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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 584 में से

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पृष्ठ 121

भाषाटीकासहित । (९५)
सिंगियाविष ( तेलिया मिट्टी या बच्छनाग ) लेकर उसके चणेके
समान छोटे २ टुकडे करे, इनको तीन दिन गोमूत्रमें भिगोकर रक्खे
चौथे दिन निकाल कर समभाग सुहागा डालकर पीस ले, जब सूख
जाये तो सिंगिये विषको मरा हुआ ( या शुद्ध ) जानना, यह औषधि-
योंमें मिलाने योग्य शुद्ध विष होजाता है ॥ ७४ ॥
अन्यप्रकारसे विषशोधन ।
अथवा त्रैफले क्वाथे विषं शुद्धयति पाचितम् ।
दोलायां त्रिफलाक्वाथे छागीक्षीरे च पाचितम्॥७५॥
त्रिफलेके क्वाथमें दोलायन्त्र द्वारा चार पहर पकानेसे भी विष शुद्ध
होजाता है । अथवा बकरीके दूधमें दोलायन्त्र द्वारा चार पहर पकावे
तो विष शुद्ध होजाता है ॥ ७५ ॥
गोमूत्रपूर्णपात्रे च दोलायन्त्रे विषं पचेत् ।
दशतोलकमानेन चादौ वैद्यो दिवानिशम् ॥ ७६ ॥
अथवा दश तोला विषके छोटे २ ठुकडे कर पोटलीमें बांध गोमू-
त्रसे भरे पात्रमें एक दिन रात दोलायन्त्रकी विधिसे पकावे, फिर निकाल
गर्म जलसे धोकर सुखा ले तो विष शुद्ध होजाता है ॥ ७६ ॥
विषभागाँश्चणकवत्स्थूलान्कृत्वा तु भाजने ।
तत्र गोमूत्रकं दत्त्वा प्रत्यहं नित्यनूतनम् ॥ ७७ ॥
शोषयेन्त्रिदिनादूर्ध्वं धृत्वा तीव्रातपे ततः ।
प्रयोगेषु प्रयुञ्जीत भागमानेन तद्विधम् ॥ ७८ ॥
अथवा विषको चनेके समान छोटा छोटा करके मट्टीके पात्रमें
रक्खे इसमें गोमूत्र डाल दे और एक दिन रक्खा रहने दे, दूसरे दिन
पहला गोमूत्र निकालकर फेंक दे और नवीन ( ताजा ) गोमूत्र उसमें