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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 286 में से

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पृष्ठ 211

साथ छूटने पर भी ऐ हृदय तू फटकर करोड़ों टुकड़े नहीं हो गया, तुझे
धिक्कार है ।
सूचना- मन के प्रति होने से प्रच्छन्न है ।
श्रीकृष्णजू को प्रकाश प्रवासविरह, यथा- ( सवैया )
(४०४) केसव क्योंहूँ चलैं चलि कोरि संदेस कहैं फिरि पैंडक दू पर ।
आगें धरैं अपनौ सो कै साहस पाछेहीं पेलि परै पग भू पर ।
होत जहाँ तहीं ठाढ़े ठगे से चलौ न कह्यो परै कान्ह हितू पर ।
लोक की लाज फिरयो न परै पै मिलान करैं अधकोसक ऊपर ।१२।
शब्दार्थ-कोरि = करोड़ । पैंड़क दू पर = दो डग चलने पर । पेलि =
बरबस । कान्ह हितू पर = प्रिय कृष्ण से । फिरयौ न परै = लौटा नहीं जाता ।
मिलान करैं = पड़ाव डालते हैं । अधकोसक ० = आधे कोस पर ।
भावार्थ- (सखी-वचन सखी से) किसी प्रकार श्रीकृष्ण चलते हैं और
दो पग चलने पर ही लौटकर करोड़ों ( अनेक ) संदेश कह डालते हैं । अपने
साहस से आगे को पैर रखते हैं, पर बलपूर्वक वह पृथ्वी पर पीछे ही पड़ता
है जहाँ जहाँ वे ठगे से खड़े हो जाते हैं और उनसे ( साथवाली सखी या
प्रेमिका से ) 'चलो' ( लौट जाओ ) कहते नहीं बनता । लोक लज्जावश
उनसे भी लौटते नहीं बनता इसलिए वे आधे आधे कोस पर पड़ाव डालते हुए
जा रहे हैं ।
सूचना-( १ ) सखियों तक बात पहुँच गई है ( सब जानते हैं ),
अतः प्रकाश है । ( २ ) हस्तलिखित प्रति में इसके बाद यह दोहा है-
खान पान परिधान पुनि, जान जान दुति अंग ।
सुभ संजोग बियोग बिन जानौ सुख तिय संग ॥
श्रीकृष्णजू को विरह-भयविभ्रम, यथा- ( सवैया )
(४०५) प्रेत की नारि ज्यों तारे अनेक चढ़ाइ चलै चितवै चिहुँघातो ।
कोढ़िनि सी ककुरे कर कंजनि केसव सेत सबै तन तातो ।
भेटतहीं बरहीं अबहीं तौ बरषाइ गई ही सुखै सुख सातो ।
कैसी करौं कहि कैसें बचौं बहुरयौ निसि आई कियें मुँह रातो ।१३।
१२-फिरि-पुनि । पेंडक०-पेंडक ऊपर, पेंडकहू पर । सो कै-कै सु ।
कान्ह०-कान्हहि तूपुर । अध-दस । १३ -- चलै-चली । तो-तें । ककुरे-सकुरे ।
अबही-तबही । ही सुखै०-संग ही सुख, ही सुखै सुध । बचौं = जियों ।