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रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

१८४ रसिकप्रिया
जी के पुत्र हैं और ये वृषभानुजी की पुत्री हैं। इन (बड़े बाप के लाडिली-
लाड़िलों) का भेद कुछ खुलता नहीं कि आखिर बात क्या है। एक ही साथ
दोनो को क्या हो गया, जरा आकर तू भी देख क्यों नहीं जाती।
सूचना-व्याधि के इन दो उदाहरणों में नायक और नायिका दोनो की
दशा का साथ ही वर्णन कर दिया गया है, इसी से प्रकाश और प्रच्छन्न के
पृथक् पृथक् दो दो उदाहरण केशव ने नहीं रखे।
अथ जड़ता-लक्षण- (दोहा)
(३२६) भूलि जाइ सुधि बुधि जहाँ, सुख दुख होइ समान।
तासों जड़ता कहत हैं, केसवदास सुजान। ४८।
श्रीराधिकाजू की प्रच्छन्न जड़ता, यथा- (सवैया)
(३३०) खरे उपचार खरी सियरी सियरे तें खरोई खरो तन छीजै।
ऐसे में और करें तें कछू उपजै तौ सकेलि कहा हम लीजै।
देखत हौ यह कामकली कुँभिलानियै जाति कहा अब कीजै।
कौन पै जाऊँ, कहा करौ केसव कैसें जियै बह क्यों हम जीजै। ४६।
शब्दार्थ-खरे = अच्छे, अत्यंत लाभदायक। खरी = अत्यंत। सियरी =
शीतलता। सियरे तें = शीतल से। खरोई खरी = अत्यधिक, और अधिक।
छीजै = क्षीण होता है। खरे उपचार० = अच्छे उपचारों से शरीर में अत्यंत
शीतलता होती है, पर यहाँ तो शीतोपचार से और भी शरीर क्षीण होता चला
जा रहा है। सकेलि कहा हम लीजै० = हम क्या भँजा लेंगी, क्या पाएँगी,
हमें क्या मिलेगा ? सकेलना = एकत्र करना, पाना। ऐसे में = ऐसी दशा में
कोई और उपचार करने से कहीं कुछ का कुछ न हो जाय तो हम लोग कौन
सा भाँड़ा भर लेंगी ? कामकली = नायिका। जीजै = जीवित रहें, जियें।
(३३१) श्रीराधिकाजू की प्रकाश जड़ता, यथा- (सवैया)
आँखियानि मिली सखियानि मिली पतियाँ बतियानि मिली तजि मौनै।
ध्यान-बिधान मिली मनहीं मन ज्यों मिलै राँक मनौ मन सौनै।
केसव कैसहूँ बेगि चलौ नतु हैहै वहै हरि जो कछु हौनै।
पूरन प्रेम-समाधि लगे मिलि जैहै तुम्हें मिलिहौ तब कौनै। ५०।
शब्दार्थ-पतियाँ = पत्रिका। पतियां बतियानि = पत्रिका की बातों के
द्वारा। ध्यान-विधान = ध्यान करने के ढंग से।
भावार्थ-(सखी-वचन नायक से) वह स्वयम् अपनी आँखों से तुमसे मिली
(आँखों से देखना जब संभव नहीं रहा तो) सखियों द्वारा मिली (अर्थात् सखियों
४८-केसवदास-केसवराय। ४६-करें-किये। हौ-ही। कामकली-
कामलता। ५०-पतियां०-पतियानि मिली बतियाँ। रांक-एक। मन-मिलि,
मय। चलो-मिलो। नतु-तन। लगे-मिलें।

अष्टम प्रभाव १८३
के माध्यम से बात करती रही, स्वयम् मौन हो रही), फिर उसने सखियों के
माध्यम से मिलने की अपेक्षा पत्रिका की बातों के द्वारा प्रत्यक्ष तुमसे बात करना
ठीक समझकर उस माध्यम से भी वह मिली । पत्रिका का माध्यम संतोषप्रद
न होने से वह ध्यान-विधान से मन ही मन तुमसे मिली, जैसे दरिद्र मन ही
मन सोने की कल्पना करके उससे मिलता है । इसलिए अब आप उससे शीघ्र
ही मिलिए । नहीं तो जो कुछ होना होगा वही होकर रहेगा । यदि कहीं
उसकी पूर्ण प्रेमसमाधि लग गई और ( उसने योगियों की भाँति ) तुममें
अपने को मिला दिया, तब तुम जाकर मिलोगे भी तो किससे मिलोगे ?
उसमें तुममें अभेद हो जायगा, भेद रहेगा ही नहीं ।
श्रीकृष्णजू की प्रच्छन्न जड़ता, यथा—( सवैया )
(३३२) पल ही पल सीतल होत सरोर .बिचारे सबै उपचार निदानैं ।
जौ करियै तन मंडन खंडन चित्त कछू सुख दुख न आनैं ।
केसव कान्ह सुने समुझें नहिं, बूझिय कौनहिं को पहिचानैं ।
जोग लियो कै बियोग है काहू को लोग कहा इन रोगनि जानैं ।५१।
शब्दार्थ—पल ही पल = प्रतिक्षण । बिचारे = सोचे । उपचार = रोगशमन
के उपाय, औषध । निदानैं = रोग का आदिकारण । मंडन = अलंकृत, सज्जित ।
खंडन = काट डालना, कष्ट देना । न आनैं = नहीं लाते । चित्त कछू० = उनके
चित्त में शरीर को आराम देने या कष्ट पहुँचाने से सुख या दुख नहीं होता ।
बूझियै० = (श्रीकृष्ण की तो यह दशा है कि वे कुछ सुनते समझते नहीं) अब
किससे पूछूं, कौन रोग की ठीक ठीक पहचान कर सकता है ? जोग लियो० =
यह योग किया है या किसी का वियोग है, आखिर लोग इन रोगों को समझते
ही क्या हैं ? ( यह योगजन्य है या प्रेमजन्य अथवा अन्य किसी हेतु से है ) ।
श्रीकृष्णजू की प्रकाश जड़ता, यथा—( सवैया )
(३३३) कान्ह के आसन बासनहीन हुतासन-मीत को प्रासन कीजै ।
केसव इंद्रिय सोधि सबै मन साधि समाधिनि के रस भीजै ।
जौ लौं भए हरि सिद्ध प्रसिद्ध न तौ लौं बिलोकि अलोक न कीजै ।
देवी करैं तप तो लगि वै वरदान न जौ जिय-दान तौ दीजै ।५२।
शब्दार्थ—बासन = वस्त्रों से । हुतासन-मीत = हुताशन का मित्र, वायु ।
प्रासन = भोजन, भक्षण, पान । साधि = स्थिर करके । रस भीजै = आनंद
प्राप्त कर रहे हैं । अलोक = बदनामी, अपयश ।
भावार्थ—( सखी-वचन नायिका प्रति ) श्रीकृष्ण की अवस्था यह है कि
वे आसन मारे हुए हैं, वस्त्र उन्होंने उतार फेंके हैं, हवा पीकर रहते हैं, सभी
५१—बिचारे-बिचारि । कान्ह-स्यामु । पहिचानैं यह मानैं । ५२—
सोधि०-निग्रह जानिकं सोधि ।

