रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
( ८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
त्रिरात्रं धान्यराशिस्थं तत्ततो मर्दयेद्दृढम् ।
रजस्तद्वस्त्रगलितं नीरे तरति हंसवत् ॥
तीक्ष्णं मुण्डं कान्तलोहं निरुत्थं जायते मृतम्॥५१॥
शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध आमलासार गंधक दो भाग इन दोनोंके
बराबर उपरोक्त विधिसे शुद्ध किया लोह चूर्ण ले, पहिले पारे गंधकको
रगड़कर कजली करे फिर इसमें लोहचूर्ण मिला घीकुमारके रसमें दो
पहर रगड़कर गोला बनावे इस गोलेको तांबेके पात्रमें रख दो पहरकी
अग्नि देवे ( इस पात्रको चूल्हेपर चढ़ा कर नीचे दो पहर तीक्ष्ण
अग्नि जलावे । कोई इसको पुटमें फूंकना मानते हैं परन्तु मूलपाठसे
पुटमें फूंकनेका अर्थ नहीं निकलता, कोई कोई पुरुष तीक्ष्ण धूपमें दो
पहर रखना ऐसा अर्थ करते हैं, हमारी रायमें दो पहरकी अग्नि देना
ठीक है अथवा दो पहर घीकुमारमें रगड़कर पुट देना भी ठीक है )
फिर शीतल होनेपर पात्रमेंसे लोहचूर्णके गोलेको निकाल एरंडके पत्रोंसे
लपेट धान्योंकी राशिमें तीन दिन पर्यन्त दबाये रक्खे चौथे दिन
निकालकर खरलमें डाल बारीक चूर्ण करे और वस्त्रद्वारा छानकर
पानीपर तैरावे ( जबतक पानीपर तैरनेवाली उत्तम भस्म न बने तब-
तक इसी विधानसे पारे गंधकके संयोगसे गोला बनाकर दो प्रहरकी
अग्नि या पुट दे धान्यके ढेरमें दबाकर चूर्ण करता रहे, जब हंसके
समान तैरनेवाली होजाय तो शुद्ध भस्म जाने ) इस प्रकार तीक्ष्णलोह
वा मुण्डलोह, या कांतलोह इनमेंसे कोई भी लोह हो उसकी उत्तम
निरुत्थ भस्म होजाती है ॥ ४९-५१ ॥
द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णस्य मेलयेत् ।
कन्यानीरेण संमर्द्य यामयुग्मञ्च संपुटेत् ।
एवं सप्तपुटे मृत्युं लोहचूर्णमवाप्नुयात् ॥ ५२ ॥
अन्य प्रकार—शुद्ध लोहचूर्णमें बारहवां भाग सिंगरफ मिलाकर दो
पहर तक घीकुमारके रसमें खूब रगड़े फिर संपुटमें रख पुटमें फूंक दे
इसप्रकार सात पुटें देनेसे लोहेकी उत्तम भस्म होजाती है ॥ ५२ ॥
भाषाटीकासहित । ( ८९ )
निरुत्थ भस्मकी परीक्षा ।
सर्वमेतन्मृतं लोहं पक्तव्यं मित्रपञ्चकैः ।
यद्येवं स्यान्निरुत्थञ्च सेव्यं रक्तिचतुष्टयम् ॥ ५३ ॥
सब प्रकारके मृत लोहोंको मित्रपंचकमें मिलाकर कोयलोंकी
अग्निमें तपावे यदि इस प्रकार तीक्ष्णाग्नि देनेसे भस्म जैसी डाली थी
वैसाही रहे तो निरुत्थ भस्म जाने, निरुत्थ भस्म हो तो इसको चार
रत्ती मात्रा तक सेवन कर सकते हैं (यदि वही धातु जी जावे तो
उसे न खावे फिर पूर्ववत् पुटें देवे जब निरुत्थ हो जाये तो सेवन करे) ५३॥
मित्रपंचक ।
मधु सर्पिस्तथा गुञ्जा टंकणं गुग्गुलुस्तथा ।
मित्रपञ्चकमेतच्च गदितं धातुमेलने ॥ ५४ ॥
शहद, घी, रत्तकें, सुहागा और गुग्गुल इन पांच द्रव्योंको
मित्रपञ्चक कहते हैं, इस मित्रपञ्चकमें मिलाकर धमानेसे जो धातु
फूंकनेमें कच्ची रहगई हो वह जी उठती है अर्थात् फिर वैसी ही
बन जाती है ॥ ५४ ॥
अन्य प्रकारसे परीक्षा ।
गोघृतं गन्धकं लोहं तप्तखल्ले विमर्दयेत् ।
दिनैकं कन्यकाद्रावै रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ॥
इत्येवं सर्वलोहानां कर्त्तव्यं स्यान्निरुत्थितम् ॥५५॥
गोघृत, गंधक और लोहभस्म इनको घीकुमारके रससे तप्त खल्वमें
एक दिन मर्दन कर संपुटमें रख गजपुटमें फूंक दे । शीतल होनेपर
निकाले यदि निरुत्थ भस्म हो तो सेवन करे । इस प्रकार सब प्रकारके
लोहोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५५ ॥
घृतमधुगुञ्जाटंकणैःसमं लोहभस्म मर्दयेच्च विचक्षणः।
धमेद्बह्नौ पुनर्लोहं तदा योज्यं रसायने ॥ ५६ ॥
( ९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अन्य मत—घी, शहद, रत्तकें और सुहागा इनकी बराबर लोहभस्म
डालकर मर्दन करे फिर मूषामें या संपुटमें रख कोयलोंकी अग्निमें
