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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 286 में से

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पृष्ठ 205

१४
एकादश प्रभाव
अथ करुणाविरह-लक्षण—(दोहा)
(३६३) छूटि जात केसव जहाँ, सुख के सबै उपाय।
करुनारस उपजत तहाँ, आपुन तें अकुलाय।१।
(३६४) सुख में दुख क्यों बरनियै, यह बरनत व्यौहार।
तदपि प्रसंगहि पाइ कछु, बरनत मति-अनुसार।२।
अथ राधिकाजू को प्रच्छन्न करुणाविरह, यथा—(सवैया)
(३६५) मैं पठई मति लेन सखी सु रही मिलिकै मिलिबे कहँ आनै।
जाइ मिले दिन ही दृग-दूत दयाल सों देहदसा न बखानै।
प्रेत पैज कियें तन प्राननि जोग के और प्रयोग निदानै।
लाज तें बोलन पाऊँ न केसव ऐसें ही कोऊ कहा दुख जानै।३।
शब्दार्थ—आनै = ले आए। प्रेत = प्रेरित करता है। पैज = प्रतिज्ञा।
और = अन्य, दूसरे। निदानै = निदान कर, खोजकर, सोचकर।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति मन से) मैंने मति रूपी सखी को नायक
को ले आने के लिए भेजा पर वह तो वहीं उनसे मिलकर रह गई, उन्हें मुझसे
मिलाने के लिए कौन लाता। इतना ही नहीं नेत्र रूपी दूत भी दयालु
(नायक) से जा मिले, जाकर मेरी देहदशा का वर्णन नहीं किया। योग के
अन्य प्रयोग सोचकर अब मेरा शरीर प्रतिज्ञा करके (कि अवश्य भेंट होगी)
प्राणों को भेज रहा है (देखें क्या होता है)। मै लज्जा के कारण कुछ कह
नहीं सकती और बिना कहे यों ही मेरे इस (कठिन) दुख को कोई जान
भी कैसे सकता है ?
सूचना—प्राणों के भेजने से यहाँ करुणाविरह है। किसी से कुछ नहीं
कहती, मन ही मन सोचती रहती है, अतः प्रच्छन्न है।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश करुणाविरह, यथा—(कबित्त)
(३६६) हरित हरित हार हेरत हियो हरतु,
हारी हौं हरिननैनी हरि न कहूँ लहौं।
बनमाली ब्रज पर बरषत बनमाली,
बनमाली दूर दुख केसव कैसें सहौं।
२—यह-नहि। ३-कै-कौ। निदानै-निधानै, निधानै दिनानै।
कियें--करै।