रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
जैपालाष्टौ द्विको गन्धस्त्रिशुण्ठी मरिचं द्विकम् ।
एकः सूतः सोहागैका गुञ्जामात्रा वटी कृता ॥ ४ ॥
शूलव्याधिप्रभृतयः कुष्ठैकादशपित्तजाः ।
भगन्दरादिहृद्रोगाः सर्वे नश्यन्ति भक्षणात् ॥ ५ ॥
अन्य इच्छाभेदी-जमालगोटेका चूर्ण ८ भाग, गंधक दो भाग, सोंठ
तीन भाग, कालीमिर्च २ भाग, पारा १ भाग और सुहागा १ भाग
इन सब पदार्थोंको एकत्र कर जलके साथ मर्दन करके एक एक रत्तीकी
गोली बनालेवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अच्छे प्रकारसे विरेचन
होकर शरीर शुद्ध होजाता है तथा शूलादि रोग, कुष्ठ, ग्यारह प्रकारके
पित्तरोग, भगंदर और हृद्रोगादि समस्त रोग तत्काल नष्ट होजाते
हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥
गदमुरारि इच्छाभेदी ।
रसवलिगगनार्कं शुद्धतालं विषञ्च
त्रिफलत्रिकटुमेतट्टङ्कणं भृङ्गमेभिः ।
सममिह जयपालोद्भूतचूर्णं विमर्द्य
द्विनिशमनिशमेतद्भृङ्गराजोत्थवारि ॥ ६ ॥
भवति गदमुरारिः स्वेच्छया भेदकोऽयं
हरति सकलरोगान्सन्निपातानशेषान् ।
इह हि भवति पथ्यं मत्स्यमांसादि सर्वं
घृतविलुलितमस्मिन्भोजनं भूरि देयम् ॥ ७ ॥
पारा, गंधक, अभ्रकभस्म, ताम्रभस्म, हरितालभस्म, विष, त्रिफला,
त्रिकुटा, सुहागा और दालचीनी यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग
और जमालगोटेका चूर्ण सब औषधियोंकी बराबर लेवे; इन सबको
एकत्र करके भांगरेके रसमें दो दिनतक निरंतर मर्दन करके