धौंकनीसे धमावे यदि भस्म निरुत्थ रहे तो रसायनकर्ममें आयुवृद्धिके
लिये प्रयोग करे ॥ ५६ ॥
लोहभस्मके गुण ।
कृष्णायःशोथशूलार्शःक्रिमिपाण्डुत्वशोषनुत् ।
वयस्यं गुरु चक्षुष्यं सर्वमेदोऽनिलापहम् ॥५७॥
आयुःप्रदाता बलवीर्यकर्त्ता रोगापहर्त्ता मदनस्य
कर्त्ता । अयःसमानं नहि किञ्चिदस्ति रसायनं
श्रेष्ठतमं नराणाम् ॥ ५८ ॥
लोहभस्म-सूजन, शूल, अर्श, क्रिमिरोग, पाण्डुरोग और शोष
रोगको नष्ट करनेवाली है तथा अवस्थास्थापक, भारी, नेत्रोंको हितकारी,
सब प्रकारके मेदरोग और वातरोगोंको दूर करती है । एवं आयुको
देनेवाली, बलकारक, वीर्यवर्द्धक, रोगनाशक और कामशक्तिवर्द्धक है,
मनुष्योंके लिये लोहभस्मके समान और कोई भी रसायन उत्तम
नहीं है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
लोहसेवनमें कुपथ्य ।
कूष्माण्डं तिलतैलञ्च रसोनं राजिकां तथा ।
मद्यमम्लरसञ्चैव त्यजेल्लोहस्य सेवकः ॥ ५९ ॥
पेठा, तिलतेल, लहसुन, राई, मद्य और खट्टे रसवाले पदार्थ इन
सबको लोहभस्मको खानेवाला मनुष्य त्याग देवे ॥ ५९ ॥
जातिभेदसे लोहके गुणोंमें न्यूनाधिकता ।
सामान्याद्विगुणं क्रौञ्चं कालिङ्गोऽष्टगुणस्ततः ।
कलेः शतगुणं भद्रं भद्राद्वज्रं सहस्रधा ॥ ३६० ॥
भाषाटीकासहित । ( ९१ )
वज्राच्छतगुणं पाण्डि निरङ्गं दशभिर्गुणैः ।
ततः कोटिसहस्रैर्वा कान्तलोहं महागुणम् ॥ ६१ ॥
सामान्य लोहसे क्रौञ्चलोह गुणमें दोगुणा अधिक गुणकारी है ।
क्रौंचसे कालिंगलोह आठगुणा गुण करता है । कालिंगेसे भद्रलोह
सौगुणा गुणकारी है । भद्रसे वज्रलोह सहस्रगुणा, वज्रसे पाण्ड्य लोह
सौगुणा गुणमें अधिक है. एवं पाण्ड्य लोहसे दशगुणा निरंग और
निरंगसे भी सहस्रों करोडों गुणा अधिक गुणकारी कांतलोह होता है
इसलिये कांतलोह सब लोहोंमें महागुणकारी होता है ॥३६०॥६१॥
इति लोह मारण ।
मण्डूर शोधन ।
ये गुणा मारिते मुण्डे ते गुणा मुण्डकिट्टेके ।
तस्मात्सर्वत्र मण्डूरं रोगशान्त्यै प्रयोजयेत् ॥ ६२ ॥
जो गुण मारे हुए लोहमें होते हैं वही गुण लोहकिट्टमें भी होते हैं।
इसलिये लोहभस्मके अभावमें लोहकिट्ट ( मण्डूरकी ) भस्मका संपूर्ण
रोगोंकी शांतिके लिये प्रयोग करना चाहिये ॥ ६२ ॥
मण्डूरके गुण ।
शतोर्ध्वमुत्तमं किट्टं मध्यञ्चाशीतिवार्षिकम् ।
अधमं षष्टिवर्षीयं ततो हीनं विषोपमम् ॥ ६३ ॥
यदि १०० सौ वर्षका पुराना मण्डूर हो तो गुणमें उत्तम होता है ।
८० अस्सी वर्षका पुराना मण्डूर मध्यम होता है और साठ ६० वर्षका
पुराना अधम होता है, यदि साठ वर्षसे कम पुराना मण्डूर हो तो
वह विषके समान जानना, इसलिये अत्यंत पुराना मण्डूर लेकर
मारना चाहिये ॥ ६३ ॥
( ९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
मण्डूर मारण ।
दग्ध्वाक्षकाष्ठैर्मलमायसन्तु गोमूत्रनिर्वापितमष्ट-
वारान् । विचूर्ण्य लीढं मधुना चिरेण कुम्भाह्वयं
पाण्डुगदं निहन्ति ॥ ६४ ॥
लोहकिट्टको बहेड़ेकी लकड़ियोंकी अग्निमें तपा २ कर गोमूत्रमें
बुझावे, इस प्रकार आठ वार बुझानेसे मण्डूर मर जाता है, इसको पीसकर
शहदके साथ चाटनेसे कुम्भकामला और पाण्डुरोग दूर होते हैं ॥ ६४॥
गुणाधिक्य ।
किट्टाद्दशगुणं मुण्डं मुण्डात्तीक्ष्णं शताधिकम् ।
तीक्ष्णाल्लक्षगुणं कान्तं भक्षणात्कुरुते गुणम् ॥ ६५ ॥
मण्डूरसे मुण्डूरलोहभस्म दशगुणा गुण करती है । मुण्डलोहसे
तीक्ष्ण लोहभस्म सौगुणा अधिक गुण करती है। एवं कांतभस्मके खानेसे
तीक्ष्ण लोहभस्मसे लक्षगुणा अधिक गुण होता है ॥ ६५ ॥
इति किट्ट शोधनविधि ।
सुवर्णादि धातुओंके साधारण मारक द्रव्य ।
नागैः सुवर्णं रजतञ्च ताप्यैर्गन्धेन ताम्रं शिलया
च नागम् । तालेन वङ्गं त्रिविधञ्च लोहं नारीपयो
हन्ति च हिङ्गुलेन ॥ ६६ ॥
नाग ( सिक्का ) के संयोगसे पुटें देनेसे सुवर्णकी भस्म होजाती है ।
सोनामाक्खीसे चांदीकी भस्म होजाती है । गंधकके संग पुटें देनेसे
