रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)
Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan
महाकवि केशवदास द्वारा
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शब्दार्थ—हौं = मैं। हौं तुमहीं तुम हौं = मैं तुम हूँ और तुम मैं। अपने
सहुँ = अपनों से।
भावार्थ—(नायक की उक्ति नायिका से) जो किसी से सदा सुख की
आशा किए रहे उसे दुख नहीं देना चाहिए। जिसे भूल से भी अपना मान
लिया गया हो उस पर भी रोष नहीं करना चाहिए। मैं तुम हूँ और तुम मैं
हो (दोनों में कोई भेद नहीं है) हे सुंदरी, मूर्तियाँ (शरीर) दो हैं पर
(हम दोनों में) प्राण एक ही है, जिससे जी रहे हैं। (इस प्रकार अभेद
होने पर मान ठीक नहीं, क्योंकि) मान भेद की जड़ है, इसलिए अपनों से
(जिनसे एकत्व की भावना है) स्वप्न में भी मान नहीं करना चाहिए।
सूचना—नायक ज्ञान और व्यवहार की बातों से समझा रहा है। अतः
मानमोचन का यह साम उपाय है।
अलंकार—काव्यलिंग (एकत्व की युक्ति द्वारा समर्थन करने से)।
श्रीकृष्णजू को साम उपाय, यथा—(सवैया)
(३६४) कहि आवति है जौ कहावत हौ तुम, नाहीं तौ ताकि सकै हम सौंहीं।
तिहिं पैंडें कहा चलियै कबहुँ जिहिं काँटो लगै पग पोर दुखौंहीं।
प्रोति कुम्हड़े की जैहै जई सम, होति तुम्हें अँगुरी पसरौंहीं।
कीजै कछू यह जानिकै केसव हौं तुमहीं तुम तौ हरि हौहीं। ५।
शब्दार्थ—सौंहीं = सामने। पेंडें = मार्ग पर। दुखौंहीं = दुख देनेवाली।
कुम्हड़े की जई = कुम्हड़े की बतिया। सम = तरह, भाँति। पसरौहीं = पसारने,
दिखलाने से।
भावार्थ—(नायिका की उक्ति नायक से) हे हरि, आप कहलाते हैं
इसीलिए लोगों को कहना पड़ता है, नहीं तो किसकी मजाल है कि हम लोगों
की ओर ताक भी सके। मेरे विचार से क्या कभी ऐसे मार्ग से चलना चाहिए
जिसमें एक तो पैर में काँटा गड़े और दूसरे पैरों को पीड़ा का भी दुख झेलना
पड़े। लोग जब तुम्हारी ओर उँगली उठाने लगेंगे (तुम्हारी बदनामी करने
लगेंगे) तब तो प्रीति की वैसी ही दशा हो जायगी जैसी कुम्हड़े की बतिया को
उँगली दिखाने से होती है (प्रेम नष्ट हो जायगा)। इसलिए आपको समझ
बूझकर कोई काम करना चाहिए। मैं आप ही हूँ और आप मैं ही हैं (मुझमें
और आपमें अभेद है)।
सूचना—सरदार ने 'छूटि जाइ मान' का ध्यान रखकर ऊपर के दोनों
छंदों के चतुर्थ चरणों के उत्तरांश को मान करनेवाले की उक्ति माना है।
५—जौ-जु। दुखौंहीं-दुखोंहीं, पिरोहीं। जैहै-ह्वैहै, जैसे। सम-हरि।