मोल लिये ।
जिनको चित लालची लोचन रूप अनूप पियूष सु पोय जिये ।
जिनके पद केसव पानि छियैं सुख मानि सबै दुख दूरि किये ।
तिनको सँग छूटत ही फिटु रे फटि कोटिक टूक भयो न हिये ।११।
शब्दार्थ—छियैं = छूने पर । छूटत = छूटने से । फिटु = धिक्कार ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति आत्मगत ) जिन्होंने सुंदर अमूल्य वाणी
बोलकर और क्रीड़ा के कल्लोल ( मुद्राओं ) से मेरे सभी अंग मोल ले लिए
( जिनकी वाणी और मुद्रा पर मेरा शरीर निछावर था ), जिनके अनेक रूप
( सौंदर्य ) के अमृत का नेत्रों द्वारा पान करके मेरा लालची चित्त जीता रहा,
जिनके चरणों को हाथ से छूकर सब दुःख दूर करके मैंने सुख माना उनका
१०—जैमुनि०-जामनि जामनि । जियै-जियो । करौ करे । बिसनी-
बिनसी । ११—बिनके पद-जिनको पद । छियैं-छवै, हिये । छूटत-फूटत ।
फिटु-फिटि ।
साथ छूटने पर भी ऐ हृदय तू फटकर करोड़ों टुकड़े नहीं हो गया, तुझे
धिक्कार है ।
सूचना- मन के प्रति होने से प्रच्छन्न है ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश प्रवासविरह, यथा- ( सवैया )
(४०४) केसव क्योंहूँ चलैं चलि कोरि संदेस कहैं फिरि पैंडक दू पर ।
आगें धरैं अपनौ सो कै साहस पाछेहीं पेलि परै पग भू पर ।
होत जहाँ तहीं ठाढ़े ठगे से चलौ न कह्यो परै कान्ह हितू पर ।
लोक की लाज फिरयो न परै पै मिलान करैं अधकोसक ऊपर ।१२।
शब्दार्थ-कोरि = करोड़ । पैंड़क दू पर = दो डग चलने पर । पेलि =
बरबस । कान्ह हितू पर = प्रिय कृष्ण से । फिरयौ न परै = लौटा नहीं जाता ।
मिलान करैं = पड़ाव डालते हैं । अधकोसक ० = आधे कोस पर ।
भावार्थ- (सखी-वचन सखी से) किसी प्रकार श्रीकृष्ण चलते हैं और
दो पग चलने पर ही लौटकर करोड़ों ( अनेक ) संदेश कह डालते हैं । अपने
साहस से आगे को पैर रखते हैं, पर बलपूर्वक वह पृथ्वी पर पीछे ही पड़ता
है जहाँ जहाँ वे ठगे से खड़े हो जाते हैं और उनसे ( साथवाली सखी या
प्रेमिका से ) 'चलो' ( लौट जाओ ) कहते नहीं बनता । लोक लज्जावश
उनसे भी लौटते नहीं बनता इसलिए वे आधे आधे कोस पर पड़ाव डालते हुए
जा रहे हैं ।
सूचना-( १ ) सखियों तक बात पहुँच गई है ( सब जानते हैं ),
अतः प्रकाश है । ( २ ) हस्तलिखित प्रति में इसके बाद यह दोहा है-
खान पान परिधान पुनि, जान जान दुति अंग ।
सुभ संजोग बियोग बिन जानौ सुख तिय संग ॥
श्रीकृष्णजू को विरह-भयविभ्रम, यथा- ( सवैया )
(४०५) प्रेत की नारि ज्यों तारे अनेक चढ़ाइ चलै चितवै चिहुँघातो ।
कोढ़िनि सी ककुरे कर कंजनि केसव सेत सबै तन तातो ।
भेटतहीं बरहीं अबहीं तौ बरषाइ गई ही सुखै सुख सातो ।
कैसी करौं कहि कैसें बचौं बहुरयौ निसि आई कियें मुँह रातो ।१३।
१२-फिरि-पुनि । पेंडक०-पेंडक ऊपर, पेंडकहू पर । सो कै-कै सु ।
कान्ह०-कान्हहि तूपुर । अध-दस । १३ -- चलै-चली । तो-तें । ककुरे-सकुरे ।
अबही-तबही । ही सुखै०-संग ही सुख, ही सुखै सुध । बचौं = जियों ।
२१६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—तारे = नक्षत्र, नेत्र की पुतली । चितवै चहुँघातो = चारो तरफ
देखती है । ककुरे = सिकोड़े हुए । तातो = तप्त । भेटतहीं = भेंट करते ही, छूते
ही । बरहीं = बलपूर्वक । बरचाइ गई = कठिनता से गई थी, मुश्किल से हटी
थी । सुखै = सुखाकर, नष्ट करके । बहुरचौ = फिर, पुन: । सुख सातो = सात
प्रकार के सुख (खान-पान परिधान पुनि ज्ञान गान द्युति अंग । सुभ संयोग
वियोग बिन, सातो सुख तिय संग )। हस्तलिखित प्रति में यह दोहा मूल में
है । रातो = रक्त, लाल ।
भावार्थ—( नायक-वचन सखी प्रति ) प्रेतिनी की भाँति अनेक (नेत्र