ताम्बेकी भस्म होजाती है । मनसिलके साथ पुटें देनेसे सिक्केकी भस्म
होजाती है, एवं हरितालसे वंगकी भस्म होजाती है और सिंगरफ
तथा स्त्रीका दूध मिलाकर पुटें देनेसे सब प्रकारके लोहोंकी भस्म
होजाती है । ( इन द्रव्योंमें रगड़ रगड़ कर पुटोंमें फूंकनेसे भस्म
होजाती है ) ॥ ६६ ॥
इति स्वर्णादि धातु शोधन मारण ।
भाषाटीकासहित । ( ९३ )
मणियुक्तादिरत्नशोधन मारण ।
स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे जयन्त्याः स्वरसेन च ।
मणिमुक्ताप्रवालानि यामैकेन च शोधयेत् ॥ ६७ ॥
मणियाँ, मोती और मूंगे इनमेंसे जिसको शुद्ध करना हो उसे वस्त्रमें
पोटली बांधकर जयंतीके स्वरसमें एक प्रहर दोलायंत्रकी विधिसे पकावे
तो मणि, मुक्ता और प्रवाल शुद्ध होजाते हैं ॥ ६७ ॥
मोतियोंका मारण ।
मुक्ताफलानि शुद्धानि खल्ले पिष्ट्वा पुटेल्लघु ।
एवं भस्मत्वमाप्नोति वज्रकं काञ्जियोगतः ॥ ६८ ॥
शुद्ध मोती लेकर खरलमें पीसकर लघुपुटमें फूंक दे तो मोतियोंकी
भस्म होजाती है । यदि वज्रकी भस्म करनी हो तो कांजीके संयोगसे
करे अर्थात् वज्रको शुद्ध करके तपा तपा कर कांजीमें बुझावे, फिर
कांजीमें पीसकर पुट देनेसे वज्र ( हीरा ) की भस्म होजाती है ॥६८॥
अन्य प्रकारसे रत्नमारण ।
कुमार्या तण्डुलीयेन तुल्येन च निषेचयेत् ।
प्रत्येकं सप्तवारांश्च तप्ततप्तानि कृत्स्नशः ॥ ६९ ॥
मौक्तिकानि प्रवालानि तथा रत्नान्यशेषतः ।
क्षणाद्विविधवर्णानि म्रियन्ते नात्र संशयः ॥३७०॥
मोती, मूंगा या अन्य सब प्रकारके रत्न तीक्ष्णाग्निमें तपा २ कर
समभाग घीकुवारके रस तथा चौलाईके रसमें सात २ बार बुझानेसे
अवश्य मर जाते हैं । ( जिस रत्नकी भस्म करनी हो उसको अग्निमें
लाल कर बराबरके घीकुवारके रससे बुझावे, ऐसे सात बार घीकुवारके
रससे और सात बार चौलाईके रससे बुझावे तो मोती आदि सब
रत्नोंकी भस्म होजाती है ) ॥ ६९ ॥ ३७० ॥
( ९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
प्रवालमारण ।
स्त्रीदुग्धेन प्रवालञ्च भावयित्वा तु हण्डिके ।
मध्येऽपि तक्रसहितं स्थापयेत्तां निरोधयेत् ।
चूल्ह्यामग्निप्रतापेन म्रियते प्रहरद्वये ॥ ७१ ॥
प्रवाल (मूँगे) को स्त्रीके दूधमें भिगोकर सुखा ले फिर एक हांडीमें
नीचे ऊपर तक ( मट्ठा ) डालकर बीचमें मूँगा रख हांडीका मुख बंद
करके चूल्हेपर चढ़ा नीचे दो पहरकी तीक्ष्णाग्नि देवे तो मूँगोंकी भस्म
होजाती है ॥ ७१ ॥
सब रत्न और मणियोंका शोधन ।
कुलत्थस्य पलशतं वारिद्रोणेन पाचयेत् ।
तस्मिन्पादावशेषे च क्वाथेऽष्टौ मणयःशिलाः॥७२॥
आतपे त्रिदिनं शोध्याः क्वाथसिक्ताः पुनः पुनः ।
शुद्ध्यन्ते सर्वरत्नानि मणयश्च न संशयः॥ ७३ ॥
सौ पल कुलथीको एक द्रोण पानीमें पकावे चौथा भाग शेष
रहनेपर उतारकर छान ले, इस क्वाथसे मणि मुक्ता आदिको बार २
सेचन कर तीन दिन धूपमें रक्खे तो श्वेत, रक्त, नीलादि मणियाँ
मोती आदि रत्न और मनशिल यह सब शुद्ध हो जाते हैं इसमें
संशय नहीं । तात्पर्य्य यह हुआ कि, जिस रत्नको शोधन करना हो उसको
पात्रमें डाल धूपमें रक्खे और बार २ कुलथीके क्वाथसे सींचता रहे, इस
प्रकार तीन दिन धूपमें रखनेसे रत्न अवश्य शुद्ध होजायगा ॥७२--७३॥
इति मुक्तादि शोधन मारण ।
विषका शोधन मारण ।
कृत्वा चणकसंस्थानं गोमूत्रैर्भावयेत्त्र्यहम् ।
समटङ्कणसंपिष्टं मृतमित्युच्यते विषम् ॥ ७४ ॥
भाषाटीकासहित । (९५)
सिंगियाविष ( तेलिया मिट्टी या बच्छनाग ) लेकर उसके चणेके
समान छोटे २ टुकडे करे, इनको तीन दिन गोमूत्रमें भिगोकर रक्खे
चौथे दिन निकाल कर समभाग सुहागा डालकर पीस ले, जब सूख
जाये तो सिंगिये विषको मरा हुआ ( या शुद्ध ) जानना, यह औषधि-
योंमें मिलाने योग्य शुद्ध विष होजाता है ॥ ७४ ॥
अन्यप्रकारसे विषशोधन ।
अथवा त्रैफले क्वाथे विषं शुद्धयति पाचितम् ।
दोलायां त्रिफलाक्वाथे छागीक्षीरे च पाचितम्॥७५॥