१८४ रसिकप्रिया
इंद्रियों को सोष लिया है (तत्तत् विषयों से उन्हें हटा लिया है—आँखों को
देखने से, कानों को सुनने से आदि) । मन को भी साध लिया है और समाधि
का आनंद ले रहे हैं। जब तक वे प्रख्यात सिद्ध न हो जायँ तब तक देखो,
उनका अपयश मत करो । हे देवी, वे तपस्या तुम्हारे ही लिए कर रहे हैं ।
यदि वरदान नहीं देती हो तो कम से कम जीवन-दान तो दो (उनकी दशा
तो यह है कि प्राण निकलने निकलने हो रहे हैं ) ।
अथ मरण-लक्षण—( दोहा )
(३३४) बनै न क्योंहूँ मिलन जहँ, छलबल केसवदास ।
पूरन-प्रेम-प्रताप तें, मरन होत अनयास ।५३।
शब्दार्थ—प्रताप तें = प्रभाव से ।
भावार्थ—वियोग से जब किसी प्रकार छल बल से भी संयोग नहीं हो
पाता तो पूर्ण प्रेम होने के कारण अनायास मरण हो जाता है ।
(३३५) मरन सु केसवदास पै, बरन्यो जाइ न मित्र ।
अजर अमर जस कहि कहौं, कैसे प्रेत-चरित्र ।५४।
शब्दार्थ—पै = से । अजर अमर० = अजर अमर यश का वर्णन करके
अब प्रेतचरित्र ( मरण का ) वर्णन क्या करूँ ?
(३३६) रति उपजै रमनीन के, पहिलें केसवदास ।
तिनकी इंगित देखि सखि, करत·सुप्रेम-प्रकास ।५५।
शब्दार्थ—रति = प्रेम । रमनी = रमणी, नायिका । तिनकी = उनकी ।
इंगित = चेष्टा ।
(३३७) अति आदर अति लोभ तें, अति संगति तें मित्त ।
साधुनिहूँ के होत हैं, केसव चंचल चित्त ।५६।
सूचना—'रसग्राहकचंद्रिका' टीका में इसके अनंतर यह दोहा है—
आदरादि तें साधुहू क्यों चंचल चित होत ।
त्यों परि सखिसँग दंपतिहिं चंचलता उद्दोत ।
(३३८) सुभग दसा दस मैं कही, उपजै पूरन राग ।
जिहि बिधि उपजै मान मन, बरनौँ सुनहु सभाग ।५७।
शब्दार्थ—उपजै०—जिनसे पूर्ण प्रेम प्रकट होता है ।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां विप्रलंभशृंगार-
पूर्वानुरागवर्णनं नामाष्टमः प्रभावः ।८।
५३—होत-होहि । ५४- जस०-तासों कहौं। कैं से०-केसव प्रेम चरित्र ।
५५—की-पै । देखि-जान । सखि-पिय । ५७-मन अब । सभाग-समाय ।

नवम प्रभाव
अथ मान-लक्षण—( दोहा )
(३३६) पूरन-प्रेम-प्रताप तें, उपजि परत अभिमान ।
ताकी छबि के छोभ तें, केसव कहियत मान । १।
शब्दार्थ—प्रताप तें = प्रभाव से, कारण। छवि के छोभ तें = उसकी
छटा के उद्रेक से ।
(३४०) प्रकटहि पिय प्रति मानिनी, गुरु लघु मध्यम मान ।
प्रकटहिं पीय प्रियानि प्रति, केसवदास सुजान ।२।
शब्दार्थ—पिय, पीय = प्रिय, नायक । प्रियानि प्रति = प्रियाओं के प्रति,
नायिकाओं के प्रति ।
अथ गुरुमान लक्षण—( दोहा )
(३४१) आन नारि के चिह्न लखि, अरु सुनि स्रवननि नाउँ ।
उपजत है गुरुमान तहँ, केसवदास सुभाउँ ।३।
शब्दार्थ—आन = (अन्य ) दूसरी । स्रवननि = अपने कानों से किसी
दूसरी नायिका का नाम सुनकर । नाउँ = नाम ( गोत्रस्खलन ) । सुभाउँ =
स्वभाव से ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न गुरुमान चिह्न-दर्शन तें यथा—( सवैया )
(३४२) आजु मिले बृषभानुकुमारिहि नंदकुमार बियोग बितैकै ।
रूप की रासि रस्यो रस केसव हास-विलासनि रोस रितैकै ।
बागे के भीतर देखि हियें नख नैन नबाइ रही सु इतै कै ।
फूलिहि में भ्रमि भूलि मनो सकुचे सरसीरुह चंद चितैकै ,४।
शब्दार्थ—बियोग = वियोगजन्य दुःख, विरह । बितैकै = व्यतीत करके,
दूर करके । रस रस्यो = आनंद प्राप्त किया । रोस रितैकै = रोषशून्य करके,
दूर करके । बागा = पोशाक, वस्त्र । इतै कै = इधर की ओर करके, अपनी
ओर करके । फूलिहि में = फूलते ही समय । भ्रमि = धोखे में पड़कर ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) आज श्रीकृष्ण राधिका से वियोग-
जन्य दुःख दूर करते हुए ( परम प्रेम से ) मिले और हास-विलास में रोष को
दूर करते हुए उन्होंने रूपवती ( राधा ) के प्रेम का आनंद प्राप्त किया । किंतु
संयोग से वस्त्रों के भीतर श्रीकृष्ण के हृदय पर नखक्षत देखकर उन्होंने इस
प्रकार उधर से अपने नेत्र हटाकर नीचे कर लिए मानो कमल के दो फूल जिस
१-छोम तें-छोभ सों । २-प्रकटहि ०-मानभेद प्रकटहि प्रिया । ३-के
-को । अरु-कँ । ४-हियें०-नखच्छत । नैन ०-रेख बनाइ । सकुचे-सकुच्यो ।

१८६ रसिकप्रिया
समय खिल रहे हों उ सी समय किसी (प्रकाशपिंड में) चंद्रमा का भ्रम हो जाने
से भूलकर (नखक्षत = द्वितीया का चंद्र) उसे देखते ही संकुचित हो गए हों।
अलंकार—उत्प्रेक्षा।
श्रीराधाकाजू को प्रकाश गुरुमान श्रवण तें, यथा—( सवैया )
(३४३) बूझति ही वह गोपी गुपालहि आजु कछू हँसिकै गुनगाथहिं।
ऐसे में काहू को नाम सखी कहि कैसे धौं आइ गयो ब्रजनाथहि।
खात खवावति ही जु बिरी सु रही मुख की मुख हाथ की हाथहिं।
आतुर ह्वै उनि आँखिन तें अँसुवा निकसे अखरान के साथहि। ५।
शब्दार्थ—बूझति ही = ( श्रीकृष्ण से ) पूछ रही थी। गुनगाथहिं =
उनकी गुणगाथा, उनकी बातें। कहि आइ गयो = मुख से निकल पड़ा। धौं
कैसे० = न जाने कैसे श्रीकृष्ण के मुख से निकल पड़ा, गोत्रस्खलन हो गया।
खाति खवावति ही = खा-खिला रही थी। ही = थी। बिरी = पान के बीड़े।
सु रही० = जो पान वह खा रही थी वह तो मुँह का मुँह में ही रह गया,
दाँतों से या होठों से जहाँ का तहाँ दबाए रह गई और जो हाथ में लेकर
उन्हें खिलाने जा रही थी वह हाथ में ही ज्यों का त्यों रह गया, उन्हें खिला
न सकी। आतुर ह्वै = व्यग्र होकर। उनि० = उनकी आँखों से। अखरान =
नाम के अक्षरों के साथ।
अलंकार—चपलातिशयोक्ति।
अथ नायक को गुरुमान-लक्षण—( दोहा )
(३४४) लोकलीक उल्लंघि कछु, प्रिया कहै जब बैन।
उपजि परत गुरुमान तहँ, प्रीतम के उर-ऐन। ६।
शब्दार्थ—लोकलीक = लोकमर्यादा। उल्लंघि = उल्लंघन करके ( लोक-
सीमा को पार करके )। ऐन = ( अयन ) घर। उर-ऐन = हृदय रूपी घर में,
हृदय में।
श्रीकृष्ण को प्रच्छन्न गुरुमान, यथा—( कबित्त )
(३४५) ऐसी ऐसी रति राचे सौंहनि के साँचे स्याम,
देखौ आनि बाँचि किधौं कौन की ये चीठी है।
सुनहु सभागै पाई रावरीयै पाग माँहँ,
कागर के रूप काहू आगि की अँगीठी है।
जानति हौं याही मग पायो है जनम जग,
औरहूँ अलोकन की बीथी तुम दीठी है।
५—नाम-नाउ। कहि कैसे-सुनि आयो। आइ०-कैसे कह्यो। ६—
उपजि०-उपजत है।