के) तारों को चढ़ाए हुए (नक्षत्रों से युक्त) चारो ओर देखती चल रही है ।
कोढ़िन (स्त्री) की भाँति कर रूपी कमलों को सिकोड़े हुए है (रात में
कमल संकुचित हो जाते हैं) । इसका सारा शरीर (कुष्ठ के कारण) श्वेत
है (चाँदनी फैली है) । शरीर तप्त है (विरह के कारण चाँदनी तप्त जान
पड़ती है) । अभी बरबस मुझे छूते ही सातो सुख नष्ट कर, बड़ी कठिनाई से
गई थी । मैं क्या करूँ, कैसे अपने को बचाऊँ वह रात्रि (पिशाचिनी) फिर
लाल मुँह किए (ललाईयुक्त, उदित होते हुए चंद्रमा से युक्त) आ गई ।
सूचना—विरह में सात सुख दुःखद माने जाते हैं—
नींद, सेज, सुमनो, समा, संगति, सालि, सुगंध ।
सात बियोगिन कों करत, महा बिरह तें अंध ।। (-सरदार की टीका
श्रीराधिकाजू की निद्रा, यथा—(सवैया)
(४०६) आएँ तें आवैंगी आँखिन आगेंही डोलिहै मानहु मोल लई है ।
सोवै न सोबन देइ न यों तब सोवन में उन साथ दई है ।
मेरियै भूलि कहा कहौं केसव सौति कहूँ तें सहेली भई है ।
स्वारथ ही हितु है सबकें, परदेस गएँ हरि नींदौ गई है ।१४।
शब्दार्थ—आएँ तें = प्रियतम के आने पर । मानहु मोल लई है = मानो
मोल ले ली गई है अर्थात् क्रीतदासी की भाँति है । सोवै = ( यह ) सोती थी,
सोना चाहती थी ( प्रिय के पास ) । तब = जाते समय । सोवन में = सोने के
समय । उन = प्रिय ने ।
भावार्थ—( नायिका-वचन सखी से ) हे सखी, प्रिय के आने पर वह
नींद आएगी और क्रीतदासी की भाँति आँखों के आगे नाचा करेगी, पर इस
१४—डोलिहै-डोलैगी । सोवै-सोऊँ । देइ-देउँ । न यों-न ज्यों, सखी ।
मेरियै-मेरी सों ।
एकादश प्रभाव २१७
समय नहीं आती । (उस समय वह पति के पास सोने की बहुत इच्छा रखती
थी) उनके पास सो जाती थी, पर मैं उसे सोने नहीं देती थी । इसलिए
विदेश जाते समय (चित्त में कोई खटका न हो) इसलिए वे उसे मेरे साथ
सोने के लिए दे गए हैं । पर इसमें भी मेरी ही भूल है, भला कहीं सौत सखी
हुई है । सबको स्वार्थ ही प्रिय होता है, प्रिय के परदेश चले जाने पर वह
नींद भी उड़ गई है । (वह भी मेरा साथ नहीं देती) ।
श्रीकृष्णजू की निद्रा, यथा-( सवैया )
(४०७) केसव कैसहूँ कोरि उपाइन जानि सु तौ उर लागति है ।
चकचौंधत सी चितवै चित में चित सोवतहूँ महँ जागत्ति है ।
परदेश प्रिया पल मोहिं पत्याति न जानै को याकी कहा गति है ।
तजि नैननि नींद नवोढ़बधू लहुँ अधिक राति तें भागति है ।१५।
शब्दार्थ-कोरि = करोड़ों । आनि = आकर । सु तौ = वह तो (नींद)।
परदेस प्रिया = प्रिया के परदेश में होने से (विरह के कारण), यह प्रिया
(नवोढ़ा वधू निद्रा) परदेश में है (पिता के घर से पति के घर आई है) ।
लहुँ = लौं, समान ।
भावार्थ-(नायक-वचन स्वगत या मित्र से) किसी प्रकार करोड़ों
उपाय करने पर तो यह छाती से आकर लगती है। (छाती से लगने पर) चित्त
में चकपकाती हुई सी देखा करती है (सोती नहीं, पूरी नींद आती नहीं) सोने
पर भी चित्त से जागती रहती है, सावधान रहती है (बारबार उचट जाती
है) । प्रिया के परदेश में होने से यह मुझ पर क्षण भर के लिए भी विश्वास
नहीं करती । न जाने इसकी कैसी चालढाल है । नेत्रों को त्याग कर नवोढ़ा
वधू की भाँति निद्रा आधी रात से ही चुपचाप शीघ्रता से भाग जाती है ।
अलंकार - रूपक ।
श्रीराधिकाजू की सखी की पत्री, यथा-(सवैया)
(४०८) केसव कुँवर बृषभानु की कुँवरि आजु,
देवता ज्यों बन उपबन बिहरति है ।
कमल ज्यों थिर न रहति कहूँ एक छिन,
कमलाग्रजा ज्यों कमलनि तें डरति है ।
काली ज्यों न केतकी के फूल रुचैं, सीता जू ज्यों
निसिचर-मुख तिन देखे ही जरति है ।
१५-अधिक ०- आवत ही निसि ।