रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
प्रवालमारण ।
स्त्रीदुग्धेन प्रवालञ्च भावयित्वा तु हण्डिके ।
मध्येऽपि तक्रसहितं स्थापयेत्तां निरोधयेत् ।
चूल्ह्यामग्निप्रतापेन म्रियते प्रहरद्वये ॥ ७१ ॥
प्रवाल (मूँगे) को स्त्रीके दूधमें भिगोकर सुखा ले फिर एक हांडीमें
नीचे ऊपर तक ( मट्ठा ) डालकर बीचमें मूँगा रख हांडीका मुख बंद
करके चूल्हेपर चढ़ा नीचे दो पहरकी तीक्ष्णाग्नि देवे तो मूँगोंकी भस्म
होजाती है ॥ ७१ ॥
सब रत्न और मणियोंका शोधन ।
कुलत्थस्य पलशतं वारिद्रोणेन पाचयेत् ।
तस्मिन्पादावशेषे च क्वाथेऽष्टौ मणयःशिलाः॥७२॥
आतपे त्रिदिनं शोध्याः क्वाथसिक्ताः पुनः पुनः ।
शुद्ध्यन्ते सर्वरत्नानि मणयश्च न संशयः॥ ७३ ॥
सौ पल कुलथीको एक द्रोण पानीमें पकावे चौथा भाग शेष
रहनेपर उतारकर छान ले, इस क्वाथसे मणि मुक्ता आदिको बार २
सेचन कर तीन दिन धूपमें रक्खे तो श्वेत, रक्त, नीलादि मणियाँ
मोती आदि रत्न और मनशिल यह सब शुद्ध हो जाते हैं इसमें
संशय नहीं । तात्पर्य्य यह हुआ कि, जिस रत्नको शोधन करना हो उसको
पात्रमें डाल धूपमें रक्खे और बार २ कुलथीके क्वाथसे सींचता रहे, इस
प्रकार तीन दिन धूपमें रखनेसे रत्न अवश्य शुद्ध होजायगा ॥७२--७३॥
इति मुक्तादि शोधन मारण ।
विषका शोधन मारण ।
कृत्वा चणकसंस्थानं गोमूत्रैर्भावयेत्त्र्यहम् ।
समटङ्कणसंपिष्टं मृतमित्युच्यते विषम् ॥ ७४ ॥