१८८ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—खोरि = दोष । खोरि = गली । घनी = अनेक । घरनीनि =
स्त्रियाँ ।
भावार्थ—( नायक के गुरुमान करने पर बहिरंग सखी की उक्ति नायिका
से ) अगर कोई शिकायत करनी ही हो तो अपने लोगों से अपने ही सामने
( एकांत में ) उसे कहते हैं । यह नहीं कि उसके दोषों का खजाना गलियों में
खोलने लगें ( गली गली सबसे दोष कहते फिरना अनुचित है ) । यदि किसी
की दृष्टि किसी की ओर जाती है तो इतना ही किया जा सकता है कि वह
उधर जाने से रोक ली जाय, यह तो हो नहीं सकता कि चाकू लेकर नेत्र ही
तराश दिए जायें । ( आज तो तू ऐसी बातें करके उन्हें क्रुद्ध कर रही है और
वियोग सहा रही है ) पर क्या जानती नहीं कि ये वे ही घनश्याम हैं जिनके
घड़ी भर के वियोग के कारण अनेक स्त्रियों की ऐसी दशा हो जाया करती
थी कि उनकी विरहाग्नि शांत करने के लिए कपूर घोलने की आवश्यकता
पड़ जाती थी । तू कैसी बातें करने लगी है, तुझे इस प्रकार बोलना चाहिए
जिस प्रकार साधारणतया बोलते हैं । मोल लिए हुए के प्रति भी क्या ऐसी
बातें कही जाती हैं, जैसी बातें तूने अपने प्रिय श्रीकृष्ण के प्रति कही हैं ?
( जो तेरे प्रेम में बिक चुका उसे ऐसी कड़ी बातें ! ) ।
सूचना—सखी की उक्ति से स्पष्ट है कि नायिका ने ऐसी बातें कही हैं
जैसी साधारणतः लोकमर्यादा के विरुद्ध हैं । श्रीकृष्ण की ओर से सखी
उलाहना दे रही है । वह बहिरंग है अतः प्रकाश गुरुमान है ।
अथ लघुमान-लक्षण—( दोहा )
(३४७) देखत काहू नारि-त्यों, देखै अपने नैन ।
तहँ उपजत लघुमान कै, सुनै सखी के बैन ।६।
शब्दार्थ—त्यों = ओर ।
भावार्थ—स्वयम् अपनी आँखों से किसी दूसरी स्त्री की ओर देखते हुए
नायक को देख लेने पर या ऐसी बात सखी से सुनने पर लघुमान उत्पन्न
होता है ।
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न लघुमान, यथा—( सवैया )
(३४८) कान्ह तिहारी वा प्रानप्रिया कें अयान सयान सबै मन माहीं ।
मान किधौँ अपमान अबै यह मानस पै अनुमाने न जाहीं ।
सुख दुख्ख न केसव जानि परै समुझ रिस हास न हाँ अरु नाहीं ।
यों खिन ही सियरी खिन ताती है ज्यौं बदलै बदरानि की छाहीं ।१०।
६—उपजत—उपजै । सखी के—सखीये । १० — मानस पै—मान लखौ ।
अनुमाने—पहिचाने । न हां—नहीं अरु माहीं । यों—जो । ही—में । है—सो, सु ।
बदरानि—बदरान ।

नवम प्रभाव १८६
शब्दार्थ - सयान = सयानापन, चतुराई । अयान = मूढ़ता, अज्ञान,
भोलापन । मानस = मनुष्य । पै = से । सियरी = ठंढी ।
भावार्थ-( सखी की उक्ति नायक से ) हे कन्हैया, तुम्हारी उस प्राण-
प्यारी की बातें कुछ खुलती नहीं-उसका सयानापन या भोलापन सब उसके
मन में ही रहता है। यह मान है या अपमान, अभी तो मनुष्य इसका अनुमान
लगा ही नहीं सकता ( पता नहीं चलता कि बात क्या है ? ) । न तो सुख
का पता चलता है न दुख का, न रोष अर्थात् उदासी का ही पता चलता है
न हँसी या प्रसन्नता का । ( पूछने पर ऐसे ढंग से बोलती है कि ) न 'हाँ'
का पता चलता है न 'नहीं' का । क्षण भर में तो वह ठंढी ( शांत ) पड़
जाती है और क्षण भर में गरम ( उग्र ) हो उठती है । वह तो अपना रंग
ढंग उसी प्रकार बदल रही है जैसे बादलों की छाया ( थोड़ी देर तक छाया
रहती है फिर हट जाती है, फिर आती है फिर हटती है ) ।
सूचना-जिस अवस्था का वर्णन किया गया है उससे मान व्यंजित
होता है । शब्दों द्वारा साफ साफ नहीं कहा गया है इसलिए प्रच्छन्न है ।
सखी कृष्ण को किसी बात का उलाहना नहीं दे रही है, इससे जान पड़ता
है कि नायिका ने श्रीकृष्ण का अन्य स्त्री से प्रेम किसी से सुना है, अतः
लघुमान है ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश लघुमान, यथा-( कवित्त )
(३४१) मूठहूँ न रूठिये री ईठ सों इतै कहा ब,
नेक पीठ देत ईठ कौन के भए अली ।
कालि केतौ नंदलाल मोसों घालि लालि करें,
कालि ही न आई ग्वारि जो पै तूँ हुती भली ।
आजुहीं जु बीच परी बीच पारिबे कौं माई,
आन रंग आन भाँति ज्यों कनेर की कली ।
तेरे ही कहे की कोऊ साखि है जु बूझिये री,
देखिये जु आँखि ताकी साखि की कहा चली ।११।
शब्दार्थ - ईठ = प्रिय, स्वामी, पति । पीठ देत = विमुख होने पर । मो-
सों घालि = मुझे बीच में डालकर, मेरे माध्यम से । लालि = मिन्नत,लालसा ।
बीच पारिबे कौं = भेद डालने को । कनेर = कनै ल का फूल । साखि =
साक्षी, गवाह ।
११-इतै०रती कहा बनै कुडाँठि पीठि देत ईठ कौन के अली । देत-
देइ । नन्दलाल०-केसौराइ नन्दलाल लालि करे । जो पै-पे तो । आन भाँति-
आनमति , आन रंग । ताकी०-ताकी०-ताहि०, साखि बूझिबे की ।