त्रिफलेके क्वाथमें दोलायन्त्र द्वारा चार पहर पकानेसे भी विष शुद्ध
होजाता है । अथवा बकरीके दूधमें दोलायन्त्र द्वारा चार पहर पकावे
तो विष शुद्ध होजाता है ॥ ७५ ॥
गोमूत्रपूर्णपात्रे च दोलायन्त्रे विषं पचेत् ।
दशतोलकमानेन चादौ वैद्यो दिवानिशम् ॥ ७६ ॥
अथवा दश तोला विषके छोटे २ ठुकडे कर पोटलीमें बांध गोमू-
त्रसे भरे पात्रमें एक दिन रात दोलायन्त्रकी विधिसे पकावे, फिर निकाल
गर्म जलसे धोकर सुखा ले तो विष शुद्ध होजाता है ॥ ७६ ॥
विषभागाँश्चणकवत्स्थूलान्कृत्वा तु भाजने ।
तत्र गोमूत्रकं दत्त्वा प्रत्यहं नित्यनूतनम् ॥ ७७ ॥
शोषयेन्त्रिदिनादूर्ध्वं धृत्वा तीव्रातपे ततः ।
प्रयोगेषु प्रयुञ्जीत भागमानेन तद्विधम् ॥ ७८ ॥
अथवा विषको चनेके समान छोटा छोटा करके मट्टीके पात्रमें
रक्खे इसमें गोमूत्र डाल दे और एक दिन रक्खा रहने दे, दूसरे दिन
पहला गोमूत्र निकालकर फेंक दे और नवीन ( ताजा ) गोमूत्र उसमें
( ९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
डाल दे, इसप्रकार तीन दिन करे फिर निकालकर तीव्र धूपमें सुखा ले।
इसप्रकार शोधन किया विष जिस योगमें जितना डालना लिखा
हो उतना डाले ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ इति विष शोधन ॥
सात उपविष ।
अर्कस्सेहुण्डधत्तूरलाङ्गलीकरवीरकाः ।
गुञ्जाहिफेनावित्येताः सप्तोपविषजातयः ॥ ७९ ॥
आक, थोहर, धतूरा, लांगलीकंद, कनेर, गुंजा ( रत्तक ) और
अफीम यह सात उपविषोंकी जातियां हैं ॥ ७९ ॥
उपविष शोधन ।
धत्तूरस्य च यद्बीजमन्यच्चोपविषं च यत् ।
तच्छोध्यं दोलिकायन्त्रे क्षीरपूर्णेऽथ पात्रके ॥३८०
धतूरेके बीज या अन्य उपविष जो शोधन करना हो उसको
पोटलीमें बांध दुग्धयुक्त पात्रमें लटका दोलायन्त्रविधिसे पकावे तो
शुद्ध होजाते हैं ॥ ३८० ॥
जमालगोटेका शोधन ।
निस्तुषं जयपालश्च द्विधा कृत्वा विचक्षणः ।
एतद्बीजस्य मध्यन्तु पत्रवत्परिवर्जयेत् ॥ ८१ ॥
अष्टमांशेन चूर्णेन टङ्कणस्य च मेलयेत् ।
त्रिरात्रं गोमये क्षिप्त्वा पाच्यं दुग्धेन संप्लुतम् ।
एवं वै शुद्धिमायाति जैपालममृतोपमम् ॥ ८२ ॥
जमालगोटेके छिलके दूर कर उनकी गिरीकी दो दो दालसी काट-
कर अन्दरसे सफेद पत्ती ( जीभी ) दूर कर दे, फिर इनमें आठवां
भाग सुहागा मिलाकर पोटली बांध गायके गोबरमें डुबोकर रक्खे
तीन दिनके बाद निकाल कर गरम पानीसे धो डाले, फिर पोटलीमें
भाषाटीकासहित । ( ९७ )
बांध दोलायन्त्रविधिसे गोदूधमें पकावे फिर निकाल करके खरलमें
बारीक रगडे ( फिर इस कल्कको मिट्टीके ठीकरों या शरावोंपर लेप-
कर धूपमें सुखावे जिससे सब चिकनाई शराव शोषण कर ले फिर
शरावोंपरसे उतार ले ) यह जमालगोटे शुद्ध और अमृतके समान गुण
कारी होते हैं । जिस योगमें जमालगोटे डालने हों यह डालने
चाहिये ॥ ३८१ ॥ ३८२ ॥ इति जैपाल शुद्धि ॥
अन्य मतसे जैपालादि बीजोंका शोधन ।
मूलक्वाथैः कुमार्याश्च जैपालबीजशोधनम् ।
इन्द्रवारुणिकाक्वाथै राजवृक्षस्य बीजकम् ॥ ८३ ॥
समूलोत्तरवारुण्या धुस्तूरबीजशोधनम् ।
धात्रीफलरसेनैव पलाशबीजशोधनम् ॥ ८४ ॥
जमालगोटोंकी पत्ती निकाल पोटलीमें बांध घीकुवारकी जड़के
क्वाथमें पकावे तो शुद्ध होजाते हैं । अमलतासके बीज इन्द्रायणके
क्वाथमें शुद्ध होजाते हैं । ऐसे ही जडसहित इंद्रायणके काथमें धतू-
रेके बीज शुद्ध होजाते हैं । आमलेके रसकी भावना देनेसे ढाकके
बीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ८३ ॥ ८४ ॥
थोहरके दूधका शोधन ।
चिञ्चापत्ररसे कर्षे वस्त्रपूते पलद्वयम् ।
स्नुहीक्षीरं रौद्रयन्त्रे भावयेद्यत्नतः सुधीः ।
द्रवे शुष्के समुत्तार्य सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ ८५ ॥
इमलीके पत्रोंका स्वरस वस्त्रसे छना हुआ एक तोला, थोहरका
दूध दश तोला इन दोनोंको मिट्टीके कपालमें डाल अग्निपर चढ़ावे जब
