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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 286 में से

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पृष्ठ 206

२१० रसिकप्रिया !
हृदय-कमल-नैन देखिकै कमल नैन,
होहुँगी कमलनैनि और हौं कहा कहौं ।
आप घने घनस्याम घनहीं से होत घन,
सावन के द्योस घनस्याम बिनु क्यों रहौं ।४।
शब्दार्थ—हरित हरित = हरे हरे । हार = खेत, जंगल । हरत = हर लेते
हैं । हरिननैनी = मृगनैत्री (चपलतापूर्वक चारों ओर देखनेवाली) । वनमाली =
वन से घिरा हुआ प्रदेश । बनमाली = ( बन = जल + माली = समूह से युक्त )
बादल । बनमाली = श्रीकृष्ण ! हृदय कमल नैन = हृदय की आँख से, ध्यान
करके । कमलनैनि = जलपूर्ण नेत्रवाली (कमल = जल) । आप = जल । घने =
अत्यधिक । घन से = बहुत । घनहीं = हथौड़े की भांति ।
भावार्थ—( विरहिणी नायिका किसी सखी के साथ घूम रही है और
कह रही है ) इन हरे हरे खेतों को देखकर तेरा हृदय मुग्ध हो गया है, पर मैं
परेशान हो गई, मैं हरिणनेत्री होकर ( चंचलतापूर्वक इधर उधर देखती हुई
भी ) हरि को कहीं भी देख नहीं पाती हूँ । वनों से घिरे हुए ब्रज पर जल से
भरे हुए बादल बरस रहे हैं । वनमाली (श्रीकृष्ण) दूर हैं, मैं दुःख कैसे सहूँ !
हृदयकमल के नेत्रों से कमलनेत्रवाले श्रीकृष्ण को देखकर मैं जलपूर्ण नेत्रवाली
हो जाऊँगी ( उनका ध्यान करने से मेरे नेत्रों में आँसू छलक आएँगे ) । और
अधिक मैं क्या कहूँ अत्यधिक जल से भरे हुए अत्यंत काले ये बादल हथौड़े
की भाँति कष्टदायक प्रतीत होते हैं । इन सावन के दिनों में भला घनश्याम
के बिना मैं कैसे रह सकती हूँ ( जी सकती हूँ ) ।
सूचना—नायिका का अत्यंत दुःखप्रकाश होने से करुणविरह है, सहेली
बातें कर रही है, अतः प्रकाश है ।
अलंकार—यमक ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न करुणविरह, यथा—( कवित्त )
(३६७) जैसें मिल्यो प्रथम स्त्रवन-मग जाइ मन,
रवन भवन कीने अलिक अलक में ।
मन मिलें मिले नैन केसौदास सबिलास,
छबि-आस भूलि रहे कपोल-फलक में ।
नैन मिलें मिल्यो ज्ञान सकल सयान सजि,
तजि अभिमान भूल्यो तन की झलक में ।
४—हियो-हिये । हरत-हेरात । घने०-घनघने । सावन०-घतनि के घोष,
स्यामनि के द्यौस ।