१५० रसिकप्रिया
भावार्थ—( सखी और नायिका के उत्तर प्रत्युत्तर ) (सखी-) प्रिय से
झूठमूठ भी रूठना नहीं चाहिए और इतना अधिक रूठने की तो कल्पना ही नहीं
करनी चाहिए। (नायिका ने) विमुख होने पर भला कौन प्रिय होता है? (सखी)
कल नंदलाल ने मुझसे तेरे लिए कितनी ही लालसाएँ कीं । (नायिका- )
यदि तू बड़ी भोली थी तो कल ही क्यों नहीं झगड़ा निपटाने आई ? सखी-)
अच्छा तो मैं आज ही बीच में पड़ती हूँ । (नायिका-) तब तो तू भेद ही
डालने के लिए बीच में पड़ेगी । श्रीकृष्ण तो कनेर की तरह बाहर और भीतर
से भिन्न स्वरूप वाले हैं ( कनेर की कली ऊपर लाल और भीतर सफेद होती
है, श्रीकृष्ण भी दिखाऊ प्रेम करते हैं भीतर से सौतों को चाहते हैं )।
( सखी-) तू जो बात कहती है, क्या उसका कोई साक्षी है जिससे पूछा जा
सके ? ( नायिका-) जो बात मैंने अपनी आँखों देखी उसके लिए साक्षी
की आवश्यकता ही क्या ?
सूचना—नायिका ने स्वयम् अपनी आँखों से श्रीकृष्ण को अन्य स्त्री की
ओर निहारते देखा है उसी पर लघुमान किया है। सखी (बहिरंग ) तक बात
पहुँच चुकी है इसलिए प्रकाश है ।
अथ प्रिय को लघुमान-लक्षण—(दोहा)
(३५०) प्रिय को कह्यो करै नहीं, प्रिया कौनहूँ काज ।
उपजत है लघुमान तहँ, बरनि कहत कबिराज ।१२।
शब्दार्थ—कौनहूँ काज = किसी कारण से ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न लघुमान, यथा-(सवैया)
(१५१) आगें कहा करिहौ अबहीं तें इतौ दुख दीनो कह्यो बिनु कीनें ।
केसव कौनहु लाज कि लाड़ तें भूलि गई तौ भए हित हीनें ।
भेंटे नहीं भरि अंक लला भरि जीभ न बोली जु बोल नवीनें ।
देखे नहीं कबहूँ भरि आँखिनि आजुहिं कैसें चलै चित लीनें ।१।
शब्दार्थ—कह्यो बिनु कीनें = कहा न करके । कि = अथवा । लाड़ तें =
प्यार से । हीने = अभाव, कमी । चलै चित लीनें = ( चित चलै लीनें ) चित्त
चंचल कर लिया, चित्त हटा लिया ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से ) आगे क्या करोगी, कहा हुआ
१२—प्रिय-तिय । नहीं-न जहँ । प्रिया-पिया । प्रिया०-प्रिय को
नाहीं लाज । बरनि०-बरनत हैं । १३—करिहो-हरिहो । तें-तौ । कि-के,
की । भए-भई । भेंटे-भेंटत हो । भरि०-भरि जीव, हँसि जोय । आँखिनि-
नैननि । चलै-चलो ।

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नवम प्रभाव १६१
न करके तो अभी तुमने इतना दुःख दिया। किसी लज्जा के कारण या प्यार
के कारण भूल कर गईं जिससे हित की हानि हुई। तुमने लाल को अंक
भरकर भेंटा नहीं और भर जीभ नई नई बातें भी नहीं कीं। अभी तो भर
आँख उन्हें देखा भी नहीं फिर अपने चित्त को आज ही उनसे क्यों चलायमान
कर लिया ? (उनकी कही बातें क्यों नहीं करतीं)।
सूचना—सखी नायिका को उलाहना देने आई है इससे नायक का
लघुमान व्यक्त होता है। बहिरंग सखी भी जानती है, इसलिए प्रच्छन्न है।
श्रीकृष्णजू को प्रकाशन लघुमान, यथा— (सवैया)
(३५२) बोलि ज्यौं आए त्यौं बोलत नाहिनै मोसों कहा कछु चूक तिहारी।
केसव कैसहूँ देखे सुने बिन जानै कहा कोऊ जी की पिहाँ री।
खोर सिराइ न जानत खाइ, नई यह भूख की भाँति निहारी।
काँचि ही दाखहि चाहत चाख्यो सु अंत तऊ तुम कुंजबिहारी। १४।
शब्दार्थ—चूक = भूल, अपराध। यहाँ

१६२ रसिकप्रिया
श्रीराधिकाजू को प्रच्छन्न मध्यममान, यथा—( सवैया )
(३५४) कहौ कान्ह कहाँ सिगरी निसि नासी सु तौ तुम्हीं कहँ चाहतहीं ।
तनु में तनु रेख लिखी किहि केसव कंटक कानन गाहतहीं ।
कछू राती सी आँखि कहा भई ताती तिहारे बियोग के दाहतहीं ।
हिय-बंचक-रीति रची जब रंचक लाइ लई उर नाह तहीं ।१६।
शब्दार्थ—( नायक और नायिका के प्रश्नोत्तर ) ( नायिका— ) हे
कन्हैया, कहिए सारी रात कहाँ बिताई ? (नायक— ) तुम्हारी प्रतीक्षा करते
हुए तो । ( नायिका— ) कहिए, आपके शरीर में यह पतली ( नख की )
रेखा कैसी है ? ( कृष्ण— ) घूमते-फिरते वन में काँटों की खरोंच लग गई
है ( नायिका— ) अच्छा यह तो बताइए आपकी आँखें कुछ लाल क्यों हैं ?
(नायक— ) तुम्हारी वियोगाग्नि में जलने से गरम होकर ये लाल हो गई हैं।
इस प्रकार कहने पर जब नायिका ने उनकी बातों पर अविश्वास
व्यक्त करते हुए विचित्र मुद्रा से कुछ हृदय लुभाने का सा ढंग दिखाया, तब
नायक ने उसे हृदय से लगा लिया ।
सूचना—अन्य स्त्री से बातें करते देख लेने से नायिका ने मान किया,
इसलिए मध्यममान है । नायक-नायिका तक ही बात है इससे प्रच्छन्न । चौथे
चरण में मानमोचन हो जाने का आभास मिलता है इसलिए सरदार ने उसका
अर्थ इस प्रकार किया है— (नायक) तुमने भी हृदय को धोखा देनेवाली
रीति पकड़ी है । ( नायिका ) आप केवल बात करके क्यों रह गए जरा वहीं
पर उसे गले क्यों नहीं लगा लिया ।
श्रीराधिकाजू को प्रकाश मध्यममान, यथा—( सवैया )
(३५५) सखि ज्यों उनको तू बकावति मोहूँ कों आई बकावन हूँ गरई ।
अब याही तें तोसहूँ बात कछू कहिबे कों हुती न कही परई ।
कहि केसव आपनी जाँघ उघारिकै आपही लाजनि को मरई ।
इक तौ सब तें हरए हरि हैं अब होहुँ कहा हरि तें हरई ।१७।
शब्दार्थ—गरई = हठीली, ढीठ । हरए = हलके, शरारती, नटखट,
निर्लज्ज, दुष्ट । हरई = हलकी, निर्लज्ज ।
भावार्थ—( नायिका ने जिस स्त्री से नायक को बातचीत करते देखा
है, वही मानमोचन के लिए आई है, नायिका उसी से कह रही है ) जिस
१६—नासी-नारी, नाखी । तनु-नल । किहि-कँहि । तिहारे-कि तेरे ।
१७—सखि ज्यों—ज्यों । तू—त्यों । कों-जू, सों । तोसहूँ-तो सों है । परई-
थरई । कै-ब । आपही-आपुन । अब०-अरु होहू ब होऊँ कहा हरई ।

