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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 286 में से

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पृष्ठ 212

२१६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—तारे = नक्षत्र, नेत्र की पुतली । चितवै चहुँघातो = चारो तरफ
देखती है । ककुरे = सिकोड़े हुए । तातो = तप्त । भेटतहीं = भेंट करते ही, छूते
ही । बरहीं = बलपूर्वक । बरचाइ गई = कठिनता से गई थी, मुश्किल से हटी
थी । सुखै = सुखाकर, नष्ट करके । बहुरचौ = फिर, पुन: । सुख सातो = सात
प्रकार के सुख (खान-पान परिधान पुनि ज्ञान गान द्युति अंग । सुभ संयोग
वियोग बिन, सातो सुख तिय संग )। हस्तलिखित प्रति में यह दोहा मूल में
है । रातो = रक्त, लाल ।
भावार्थ—( नायक-वचन सखी प्रति ) प्रेतिनी की भाँति अनेक (नेत्र
के) तारों को चढ़ाए हुए (नक्षत्रों से युक्त) चारो ओर देखती चल रही है ।
कोढ़िन (स्त्री) की भाँति कर रूपी कमलों को सिकोड़े हुए है (रात में
कमल संकुचित हो जाते हैं) । इसका सारा शरीर (कुष्ठ के कारण) श्वेत
है (चाँदनी फैली है) । शरीर तप्त है (विरह के कारण चाँदनी तप्त जान
पड़ती है) । अभी बरबस मुझे छूते ही सातो सुख नष्ट कर, बड़ी कठिनाई से
गई थी । मैं क्या करूँ, कैसे अपने को बचाऊँ वह रात्रि (पिशाचिनी) फिर
लाल मुँह किए (ललाईयुक्त, उदित होते हुए चंद्रमा से युक्त) आ गई ।
सूचना—विरह में सात सुख दुःखद माने जाते हैं—
नींद, सेज, सुमनो, समा, संगति, सालि, सुगंध ।
सात बियोगिन कों करत, महा बिरह तें अंध ।। (-सरदार की टीका
श्रीराधिकाजू की निद्रा, यथा—(सवैया)
(४०६) आएँ तें आवैंगी आँखिन आगेंही डोलिहै मानहु मोल लई है ।
सोवै न सोबन देइ न यों तब सोवन में उन साथ दई है ।
मेरियै भूलि कहा कहौं केसव सौति कहूँ तें सहेली भई है ।
स्वारथ ही हितु है सबकें, परदेस गएँ हरि नींदौ गई है ।१४।
शब्दार्थ—आएँ तें = प्रियतम के आने पर । मानहु मोल लई है = मानो
मोल ले ली गई है अर्थात् क्रीतदासी की भाँति है । सोवै = ( यह ) सोती थी,
सोना चाहती थी ( प्रिय के पास ) । तब = जाते समय । सोवन में = सोने के
समय । उन = प्रिय ने ।
भावार्थ—( नायिका-वचन सखी से ) हे सखी, प्रिय के आने पर वह
नींद आएगी और क्रीतदासी की भाँति आँखों के आगे नाचा करेगी, पर इस
१४—डोलिहै-डोलैगी । सोवै-सोऊँ । देइ-देउँ । न यों-न ज्यों, सखी ।
मेरियै-मेरी सों ।