थोहरके दूधका पतलापन दूर होकर दूध सूख जावे तो उतार ले । यह
दूध शुद्ध और विरेचक योगमें डालने योग्य होजाता है ॥ ८५ ॥
( ९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
जलौका ( जोंक ) शोधनविधि ।
चिरन्तनां जलौकान्तु ताम्रपात्रेषु रक्षयेत् ।
चतुर्माषं निशाचूर्णं जलाष्टकपले क्षिपेत् ॥ ८६ ॥
तस्मिन् क्षिपेज्जलौका च सा योज्या रक्तमोक्षणे८७
पुरानी जोंकोंको लेकर एक तांबेके पात्रमें रक्खो उस पात्रमें चार
मासे हलदीका चूर्ण और आठ पल जल डाल देवे इस पानीमें डॉली
हुई जोंकोंके मुखसे लार बहने लगती हैं । जब लारें निकल चुकें तो इन
जोंकोंको साफकर रक्त निकालनेके लिये लगाना चाहिये ( विशेष वर्णन
सुश्रुतसंहिताके तेरहवें अध्यायमें देखो ) ॥ ८६ ॥ ८७ ॥
त्याज्य जलौका ।
रोमपृष्ठा च कपिला रक्तरेखा च दुर्बला ।
वर्जनीया विशेषेण भिषजा कीर्तिमिच्छता ॥ ८८ ॥
यशकी इच्छावाले वैद्यको चाहिये कि रोमोंवाली जोंकें, कपिल
वर्णकी जोंकें, लाल लाल रेखावाली जोंकें और दुर्बल या रोगयुक्त,
विषैली जोंकें कभी न लगावे ॥ ८८ ॥ इति जलौकाविधि ॥
विधायरेके बीजोंका शोधन ।
बीजमादौ समादाय रौद्रयन्त्रे विशोषयेत् ।
ईषत्सैन्धवयुक्तेन द्रवेण यत्नतः सुधीः ॥
अपामार्गस्य वा तौयैर्वाद्धक्यबीजशोधनम् ॥ ८९ ॥
विधायरेके बीज लेकर उनमें सेंधानमकका थोड़ासा पानी डाल
मिट्टीके कपालमें अग्निपर मंद अग्निसे पकावे, पानी सूखनेपर बीजोंको
उतार ले यह शुद्ध जानने । अथवा अपामार्गके क्वाथमें पकानेसे भी
विधायरेके बीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ८९ ॥
भाषाटीकासहित । (९९)
वृद्धदारकबीजन्तु पक्वं दोलाकृतं पचेत् ।
दुग्धपूर्णेषु पत्रेषु ततः शुद्धयति निश्चितम् ॥ ३९० ॥
अथवा विधायरेके बीजोंको पोटलीमें बांध दूधसे भरे मिट्टीके पात्रमें
लटका दोलायन्त्रकी विधिसे पकावे तो एक प्रहरमें विधायरेके बीज
शुद्ध होजाते हैं ॥ ३९० ॥
अन्य बीजोंके शोधन ।
अपामार्गकषायेण निम्बुबीजं विशोधयेत् ।
शिग्रुकार्पासबीजानि अपामार्गस्य बीजकम् ॥ ९१ ॥
घर्मेण शोधनं तेषां न दद्यात्सैन्धवं ततः ।
तिक्ता कोषातकी दन्ती पटोली चेन्द्रवारुणी ।
कटुतुम्बी देवदाली काकतुण्डी च शोधयेत् ॥९२॥
अपामार्गके क्वाथमें स्वेदन करनेसे नींबूके बीज शुद्ध होजाते हैं ।
सुहाजनेके बीज, कपासके बीज और अपामार्गके बीज इनको प्रातःकाल
लेकर धूपमें सुखाना ही इनका शोधन है । इनमें नमकका पानी
डालकर शोधन करनेकी आवश्यकता नहीं । कुटकी, कड़वी
तोरी, दन्ती (जमालगोटेकी जड़), पटोलकी जड़, इन्द्रायण, कड़वी
तुम्बी, देवदाली (बंदालडोडा) और काकतुण्डी इनको धूपमें
सुखानेसे ही शुद्ध जानना अर्थात् इनको उचित ऋतुमें प्रातःकाल
लाकर धूपमें सुखाकर रक्खे जिस योगमें डालना हो डालकर प्रयोग
करे ॥ ९१ ॥ ९२ ॥
धात्रीफलरसेनैव महाकालस्य शोधनम् ।
करञ्जयुग्मयोर्बीजं भृंगराजेन शोधयेत् ॥ ९३ ॥
महाकाल (कालादाना) आमलोंके रसकी भावना देनेसे शुद्ध
होजाता है । दोनों प्रकारके करंजुएके बीजोंकी गिरीको भांगरेके रसमें
भावना देनेसे करंजबीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ९३ ॥
( १०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
गुञ्जादिबीजशोधन ।
गुञ्जादिसर्वबीजानां नरमूत्रैः पटुं विना ।
नारिकेलाम्बुना शोध्यं बिल्वं भल्लातकोद्भवम् ॥९४॥
रत्तक आदि विषैले बीज नमकके बिना ही मनुष्यके मूत्रमें भावना
देनेसे शुद्ध होजाते हैं। नारिकेलके जलमें बेलके बीज और भिलावेके
बीजोंको शोधन करना चाहिये ॥ ९४ ॥
गुग्गुलशोधन ।
गुडूचीत्रिफलाक्वाथे क्षीरे चैव विशेषतः ।
पक्त्वा च खण्डशः शुद्धं गृह्णीयान्मृदुगुग्गुलुम् ३९५॥
इति श्रीगोपालकृष्णसूरिविरचिते रसेन्द्रसारसंग्रहे
पूर्वखण्डः समाप्तः ।
उत्तम नवीन गुग्गुलके छोटे २ टुकड़े कर गिलोयके क्वाथमें,
त्रिफलेके क्वाथमें और गोदुग्धमें पकानेसे गुग्गुल शुद्ध होजाती है ।