१३ नवम प्रभाव १६३
प्रकार तू उन्हें बकबक करने के लिए प्रेरित करती है क्या ढीठ होकर मुझे
भी बकबक कराने आई है (जैसे उनका सिर खपाती है वैसे मेरा भी खपाने
आई है)। इसी से जो कुछ बात तुझसे कहने को थी वह भी मुझसे कही
नहीं जाती (कौन तुझसे माथा मारे)। कौन अपनी जाँघ उघारकर स्वयम्
ही लज्जा से मरे (तुझसे अपना ही भेद खोलकर मैं क्यों पछताऊँ)। एक तो
श्रीकृष्ण और सब लोगों से बढ़कर निर्लज्ज हैं, क्या मैं अब उनसे भी बढ़कर
निर्लज्ज हो जाऊँ ?
सूचना-नायिका ने बात करते सुना है अतः मध्यममान। जिससे बात
हुई है उसी से बातें हो रही हैं, अतः 'प्रकाश' है।
अलंकार-लोकोक्ति ।
अथ प्रिय को मध्यममान-लक्षण- (दोहा)
(३५६) जहाँ न मानै मानिनी, हारै पिय जु मनाइ ।
उपजत मध्यम मान तहँ, प्रीतम के उर आइ ।१८।
शब्दार्थ-मनाइ हारै = मनाते मनाते थक जाय ।
श्रीकृष्णजू को प्रच्छन्न मध्यममान, यथा- (कवित्त)
(३५७) बार बार बरजी मैं सारस सरस मुखी,
आरसी लै देखि मुख आरस में बोरिहैं ।
सोभा के निहोरे तें निहारति न नेंकहूँ तूँ,
हारी हैं निहोरि सब कहा काहू खोरि हैं ।
सुख को निहोरो जु न मान्यो सो भली करी तैं,
कैसोदास की सौं तोहि जौ तूँ मुँह मोरिहै ।
नाह के निहोरें किन मानहि निहोरति हौं,
नेह के निहोरें फिर मोहीं जु निहोरिहै ।१९।
शब्दार्थ-बरजी = मना किया । सारस = कमल । सरस = रसीला,
रसमय । आरसी = दर्पण । आरस में बोरिहै = आलस्य में डुबो देगी, मलिन
कर देगी । निहोरे = कारण, बहाने । खोरि = दोष, अपराध, त्रुटि । सौं =
सौगंध, शपथ । मुख मोरिहै = विमुख या प्रतिकूल होगी । किन = क्यों नहीं ।
निहोरति हौं = मनाती हूँ । निहोरें = विवश करने पर ।
भावार्थ- (सखी ने मान करते समय नायिका को समझाया था कि
मान मत कर तुझे पीछे पछताना पड़ेगा। पर उसने मान किया, नायक के
१८-पिय जु-पीउ । १९-आरस-या रस । तें-तौ, त्यों । जु-जो ।
तैं-न, ब । कैसोदास-केसोराय । ताहि-अब । मुहँ-मुख, मन । किन-किहि ।
मानहि-मानति । मोही-मोहू । जु-तू ।

१६४ रसिकप्रिया
मनाने पर भी मान नहीं छोड़ा। जब प्रिय भी उसके न मानने पर मान कर
बैठा तब नायिका नायक को मना लाने के लिए उसी अंतरंग सखी को भेजने
लगी । उस समय सखी ने नायिका से कहा कि मैंने पहले ही कहा था कि तुझे
ऐसा करना पड़ेगा । सखी नायिका से ही कह रही है कि मैंने पहले तुझसे
ऐसा कहा था न ! ) हे कमल से सरस मुखवाली, मैंने बारंबार मना किया था
कि मान मत कर, दर्पण लेकर अपना मुख देख ले, तेरा ऐसा सुंदर मुख मुरझा
जायगा । शोभा के निहोरे से भी तू ठीक ठीक देखती नहीं है । ( अर्थात् जब
यह कहा जाता है कि ऐसा सुंदर मुख क्रोध से लाल पीला करने योग्य नहीं है
तब भी तू भौंहें सीधी नहीं करती है ) । सब सखियां मनाकर हार गईं, अब
किसी का क्या दोष है । सुख का भी निहोरा तुझे दिया गया था कि मान
करने से तुझे सुख न रह जायगा पर उसे भी तूने नहीं माना। यह तूने अच्छा
ही किया । क्योंकि मैं जानती थी कि यदि तू सुख से भी मुख मोड़ लेगी तो
मुझसे कभी न कभी नायक को मनाने का आग्रह करना ही पड़ेगा। (मैंने कहा
न था कि) मैं प्रार्थना करती हूँ प्रिय के मनाने पर मान जा नहीं तो प्रेम के
विवश करने पर तू मुझे ही निहोरेगी (नायक को मना लाने का आग्रह करेगी)।
सूचना—(१) श्रीकृष्ण मनाकर हार गए हैं, इसलिए मध्यममान है ।
अंतरंग सखी ही जानती है इसलिए प्रच्छन्न है । (२) यह छंद 'कविप्रिया' में
'मान विरह' के उदाहरण में दिया गया है ( कविप्रिया, ८/४० )
श्रीकृष्णजू को प्रकाश मध्यममान, यथा—( सवैया )
(३५८) मानहि मान तें मानिनि केसव मानस तैं कछु मान टरैगो।
मान रहै सु जु मानै नहीं परिमान नखें अभिमान भरैगो ।
हैहै सहेली समान तबै जब सौतिन में अपमान करैगो ।
आपु मनावत मानहि री, बहुरयो जु मनावन तोहि परैगो ।२०।
शब्दार्थ—मानस=मनुष्य । परिमान नखें = सीमा का उल्लंघन करने पर ।
भावार्थ—(बहिरंग सखी की उक्ति नायिका से) हे सखी, मानवती नायिका
आदर करने से मानती है (यदि ऐसा नहीं है तो) क्या किसी मनुष्य के हटाने
से कहीं मान हट सकता है ? जो मनाने पर मानता नहीं उसके हाथ मान ही
मान रह जाता है । सीमा के पार जाने पर तो स्वयम् नायक भी अभिमान
( आत्मसंमान ) से भर उठता है ( वह भी चिढ़ जाता है ) । फिर जब वह
सौतों में (तुम्हारा) अनादर करने लगेगा तो सखी के ही समान रह जाओगी ।
( मैंने पहले ही कहा था कि ) स्वयम् प्रिय मना रहा है मान जाओ, नहीं
तो उलटे तुम्हीं को मनाना पड़ेगा ।
२०—टरैगो-हरैगो । रहै-है री । मानै-मानौ । ह्रैहैं-हैहौ ।

दशम प्रभाव १६५
सूचना—यहां भी प्रकरण पिछले छंद की ही भाँति है। सखी बहिरंग
है अतः 'प्रकाश' मान है।
(दोहा)
(३५६) राधा राधा-रमन के, बरने मान समान ।
तिनको मान मनाइबो, कहियत सुनौ सुजान ।२१।
इति श्रीमन्महाराजकुमारइंद्रजीतविरचितायां रसिकप्रियायां विप्रलंभशृंगार
मानवर्णनं नाम नवमः प्रभावः । ९।
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दशम प्रभाव
अथ मानमोचन-लक्षण—(दोहा)
(३६०) मान तजहिं प्रीतम प्रिया, कहि केसव करि प्रीति ।
बरनि सुनाऊँ सुनहु सब, मैं जु सुनी षट रीति ।१।
भावार्थ—नायक और नायिका प्रेमपूर्वक मिलकर मान त्याग देते हैं ।
इसके छह प्रकार हैं।
(३६१) साम दान भनि भेद पुनि, प्रनति उपेच्छा मानि ।
पुनि प्रसंगबिध्वंस अरु, दंड होइ रस-हानि ।२।
भावार्थ—वे छह प्रकार ये हैं—साम, दान, भेद, प्रणति, उपेक्षा और
प्रसंगविध्वंस । दंड में रस नहीं रह जाता इसलिए वह वर्जित है।
अथ साम-लक्षण—(दोहा)
(३६२) ज्यों क्योंहूँ मन मोहियै, छूटि जाइ जहँ मान ।
सोई साम उपाय कहि, केसवदास बखान ।३।
शब्दार्थ—ज्यों० = जिस किसी प्रकार से ।
श्रीराधिकाजू को साम उपाय, यथा—(सवैया)
(३६३) केसवदास सदा कियै आस रहै सुख की दुख ताहि न दीजै ।
ताहू सों रोष न मानियै मानिनि भूलिहुँ आपनो मानि सु लीजै।
हौँ तुम्हीं तुम हौँ सुनि सुंदरि मूरति द्वै जिय एकहीं जीजै ।
मान है भेद को मूल महा अपने सहुँ सो सपनेहुँ न कीजै । ४।
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२१—बरने मान समान-कहे जथामति मान । सुनौ-सुनहु ।
१-तजहि-तजें । सुनहु०-सो सबै । २-दान०-दामअरु । पुनि-अरु, औरु।
अरु-पुनि। होइ-होहि । ३—क्योंहूँ-त्यों करि । छूटि-मूलि । कहि-कबि ।
४—ताहू-केहूँ । भूलिहुँ-भुलि सु । सु-जु । हौँ तुम्हीं०-वै तुम ही तुम वै ।
अपने०-अपनेहुँन सों । सपनेहुँ न-सपने नहिं ।

