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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 286 में से

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पृष्ठ 210

२१४ रसिकप्रिया
जै मुनि जै मुनि कै बची जोन्ह की जामिनी, पै न अजौं सुधि भूली ।
क्यों जियै कैसो करौं बहुरचौ बिष सी बिसनी बिसवासिनी फूली ।१०।
शब्दार्थ-केकी=मयूर । कुलाहल = (कोलाहल) शोर । हूल = पीड़ा ।
लूली=पंगुल । तूली = रूई (वाला) । मुनि = अगस्त्य मुनि । बिष सी=विष
की भाँति कष्टदायिनी । बिसनी = कमलिनी । बिसवासिनी = ( ब्रजभाषा का
विशिष्ट प्रयोग ) विश्वासघातिनी ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति सखी प्रति ) हे सखी, कोयल और मोरों
का कोलाहल सुनकर उस विरहिणी नायिका के हृदय में पीड़ा होने लगी और
उसकी बुद्धि पंगु हो गई (वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई) । शीतल एवम् सुगंधित
वायु के चलने से शरीर से धैर्य रूई की भाँति उड़ गया । ( उस दिन तो समुद्र
का शोषण करनेवाले ) अगस्त्य मुनि का बार-बार जयकार करके वह उस
चाँदनी रात्रि में बची (क्योंकि चंद्रमा समुद्र का पुत्र है, अपने पिता के शोषक
के नाम से डर जाएगा) पर उस दिन उसे जो कष्ट उस चाँदनी रात्रि से मिला
उसके कारण वह उसे आज तक भूल नहीं सकी । अब ( प्रभात के समय )
वह कैसे जी सकेगी और क्या करेगी, क्योंकि विष की भाँति मार डालनेवाली
विश्वासघातिनी कमलिनी भी फूलने लगी है ।
सूचना -विरहावस्था में संयोग की सुखदायिनी वस्तुएँ दुःखद हो जाती हैं ।
इसी का वर्णन केसवदासजी ने 'विरह-भयविभ्रम' नाम से अलग कर दिया है ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न प्रवासविरह, यथा—( सवैया )
(४०३) जिनि बोलि सुबोल अमोल, सबै अँग केलिकलोलनि मोल लिये ।
जिनको चित लालची लोचन रूप अनूप पियूष सु पोय जिये ।
जिनके पद केसव पानि छियैं सुख मानि सबै दुख दूरि किये ।
तिनको सँग छूटत ही फिटु रे फटि कोटिक टूक भयो न हिये ।११।
शब्दार्थ—छियैं = छूने पर । छूटत = छूटने से । फिटु = धिक्कार ।
भावार्थ—( नायक की उक्ति आत्मगत ) जिन्होंने सुंदर अमूल्य वाणी
बोलकर और क्रीड़ा के कल्लोल ( मुद्राओं ) से मेरे सभी अंग मोल ले लिए
( जिनकी वाणी और मुद्रा पर मेरा शरीर निछावर था ), जिनके अनेक रूप
( सौंदर्य ) के अमृत का नेत्रों द्वारा पान करके मेरा लालची चित्त जीता रहा,
जिनके चरणों को हाथ से छूकर सब दुःख दूर करके मैंने सुख माना उनका
१०—जैमुनि०-जामनि जामनि । जियै-जियो । करौ करे । बिसनी-
बिनसी । ११—बिनके पद-जिनको पद । छियैं-छवै, हिये । छूटत-फूटत ।
फिटु-फिटि ।