( प्रथम गुग्गुलको टुकड़े २ कर गिलोय या त्रिफलेके क्वाथमें भिगोदे,
दूसरे दिन उबाल ले जब क्वाथमें गूगल घुल जावे तो वस्त्रमें छान ले
बाकी रहे गूगलको फिर क्वाथमें पकाकर छान ले, कंकड़ तिनका
आदि दूर फेंककर कड़ाहीमें क्वाथको खोयेके समान गाढ़ा कर
पिण्डसा बननेपर गुग्गुलको शुद्ध जाने यह गुग्गुल सब औषधि-
प्रयोगमें काम लेवे ) ॥ ३९५ ॥ इति गुग्गुल शोधन ॥
दोहा-रस धातु मणि आदिको, शोधन मारण भेद ॥
इहि विधि जानहिं जे भिषक्, हरहिं जगत्को खेद ॥
होहिं चतुर रसकर्ममें, पढ भाषा अनुवाद ॥
प्रथम खण्ड पूरित भयो,तिलकित रामप्रसाद ॥
इति श्रीपटियालाराज्यस्थवैद्यरत्न रामप्रसादराजवैद्यवैद्योपाध्यायकृत-
भाषाटीकायां पूर्वखण्डः समाप्तः ।
अथोत्तरखण्डः ।
क्षीराब्धेरुत्थितं देवं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम् ।
वन्दे धन्वन्तरिं भक्त्या नानागदनिषूदनम् ॥ १ ॥
जो क्षीर समुद्रके मथनेके समय पीत वस्त्रोंको धारण किये हुए
चतुर्भुज भगवान् प्रगट हुए और जो नाना रोगोंके नाश करनेवाले देव
हैं उन धन्वन्तरि भगवान्को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥
प्रायशो वपुषः शुद्धिं कृत्वा देयं तदौषधम् ।
अतः पूर्वं चिकित्सायां रेचकौषधमुच्यते ॥ २ ॥
प्रायः संपूर्ण रोगोंमें शरीरको शुद्ध करके तदनंतर औषधि देना
चाहिये । इसलिये संपूर्ण औषधियोंसे पहले रेचनी औषधियोंको
कथन करते हैं ॥ २ ॥
इच्छाभेदी रस ।
तुल्यं टङ्कणपारदं समरिचं तुल्यांशकं गन्धकं
विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् ।
गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचयेत्
यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च दध्योदनम्॥३॥
शुद्ध सुहागा, शुद्ध पारा, कालीमिर्च और शुद्ध गंधक यह सब एक
एक भाग लेवे । सोंठ दो भाग, शुद्ध जमालमोटा ९ भाग इन सबको
खरल करके शीशीमें रक्खे इसमेंसे एक रत्ती प्रमाण प्रातःकाल खाकर
ऊपरसे शीतल जल पीवे तो उत्तम रीतिसे रेचन ( दस्त ) होजाता
है । जबतक गरम जल न पीवे तबतक रेचन होता रहता है । ठीक
रेचन हो लेनेके अनंतर दहीभातका पथ्य खिलावे ॥ ३ ॥
( १०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
जैपालाष्टौ द्विको गन्धस्त्रिशुण्ठी मरिचं द्विकम् ।
एकः सूतः सोहागैका गुञ्जामात्रा वटी कृता ॥ ४ ॥
शूलव्याधिप्रभृतयः कुष्ठैकादशपित्तजाः ।
भगन्दरादिहृद्रोगाः सर्वे नश्यन्ति भक्षणात् ॥ ५ ॥
अन्य इच्छाभेदी-जमालगोटेका चूर्ण ८ भाग, गंधक दो भाग, सोंठ
तीन भाग, कालीमिर्च २ भाग, पारा १ भाग और सुहागा १ भाग
इन सब पदार्थोंको एकत्र कर जलके साथ मर्दन करके एक एक रत्तीकी
गोली बनालेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे विरेचन
होकर शरीर शुद्ध होजाता है तथा शूलादि रोग, कुष्ठ, ग्यारह प्रकारके
पित्तरोग, भगंदर और हृद्रोगादि समस्त रोग तत्काल नष्ट होजाते
हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥
गदमुरारि इच्छाभेदी ।
रसवलिगगनार्कं शुद्धतालं विषञ्च
त्रिफलत्रिकटुमेतट्टङ्कणं भृङ्गमेभिः ।
सममिह जयपालोद्भूतचूर्णं विमर्द्य
द्विनिशमनिशमेतद्भृङ्गराजोत्थवारि ॥ ६ ॥
भवति गदमुरारिः स्वेच्छया भेदकोऽयं
हरति सकलरोगान्सन्निपातानशेषान् ।
इह हि भवति पथ्यं मत्स्यमांसादि सर्वं
घृतविलुलितमस्मिन्भोजनं भूरि देयम् ॥ ७ ॥
पारा, गंधक, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, हरितालभस्म, विष, त्रिफला,
त्रिकुटा, सुहागा और दालचीनी यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग
और जमालगोटेका चूर्ण सब औषधियोंकी बराबर लेवे; इन सबको
एकत्र करके भांगरेके रसमें दो दिनतक निरंतर मर्दन करके
भाषाटीकासहित । ( १०३ )
एक एक रत्तीकी गोलियां बना लेवे । इसको गद्सुरारि इच्छाभेदी