१६६ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—हौं = मैं। हौं तुमहीं तुम हौं = मैं तुम हूँ और तुम मैं। अपने
सहुँ = अपनों से।
भावार्थ—(नायक की उक्ति नायिका से) जो किसी से सदा सुख की
आशा किए रहे उसे दुख नहीं देना चाहिए। जिसे भूल से भी अपना मान
लिया गया हो उस पर भी रोष नहीं करना चाहिए। मैं तुम हूँ और तुम मैं
हो (दोनों में कोई भेद नहीं है) हे सुंदरी, मूर्तियाँ (शरीर) दो हैं पर
(हम दोनों में) प्राण एक ही है, जिससे जी रहे हैं। (इस प्रकार अभेद
होने पर मान ठीक नहीं, क्योंकि) मान भेद की जड़ है, इसलिए अपनों से
(जिनसे एकत्व की भावना है) स्वप्न में भी मान नहीं करना चाहिए।
सूचना—नायक ज्ञान और व्यवहार की बातों से समझा रहा है। अतः
मानमोचन का यह साम उपाय है।
अलंकार—काव्यलिंग (एकत्व की युक्ति द्वारा समर्थन करने से)।
श्रीकृष्णजू को साम उपाय, यथा—(सवैया)
(३६४) कहि आवति है जौ कहावत हौ तुम, नाहीं तौ ताकि सकै हम सौंहीं।
तिहिं पैंडें कहा चलियै कबहुँ जिहिं काँटो लगै पग पोर दुखौंहीं।
प्रोति कुम्हड़े की जैहै जई सम, होति तुम्हें अँगुरी पसरौंहीं।
कीजै कछू यह जानिकै केसव हौं तुमहीं तुम तौ हरि हौहीं। ५।
शब्दार्थ—सौंहीं = सामने। पेंडें = मार्ग पर। दुखौंहीं = दुख देनेवाली।
कुम्हड़े की जई = कुम्हड़े की बतिया। सम = तरह, भाँति। पसरौहीं = पसारने,
दिखलाने से।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक से) हे हरि, आप कहलाते हैं
इसीलिए लोगों को कहना पड़ता है, नहीं तो किसकी मजाल है कि हम लोगों
की ओर ताक भी सके। मेरे विचार से क्या कभी ऐसे मार्ग से चलना चाहिए
जिसमें एक तो पैर में काँटा गड़े और दूसरे पैरों को पीड़ा का भी दुख झेलना
पड़े। लोग जब तुम्हारी ओर उँगली उठाने लगेंगे (तुम्हारी बदनामी करने
लगेंगे) तब तो प्रीति की वैसी ही दशा हो जायगी जैसी कुम्हड़े की बतिया को
उँगली दिखाने से होती है (प्रेम नष्ट हो जायगा)। इसलिए आपको समझ
बूझकर कोई काम करना चाहिए। मैं आप ही हूँ और आप मैं ही हैं (मुझमें
और आपमें अभेद है)।
सूचना—सरदार ने 'छूटि जाइ मान' का ध्यान रखकर ऊपर के दोनों
छंदों के चतुर्थ चरणों के उत्तरांश को मान करनेवाले की उक्ति माना है।
५—जौ-जु। दुखौंहीं-दुखोंहीं, पिरोहीं। जैहै-ह्वैहै, जैसे। सम-हरि।

· दशम प्रभाव १६७
अथ दान उपाय-लक्षण—( दोहा )
(३६५) केसव कौनहुँ ब्याज-मिस, दै जु छुटावै मान ।
बचन-रचन मोहै मनहिं, तासों कहिये दान ।६।
शब्दार्थ—ब्याज = बहाने से। मिस = बहाना। बचन-रचन = वचनों की
रचना से, मीठी बातों से । 'ब्याज-मिस' 'सदासर्वदा' की भाँति द्विरुक्ति है ।
(३६६) जहाँ लोभ तें दान लै, छाँडै मानिनि मान ।
बारबधू के लच्छनहिं, पावै तबहि प्रमान ।७।
सूचना—पहले दोहे में कहा गया है कि जहाँ किसी बहाने से कुछ देकर
मान छुड़ाया जाय और मीठी बातों से मन मोहा जाय वहाँ दान उपाय होता
है । गणिका भी द्रव्य लेती है। इससे दान का उपाय गणिका में ही संभव जान
पड़ता है । अतः दोनों का अंतर स्पष्ट करने के लिए दूसरा दोहा लिखा गया
है । जहाँ मानिनी के हृदय में लोभ हो वहाँ गणिका और जहाँ उसके हृदय
में द्रव्य-लोभ न हो वहाँ ( दान उपाय में ) गणिका नहीं समझनी चाहिए ।
गणिका में द्रव्य का लोभ होता है। दान उपाय में धन ही नहीं अन्य वस्तुएँ
भी दी जाती हैं ।
श्रीराधिकाजू को दान उपाय, यथा—(कबित्त)
(३६७) कोमल अमल दल दीने हे कमल-भव,
करुन अरुन प्रभुजू कौं सुखदाइयै ।
केसौदास सोभाधर सधर सुधा के धर,
मधुर अधर उपमा तौ इनि पाइयै ।
उरज-मलय-सैल-सील सम सुनि देखि,
अलक-बलित-ब्याल आसा उरझाइयै ।
निपट निगंध यह हार बंधुजीव को सु,
चाहत सुगंध भयो नेक ग्रीव नाइयै ।८।
शब्दार्थ—दल = पत्र । कमल-भव = ब्रह्मा । करुन = ( अरुण ) लाल ।
करुन प्रभु = सूर्य भगवान् । सधर = ऊपर का ओठ । अधर = नीचे का ओठ ।
सैल = ( शैल ) पर्वत । बलित = युक्त । ब्याल = सर्प । बंधुजीव = फूल-
दुपहरिया । नेक = थोड़ा । ग्रीव = कंठ में ।
भावार्थ—( नायिका ने मान किया है, नायक ने सखी के द्वारा फूल-
दुपहरिया की माला भेजी है, सखी नायिका से कह रही है ) हे सखी, इसकी
पंखुड़ियाँ ब्रह्मा ने कोमल और स्वच्छ बनाई हैं। इसका रंग लाल है और यह
६—मिस-कछु । छुटावै-छुड़ावै । मनहि-मनै । तासों-ताकों । कहियै-
कहियत । ७—लै-तें । तबहिं-तहाँ । ८—दीने-दीन्हें, कीन्हें । सधर०-अधर,
सुधर । धर-घर । उरझाइयै-उर लाइए, उर आइए, उर धाइय ।

