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सर्वकोश
रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

रसिकप्रिया (महाकवि केशवदास - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी व्याख्या, नायिका-भेद एवं शृंगार मनोविज्ञान)

Rasikapriya: Nayika Bheda, Shringara Rasa evam Saundarya Manovigyan

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished286 पृष्ठ

पृष्ठ 193, कुल 286 में से

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पृष्ठ 193

· दशम प्रभाव १६७
अथ दान उपाय-लक्षण—( दोहा )
(३६५) केसव कौनहुँ ब्याज-मिस, दै जु छुटावै मान ।
बचन-रचन मोहै मनहिं, तासों कहिये दान ।६।
शब्दार्थ—ब्याज = बहाने से। मिस = बहाना। बचन-रचन = वचनों की
रचना से, मीठी बातों से । 'ब्याज-मिस' 'सदासर्वदा' की भाँति द्विरुक्ति है ।
(३६६) जहाँ लोभ तें दान लै, छाँडै मानिनि मान ।
बारबधू के लच्छनहिं, पावै तबहि प्रमान ।७।
सूचना—पहले दोहे में कहा गया है कि जहाँ किसी बहाने से कुछ देकर
मान छुड़ाया जाय और मीठी बातों से मन मोहा जाय वहाँ दान उपाय होता
है । गणिका भी द्रव्य लेती है। इससे दान का उपाय गणिका में ही संभव जान
पड़ता है । अतः दोनों का अंतर स्पष्ट करने के लिए दूसरा दोहा लिखा गया
है । जहाँ मानिनी के हृदय में लोभ हो वहाँ गणिका और जहाँ उसके हृदय
में द्रव्य-लोभ न हो वहाँ ( दान उपाय में ) गणिका नहीं समझनी चाहिए ।
गणिका में द्रव्य का लोभ होता है। दान उपाय में धन ही नहीं अन्य वस्तुएँ
भी दी जाती हैं ।
श्रीराधिकाजू को दान उपाय, यथा—(कबित्त)
(३६७) कोमल अमल दल दीने हे कमल-भव,
करुन अरुन प्रभुजू कौं सुखदाइयै ।
केसौदास सोभाधर सधर सुधा के धर,
मधुर अधर उपमा तौ इनि पाइयै ।
उरज-मलय-सैल-सील सम सुनि देखि,
अलक-बलित-ब्याल आसा उरझाइयै ।
निपट निगंध यह हार बंधुजीव को सु,
चाहत सुगंध भयो नेक ग्रीव नाइयै ।८।
शब्दार्थ—दल = पत्र । कमल-भव = ब्रह्मा । करुन = ( अरुण ) लाल ।
करुन प्रभु = सूर्य भगवान् । सधर = ऊपर का ओठ । अधर = नीचे का ओठ ।
सैल = ( शैल ) पर्वत । बलित = युक्त । ब्याल = सर्प । बंधुजीव = फूल-
दुपहरिया । नेक = थोड़ा । ग्रीव = कंठ में ।
भावार्थ—( नायिका ने मान किया है, नायक ने सखी के द्वारा फूल-
दुपहरिया की माला भेजी है, सखी नायिका से कह रही है ) हे सखी, इसकी
पंखुड़ियाँ ब्रह्मा ने कोमल और स्वच्छ बनाई हैं। इसका रंग लाल है और यह
६—मिस-कछु । छुटावै-छुड़ावै । मनहि-मनै । तासों-ताकों । कहियै-
कहियत । ७—लै-तें । तबहिं-तहाँ । ८—दीने-दीन्हें, कीन्हें । सधर०-अधर,
सुधर । धर-घर । उरझाइयै-उर लाइए, उर आइए, उर धाइय ।