रस कहते हैं । इस औषधिके सेवन करनेसे इच्छानुसार विरेचन होजाता
है । तथा सन्निपातादि समस्त रोग नष्ट होजाते हैं, इसपर विरेचन होजा-
नेके पश्चात् दहीभात पथ्य दे और रोगीको मत्स्य मांसादि सर्व पदार्थ
घृतमें भूनकरके भोजनके लिये दे सकते हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥
रुक्मिश रस ।
अभयाचूर्णमादाय नूतनैर्जयपालकैः ।
पञ्चमांशेन मिलितैः स्नुहीदुग्धेन मर्दिताः ॥ ८ ॥
गुडिकास्तस्य कर्तव्या वर्तुलाश्चणकप्रभाः ।
( एकैकस्यास्य टङ्कस्य रेचनैश्च रसैस्तदा ॥ ९ ॥ )
प्रथम उत्तम हरड़ोंका चूर्ण करके फिर उसमें पंचमांश नवीन
जमालगोटेका चूर्ण मिलाकर थूहरके दूधमें अच्छे प्रकारसे मर्दन
करके चनेकी बराबर गोली बांधे, इस रसको एक टंक तक रेचनरसोंके
अनुपानसे दे सकते हैं ॥ ८ ॥ ९ ॥
रुक्मिशो न च दाहः स्यान्न च मूर्च्छाभ्रमः क्लमः ।
वेगतः सारयेदेषा विशेषादामनाशिनी ॥ १० ॥
निरूहेन तथा नैव तथा बिन्दुघृतेन च ।
त्रिवृता न तथा रेच्या यथा स्याद्गुडिकोत्तमा ॥ ११॥
इस रुक्मिश रसके सेवन करनेसे दाह, मूर्छा, भ्रम, क्लम इत्यादि
कोई भी उपद्रव न होकर वेगपूर्वक दस्त होजाते हैं तथा आमदोष नष्ट
होजाता है । जिस प्रकार सुखपूर्वक इस औषधिके सेवन करनेसे
विरेचन होजाता है इस प्रकार निरूहण ( बस्तिकर्म ), बिन्दुघृत तथा
निशोथके चूर्ण आदि किसीसे विरेचन नहीं होता ॥ १० ॥ ११ ॥
अतिशुद्धं भवेदेवमतिप्रबलमुत्तमम् ।
अतिरूपमतिप्रौढमत्यायुष्करमुत्तमम् ॥ १२ ॥
( १०४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
विष्टम्भे गुडिका देया चोदरे दारुणामये ।
अधोदेशेषु सर्वेषु गदेषु च महौषधिः ।
दीयते क्षीयते सामः कामकायविवर्द्धनः ॥ १३ ॥
इस रुक्मेश रसके सेवन करनेसे शरीर शुद्ध होजाता है तथा सुंदर
और दृढ़ होजाता है। एवं अत्यन्त बलवान् होता है। यौवन स्थिर
रहता है और आयुकी वृद्धि होती है । विष्टम्भाजीर्ण, कठिन उदरामय,
अधोगत सर्व प्रकारके रोग और गुह्यद्वारोद्भव रोगादिकोंकी यह उत्तम
औषधि है। इसके सेवन करनेसे आमदोष नष्ट होकर काम और
शरीरकी शोभाकी वृद्धि होती है ॥ १२ ॥ १३ ॥
इच्छाभेदी गुटिका ।
पारदं गन्धकं कुर्यात्सौभाग्यं पिप्पलीसमम् ।
समानि जयपालानि क्रियन्ते रेचनाय च ।
शीतेन रेचयेत्सम्यगुष्णेनैव प्रशाम्यति ॥ १४ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, सुहागा और पीपल यह सब समान
भाग और सबकी बराबर शुद्ध जमालगोटे लेवे, इन सबको एकत्र
खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बना लेवे, एक गोली शीतल
जलके साथ सेवन करे। इसपर शीतल जलादिक शीतल क्रिया करनेसे
दस्त होते हैं और उष्णजल पान आदि उष्णक्रिया करनेसे दस्त बंद
हो जाते हैं। इसको 'इच्छाभेदी गुटिका' कहते हैं ॥ १४ ॥
दूसरा इच्छाभेदी रस ।
शुण्ठीमरीचसंयुक्तं रसगन्धकटङ्कणम् ।
जैपालास्त्रिगुणाः प्रोक्ताः सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ॥१५॥
इच्छाभेदी द्विगुञ्जः स्यात्सितया सह दापयेत् ।
यावन्तश्चिल्लुकाः पीतास्तावद्वारान्विरेचयेत् ।
तक्रौदनं खादितव्यमिच्छाभेदी यथेच्छया ॥१६॥
भाषाटीकासहित । (१०५)
सोंठ, मिरच, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक और सुहागा यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग शुद्ध जमालगोटेका चूर्ण तीन भाग इन
सबको एकत्र मिलाकर जलमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियां
बनालेवे, इसमेंसे एक गोली लेकर मिश्रीके साथ सेवन करे और ऊप-
रसे शीतल जल पीवे, इसपर जितने जलके घूट पान करेगा उतनी बार
दस्त होंगे, जब अच्छे प्रकारसे दस्त होचुकें तो यथेच्छ तक्रके साथ
भात खाना चाहिये ( इसको इच्छाभेदी रस कहते हैं ) ॥ १५॥१६॥
पुष्परेचनी गुटिका ।
देवदाली स्वर्णपुष्पं गुडेन वटकीकृतम् ।