१६८ रसिकप्रिया
सूर्य्य भगवान् को परम प्रिय है। शोभा को धारण करनेवाले सधर और अमृत
को धारण करनेवाले मधुर अधर की समता भी इसी से दी जाती है। पर
इसमें सुगंध नहीं है, अतः तेरे सर्प रूपी केशों से आच्छादित कुच रूपी मलय-
गिरि को देख सुनकर इसका हृदय (सुगंधित हो जाने की) आशा में उलझ
जाता है। अतः यह बंधुजीव का निर्गंध हार सुगंधित होना चाहता है, जरा
इसे अपनी गर्दन में डाल तो लो।
अलंकार—रूपक ।
अन्यच्च, यथा—( सवैया )
(३६८) मत्तगयंदनि साथ सदा इनि थावर जंगम जंतु बिदारयो ।
ता दिन तें कहि केसव बंधन बेधन कै बहुधा बिधि मारयो ।
सो अपराध सुधारन सोधि यहै इनि साधन साधु बिचारयो ।
पावन-पुंज तिहारो हियो यह चाहत है अब हार बिहारयो ।६।
शब्दार्थ—मत्तगयंदनि = मतवाले हाथियों के । इनि = इस (गजमुक्ता-
हार ने)। थावर = स्थावर, अचर । जंगम = चर । जंतु = जीव । बंधन
कै = बंधन में डालकर, गुहकर, पिरोकर । बेधन कै = बेधों (छेदों) से ।
बहुधा = अनेक प्रकार से । बिधि = ब्रह्मा । सुधारन = शुद्धि के लिए । सोध =
(शोध) परिष्कार । साधन = उपाय । साधु = ठीक, अच्छा ।
भावार्थ—(मानवती नायिका के पास नायक ने गजमुक्ताओं की माला
भेजी है, सखी उससे कह रही है) इसने (अर्थात् इस हार के मोतियों ने)
मतवाले हाथियों (के मस्तक) के साथ रहकर सदा (पहले बराबर) चर
और अचर जीवों का नाश किया । उस दोष के कारण ब्रह्मा ने इसे बिंधवा-
कर और बँधवाकर (छेद करवाकर और पिरोकर) अनेक प्रकार के कष्ट
दिए । उस दोष की शांति के लिए इसने अब यही उचित उपाय विचारा है
कि तेरे हृदय में, जो पवित्रता का आगार है, यह विहार करे (जिससे इसके
पाप का नाश हो जाय—तू इस माला को गले में पहन ले)।
सूचना—स्तनों की उपमा शंभु से दी जाती है, सखी का लक्ष्य 'पावन-
पुंज हियो' से उसी ओर है।
श्रीकृष्णजू को दान उपाय, यथा-(कवित्त)
(३६६) हँसति हँसति आई आनि इक गाथा गाई,
कहहु कन्हाई याको भाउ समझाइकै ।
पीवैं क्यों अधर-मधु दंपति एक ही बार,
रदन करज थल दीजहि बताइकै ।
६—सोध०-काज यहै सब साधन मंत्र बिचारे । हियो—हिये ।

दशम प्रभाव १६६
यह परिरंभन कहावै कौन केसोदास,
मेरी सौं जौ मोसों तुम राखहु दुराइकै ।
राधिका की अधिकाई कहा कहौं लीनो आजु,
आपनो पियारो पीउ आपुहीं मनाइकै ॥१०॥
शब्दार्थ—गाथा = प्राकृत भाषा का मात्रिक छंद । भाउ = भाव,
तात्पर्य । रदन थल = दंताघात का स्थान । करज = नख । करज थल = नख-
क्षत का स्थान । परिरंभन = आलिंगन । अधिकाई = विशेषता ।
भावार्थ—(सखी की उक्ति सखी से) श्रीकृष्ण के मान करने की बात सुन-
कर राधिका हँसती हँसती आईं और आकर श्रीकृष्ण को एक गाथा सुनाई। सुना-
कर उन्होंने पूछा कि 'इसका तात्पर्य तो मुझको समझा दीजिए । (इसमें दंपति
के एक साथ ही अधरपान की जो बात कही गई है वह) कैसे संभव है कि प्रिय
और प्रेमिका परस्पर एक दूसरे का अधर-मधु-पान करें (दंत एवम् नखक्षत की
बात जो कही गई है वह) दंतक्षत एवम् नखक्षत करने का स्थान कौन सा है ?
इस प्रकार (स्वयम् आलिंगन करती हुई) आलिंगन करने की बात जो इसमें
कही गई है वह कौन सा आलिंगन कहलाता है ? तुम्हें मेरी शपथ अगर
मुझसे कोई बात छिपा रखो ।' राधिका की विशेषता तो देख, उसने स्वयम् ही
आज अपने प्यारे पति को मना लिया (हम लोगों की आवश्यकता ही न पड़ी) ।
सूचना—'यह परिरंभन कहावै कौन' कहती हुई नायिका ने आलिंगन-
दान किया है । यही दान उपाय है ।
अलंकार—पर्यायोक्ति ( छल से कार्यसिद्धि ) ।
अथ भेद-लक्षण—( दोहा )
(३७०) सुख दै कै सब सखिनि कहँ, आपु लेइ अपनाइ ।
तब सु छुड़ावै मान कों, बरनौ भेद बनाइ ॥११॥
भावार्थ—जहां सखियों को अपनी ओर मिला लिया जाय और वे ही
मान'छुड़ाएँ, वहाँ भेद उपाय होता है ।
श्रीराधिकाजू को भेद उपाय, यथा—( सवैया )
(३७१) केसव धाइ खवासिनि तोहि सखी सकुचैं सब आपनी घातैं ।
मोहिं तौ माई कहेहीं बनै अब बाँधि दई बिधि तो कहँ तातैं ।
नेक हरें हरें बोलि बताइ ल्यौं हौं डरपौं गड़ि जाइ न जातैं ।
माखन सो मेरे मोहन को मन काठ सी तेरी कठेठो ये बातैं ॥१२॥
१०—गाथा-गाहा । कहहु-कहो धौं । एक हों-पु एकै । रदन०-उरज
करज । दीजहि-दीजै जू । केसोदास-केसोराय । राखहु-राखि हौ । ११—
सु छुड़ावै०-जु मनावै मानिनिहि । छुड़ावै-छिड़ावै । बनाइ-सुनाइ । १२—
तो-ती । जातैं-पातैं ।

२०० रसिकप्रिया
शब्दार्थ—धाइ = धात्री । खवासिनि = दहेज में वधू के साथ आने-
वाली लौंडी । अपनी घातैं = अपने स्वार्थ से । माई = हे सखी । तातैं = इस
कारण । नेक = जरा । हरैं हरैं बोलि = धीरे से बोलो । बलाइ ल्यों = बलैया
लेती हूँ । डरपों = डरती हूँ । जातैं = जिससे, इससे । माखन सो = मक्खन
की भाँति ( मृदु ) । कठेठी = कठोर ।
भावार्थ—( नायक ने सखी को अपनी ओर मिला लिया है, वह नायिका
से कह रही है ) हे सखी, धाय और दासी सब अपनी गाँ से तुझे सकुचती हैं ।
पर मुझे तो कहना ही पड़ता है (कहाँ तक संकोच करूँ)। ब्रह्मा ने मुझे तेरे साथ
बांध दिया है, इसीलिए (नहीं तो मुझे क्या पड़ी थी)। मैं तेरी बलैया लेती हूँ,
थोड़ा धीरे धीरे बोल, मुझे डर लगता है कि मेरे मोहन का मन मक्खन की तरह
मृदु है और तेरी बातें काठ की तरह कठोर हैं—कहीं ये उसमें गड़ न जाएँ ।
अलंकार—धर्मलुप्तोपमा ( माखन सो मेरे मोहन को मन ), पूर्णोपमा
( काठ सी तेरी कठेठी बातें), विषम ( कहाँ मृदु मन कहाँ काठ सी बातें ) ।
श्रीकृष्णजू को भेद उपाय, यथा—( सवैया )
( ३७२) काहूँ कह्यो 'हरि रूठि रहे' तब तें बहु बुद्धि बितर्क बढ़ावै ।
सोधि सबै अपनो सो रही धन मीत रहैं सु उपाय न पावै ।
हाँ वह रीति इहाँ यह केसव ज्यों दुहुँ ओर जरे कों जरावै ।
बूझति हौं पिय प्यारी तिहारी सु मान करै कि मनावन आवै ।१३।
शब्दार्थ—सोधि रही = विचार करके थक गई । मीत = (मित्र) प्रिय ।
भावार्थ—( नायिका ने सखी को अपनी ओर मिला लिया है । वह
नायक से कह रही है ) किसी ने कहीं कह दिया कि श्रीकृष्ण रूठे हुए हैं ।
जब से ऐसा सुना तभी से वह अपनी बुद्धि में अनेक प्रकार के तर्क-वितर्क कर
रही हैं। अपनी वाली सब कुछ कर धरकर वह थक गई । 'धन भी रहे और
मित्र भी न जाय' ऐसा कोई उपाय उसे दिखाई नहीं देता । वह तो यहाँ
दशा है और यहाँ यह कि आप मान किए बैठे हैं आप भी उसे कष्ट दे रहे हैं
(औरों ने वह कथा सुनाकर कष्ट दिया ) । उस बेचारी की तो वही दशा है
कि दोनो ओर से जल रही है ( उसे इस स्थिति से निकालनेवाला कौन है) ।
इससे मैं आप ही से पूछती हूँ कि वह ऐसी हालत में स्वयम् मान करे या आप
को मनाने के लिए यहाँ दौड़ी आए ?
अलंकार—लोकोक्ति ।
१३—बहु-यह । रहै-मिलै । सु-सो । ज्यों-जौ । कों-को । जरावै-
जुड़ावै । बूझति-पूछति ।

दशम प्रभाव २०१
अथ प्रणति-लक्षण-( दोहा )
((३७३) अति हित तें अति काम तें, अति अपराधहिं जानि ।
पाइ परै प्रीतम प्रिया, ताकों प्रनति बखानि ।१४।
भावार्थ—अत्यंत प्रेम, अत्यंत काम-वासना अथवा अत्यंत अपराध के
कारण जहाँ प्रिय प्रिया के पैरों पड़े वहाँ प्रणति से मानमोचन होता है ।
श्रीराधिकाजू की प्रेम तें प्रणति, यथा-( सवैया )
(३७४) तैं चितयो जु न सूधे तऊ जऊ प्रेम ककै पिय पाउ गह्यो हो ।
मोहिं बिलोकि बिलोकि अलीन, अलोक अलोक प्रंबाह बह्यो हो ।
बूझति हौं सखी सीस दियेँ तिनु और सबै हिय हेतु रह्यो हो ।
कान्हहि आएँ मनावन तोसों में मान किधौँ अपमान कह्यो हो।१५
शब्दार्थ—सूधे = सीधे । तऊ = तदपि, तो भी । जऊ = यद्यपि । बिलोकि
= देखो । अलीन = सखियों को । अलीक=कलंक, बदनामी । .बूझति हौं = मैं
पूछती हूँ । सीस दियेँ तिनु = ( मुहावरा ) सिर पर तिनका धरकर, नम्रता-
पूर्वक, अत्यंत दीनता से ।
भावार्थ— ( सखी की उक्ति नायिका प्रति ) हे सखी, विचार तो !
तूने यद्यपि सीधे नहीं देखा, फिर भी नायक ने अत्यंत प्रेम दिखा दिखाकर तेरे
पैर पकड़े । और नहीं तो मेरा मुँह देख और इन सखियों को ( इनका ही
मुँह ) देख ( और मान करना छोड़ दे ) । बदनामी का कैसा झूठा प्रवाह
फैला हुआ है । मैं सिर पर तिनका धरकर ( अपनी सत्यता और दीनता का
प्रमाण देकर ) तुझसे पूछती हूँ । हृदय के प्रेम की बातें तो तू जाने दे ( और
बातों की कोई गिनती नहीं ) पर यह तो बतला कि स्वयम् ( उलटे ) कृष्ण
ही तुझे मनाने आए हैं इसमें मान माना जाए या अपमान ?
श्रीराधिकाजू की अति काम तें प्रणति, यथा-(सवैया)
(३७५) बोलति नाहिं बुलाएँहुँ बोल कहा लगी मोहिं बकाएहीं मारन ।
सो परयो पाइनि बूझि सखी सब देति हैं ज्यों जुवती जिहि कारन ।
हठु छाँडिकै कंठ लगाइ उठाइ कहा लगी ऐंठि अकास निहारन ।
कौन भए नहिं द्वै दिन ए दिन तू ही लगी कछु ऊलट पारन ।१६।
१४-अपराधहिं-पराध तौं । १५-चितयो-चितई । जु न-नहिं । तऊ०-
जऊ तऊ । प्रेम-प्रीति । जऊ०-तजि प्रेम को प्रीतम । हो-है । बूझति-
पूछति । कान्हहि-कान्ह जु । १६-बोलति०-न बोलति आप । बकाएहीं-
बनाइयै । ऐंठि-बैठि, भेदि । कोने०-कानों भए नट द्वै दिन ये तिन तें हो लगी
कछु, कौनी भए नटि द्वै दिन ये तिन तें ही लगी, कोनु भयो दिन द्वै पै तुही कछु
लागी है ।

२०२ रसिकप्रिया
शब्दार्थ—बूझि = समझ, विचार । ज्यो-जी, प्राण । ऐंठि = अकड़कर ।
उलट पारना = उलटी ( बातें ) करना ।
भावार्थ—( सखी की उक्ति नायिका से) यदि तू स्वयम् नहीं बोलती है
तो बुलाने से तो बोल । क्या मुझे यों बका-बकाकर मार डालने पर लगी है ?
अच्छा, तू हीं विचार कि तेरा ऐसा नायक तेरे पैरों पड़ा जिसके लिए सब युवती
अपने प्राण देती हैं । हठ छोड़ दे और उठकर उन्हें गले लगा ले, तू अकड़-
कर आकाश क्या देखने लगी ? किसे ये दिन दूने नहीं लग रहे हैं—एक दिन
दो दिनों के समान हो गया है, तू कैसी उलटी बातें करने लगी है ।
सूचना—युवतियों के जी देने की बात कहने से लक्षित होता है कि
काम-प्रेरित प्रणति है ।
श्रीराधिकाजू की अति अपराध में प्रणति, यथा—( सवैया )
(३७६) केसवदास उदास भई दरसाइ दसा-दुख द्योस भरयो री ।
राति भए अधिरातकहू लौं बिनै बहु बंधुबधूनि करयो री ।
धाइ रही समुझाइ कछू न सखीनिहूँ के सिखए तें सरयो री ।
काहे तें मान्यौ न मानिनि तौलगि जौलगि पाइ न पीउ परयो री।१७।
शब्दार्थ—भरयो = बिताया । सरयो री = कुछ भी कार्य न सधा ।
भावार्थ—( रातभर सब लोग मनाते रहे पर नायिका ने मान न छोड़ा,
पर जब प्रिय ने पैर पकड़े तब उसने मान छोड़ दिया । सखी नायिका से
व्यंग्य कर रही है कि क्यों ऐसी क्या बात थी कि प्रिय के पैर पकड़ने पर ही
तूने मान छोड़ा ) हे सखी, तू अत्यंत उदास हो गई और दुख की दशा
दिखलाकर ( दुखी होकर किसी प्रकार ) तूने दिन बिताया । जब रात हुई
तो आधी रात तक देवरानी जिठानियों ने अनेक विनय की, फिर भी मान न
छूटा । धाय भी समझा बुझाकर थक गई, सखियों के सिखाने का भी कोई
फल न हुआ । ऐ मानिनी, तब तक तूने मान क्यों नहीं छोड़ा जब तक प्रियतम
पैरों नहीं पड़ा ?
सूचना—'प्रियतम के पैर पकड़ने पर मान जाना तथा और किसी के
मनाने से न मानना' यह बतलाता हैं कि नायक ने अपराध किया था ।
( दोहा )
(३७७) पियहि मनावै पाइ परि, प्रिया परम हित मानि ।
नापराध नहिं काम तें, बरनत ही रस-हानि ।१८।
भावार्थ—नायक के पैरों पड़ने में और नायिका के मान जाने में शुद्ध
प्रेम कहीं नहीं दिखाना चाहिए । उसमें अपराध अथवा काम की प्रेरणा होनी
१७—अधिरातकहू लौं—अधिरातक लों सु । सिखए तें—सिखए न । पीउ—
नाह । १८—नापराध—त्यों अपराधन, अति अपराधन, ना अपराधन ।