गुदमध्ये प्रदेयैषा पातयेच्च महागदम् ॥ १७ ॥
अधश्च साममायाति पुनः सा दीयते गुदे ।
प्रक्षाल्य वारिणा चैषा वारंवारं प्रयच्छति ॥ १८ ॥
अनेन क्रमयोगेन मलमामं विरेचनम् ।
जायते सकलं देहं शुद्धवर्णं निरामयम् ॥ १९ ॥
बंदाल और अमलतासके गुदेको बराबर लेकर दुगुने गुडमें मर्दन
करके वर्ती बनावे एक वर्तीको गुदामें प्रवेश करे, इससे अनेक प्रकारके
दुःसाध्य रोग पतित होकर अच्छे प्रकारसे दस्त होजाते हैं । जबतक
आमदोष अच्छे प्रकारसे न निकल जाये तबतक बराबर वर्ती रखे ।
एक वर्तीको निकालकर जलसे गुह्यद्वारको धोकर फिर दूसरी वर्ती
प्रवेश करनी चाहिये इस प्रकार करनेसे आम और मल विरेचनद्वारा
निकलकर शरीर शुद्ध और निरोग हो जाता है ॥ १७-१९ ॥
सर्वाङ्गसुन्दर रस ।
शुद्धसूतञ्च गन्धञ्च विषञ्च जयपालकम् ।
कटुत्रयञ्च त्रिफला टङ्कणञ्च समांशकम् ॥ २० ॥
( १०६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
अस्य मात्रा प्रयोक्तव्या गुञ्जात्रयसमा ततः ।
सर्वेषु ज्वररोगेषु सामवाते विशेषतः ॥ २१ ॥
नाशयेच्छ्वासकासञ्च अग्निमान्द्यं विशेषतः ।
ब्रह्मणा निर्मितः पूर्वं रसः सर्वाङ्गसुन्दरः ॥ २२ ॥
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध विष, शुद्ध जमालगोटे, सोंठ, मिरच,
पीपल, हरड, बहेडा, आमला और सुहागा इन सब औषधियोंका
चूर्ण समान भाग लेकर एकत्र खरल करके तीन २ रत्तीकी गोली
बना लेवे ( एक गोलीकी मात्रा है ) सर्व प्रकारके ज्वर और आम-
वातमें यह औषधि विशेष करके हितकारी है तथा श्वास, खांसी और
मन्दाग्निको नष्ट करता है। यह सर्वाङ्गसुन्दर रस पूर्वकालमें ब्रह्माजीने
स्वयं निर्माण किया था ॥ २०-२२ ॥
अविरेचनीय रोगी ।
बालवृद्धकृशक्षीणपीनसार्त्तभयार्दिताः ।
रूक्षशोषतृषायुक्ता गर्भिणी च नवज्वरी ॥ २३ ॥
अधो गच्छति यस्यासृक् सूतिकातङ्कपीडिता ।
नैते विरेकयोग्याः स्युरन्येषाञ्च बलाबलम् ॥ २४ ॥
नवज्वरे च ये योगा भेदकाः परिकीर्त्तिताः ।
ते तथैव प्रयोक्तव्या वीक्ष्य देहमलादिकम् ॥ २५ ॥
अब विरेचनके अयोग्य रोगियोंको कहते हैं-बालक, वृद्ध, कृश,
क्षीण, पीनसरोगी, भयातुर, रूक्ष, शोष और तृषासे पीडित, गर्भवती
स्त्री, नवीन ज्वरवाला, अधोगत रक्तपित्त रोगी और सूतिका रोग-
वाली स्त्री इन सबको विरेचन नहीं देना चाहिये । इनके अतिरिक्त
अन्यान्य रोगोंमें रोगीका बलाबल विचारकर विरेचन देना चाहिये ।
नवीनज्वरमें जो भेदक योग कहे हैं वही योग देवे और दोष दूष्यादि
भाषाटीकासहित । ( १०७ )
विचार करही इन विरेचन योगोंका जैसे उचित हो वैसे प्रयोग
करना चाहिये ॥ २३-२५ ॥ इति विरेकाधिकारः ॥
अथ ज्वरचिकित्सा ।
नवज्वरांकुश रस ।
क्रमेण वृद्धात्रसगन्धहिंगुलान्नैकुम्भबीजान्यथ दन्ति-
वारिणा । पिष्ट्वास्य गुञ्जाभिनवज्वरापहा जलेन
चार्द्रासितया प्रयोजिता ॥ १ ॥
ज्वर संपूर्ण रोगोंमें प्रधान है अतएव प्रथम ज्वरकी चिकित्सा
कहते हैं-पारा १ भाग, गंधक २ भाग, सिंगरफ ३ भाग और जमा-
लगोटे ४ भाग इन सबको विधिपूर्वक रगड़ करके दन्तीके क्वाथकी
सात बार भावना देवे और फिर एक एक रत्तीकी गोली बनालेवे एक
गोली मिश्रीके शर्बतके साथ सेवन करे, इसके सेवन करनेसे दस्त
होकर नवीन ज्वर नष्ट होजाता है । इसको नवज्वरांकुश रस कहते हैं
( जहांपर किसी भी योगमें पारा और गंधक हो वह पहले कज्जली
करके ही मिलाना चाहिये ) ॥ १ ॥
हिंगुलेश्वर रस ।
तुल्यांशं मर्दयेत्खल्ले पिप्पली हिंगुलं विषम् ।
द्विगुञ्जा मधुना देया वातज्वरनिवृत्तये ॥ २ ॥
पीपल, सिंगरफ और विष यह तीनों औषधि समान भाग लेकर
खरलमें अच्छे प्रकारसे मर्दन करके दो दो रत्तीकी गोली बना लेवे
इसको शहदके साथ खाये इससे वातज्वर नष्ट होजाता है इसको हिंगु-
लेश्वर रस कहते हैं ॥ २ ॥
ज्वरधूमकेतु ।
भवेत्समं सूतसमुद्रफेनहिंगूलगन्धं परिमर्द्य यत्नात् ।
नवज्वरे वल्लमितं त्रिघस्रमार्द्राम्बुनायं ज्वरधूमकेतुः३